भोरमदेव के फणिनागवंशी शासक भोणिंग देव और महाराजा सतीम
January 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

छतीसगढ़ के कबीरधाम जिले में भोरमदेव क्षेत्र अपने पुरातत्विक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। प्राप्त शिलालेखों से 9वी से 14वी शताब्दी के लगभग इस क्षेत्र में फणिनागवंश के शासकों के साम्राज्य होने के साक्ष्य मिलते हैं। भोरमदेव के मुख्य शिव मंदिर, मड़वा महल, छेरकी महल के अलावा भी आस-पास के क्षेत्रों में मैकल श्रेणी के समानांतर इस राजवंश के शासनकाल के ध्वंशावशेष मिलते हैं।

मंदिर के अवशेष- पचराही
इनमें गंडई, घटियारी, बिलहरी,सहसपुर, राजाबेंदा , सिली पचराही प्रमुख हैं। इसके अलावा भी उस काल की मूर्तियां, शिल्प खण्ड, ईंटो के अवशेष जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। कई स्थल आज भी उत्खनन की बाट जोह रहे हैं। पचराही जिला मुख्यालय कवर्धा से 45 किलोमीटर तथा ब्लॉक मुख्यालय बोड़ला से 17 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम दिशा में हाफ नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है।

हाफ नदी
पचराही का तो सर्वप्रथम नाम ही आकर्षित करता है।एक सामान्य अर्थ जहां पाँच रास्ते आकर मिलते हो या जहां से पाँच रास्ते निकलते हो।लोक मान्यता में ये पाँच रास्ते जिनको जोड़ते हैं; वे हैं- रतनपुर, सहसपुर, भोरमदेव, मंडला और लांझी। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से यह बात सही लगती है कि यहां अपेक्षाकृत बड़ी बसाहट रही होगी।स्वर्ण-रजत सिक्कें, महल,मंदिरों के अवशेष यहां सम्प्पन्न व्यक्तियों अथवा राजपुरुषों के निवास करने को भी प्रमाणित करते हैं।
पचराही के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी लोकमानस के अलावा इतिहासकारों/सर्वेक्षणकर्ताओं को भी काफी समय से रही है। आस-पास के लोक-जीवन मे प्रसिद्ध कंकाली टीला देवी मूर्ति के कारण 'कंकाली देवी' के नाम से जाना जाता रहा है। इस क्षेत्र का सर्वप्रथम सर्वे सर आर.जेनकिन्स द्वारा(1825 के लगभग) कराया गया, जिसकी रिपोर्ट 'एशियाटिक रिसर्चेस, वॉल्यूम 15' में प्रकाशित हुई। उन्होंने अपने रिपोर्ट में दो शिलालेखों की प्राप्ति का उल्लेख किया है, जो उन्हें ध्वस्त मंदिर के पास प्राप्त हुआ था। इनमें से एक तीन हिस्सों में खण्डित था जिसमे कोई तिथि अंकित नही थी। दूसरे शिलालेख में 849 अंकित था।
जेनकिन्स के बाद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1881-82 में इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वॉल्यूम 17 में 'रिपोर्ट ऑफ अ टूर इन द सेंट्रल प्रोविंसेस एंड लोवर गंगेटिक दोआब' के नाम से प्रकाशित हुआ।कंनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि "कंकाली की मूर्ति ध्वस्त मंदिर के बाहर रखी हुई है, जो एक वीरान किले के अंदर है"।
