आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार

नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

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स्वतंत्रता संग्राम के अज्ञात योद्धा

स्वतंत्रता संग्राम के अज्ञात योद्धा

यह लेख उन अनाम वीरों की स्मृति को समर्पित है, जिनकी वीरता और बलिदान से भारतभूमि गौरवान्वित हुई, पर जिनके नाम इतिहास की धूल में कहीं लुप्त हो गए। मातृभूमि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है, उनका स्मरण और उनका सम्मान।

सरगुजा अंचल
माझी राम गोंड: सरगुजा जिले के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कार्य किया और अंबिकापुर जेल में कठोर दंड भोगा। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान उन्हें दो बार कारावास मिला, 1940 में तीन दिन और 1942 में इक्कीस दिन। मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें 1989 और 1997 में प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।

महली भगत: मूलतः झारखण्ड निवासी महली जी ने बलरामपुर जिले के कुसमी को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें एक वर्ष की सजा हुई और 1942 में पटना कैंप जेल स्थानान्तरित किया गया। उनके योगदान की स्मृति में 1972 में उन्हें ताम्रपत्र प्रदान किया गया तथा कुसमी महाविद्यालय का नामकरण उनके नाम पर हुआ। उनके घर में आज भी स्वतंत्रता संग्राम का वह झंडा सुरक्षित रखा गया है जो उन्होंने अपने हाथों से उठाया था।

राजनाथ भगत: गुमला (झारखण्ड) के निवासी राजनाथ भगत ने सरगुजा को अपनी कर्मभूमि बनाया। महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया। उन्हें 1973 में मध्यप्रदेश सरकार तथा 2007 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सम्मानित किया गया।


सरगुजा अंचल के स्वतंत्रता संग्राम के नायक 

उरांव विद्रोह, 1918: यह विद्रोह राजा रामानुज शरण के शासनकाल में हुआ। सारहरी और पाट थाना के चौदह गाँवों में विद्रोहियों ने अत्याचारों के विरोध में लूट की और इक्यावन सरकारी कर्मचारियों को दंड दिया। राजा रामानुज शरण, इलाकेदार इंद्रप्रताप सिंह और लाल जगदीश बहादुर सशस्त्र सैनिकों के साथ आगे बढ़े, परंतु जनजातीय वीरों ने धनुष-भाले से उनका सामना किया। दोनों पक्षों में अनेक जन हताहत हुए।

गोपाल ग्राम की सहायता को नेल्सन के नेतृत्व में अंग्रेजी टुकड़ी आई। अनेक विद्रोही पकड़े गए और उन्हें मृत्यु दंड दिया गया। विद्रोह के पश्चात राजा ने सुधारात्मक कदम उठाए, बैकुण्ठपुर और मनेन्द्रगढ़ में नगरपालिकाओं की स्थापना की तथा प्रजा परिषद और प्रजा सभा गठित की। यह बगावत जनजातीय स्वाभिमान का सशक्त प्रतीक बनी।


उरांव विद्रोह-1918

राजमोहिनी देवी: राजमोहिनी देवी सरगुजा अंचल की प्रखर समाजसेविका और जनजातीय समाज की जागृति की प्रतीक थीं। वे अशिक्षित थीं, किंतु उनमें नेतृत्व, संवेदना और त्याग का अद्भुत संगम था। उन्होंने देखा कि जनजातीय समाज ज़मींदारों और ठेकेदारों के शोषण, नशे और अंधविश्वासों में जकड़ा हुआ है। उन्होंने इसी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष आरंभ किया।

राजमोहिनी देवी ने महिलाओं की शिक्षा, स्वावलंबन और नशा मुक्ति को अपना ध्येय बनाया। वे घर-घर जाकर स्त्रियों को शिक्षित करतीं, प्रसव के समय सहायता करतीं और नशे से दूर रहने की प्रेरणा देतीं। उनके नेतृत्व में जो आंदोलन प्रारंभ हुआ, वही आगे चलकर राजमोहिनी आंदोलन कहलाया। यह आंदोलन समाज सुधार, महिला सशक्तिकरण और अंधविश्वास उन्मूलन के लिए कार्य करता रहा।


