आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार

नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप

सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप



(दक्षिण कोसल टुडे द्वारा सम्पादकीय भूमिका)

हमारी लोक परम्परा में घर की देहरी लकड़ी की चौखट से कहीं बढ़कर कुल की मर्यादा और सुख-सौभाग्य की प्रहरी है। चौखट को गोबर से लीपना, चौक पूरना, आम के पत्तों का बंदनवार सजाना आदि नानाविध तरीकों से हम अपने-अपने द्वार-बार को सजाते हैं। हमारे गाँवों में तो यह द्वार-सज्जा आज भी अपनी पूरी सुघड़ता के साथ जीवित है। मध्यप्रदेश जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी की पत्रिका चौमासा (वर्ष 39, अंक 121) से साभार लिया गया व डॉ. दीपा दत्तात्रय कुचेकर द्वारा लिखा गया यह लेख हमें घर की ड्योढ़ी के माहात्म्य से अवगत कराता है और इसके पावन पक्ष से जोड़ता है। आइए, अपनी देहरी को जतन से सजाने और पूजने की इस चिरन्तन परम्परा को और निकटता से समझें।

 



सबहिं धरे सजि निज-निज द्वारे: भारत में द्वार-सज्जा के विविध रूप
 

आदिम युग में जब मनुष्य ने अपनी सुरक्षा हेतु झुग्गी-झोपड़ी का निर्माण किया, तब से निवास की जगह उसके लिए आत्मज बनती गई। उसके लिए वह तीनों ऋतुओं में लिए प्राथमिक जरूरतों का हिस्सा बनी, अनाज और वस्त्र की तरह।

जहाँ हम खाते-पीते, सोते रहते हैं, वह स्थान सुंदर, सुशोभित, प्रसन्न होना चाहिए इस उद्देश्य से घर को सजाया जाने लगा। इसकी सुरक्षा और सुंदरता का विशेष ख्याल रखा जाने लगा। आँगन से लेकर कोना-कोना सुंदर सुशोभित होने लगा। दीवारों को मिट्टी पानी के घोल से पोता जाने लगा। आँगन को गोबर पानी से लीपा पोता जाने लगा। घर में अन्य जीव-जंतु प्रविष्ट ना हो इस कारण सुरक्षा हेतु दहलीज लगा दी गई, जो आगे चलकर सुरक्षा, सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, मर्यादा आदि का साक्ष्य बनी। सामान्य रूप में इसे दहलीज देहरी, देहली या डेली कहा जाता है। यह ड्योढ़ी, बरोठा, द्वार पिंडी भी कही जाती है। जनमानस में यह मान्यता है कि घर में जो भी व्यक्ति प्रवेश करें वह घर की दहलीज लाँघ कर ही घर में दाखिल हो। इस प्रकार दहलीज घर का महत्त्वपूर्ण हिस्सा या घर की मर्यादा और सीमा रेखा बनी।

घर की दहलीज का महत्त्व परंपरागत रूप में भी है। ऐसी मान्यता है कि जब लक्ष्मी घर आती है तो वह इसे लाँघकर आती है, इसलिए इसे शुभ माना जाता है।
घर में अनेक चीजें प्रवेश करती हैं। उन्हें हम अच्छी-बुरी, शुभ-अशुभ, मंगल-अमंगल ऐसे कई नामों से सम्बोधित करते हैं और मानते भी हैं। जो बुरा, अशुभ, अमंगल है, उसे रोकने का काम दहलीज करती है। इसलिए इसका नित्य-पूजन, अलंकरण किया जाता है। जो अमंगल है उसे घर में प्रवेश ना मिले, घर के धन-वैभव में वृद्धि हो इसीलिए मान्यता के अनुसार शुभंकर, मांगलिक चिन्हों से द्वार का अलंकरण किया जाता है।

अलग-अलग अवसर पर अलग-अलग रूप में द्वार अलंकरण किया जाता है। नित्य अलंकरण से यह कुछ अलग होता है। उसके पीछे भी कुछ मान्यता है। प्रतिदिन दहलीज अलंकरण में हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल, अगरबत्ती, धूप-दीप का समावेश होता है। कई स्थानों पर गेरू, हल्दी, चावल का आटा आदि का भी प्रयोग किया जाता है।