कंकाली टीला(पचराही) ग्राम बोरिआ के निकट होने के कारण बहुत जगह पचराही की अपेक्षा बोरिआ नाम का उल्लेख हुआ है।कंनिंघम को जेनकिन्स द्वारा उल्लेखित 'तीन हिस्सों में खंडित' शिलालेख तथा 849 अंकित शिलालेख भी प्राप्त नही हो सका।लेकिन उन्हें एक शिलालेख प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने सम्वत 910 पढ़ा।यह शिलालेख दाढ़ीयुक्त हाथ जोड़े राजपुरुष की मूर्ति के पादतल(चौकी)में अंकित है। श्री धानूलाल श्रीवास्तव (अष्टराज अंभोज,1925) के अनुसार यह वही अभिलेख है जिसे जेनकिन्स ने 849 पढ़ा था।

बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि यह अभिलेख युक्त मूर्ति वर्तमान में बूढा महादेव मंदिर कवर्धा में है। इस लेख का विवरण आगे दिया जाएगा। इसके अलावा उन्हें एक बिना तिथि का अभिलेख मिला जिसमे "श्री जसराज देव" अंकित है।यह मूर्ति भी बूढ़ा महादेव मंदिर कवर्धा में रखी हुई है।
तीसरा अभिलेख जो उन्होंने देखा उसमे केवल 'देवदास' अंकित है।यह अभिलेख धानू लालश्रीवास्तव के समय (1925)तक पचराही में था ; वर्तमान में इसकी जानकारी मुझे नही है। उनके द्वारा देखे चौथे अभिलेख "जोगी श्री मगरध्वज 700" अंकित है। यह अभिलेख वर्तमान में पचराही में ही है। श्री धानूलाल श्रीवास्तव( उक्त बातें इन्होंने राय बहादुर हीरालाल की 'इस्क्रिप्सनऑफ सी. पी. एंड बरार' 1916 से लिया है)के अनुसार पचराही(बोरिआ) से दो सती स्तंभ भी लाया गया है, जो कवर्धा में करपात्री पार्क के पास स्थित 'राम मंदिर(छोटे मंदिर)के मंडप में लगा है।

मंदिर के अवशेष- पचराही
उनके अनुसार एक स्तंभ में "मार्ग शीर्ष शुक्ल द्वादशी सोमवार सम्वत 1414 अर्थात 5 दिसम्बर सन 1356 ई. सोमवार महाराजा श्री रामदेव का शासनकाल लिखा है। तथा दूसरे में ज्येष्ठ सुदी 13 संवत 1422 सोमवार अर्थात 13 मई सन 1364 ई.अंकित है। इसमें यह उल्लेख है कि परलोकगत नामक महादेव(सम्भवतः महादेव नामक परलोकगत) की तीन पत्नियां थी (1) मेताई (2) नौरवाई (3) दिवमाई।
इनमें से केवल मेताई सती हो गई और यह स्तंभ उसके सम्मानार्थ निर्माण किया गया"। इन स्तंभों को आज भी मंदिर में देखा जा सकता है। इसके अलावा वहां और भी स्तंभ और मूर्तियां हैं, लेकिन वर्तमान में सब के ऊपर काला पेंट कर देने के कारण न तो उत्कीर्ण आलेख दिख रहे हैं, न ही यह समझ आ पाता है कि कौन प्राचीन अवशेष है और कौन अर्वाचीन!
इसके बाद एक लंबे अर्से तक कोई नयी जानकारी उभर कर नहीं आ सकी। ज्ञात तथ्यों के आधार पर ही लेख आदि लिखे जाते रहें। खैरागढ़ विश्व विद्यालय से सम्बद्ध श्री सीताराम शर्मा ने अपने शोध-कार्य के दौरान इस क्षेत्र के बिखरे मूर्तियों, प्राचीन तालाबों आदि का अध्ययन कर 1990 में 'भोरमदेव क्षेत्र:पश्चिम दक्षिण कोशल की कला' नामक शोधग्रन्थ प्रकाशित की।
लगभग इसी समय श्री शरद हलवाई अपने निजी रुचि के तहत इस क्षेत्र के पुरातत्विक अवशेषों पर अखबारों में लिखते रहें।70-80 के दशक में इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रस्तर खण्डों, मूर्तियों को इंदिरा कला एवं संगीत महाविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षा की दृष्टि से स्थानांतरित कर दिया गया था,इनमे बौद्ध एवं जैन प्रतिमाएं भी हैं। इसलिए बिना संग्रहालय को देखे यहां की भव्यता का अनुमान नहीं हो सकता।
