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तुलसी पूजा: भारतीय समाज में प्राकृतिक तत्त्वों के उपासना की परम्परा

तुलसी पूजा: भारतीय समाज में प्राकृतिक तत्त्वों के उपासना की परम्परा

हिंदू धर्म में देवउठनी एकादशी एक विशेष पर्व है, यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है। 'देव' का अर्थ देवता, 'उठनी' का अर्थ जागना होता है, अर्थात् देवताओं के जागरण का पर्व तथा 'प्रबोधिनी' का अर्थ 'ज्ञानवती' है, जो बोध और ज्ञान का प्रतीक है। यह चातुर्मास (चार माह की अवधि) के समापन का सूचक है। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से आरंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) पर समाप्त होता है।  भारतीय समाज में यह पर्व विविध रूपों में मनाया जाता है, कहीं भगवान विष्णु के जागरण के रूप में, तो कहीं तुलसी विवाह के रूप में।

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देव उठनी एकादशी

पौराणिक कथाओं में देवों के शयन और जागरण की अद्भुत कथाएँ मिलती हैं। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से चार महीने की योगनिद्रा में चले जाते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने का पौराणिक अर्थ देवताओं और मनुष्यों को ध्यान व आत्मविचार करने के लिए प्रेरित करना है। चातुर्मास व्रत का महत्व यह है कि इन महीनों में विशेष नियमों का पालन किया जाता है, जिससे आत्मा की शुद्धि और मन की शांति मिलती है।

कृषि चक्र की दृष्टि से, ये चार महीने वर्षा ऋतु के हैं, जब प्रकृति सर्वाधिक सक्रिय रहती है, बीज बोए जाते हैं, फसलें पल्लवित होने लगती हैं। इन महीनों में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार आदि का शुभ कार्य नहीं किया जाता है, ताकि वर्षा की बाधाओं से बचा जा सके और आध्यात्मिक साधना में ध्यान केंद्रित किया जा सके। साधु-संत और संन्यासी इन चार महीनों में गहन तप, ध्यान और आत्मविचार में लीन रहते हैं।

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ध्यान में लीन साधू-महात्मा

भारतीय संस्कृति में प्रकृति की उपासना अनादिकाल से चली आ रही एक महत्वपूर्ण परंपरा है। विविध समुदायों, भाषाओं और भूगोलिक क्षेत्रों वाले भारत में प्रकृति पूजा को सामाजिक व सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न अंग माना गया है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को होने वाली तुलसी पूजा को तुलसी विवाह कहा जाता है।  

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तुलसी विवाह

तुलसी पूजा का आधार एक पौराणिक कथा है। असुरराज जालंधर की पत्नी वृंदा अपने पतिव्रत और तप से देवताओं को जीतने नहीं दे रही थी। भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप लेकर उसकी परीक्षा ली। वृंदा का पतिव्रत भंग हुआ, तो उसने प्राण त्याग दिए। विष्णु ने उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसे तुलसी रूप में जन्म दिया।

पौराणिक ग्रंथों में तुलसी को देवी लक्ष्मी का अवतार, विष्णु-प्रिय और समृद्धि प्रदान करने वाली माना गया है। तुलसी का विवाह भी भगवान शालिग्राम (विष्णु) के साथ होने का विधान है, जिसे 'तुलसी विवाह' पर्व के रूप में मनाया जाता है, जो प्रकृति और आध्यात्मिकता के सुंदर समन्वय का उदाहरण है। संस्कृत में ‘तुलसी’ का अर्थ ‘अतुलनीय’ होता है। तुलसी ऐसा गुणवान पौधा है जिसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती

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तुलसी विवाह

भारतीय संस्कृति में प्रकृति पूजा की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका प्रमाण प्राचीनतम सभ्यताओं में भी मिलता है। सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा व मोहनजोदड़ो) की खुदाइयों में वृक्ष पूजन के अनेक प्रमाण प्राप्त हुए हैं, मृत्तिका मुहरों व मूर्तियों पर वृक्ष के नीचे उपासना करते मानव, और त्रिशूल रूपी चिह्नों वाली आकृतियाँ आदि। सिंधु घाटी सभ्यता में पीपल, बरगद व अन्य वृक्षों की पूजा होती थी, जो आज भी भारतीय लोकजीवन में जीवंत हैं। वैदिक काल से ही वनस्पति, नदियों, पर्वतों व आकाश आदि पञ्चतत्वों की उपासना को महत्त्व दिया गया, जो बाद के युगों में तुलसी पूजा जैसी परंपराओं में विकसित हुईं। ये पुरातात्विक साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि भारतीय समाज में प्रकृति से आत्मीय संबंध, संरक्षण और आराधना की सांस्कृतिक चेतना सदा से रही है।

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भारतीय परम्परा में तुलसी पूजन 

भारत के सारे तीज त्यौहार किसी ना किसी तरह प्रकृति से जुड़े होते है। तुलसी विवाह की तरह ही, 'वट सावित्री व्रत' में महिलाओं द्वारा बरगद वृक्ष की पूजा पति की दीर्घायु हेतु की जाती है। 'आंवला नवमी' (अक्षय नवमी) पर आंवले के वृक्ष का पूजन कर उसकी जड़ों में जल, प्रसाद चढ़ाया जाता है। 'सोमवती अमावस्या' पर महिलाएं पीपल वृक्ष की परिक्रमा कर अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करती हैं। 'गंगा दशहरा' जल तत्व की पवित्रता और जीवनदायिनी शक्ति के रूप में मनाया जाता है, जिसमें नदियों की पूजा का संदेश निहित है। ये सभी पर्व भारतीय समाज में प्रकृति के महत्व, उसके संवर्धन व सम्मान का सार्वजनिक और सशक्त संदेश देते हैं।

आधुनिक विज्ञान भी तुलसी के विविध लाभों को मानता है। तुलसी में पाये जाने वाले यूजेनॉल, एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटीबैक्टीरियल, एंटीवायरल और रोगरोधी तत्त्व शरीर को विभिन्न रोगों से सुरक्षित रखते हैं।

यह पौधा 24 घंटे ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है, वायु को शुद्ध करता है तथा आसपास के वातावरण से बैक्टीरिया व विषाक्तता को कम करता है। शहरीकरण और प्रदूषण में तुलसी, नीम, पीपल जैसे पौधों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। भारतीय जीवन पद्धति ने जैव विविधता संरक्षण को समाज की दैनिक पूजा-पद्धति में शामिल किया है, जिससे उसका वैज्ञानिक महत्त्व स्वाभाविक रूप से जीवन में परिलक्षित होता है।चातुर्मास, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह का समग्र महत्व यह है कि ये परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं।

लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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