आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

वाचिक परंपरा और उसका महत्व

वाचिक परंपरा और उसका महत्व

मानव जीवन में अभिव्यक्ति एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्रिया है। ऐसा प्रकृति ने मानव को बनाया है कि मानव अपने मस्तिष्क में चल रहे विचारों को बिना अभिव्यक्त किए नहीं रह सकता। मानव बोल कर, चित्र बना कर, नृत्य कर, अभिनय कर अपने मस्तिष्क में चल रही भावनाओं को व्यक्त करता है। मानवीय अभिव्यक्ति जब वाचन स्वरूप बोल कर, गीत गाकर, कथा कहानी आदि के माध्यम से अभिव्यक्त होती है, और यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है तो इसे हम वाचिक परंपरा कहते है।


पंडवानी गायन करती तीजन बाई 

प्राकृतिक परिवेश में रहते हुए मानव ने प्रकृति से बहुत कुछ सिखा। आज मानव चाँद पर पहुँच गया है, हम जो कुछ जानते समझते है, उसका आधार भी वर्षों की साधना से प्रकृति के नियमों को समझ कर ही आज हम यहाँ तक पहुँच पाए है। मानव सदैव से प्रकृति के निकट ही रहा है, वह प्रकृति में होने वाली छोटे से छोटे बदलाव को लंबे समय तक देखता समझता रहा है। जीवन की आवश्यकता अनुसार पेड़-पौधे, जड़ी बूटियों, फलों का अपने स्वास्थ्य को अच्छा रखने और बीमार पड़ने पर इलाज हेतु उपयोग वह करता रहा, जिसके कारण लगातार परिणाम देने से यह एक ज्ञान के रूप में विकसित होने लगा। स्वयं और अपने पूर्वजों के अनुभवों को अगली पीढ़ी को सिखाया, और यह एक ज्ञान परंपरा के रूप में विकसित होकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते गया। 

तारा और धरा की कहानी - tara aur dharaa ki kahani
एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में वाचिक परंपरा का स्थानांतरण

प्रत्येक गाँव में कोई ना कोई ऐसा व्यक्ति अवश्य ही होगा जिन्हें प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति अवश्य ही आती होगी। अगर उनसे पूछे कि यह ज्ञान उन्हें कहाँ से प्राप्त हुआ तो वह बताते है कि उनके बड़े बुजुर्गों ने हमें यह सिखाई थी। ऐसा ही ज्ञान उन्हें मौसम का भी है।

उरांव समुदाय के महत्वपूर्ण पर्व सरहुल में प्रकृति की आराधना केवल एक सांस्कृतिक या धार्मिक प्रथा नहीं है, बल्कि इसमें पारंपरिक ज्ञान और विज्ञान का मेल भी दिखाई देता है। सरहुल के एक दिन पहले गांव के धार्मिक अगुवा, जैसे पाहन या बैगा, सरना स्थल में मिट्टी के घड़े में पानी भरकर उसे रातभर वहां छोड़ देते हैं।


मिट्टी के घड़े से मौसम सम्बंधित भविष्यवाणी

अगले दिन उपवास के दौरान वे घड़े में पानी के स्तर का निरीक्षण करते हैं। घड़े में पानी के स्तर के आधार पर वे उस वर्ष होने वाली वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं। यह प्रक्रिया केवल परंपरा पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें वातावरण की आर्द्रता का सूक्ष्म अवलोकन छिपा होता है। पानी के स्तर में हुए परिवर्तनों से धार्मिक अगुवा पर्यावरणीय परिस्थितियों का आकलन करते हैं। यह एक तर्कसंगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित परंपरा है, जो अनुभवजन्य ज्ञान का हिस्सा है।

ऐसा ही एक तकनीक हमें बीजा पंडुम के दौरान देखने को मिलती है। बीजा पंडुम के अंतिम दिन सुबह-सुबह शिकार करने चले जाते है। ऐसी मान्यता है कि अच्छा शिकार मिलने से फसल भी अच्छी होती है। अर्थात अगर वैशाख के माह में अगर जानवर अच्छी संख्या में नजर आ रहे है, अर्थात इस वर्ष बारिश भी अच्छी होगी, यह उनका अनुभवजन्य ज्ञान है। शिकार ना मिलने को अपसगुन माना जाता है, अर्थात बारिश ना होने की चेतावनी उन्हे पहले ही मिल जाती है।


शिकार की प्रतीकात्मक दृश्य

बैगा समुदाय में किस वर्ष उन्हें मधुरस निकालना है, किस वर्ष नहीं, इसका निर्धारण वह जंगल में खिलने वाले एक पुष्प से करते है। जब जंगलों एक विशेष प्रकार का फूल खिलता है, उसी वर्ष वह मधुरस निकालते है और रसनवाखाई का पर्व मनाते है।


मधुरस के छत्तों से मधुरस निकालते हुए

लंबे समय तक एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक अनुभवों का आदान प्रदान एवं विमर्श एक सुसंस्कृत ज्ञान के रूप में स्थानांतरित होता रहा, जिसे वाचिक परंपरा या श्रुति परंपरा (सुन कर ग्रहण करने वाला ज्ञान) का नाम दिया गया।  भारतीय समाज आरंभ से श्रुति परंपरा का निर्वहन करते आ रहा है।  वाचिक परंपराएं लोक गीत, लोक कथाएं, लोक नृत्य संगीत के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ज्ञान स्थानांतरित होती है।

वाचिक परंपरा हमारे लिए बेहद ही महत्वपूर्ण है। इन परंपराओं के माध्यम से हमें इतिहास, तत्कालीन संस्कृति, के संबंध में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती है। यहाँ तक की मानव की उत्पत्ति की कथाएं भी वाचिक परंपरा में मिलती है। जैसे कि पूरे विश्व में ज्यादातर संस्कृतियों के मजहबी और पौराणिक किताबों में मानव के इतिहास की शुरुआत जल प्रलय के बाद से होती है।

बैगा समुदाय में भी ऐसी ही एक कथा बताई गई है। भू वैज्ञानिक भी इसकी पुष्टि करते है कि पृथ्वी एक समय पर जल मग्न थी और धीरे धीरे मानव का विकास हुआ। अर्थात मानव विकास के आरंभिक चरण की जानकारियाँ हमें इनके वाचिक परंपरा की कथाओं से मिलती है। अर्थात वाचिक परंपरा बेहद ही प्राचीन है, जो निरंतर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित होते आ रही है।


जल प्रलय के बाद का दृश्य (ai)

मध्यकाल में छत्तीसगढ़ में कलचुरी शासक कल्याण साय के काल में बिंझवार समाज के योद्धा गोपल्ला बिंझवार ने मुगल दरबार से अपने राजा कल्याण साय को छुड़वाकर लाया था। यह कहानी हमें वाचिक परंपरा के माध्यम से देवार गीत से प्राप्त हुई। जिसे ऐतिहासिक साक्ष्यों से मिलान करने पर सही साबित हुई।


योद्धा गोपल्ला बिंझवार

भारत में जब लेखन परंपरा नहीं थी, तब भी वाचिक परंपरा विद्यमान थी, अतः हमें हमारी वाचिक परंपराओं पर पुनः ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि हम अपने गौरवशाली अतीत और अपनी ज्ञान परंपरा को भी जान सके।

लेख:
वेद प्रकाश सिंह 
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

Follow us on social media and share!