पचराही के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब बिधिवत रूप से यहां के पुरातत्विक स्थलों का उत्खनन हुआ। यह उत्खनन 2007-09 के दौरान श्री सोबरन सिंह यादव के निर्देशन और श्री अतुल प्रधान के नेतृत्व में हुआ।इस उत्खनन से पचराही के इतिहास को नई रौशनी मिली, और इतिहास के कई कड़ियों को जोड़ने में मदद मिली।
अवश्य कोई महत्वपूर्ण प्रस्तर अभिलेख प्राप्त नही हो सका मगर विभिन्न राजाओं के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनसे महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुई हैं।इस उत्खनन से प्राप्त अवशेषों को उन्होंने पांच कालों में विभाजित किया है - (1) पूर्व ऐतिहासिक (2) उत्तर गुप्त कालीन(पांडुवंशी) (3) कलचुरी कालीन (4) फणि नागवंशी कालीन (5) इस्लामिक ।
पूर्व ऐतिहासिक काल के अवशेषों में माइक्रोलीथिक औजार जैसे लुनेट(अर्धचंद्राकार), ट्रेपेज(समलंब आकार), स्क्रेपर(खुरचनी), पाइंट(नोक) आदि प्राप्त हुए हैं। उत्तर गुप्तकालीन अवशेषों में कोई लिखित साक्ष्य प्राप्त नही हुआ है मगर उस काल की बड़े वर्गाकार ईंटें प्राप्त हुई हैं। साथ ही पत्थर का बैल, टेराकोटा, तथा कई पट्टिकाएं प्राप्त हुई हैं जिनमे पार्वती, कार्तिकेय और कई अचिन्हित आकृतियां उत्कीर्ण हैं।
कलचुरी कालीन पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमे ईंटो से बने रहवास,किलेबंदी के अवशेष,लोहे और तांबे के समान, चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना, सिक्के और मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। सिक्को में रत्नदेव का स्वर्ण सिक्का,प्रतापमल के दो स्वर्ण सिक्के, ताम्बे के सिक्के रत्नदेव के दो, पृथ्वी देव् के एक, जाजल्लदेव के दो, प्राप्त हुए हैं।

पचराही उत्खनन से प्राप्त सिक्के
पचराही में फणि नागवंशियों के भी पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं जैसे- सिक्कें, मूर्तियां,वास्तु रूपांकन, भवन अवशेष,टेराकोटा, आदि।इनमें नक्कड़ देव् का स्वर्ण सिक्का, श्रीधरदेव का रजत सिक्का, यशोराज देव् का रजत सिक्का, जयत्रपाल के दो रजत सिक्के। फणि नागवंशियों के सिक्के पहली बार प्राप्त हुए हैं, अभी तक उनके विवरण केवल शिलालेखों में प्राप्त हुए थे।
उत्खनन में इस्लामिक शासन काल के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं, जो अपने आप मे महत्वपूर्ण हैं। इनमें अलाउद्दीन खिलजी के दो ताम्र सिक्कें(1308-09ई.के)प्राप्त हुए हैं।सम्भवतः यह व्यापार से आये होंगे।एक ब्रिटिश कालीन रजत सिक्का भी प्राप्त हुआ है, जो बाद के समय यात्रा करने वाले व्यक्तियों द्वारा आये होंगे।
जीवाश्म(फॉसिल) के अवशेष
पचराही उत्खनन में मोलस्का फाईलम का एक जीवाश्म प्राप्त हुआ है,जो सर्पिलाकार(1-2से.मी.) है। श्री मैनकर दत्त(उप संचालक,भूगर्भशास्त्र, रायपुर) के अनुसार यह जुरासिक काल के मोलस्क(20.3-13.3 करोड़ साल पूर्व) के समान है और सम्भवतः किसी और क्षेत्र से यहां पहुंचा होगा,क्योकि इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां उसको धारण करने के अनुकूल नही है।
बोरिआ(पचराही)अभिलेख संवत 910(1158 ई.)
