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बैगा समुदाय की अनोखी परम्परा: रसनवा खाई का पर्व

बैगा समुदाय की अनोखी परम्परा: रसनवा खाई का पर्व


भारतीय संस्कृति प्रकृति को जीवन और आस्था का आधार मानती है। पेड़ पौधों, नदियों, पर्वतों और पशु पक्षियों के प्रति कृतज्ञता का भाव भारतीय समाज में दिखाई देता है। मध्य भारत के बैगा समुदाय का रसनवा पर्व इसी परम्परा का उदाहरण है। यह पर्व प्रकृति के संकेतों, मधुमक्खियों की रक्षा, वन उपज के सीमित उपयोग से जुड़ा है। बैगा समुदाय भोजन, आवास, औषधि और आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर रहा है।  लोग औषधीय जड़ निकालने से पहले वनदेवी से अनुमति माँगते हैं। वे पौधे का कुछ भाग सुरक्षित छोड़ देते हैं, जिससे वह फिर विकसित हो सके। ऐसे उच्चतम मूल्य के साथ जीने वाले समुदाय का एक पर्व है, रसनवा खाई,  जिसकी चर्चा हम करने जा रहे है। 


रसनवा बैगा समुदाय का प्रमुख पर्व है। कुछ क्षेत्रों में लोग इसे मोहती नवाखाई अथवा मोहती रस का पर्व भी कहते हैं। स्थानीय परम्परा के अनुसार यह पर्व 9 वर्ष के अन्तराल पर आता है। कुछ क्षेत्रों में “8 साल 9 कार्तिक” नाम भी प्रचलित है। इसकी गणना में क्षेत्र के अनुसार अन्तर मिल सकता है।


सरई वृक्ष से मधुरस निकालता बैगा युवा
(फ़ोटो सौ. श्री राम कुमार वर्मा जी) 

मोहती अथवा मोहलाइन वनस्पति में फूल आने के बाद बैगा समाज पर्व की तैयारी आरम्भ करता है। मोहती का फूल उसके लिए प्रकृति आधारित पंचांग का काम करता है। वनवासी समुदाय पेड़ पौधों के फूलने, पक्षियों के व्यवहार और ऋतु परिवर्तन से समय तथा मौसम का अनुमान लगाते रहे हैं। रसनवा में मोहती का फूल समुदाय को रसनवा खाई पर्व मनाने का संकेत देता है।


रसनवा खाई की तैयारी करते बैगा जन 
(फ़ोटो सौ. श्री राम कुमार वर्मा जी) 

मोहती में फूल आने पर बैगा समाज के दीवान और मुकद्दम पर्व की घोषणा करते हैं। वे मुनादी से गाँवों तक सूचना पहुँचाते हैं। वे आयोजन स्थल, सामग्री और विभिन्न गाँवों के बीच तालमेल भी देखते हैं।  बैगा समुदाय के निवास क्षेत्र के लगभग 15 से 20 गाँवों के लोग किसी क्षेत्रीय आयोजन में सम्मिलित होते हैं। स्थानीय जानकारी के अनुसार अलग अलग गाँवों में इसकी प्रक्रिया लगभग 15 दिनों तक चलती है। पूरा समुदाय मिलकर इस पर्व को मनाता है।

बैगा समाज गाँव की सीमा से बाहर घने जंगल में रसनवा मनाता है। मुख्य वन अनुष्ठान में परम्परागत रूप से पुरुष भाग लेते हैं। लोग निर्धारित स्थान पर मोहती अथवा मोहलाइन की टहनियों से छोटे प्रतीकात्मक घर और दरवाजे बनाते हैं।


पर्व के दौरान अनुष्ठान करते बैगा

कुछ क्षेत्रीय विवरणों में 9 प्रतीकात्मक घर बनाने का उल्लेख मिलता है। समुदाय अन्तिम घर में बहरेसुर और नगबधेसुर जैसे स्थानीय देवों को स्थापित करता है। लोग मोहती के फूल, टहनी और पत्तियों से देवताओं तथा वन शक्तियों की पूजा करते हैं। वे पहले देवताओं को प्रसाद चढ़ाते हैं। इसके बाद सभी लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।


पर्व के दौरान अनुष्ठान करते बैगा

रसनवा में कुटकी और प्राकृतिक शहद से प्रसाद बनता है। कुटकी कम पानी में उगने वाली पारम्परिक लघु धान्य फसल (मिलेट) है। यह लम्बे समय से बैगा समाज के भोजन का हिस्सा रही है।


प्रसाद तैयार करते बैगा 
(फ़ोटो सौ. श्री राम कुमार वर्मा जी) 

लोग मोटे बाँस की गाँठ से पात्र बनाते हैं। स्थानीय भाषा में इसे ठोड़हा कहते हैं। वे इसमें कुटकी और शहद भरकर मोहलाइन के पत्तों से बन्द कर देते हैं। इसके बाद वे पात्र को आग में पकाते हैं। बाँस का रंग बदलने पर वे भोजन पक जाने का अनुमान लगाते हैं।  लोग पका हुआ भोजन मोहलाइन के पत्तों पर परोसते हैं। वे पहले इसे देवताओं को चढ़ाते हैं और फिर सामूहिक रूप से ग्रहण करते हैं। वे पूरी प्रक्रिया में स्थानीय प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करते हैं।


वनदेवी को प्रसाद अर्पित करते बैगा जन
 (फ़ोटो सौ. श्री राम कुमार वर्मा जी) 

रसनवा का प्रमुख पक्ष मधुमक्खियों और प्राकृतिक शहद के संरक्षण से जुड़ा है। बैगा समाज रसनवा से पहले जंगल के छत्तों से शहद निकालना उचित नहीं मानता। लोग पर्व सम्पन्न होने के बाद ही शहद इकट्ठा करते हैं। इस नियम से मधुमक्खियों को रस एकत्र करने, छत्ता विकसित करने और अपनी संख्या बढ़ाने का समय मिलता है। समय से पहले अथवा अधिक शहद निकालने से उनके जीवन क्रम पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। बैगा समाज ने आस्था और सामाजिक नियमों से शहद लेने का समय निश्चित किया।


परागण में सहायक मधुमक्खी

मधुमक्खियाँ फूलों के परागण में सहायता करती हैं। इससे जंगल की वनस्पतियाँ और फसलें बढ़ती हैं। रसनवा वन संसाधनों के उचित उपयोग की सामुदायिक व्यवस्था भी है। रसनवा मोहती के फूल की पूजा के साथ प्रकृति के प्रति बैगा समाज के व्यवहार को भी सामने रखता है। यह परम्परा मनुष्य को प्रकृति से आवश्यकता के अनुसार लेने और उसके जीवन क्रम का सम्मान करने की सीख देती है।

लेख:
श्री प्रहलाद पात्रे
कबीरधाम, छत्तीसगढ़

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