आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव

वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव

वारुणी पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिन्दू पर्व है, जो जल के देवता वरुण की उपासना और जल के महत्व की स्मृति से जुड़ा है। भविष्यपुराण, नारदपुराण और स्कन्दपुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। यह पर्व जल संरक्षण, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और भारतीय परंपरा में जल के आध्यात्मिक महत्व का स्मरण कराता है।

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हिन्दू परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है। इस दिन को “वारुणी पर्व” के नाम से मनाया जाता है, जिसका मूल उद्देश्य जल  के देवता “वरुण देव” को श्रद्धा अर्पित करना तथा जीवन में जल  के महत्व को स्मरण करना और समझना है । वारुणी का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जिनमें भविष्यपुराण, नारदपुराण, स्कन्दपुराण तथा त्रिस्थलीसेतु के श्लोक सम्मिलित हैं। इन ग्रंथों के अनुसार इस दिन की विशिष्ट ज्योतिषीय स्थिति, विशेष रीति‑रिवाज़ और इसके अद्वितीय फल स्पष्ट किये गये हैं।

वरुण देव को समर्पित है वारुणी पर्व
वरुण देव को समर्पित है वारुणी पर्व

 पुराणों में वर्णित वारुणी पर्व :

भविष्यपुराण में कहा गया है -
“चैत्रे मासि सिताष्टम्यां शनौ शतभिषा यदि ।
  गंगाया यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा ।”

 अर्थात यदि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को शनिवार हो और साथ ही शतभिषा नक्षत्र भी हो, तो उस दिन गंगा स्नान करने से सौौ सूर्य ग्रहणों के समय किए गए स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है । इसीलिए इस पर्व को “महावारुणी” कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यदि इस त्रयोदशी के दिन शनिवार तथा शतभिषा नक्षत्र का योग हो तो यह महावारुणी बन जाता है । इस दिन स्नान, दान तथा श्राद्ध के कार्य “अक्षय” अर्थात् कभी समाप्त न होने वाले फल प्रदान करते हैं।

नारदपुराण में इस पर्व को कुछ इस प्रकार से उल्लेखित किया गया है -
               “वारुणेन समायुक्ता मधौ कृष्णा त्रयोदशी ।
               गंगायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा।”

यह श्लोक दर्शाता है कि मधु‑त्रयोदशी (चैत्र की कृष्णत्रयोदशी) में वरुण के संलग्न होने पर गंगा में स्नान करने से सूर्य‑ग्रहों के समान अनन्त फल प्राप्त होते हैं । स्कन्दपुराण में भी इसी भावना को दोहराया गया है -
“वारुणेन समायुक्ता मधौ कृष्णा त्रयोदशी।
गङ्गायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा॥
शनिवारसमायुक्ता सा महावारुणी स्मृता।
गङ्गायां यदि लभ्येत कोटिसूर्यग्रहैः समा॥”

यहाँ “महावारुणी” शब्द को विशेष रूप से शनिवार के साथ जोड़कर कहा गया है, तथा यदि गंगा में स्नान किया जाये तो कोटियों‑सूर्यग्रहों के समान अत्यंत विशाल पुण्य प्राप्त होता है।

इन सभी श्लोकों से स्पष्ट होता है कि वारुणी पर्व केवल जल‑देवता की पूजा ही नहीं, बल्कि ज्योतिषीय स्थिति के आधार पर अतिप्रसिद्ध “महावारुणी” तथा अत्यंत दुर्लभ “महमहावारुणी” (यदि शुभ योग भी साथ हो) एक महत्त्वपूर्ण योग है जो न केवल इस दिन की महत्ता बताता है अपितु भारतीय ज्ञान परंपरा का भी प्रतीक है।

पुराणों में भी वर्णित है इस पर्व का महत्त्व
पुराणों में भी वर्णित है इस पर्व का महत्त्व

इससे यह भी सहज ही समझा जा सकता है कि जब विश्व के अनेक कोनों में मानव सभ्यता विकास की प्रारंभिक अवस्था में थी वहीं समकालीन भारतीय उपमहाद्वीप विकास की उत्कृष्ट अवस्था में था ।