इस अभिलेख की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1881-82 में अपने सर्वे के दौरान की थी। सम्भवतः यह वही अभिलेख है जिसे उनसे पूर्व जेनकिन्स ने देखा था और तिथि संवत 849 पढ़ा था। मगर इसका अनुवाद सबसे पहले कनिंघम ने किया। यह अभिलेख हाथ जोड़े एक दाढ़ीयुक्त राजपुरुष की मूर्ति के पादतल में तीन पंक्तियों में अंकित है। मूर्ति में पुरुष के अलावा दाएं-बाएं दो स्त्रियां भी हाथ जोड़े बैठी हैं।
वर्तमान में मूर्ति में लगातार पानी और फूल आदि पूजन सामग्री डालने से अभिलेख गर्द जमा होते जाने से मुश्किल से दिखाई दे रहे हैं।इसके संरक्षण के लिए प्रशासन और मंदिर समिति को कोई रास्ता निकालना चाहिए। कनिंघम ने एक जगह इसे संवत 910 तथा एक जगह संवत1110 लिखा है। राय बहादुर हीरालाल के अनुसार यह 945 अथवा 915 हो सकता है।
इस अभिलेख में जिस 'महाराणक जसराजदेव' का जिक्र है उसे इतिहासकारों ने सहसपुर से प्राप्त मूर्ति अभिलेख (संवत 934,ई.1182)में उल्लेखित 'यशोराज' से सम्बद्ध माना है।अर्थात दोनों एक ही व्यक्ति हैं।सहसपुर अभिलेख का संवत कलचुरी(चेदि) संवत ठहरता है(934+248=1182),इसलिए बोरिआ अभिलेख का संवत 1110 उचित नहीं ठहरता।
विष्णु देव् मिराशी ने सहसपुर अभिलेख के अंकों के बनावट से उक्त अभिलेख की तुलना करके बताया है कि इस अभिलेख(बोरिआ अभिलेख) का आखरी अंक 0 अथवा 1 हो सकता है; तथा किसी भी स्थिति में यह 5 नही हो सकता। इस दृष्टि से सम्वत 910 उचित ठहरता है।उन्होंने यह भी लिखा है कि अंक बहुत अष्पष्ट रूप से अंकित किये गए हैं।
फणि नागवंशियों के मड़वा महल अभिलेख में उल्लेखित वंशावली में भी इस वंश के पंद्रहवे शासक 'यशोराज' है। ये तीनो यशोराज एक ही होने चाहिये, क्योकि फणि नागवंश के छठवें शासक 'गोपालदेव' संवत 840(1088 ई.) में वर्तमान थे, उनके छ: पीढ़ी बाद 'यशोराज' हैं। चूंकि सहसपुर के 'यशोराज' 1182 ई.में वर्तमान थे, अतः 1088 से 1182 के मध्य 94 वर्ष में आठ राजाओं का बदल जाना कठिन लगता है मगर एक तो कई बार वंशावली समानांतर(भाइयों आदि)स्थानांतरित हो जाती है और कुछ नाम कल्पित भी हो सकते हैं। खुदाई में यशोराज देव् का एक रजत सिक्का प्राप्त हुआ है।अवश्य यशोराज शक्तिशाली राजा रहे होंगे!
अभिलेख का पाठ
इस अभिलेख का पाठ सर्वप्रथम कनिंघम में अपने सर्वे रिपोर्ट में(1881-82) प्रकाशित कराया था। राय बहादुर हीरालाल ने(1916) अभिलेख में उल्लेखित बातों का जिक्र किया है लेकिन पाठ प्रस्तुत नही किया।वी.वी. मिराशी(1955) ने सूक्ष्म रूप से पाठ प्रस्तुत किया।हालांकि कनिंघम से कोई मौलिक भिन्नता नही है। प्रस्तुत पाठ मिराशी से लिया गया है।
(1)स्वस्ति[।*] स्री(श्री) विजयराजजसराजदेव[।*] महाराणाकस्य तस्य महाआमात्य ठाकुर माल्तु [।*] तस्य पु-
(2) त्र (त्रो) मति श्रे(स्र)ष्ठ[*] ठाकुर[*] पाल्तु नामे(म्ना) विस्रु(श्रु)त[।*] तस्य माता वाल्ता[।*] तस्य पुत्रि(त्री) वावो नाम विस्रुत[।*] तस्य पितुस्य[पु]-
(3) ण्यार्थ प्रासाद[स्था] पीत सिव।सवत(त्)[9]10[।*] सूत्रधार धरणीधर[।*]
अनुवाद(मेरे द्वारा किया गया)
