आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

वनवासी प्रभु श्रीराम: त्याग, और मर्यादा के मूर्तिमन्त रूप

वनवासी प्रभु श्रीराम: त्याग, और मर्यादा के मूर्तिमन्त रूप


राम का वनवास न केवल भारतीय संस्कृति वरन् समूची मानवसभ्यता की सुदीर्घ यात्रा में त्याग और मर्यादा का सबसे बड़ा अध्याय है। शुभम गोंडीकार जी द्वारा रचित यह आलेख श्रीराम की वनवास कथा का अत्यन्त सुन्दर और भक्तिपूर्ण वर्णन प्रस्तुत करता है। अयोध्या के राजमहल से लेकर किष्किन्धा में परम भक्त हनुमान जी से भेंट तक, श्रीराम के वनवास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि जैसे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी श्रीराम ने अपने धर्म और मर्यादा का कभी त्याग नहीं किया, वैसे ही आज के अधिकारों के लिए मचे संघर्ष में समाज को इन मूल्यों की नितान्त आवश्यकता है।


इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी नरेश महाराज दशरथ के कुशल शासन में अयोध्या एक परम वैभवशाली राज्य था। महाराज दशरथ के चार पुत्र थे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। ज्येष्ठ राजकुमार श्रीराम अपनी सत्यनिष्ठा, धर्मपरायणता, कार्यकुशलता और तेजस्विता के लिए सम्पूर्ण जगत में विख्यात थे। वे प्रत्येक नागरिक के लिए धर्म के साक्षात् प्रतिमान थे और अयोध्या की प्रजा अपने प्राणों से भी अधिक उन पर स्नेह करती थी।

समय व्यतीत होने के साथ जब महाराज दशरथ ने वृद्धावस्था में प्रवेश किया, तो उन्होंने अयोध्या का राज्याधिकार अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को सौंपने का निर्णय लिया। सम्पूर्ण अयोध्या नगरी ने इस समाचार को अत्यन्त हर्ष और उत्साह के साथ मनाया। परन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। माता कैकेयी की एक प्रिय दासी थी मन्थरा। मन्थरा के नकारात्मक और विषैले विचारों ने माता कैकेयी की मति भ्रमित कर दी।

वचनबद्धता के कारण वनवास का आदेश देकर व्यथित राजा दशरथ
वचनबद्धता के कारण वनवास का आदेश देकर व्यथित राजा दशरथ 

मन्थरा ने उन्हें उन दो वरदानों का स्मरण कराया जो महाराज दशरथ ने उन्हें पूर्व में एक युद्ध के दौरान प्रसन्न होकर दिए थे। अवसर पाकर माता कैकेयी ने महाराज दशरथ से श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन मांग लिया। यह सुनकर महाराज दशरथ का हृदय विदीर्ण हो गया। परन्तु अपने पिता के वचनों का मान रखते हुए, श्रीराम ने भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनवास की पावन यात्रा आरम्भ की।

वनवास के मार्ग पर अग्रसर होते हुए श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी गंगा तट पर पहुंचे। वहां निषादराज गुह ने अत्यन्त आदर और सम्मान के साथ उनका सत्कार किया। इसी तट पर उनकी भेंट केवट नामक नाविक से हुई, जिसने प्रभु के प्रति अपनी अगाध भक्ति और निश्छल प्रेम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

केवट - अगाध भक्ति और प्रेम का स्वरुप
केवट - अगाध भक्ति और प्रेम का स्वरुप 

चित्रकूट में निवास और भरत मिलाप गंगा पार कर प्रभु श्रीराम ने चित्रकूट के सुरम्य वन को अपना निवास स्थान बनाया। कुछ काल पश्चात्, भ्राता भरत उन्हें खोजते हुए चित्रकूट पहुंचे और अत्यन्त करुण भाव से श्रीराम से अयोध्या लौटने की विनती की। परन्तु श्रीराम ने धर्म का पालन करते हुए वापस लौटने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया और भरत को पादुकाएं सौंपकर विदा किया।

दंडकारण्य और पंचवटी में प्रवेश चित्रकूट से प्रस्थान कर वे दंडकारण्य के गहन वन में पहुंचे। वहां अनेक ऋषि मुनि राक्षसों के निरन्तर भय और आतंक के साये में जीवन व्यतीत कर रहे थे। ऋषियों को अभयदान देकर श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी पंचवटी में आकर बस गए। वहां लक्ष्मण जी ने श्रीराम और माता सीता के निवास के लिए एक सुन्दर पर्णकुटी का निर्माण किया। यह उनके अगाध प्रेम का ही प्रमाण है कि वनवास के 14 वर्षों के दौरान लक्ष्मण जी ने भ्राता की सेवा हेतु एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं ली, और उनकी निद्रा उनकी पत्नी उर्मिला जी ने ग्रहण कर ली थी।

एक दिन सहसा शूर्पणखा नामक राक्षसी वहां आई और उसने श्रीराम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। श्रीराम द्वारा उसे अस्वीकार किए जाने पर, उसने ईर्ष्यावश माता सीता पर प्रहार करने का प्रयास किया। यह देखकर लक्ष्मण जी ने तत्काल उसकी नासिका काट दी। विलाप करती हुई वह अपने भ्राता लंकापति रावण के पास पहुंची और उसने श्रीराम तथा लक्ष्मण जी के पराक्रम के साथ साथ माता सीता के अलौकिक सौन्दर्य का वर्णन किया। इसे सुनकर रावण के मन में माता सीता को पाने की पापिनी लालसा जाग्रत हुई और उसने हरण का षड्यन्त्र रचा।