वर्तमान समय में गेरू के स्थान पर गेरुआ रंग लगाया जाता है। हल्दी के स्थान पर पीले रंग का प्रयोग कर द्वार को सुशोभित किया जाता है।

अन्य अवसर पर घी या तेल का दीपक, स्वस्तिक, लक्ष्मी जी के पाद-कमल, रंगोली आदि का उपयोग किया जाता है। विशेष अवसरों, तीज-त्योहारों पर फूलों की मालाएँ पत्ते एवं अन्य चीजों से यह अलंकरण किया जाता है।

भारत की भूमि वैविध्य पूर्ण है। यहाँ का खान-पान, रहन-सहन, ओढ़ना-पहनना सभी में विविधता में एकता के दर्शन होते हैं। उसी रूप में द्वार अलंकरण भी अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में देखने को मिलता है। कहीं सुबह तो कहीं शाम को द्वार अलंकरण किया जाता है।

द्वार अलंकरण में द्वार को धोकर उस पर गेरू के रंग से लीपा-पोती की जाती है। बाद में हल्दी, चावल का आटा आदि से चित्रांकन किया जाता है। बाद में हल्दी, कुमकुम, चावल, फूल डालकर गुड़, शक्कर, मिसरी, बताशे आदि से पूजन किया जाता है। द्वार के लिए शुभ माने जाने वाले वृक्ष आम, खैर, श्रीराम, गूलर आदि की लकड़ी का उपयोग किया जाता है।

कुमकुम, नागकेसर, लाल चंदन, केसर, शहद, दही एकत्र किया जाता है। इससे द्वार के दोनों ओर स्वस्तिक निकाली जाती है। बीच में पाँच तिलक लगाए जाते हैं जो पंचतत्व के प्रतीक माने जाते हैं। वहीं पास में लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाए जाते हैं। उस पर चावल चढ़ाये जाते हैं। द्वार को धूप, अगरबत्ती से सुगंधित किया जाता है। द्वार के सामने चार मुँह वाला दीपक जिसमें तिल का तेल या शुद्ध घी होता है, उसे जलाया जाता है। इसमें मिट्टी का दीया महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अन्य दीपक भी जलते हैं। ऐसी मान्यता है कि द्वार पर लक्ष्मी का स्थान होता है। द्वार अलंकरण में दहलीज के ऊपरी हिस्से में लक्ष्मी और गणेश का चित्र लगाया जाता है। चौखट के दोनों ओर शुभ-लाभ लिखा जाता है।

द्वार के दोनों ओर शंख और पद्म के चिन्ह बनाए जाते हैं, जो कुमकुम या रंगोली से बनते हैं। इस अलंकरण का उद्देश्य शक्ति, चैतन्य, आनंद, शांति आदि का निर्माण हो और समृद्धि प्राप्ति हो, यह माना जाता है।

द्वार अलंकरण में रंगोली का अपना महत्त्व है। रंगोली चौंसठ कला में से एक कला है। गोबर से पुताई कर उस पर रंगोली निकालना शुभ माना जाता है। यह सुंदरता और मंगलमय माना जाता है।

द्वार के सामने दीपक जलाना, आम के पत्ते, गेंदे के फूल आदि की माला बनाकर लगाना, रंगोली बनाना, धूप-अगरबत्ती से सुगंधित करना आदि अलंकरण धन-धान्य, समृद्धि के प्रतीक हैं, जो शुभंकर हैं। यह आदिम रूप से चली आ रही द्वार अलंकरण परंपरा अब नए-नए रूप धारण कर रही है। पहले असली घी के दीप जलते थे, अब विद्युत दीप जलते हैं। असली फूल-पत्तों की माला होती थी, अब अन्य सामग्री से बनी होती हैं, जो भी हो उद्देश्य वही शुभ फल प्राप्ति का है, मंगल कामना का है। चीजें बदली जरूर हैं, मगर अलंकरण की परंपरा जीवित है।

लेखक -
डॉ. दीपा दत्तात्रय कुचेकर

Follow us on social media and share!