माता राजमोहिनी देवी- समाज सुधारक

1951 के अकाल में उन्होंने सेवा और सहयोग के माध्यम से समाज को आत्मबल और संगठन का संदेश दिया। अस्सी हजार से अधिक लोग उनके आंदोलन से जुड़े। 1989 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और अंबिकापुर महाविद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया। उनके जीवन पर सामाजिक क्रांति की अग्रदूत राजमोहिनी देवी नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है।


माता राजमोहिनी कन्या महाविद्यालय - अंबिकापुर

बस्तर अंचल: परलकोट विद्रोह (1824–25)
बस्तर के भूमिया राजा गेंदसिंह ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के विरुद्ध यह संघर्ष प्रारंभ किया। परलकोट क्षेत्र में 165 गाँवों की जमींदारी थी, जिनमें से 98 वीरान थे। मराठों और अंग्रेजों के हस्तक्षेप से जनजातीय समाज ने अपनी स्वतंत्रता पर खतरा अनुभव किया और गेंदसिंह के नेतृत्व में संगठित हुआ।

विद्रोह का दिन 24 दिसंबर 1824 निश्चित किया गया। सबसे पहले दमनकारियों को रसद पहुँचाने वालों को रोककर आपूर्ति बाधित की गई। महिलाओं ने भी इस संघर्ष में नेतृत्व किया। 10 जनवरी 1825 को गेंदसिंह पकड़े गए और 20 जनवरी को उन्हें अपने महल के सामने फाँसी दी गई। उनका बलिदान स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक स्वरों में गूँजता है।


भूमिया राजा गेंदसिंह

बस्तर विद्रोह-1876-
यह स्वस्फूर्त जनआंदोलन बस्तर रियासत में दीवान गोपीनाथ के अत्याचारों और न्यायिक लापरवाही के विरोध में हुआ। जगदलपुर मुख्यालय के घेराव का संकेत आम की टहनी के माध्यम से दिया गया। जनजातीय समाज तीर-धनुष, कुल्हाड़ी और भालों से सुसज्जित था। यह आन्दोलन संपूर्ण सी.पी. और बरार क्षेत्र में प्रसिद्ध हुआ और प्रशासनिक सुधारों का कारण बना।


बस्तर विद्रोह-1876

भूमकाल विद्रोह- 1910
यह बस्तर का सबसे व्यापक जनउभार था। इसमें मुरिया, माड़िया, भतरा, परजा, हल्बा, धुरवा, गोंड और मुरहा समाज के लोग सम्मिलित हुए। विद्रोह का प्रतीक तीर, लाल मिर्च, मिट्टी का ढेला और धनुष-भाला था। दीवान बैजनाथ पांडेय के अत्याचार और आरक्षित वनों की नीति के विरोध में यह आन्दोलन भड़का।

2 फरवरी 1910 को पुसपाल बाजार की लूट से इसकी शुरुआत हुई। इससे पहले पुलिस ने 39 जनजातीयों की गोली मारकर हत्या की थी। इस संघर्ष का नेतृत्व वीर गुंडाधूर ने किया, जिन्हें अंग्रेज कभी पकड़ नहीं सके। भूमकाल का अर्थ भूकंप है, और सचमुच यह विद्रोह ब्रिटिश सत्ता को हिला देने वाला भूकंप सिद्ध हुआ।


गुंडाधूर- भूमकाल विद्रोह के नेतृत्वकर्ता

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े नगरों या प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं था बल्कि उसकी जड़ें इस देश की मिट्टी में, गाँवों और जनजातीय अंचलों के प्रत्येक हृदय में थीं। सरगुजा, बस्तर और मध्य छत्तीसगढ़ के इन अमर सपूतों ने यह सिद्ध किया कि स्वराज्य केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है। इनके संघर्ष ने स्वतंत्रता की चेतना जागृत करने में प्रभावी भूमिका निभायी।

इन वीरों ने बिना किसी स्वार्थ और प्रसिद्धि की आकांक्षा के अपने प्राण मातृभूमि को अर्पित किए। आज जब हम स्वतंत्र जीवन का आनंद ले रहे हैं, तब हमें इन नायकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र का पुनर्निर्माण तभी संभव है, जब हम उनके त्याग, एकता और स्वाभिमान के आदर्शों को अपने जीवन में धारण करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा।

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