शुभ! लब्ध प्रतिष्ठित और विजयी महाराजा श्री जसराजदेव। उनके(उसके)महामात्य(मुख्यमंत्री )ठाकुर माल्तु (है)। जिसके बुद्धिमान(मतिश्रेष्ठ)पुत्र पाल्तु के नाम से विख्यात (विस्रुत) है।जिसकी माता वाल्ता(है)। जिसकी पुत्री वावो नाम से विख्यात है।उनके पिता(ठाकुर माल्तु)के शुभफल प्राप्ति के विचार से(पुण्यार्थ) सिव(शिव)का मंदिर(प्रासाद) स्थापित किया गया है।संवत 910 (में)।इसका सूत्रधार(शिल्पकार) धरणीधर है।
बिना तिथि का दूसरा अभिलेख
यह अभिलेख भी बूढा महादेव मंदिर में रखे राजपुरुष के एक दूसरे मूर्ति के पादतल पर उत्कीर्ण है।कनिंघम ने इसका भी पाठ किया था। मिराशी के अनुसार पाठ इस प्रकार है-
(1) स्री(श्री) जसराजदेव[।*]
(2) स्री(श्री) धिरछेद्रपुत्र । डडनायक जागु[।*]
(3) ठ सावियभक्त्त ।
अनुवाद
श्री जसराज देव। (उनके) दंडनायक जागु धिरक्षेद्र के पुत्र है,(जो कि) स्वामिभक्त है।बूढा महादेव मंदिर में राजपुरुष की तीन मूर्तियां है। दो अभिलेखयुक्त तथा एक बिना अभिलेख के।दो मूर्तियों में राजपुरुष के साथ दो स्त्रियां हैं।एक में केवल एक स्त्री।जिनमे राजपुरुष के साथ दो स्त्रियां हैं, उनमें एक स्त्री-पुरुष एक साथ बैठे हैं; उनके पीछे मंडल बने हैं तथा अकेली स्त्री के पीछे कोई मंडल नही है।
एक मूर्ति में तो उसका आकार भी छोटा है। राय बहादुर हीरालाल के अनुसार मण्डलयुक्त युगल दंपत्ति माता-पिता की है, तथा सादी मूर्ति भक्तिरति कन्या(वावो) की है। ऐसा प्रतीत होता है कि ठाकुर माल्तु और उसकी पत्नी का देहांत हो गया था; और उनकी पुत्री ने उनकी स्मृति में शिव मंदिर का निर्माण कराया।लेकिन मिराशी मानते हैं कि मंदिर का निर्माण ठाकुर माल्तु ने अपने पिता के पुण्यार्थ के लिए बनवाया था न कि वावो ने जैसा कि हीरालाल जी मानते हैं। हमारी समझ से मिराशी का मत उचित जान पडता है।
कंकाली टीला

उत्खनन पूर्व कंकाली टीला
पचराही का पुरातत्व कंकाली टीला के नाम से ही अधिक चर्चित रहा है। कनिंघम से लेकर वर्तमान उत्खनन तक इसी नाम से जाना जाता रहा।अधिकांश पुरातत्विक सामग्री इसी के आस-पास बिखरी हुई थीं।टीले के उभार को देखकर ही अंदाजा हो जाता था कि यहां कोई स्थापत्य संरचना अवश्य होगी। उत्खनन से पूर्व टीले में स्थापत्य खण्ड के बीच एक मूर्ति थी जिसे कंकाली देवी के नाम से पूजा जाता रहा।

उत्खनन के बाद- कंकाली टीला
यह मूर्ति वर्तमान में पचराही संग्रहालय में अवस्थित है। मूर्ति का शिरोभाग खण्डित है। आशीर्वाद मुद्रा में बैठे हुए यह मूर्ति हमारी समझ मे यह कोई देव(पुरुष) है। इसका वक्ष स्थल सपाट है।लोकमानस में देव मूर्ति पर 'देवी' का आरोपण कोई असामान्य घटना नही है; मगर कनिंघम ने अपने सर्वे रिपोर्ट में जिस देवी मूर्ति का उल्लेख किया है; वह यह मूर्ति प्रतीत नही होती।

संग्रहालय में संरक्षित प्रतिमा - उमा-महेश्वर
उन्होंने लिखा है "The fort in which the temple stands is square of 550 feet side. The figure of Kankari Devi is 3.5 feet high, and has 18 arms, which hold amongst other objects, a bow and arrow, a shield, a trident, a human head etc. There is also a standing figure of Shiva, 4 feet, in height, with a trident and close by a figure of Ganesa.