मारीच प्रसंग और सीता हरण रावण के षड्यन्त्र के अन्तर्गत मारीच नामक राक्षस ने स्वयं को एक अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक स्वर्ण मृग में परिवर्तित कर लिया। माता सीता उस स्वर्ण मृग के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गईं और उन्होंने श्रीराम से उस मृग को लाने का अनुरोध किया। श्रीराम उस मृग के पीछे वन के भीतर चले गए। मृत्यु से पूर्व मारीच ने श्रीराम के स्वर में आर्तनाद किया। उस करुण पुकार को सुनकर माता सीता अत्यन्त चिन्तित हो उठीं कि वन में ऐसा कौन है जो उनके स्वामी को पीड़ा पहुंचा रहा है। उन्होंने लक्ष्मण जी को श्रीराम की सहायता के लिए भेजा।

लक्ष्मण जी वन जाने से पूर्व कुटी के द्वार पर एक अभेद्य 'लक्ष्मण रेखा' खींच गए और उन्होंने माता सीता से किसी भी परिस्थिति में उस रेखा को पार न करने का अनुरोध किया। लक्ष्मण जी के जाते ही रावण एक ऋषि का वेश धारण कर वहां पहुंचा और उसने भिक्षा के लिए माता सीता को लक्ष्मण रेखा पार करने के लिए विवश कर दिया। रेखा पार करते ही रावण अपने मूल स्वरूप में आ गया और माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में ले जाकर बन्दी बना लिया। ज्ञात हो कि माता सीता लगभग 10 मास (अशोक वाटिका में 300 दिन) तक रावण की लंका में बन्दी रही थीं।


रावण- जिसने छल से माता सीता का हरण किया 

जब श्रीराम और लक्ष्मण जी कुटिया में लौटे, तो माता सीता को वहां न पाकर वे अत्यन्त व्याकुल हो गए। सीता जी की रक्षा के लिए पक्षिराज जटायु ने रावण से भयंकर युद्ध किया था, परन्तु रावण ने उनके पंख काट दिए थे। वन में खोजते हुए श्रीराम को घायल जटायु मिले, जिन्होंने प्राण त्यागने से पूर्व प्रभु को यह सूचना दी कि रावण माता सीता का हरण कर दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।

किष्किन्धा में प्रवेश और हनुमान जी से भेंट माता सीता को खोजते हुए दोनों भाई किष्किन्धा नगरी के समीप पहुंचे। उन्हें आते देखकर सुग्रीव ने हनुमान जी को उनका परिचय जानने के लिए भेजा। हनुमान जी एक विप्र का वेश धारण कर श्रीराम और लक्ष्मण जी के सम्मुख उपस्थित हुए।

श्रीराम ने अपने परम भक्त हनुमान जी के कर्ण कुंडल और दिव्य तिलक को पहचान लिया और उन्हें सम्बोधित किया। यह सुनकर हनुमान जी अत्यन्त आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि उनका मानना था कि उनके मूल स्वरूप को केवल उनकी माता, उनके गुरु और उनके आराध्य प्रभु श्रीराम ही पहचान सकते हैं। हनुमान जी ने यह पूर्णतः समझ लिया कि ये कोई और नहीं, अपितु उनके आराध्य प्रभु श्रीराम ही हैं।

आराध्य और अनन्य भक्त की प्रथम भेंट
आराध्य और अनन्य भक्त की प्रथम भेंट

अपनी सुदीर्घ प्रतीक्षा को पूर्ण होते देख, हनुमान जी ने अत्यन्त प्रसन्न होकर प्रभु का जयघोष किया और आनन्द तथा भक्ति भाव से श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। हनुमान जी से यह मिलन उस महान रामायण युद्ध की पृष्ठभूमि बना, जो प्रभु श्रीराम और रावण के मध्य 13 दिनों तक चला था।

रामचरितमानस की सिद्ध चौपाई

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी।
तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥

अर्थ: माता सीता श्रीराम से कहती हैं कि जिस प्रकार प्राण के बिना देह और जल के बिना नदी का कोई मोल नहीं है, हे नाथ, ठीक उसी प्रकार पुरुष के बिना नारी का जीवन भी अपूर्ण होता है। वे एक आदर्श पत्नी के रूप में अपने कर्तव्य को व्यक्त करती हैं और प्रत्येक सुख दुख में श्रीराम का साथ चुनती हैं।

सार यह है कि श्रीराम की वनवास यात्रा केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज को एक सांस्कृतिक और आत्मीय सूत्र में पिरोने का महान अभियान था। वन के कण कण को अपनी कृपा से पावन करने वाले प्रभु श्रीराम ने निषादराज, जटायु और हनुमान जी जैसे भक्तों को जो सम्मान दिया, वह यह सिद्ध करता है कि एक आदर्श समाज की स्थापना केवल सच्चे प्रेम और समरसता से ही सम्भव है। वनवासी राम का यह चरित्र आज भी हमें धर्म, मर्यादा और लोकमंगल के मार्ग पर चलने की महान प्रेरणा देता है।

-शुभम गोण्डीकार
(लेखक बीबीए के छात्र एवं प्रबंधन के अध्येता हैं, जो अपनी लेखनी से आधुनिक व्यावसायिक विषयों और सामाजिक विमर्श में निरंतर वैचारिक योगदान करते हैं।)

 

 

Follow us on social media and share!