भारतीय परंपरा में अनुष्ठानों का विशेष महत्व है या यूँ कहें तो अधिक उचित होगा कि भिन्न-भिन्न पर्वों में किये जाने वाले विभिन्न अनुष्ठान यहाँ के पर्व और त्योहारों को रोचक और सुन्दर बनाते हैं। वारुणी पर्व से सम्बंधित प्रमुख अनुष्ठानों में पवित्र नद्य‑स्नान जिसमें गंगा, यमुना, या किसी भी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है और यदि नदी में जाकर स्नान करना संभव न हो तो उन नदियों का जल घर पर लाकर स्नान किये जाने वाले जल में मिला दिया जाता है मान्यतानुसार स्नान के समय “अक्षय पुण्य” प्राप्त होता है, जैसा कि श्लोकों में वर्णित है।

पुण्यफल की कामना से किया जाता है स्नान
पुण्यफल की कामना से किया जाता है स्नान

दान देने की परंपरा भी भारत में लगभग सभी पर्व और त्योहारों पर निभायी जाती है यदि विश्लेष्णात्मक दृष्टिकोण से देखें तो लगता है कि यह पद्धति वर्तमान में वर्णित नागरिक कर्तव्यों की भांति प्रतीत होती है । जो सहअस्तित्व  और सहिष्णुता का भाव हमारे भारतीय दर्शन में है कि हमें अपने तक न सीमित होकर सबके कल्याण के लिए कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए यही शायद इस परंपरा का भाव होगा।

इस दिन की दान‑पद्धति को “अक्षय” कहा गया है, अर्थात् दान के फल कभी समाप्त नहीं होते । दान के स्वरूप में भोजन, कपड़े या अन्य आवश्यक वस्तुएँ शामिल हो सकती हैं, परन्तु इसका मुख्य उद्देश्य निःस्वार्थ सेवा एवं जल‑संरक्षण को प्रेरित करना है।

वारुणी पर्व के मुख्य देवता वरुण के साथ देवों के देव महादेव की भी पूजा की जाती है । शिव जिन्होंने माँ गंगा को श्रीरोधार्य किया है माना जाता है कि उनकी पूजा से इस जल‑पर्व में आध्यात्मिक शुद्धि व ऊर्जा का संचार होता है ।

पौराणिक कथा एवं प्रतीकात्मक अर्थ के अनुसार वारुणी पर्व का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा से भी जुड़ता है । पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अनेक बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुई थी । उसी समय भगवान विष्णु ने वरुण‑अवतार धारण किया था, जिससे जल‑स्रोतों की महत्ता को रेखांकित किया गया।

इस कथा से यह समझ आता है कि जल केवल शारीरिक जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक एवं सामाजिक संतुलन का भी मूल स्तम्भ है । इसलिए वारुणी पर्व हमें जल के संरक्षण, उसके सदुपयोग और जल‑संसाधनों के प्रति कृतज्ञता का हाव रखने की ओर प्रेरित करता है ।

वारुणी पर्व न केवल जल‑देवता वरुण को समर्पित एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह जल के संरक्षण एवं सतत् उपयोग की सामाजिक सीख भी प्रदान करता है। भारत के हर तीज-त्यौहार और पर्व में उन्हें मनाने के समय और पद्धति में वैज्ञानिकता और तार्किकता निहित है जिसे हमें जानने और समझने की आवश्यकता है।

“वर्ल्ड वाटर डे” जो प्रतिवर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है इसकी घोषणा वर्ष 1993 में पहली बार की गयी थी । यह दिन विशेष इस ओर इंगित करता है जहाँ विश्व में तथाकथित विकसित देशों को जल का महत्त्व समझने में इतने अधिक वर्ष लग गए वहीं यह पर्व न जाने कितनी सदियों पूर्व से ही हमारी सनातन संस्कृति का अंग है।

22 मार्च- विश्व जल संरक्षण दिवस
22 मार्च- विश्व जल संरक्षण दिवस

यह पर्व जल में निहित जीवन तत्व उसकी  पवित्रता तथा उसके जीवन‑स्रोत के रूप में महत्व को और भी सुदृढ़ करता है । अंत में कहा जा सकता है कि वारुणी पर्व हमें जल के महत्व की स्मृति दिलाते हुए, इसे संरक्षित करने, उसका सदुपयोग करने और उसमें निहित प्राणदायी तत्वों के प्रति कृतज्ञ होने की प्रेरणा देता है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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