स्पष्ट है पहले वहां कंकाली की मूर्ति थी, जो अब वहां नही है।मगर डॉ सीताराम शर्मा ने लिखा है(1989-90) यह मूर्ति कई खण्डों में विभक्त होकर वहीं पर है। सम्भव है अधिक खण्डित होने के कारण मूर्ति की पहचान मिट गई हो।इसके अलावा उल्लेखित शिव मूर्ति का भी पता नही चलता।कंकाली टीला के उत्खनन से उत्तर गुप्तकालीन (पांडुवंशी)ईंटो की संरचना प्राप्त हुई है जिसमे दो कक्ष हैं(3.9मी. गहरे)और बाहर एक प्रदक्षिणापथ है।
बाद में कलचुरी काल मे इसके ऊपर पत्थर से निर्माण कार्य के साक्ष्य मिले हैं। ईंटो की सरंचना के बारे में स्थिति स्पष्ट नही है मगर कलचुरी काल मे पत्थर का निर्माण कार्य अभिलेख में उल्लेखित शिव मंदिर हो सकता है, जो मंदिर के ध्वस्त हो जाने के बाद के काल मे कंकाली की मूर्ति के कारण कंकाली मंदिर के नाम से चर्चित हो गया हो।
वैसे यहां उत्खनन में अन्य स्थलों पर भी शिव मंदिर होने के साक्ष्य मिले हैं।कहा नही जा सकता कि अभिलेख में उल्लेखित शिव मंदिर वास्तविक रूप से कौन सा है।

फणिनागवंश से संबंध
पचराही भोरमदेव के अपेक्षाकृत नज़दीक है।उत्खनन पूर्व ही शिल्पखण्ड, मूर्तियों की बनावट में समानता, बोरिआ अभिलेख के जसराज जो कि फणिनागवंश का राजा है, आदि से पचराही को फणिनागवंश साम्राज्य से ही सम्बद्ध माना जाता रहा है। उत्खनन से फणि नागवंश के राजाओं के सिक्के प्राप्त होने से इस बात को और बल मिलता है।
यहां फणि नागवंश के सोलहवें शासक नक्कड़ देव का स्वर्ण सिक्का, श्रीधर देव् का रजत सिक्का(जो धरणीधर का संक्षिप्त प्रतीत होता है)पंद्रहवे शासक यशोराज का रजत सिक्का प्राप्त हुआ है। इस तरह यह फणि नागवंशियों का का ही शासन क्षेत्र प्रतीत होता है। एक चर्चा इस बात की भी होती है कि 'फणिनाग वंशियो' का मुख्य निवास कहाँ था? भोरमदेव अथवा पचराही में?
अवश्य पचराही में मंदिर, राजनिवास के अवशेष उभर कर आये हैं;फणिनागवंशी राजाओं के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं; इससे इसके महत्वपूर्ण स्थल होना सिद्ध होता है; मगर भोरमदेव में भी भव्य मंदिरों का होना,मुख्य शिलालेख का मंड़वा महल मंदिर में होना इसकी महत्ता को स्थापित करता है। भोरमदेव में भी उत्खनन के लिए पर्याप्त स्थल हैं; खासकर गढ़ी क्षेत्र(रानी महल)। जब तक वहां उत्खनन नही हो जाता यह स्पष्ट नही हो सकता कि मुख्य निवास कहाँ था।
कलचुरियों(रतनपुर के) से सम्बंध
जिस समय (मुख्यतः10वीं-12वीं शताब्दी) भोरमदेव क्षेत्र में फणि नागवंशियों का शासन था। उस समय रतनपुर के कलचुरी शक्तिशाली थे। ऐसा माना जाता है कि फणि नागवंशी उनके अधीनता स्वीकार करते रहे होंगे और करद राज्य के रूप में शासन करते रहे होंगे। कई साक्ष्य इस तरफ संकेत करते हैं; जैसे कई अभिलेखों में कलचुरी सम्वत का प्रयोग करना। साथ ही भोरमदेव के राजाओं के नाम के साथ ‘राणक’ तथा ‘महा राणक’ शब्द का प्रयोग उनके अधीनस्थ सामंत होने का संकेत करते हैं।
भोरमदेव मंदिर के दक्षिणी दीवार अभिलेख संवत 1608 (1551 ई.)से पता चलता कि भुवनपाल देव् के मंदिर को किसी मांडोपति द्वारा तोड़कर एवं रतनपुर के दादूराय द्वारा विजय प्रतीक के रूप में(रत्न जड़ित कलश स्तंभ) ले जाने का उल्लेख है। मड़वा महल अभिलेख संवत 1406(1349ई.) से पता चलता है कि फणि नागवंशी राजा रामचन्द्र देव् का कलचुरी राजकुमारी धन्यम्बिका देवी से विवाह हुआ था।
ब्रम्हदेव के खल्लारी अभिलेख संवत 1470(1417 ई.) से पता चलता है कि कलचुरी रामचन्द्र देव ने फणिवंशी भोंणिग देव् को पराजित किया था। यहां यह स्पष्ट नही है कि यह नागवंशी बस्तर का है कि भोरमदेव; क्योकि फणि नागवंशियों के वंशावली में इस नाम का किसी राजा का पता नही चलता। फिर भी 'फणि'("फणिवंशस्याहत")के प्रयोग से भोरमदेव की संभावना बनती है।
रतनपुर के कलचुरियों ने अपने करद राज्यों में भोरमदेव का कहीं उल्लेख नहीं किया है। इस संबंध में राय बहादुर हीरालाल मानते हैं कि फणिनागवंशियों से उनकी वैवाहिक-पारिवारिक संबंध होने के कारण ऐसा हुआ होगा।वर्तमान उत्खनन से पचराही में रतनपुर के कलचुरियों के सिक्के मिलें हैं।इनमें रत्नदेव का स्वर्ण सिक्का, प्रतापमल्ल देव का स्वर्ण सिक्का।
जाजल्लदेव, पृथ्वीदेव, रत्नदेव के ताम्र सिक्के प्रमुख हैं।इस तरह कलचुरियों से फणि नागवंशियो के सम्बंध विभिन्न समयों में द्वंद्व-आधीनता-समानता तीनो तरह के प्रतीत होते हैं। मड़वा महल अभिलेख संवत 1406(1349 ई.)में उल्लेखित फणि नागवंशियों की वंशावली(राय बहादुर हीरालाल के अनुसार)
(1)अहिराज (2)राजल्ल (3)धरणीधर (4) महिमदेव (5)शक्तिचन्द्र (6) गोपालदेव (7) नलदेव (8) भुवनपाल (9)कीर्तिपाल (10) जयत्रपाल (11) महीपाल (12) विषमपाल (13) जन्हु (14) जनपाल (15)यशोराज (16) कन्नडदेव् या वल्लभ (17) लक्ष्मीवर्मा (18) खड्गदेव (19) भुवनैकमल्ल (20) अर्जुन (21) भीम (22) भोज (23) लक्ष्मण (24) रामचंद्र (25) अर्जुन
संदर्भ- (1) Excavation at pachrahi- S. S.Yadav, Atul Pradhan
(2) Report of a Tour in the Central Provinces And Lower Gangetic,Doab vol. 17 (1881-82)-A. Cunningham
(3)Asiatic Research,vol.15- R. Jenkins(1825)
(4)Corpus Inscription Indicarium Vol.4, Part-2, V.V. Mirashi(1955)
(5)Inscription in C.P. and Berar - Ray Bahadur Hiralal(1916)
(6) उत्कीर्ण लेख- बालचंद्र जैन(1961)
(7) श्री शरद हलवाई का आलेख
(8) भोरमदेव- श्री सीताराम शर्मा(1989)
(9) अष्टराज्य अंभोज- धानू लाल श्रीवास्तव(1925)
लेख-
अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा
मो.- 9893728320
छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति
June 10, 2026