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हम सबके मूल में जनजातीय समाज की मान्यताएं

हम सबके मूल में जनजातीय समाज की मान्यताएं

जब हम किसी समाज को समझना चाहते हैं, तो हम सर्वप्रथम उस समाज के इतिहास को देखते हैं। जैसे राजपूतों को समझने के लिए हम इतिहास में उन्हें देखते हैं। हम इतिहास में पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों की ओर देखते हैं। मराठों को समझने के लिए वीर शिवाजी को इतिहास में ढूँढते हैं। कुल मिलाकर समाज के किसी एक हिस्से को समझने के लिए हम इतिहास में उसके योगदान को देखते हैं। इसी न्याय से जनजातीय समाज के अध्ययन के लिए हमें भारतीय इतिहास में उनके योगदानों को समझने की आवश्यकता होगी। 


महाराणा प्रताप और पूंजा भील

उदाहरण के लिए यदि हम कुछ प्रश्नों पर विचार करें कि क्या कोई समाज बिना सामाजिक व्यवस्था के चल सकता है? क्या कोई समाज बिना ज्ञान के चल सकता है? क्या केवल विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग ही ज्ञान है? तो उत्तर होगा नहीं। फिर जब हम जनजातीय समाज को समझना चाहते हैं तो इतिहास में उनकी सामाजिक व्यवस्थाओं, उनकी ज्ञान परम्परा को हम क्यों समाविष्ट नहीं करते?

आज बिना सरकारों की मदद से पूरे समाज का अबाध और अनवरत रूप से सुचारु संचालन कर लेना हमें असम्भव-सा जान पड़ता है। किन्तु हमारे जनजातीय समाज इसके जीते-जागते उदाहरण है कि समाज को चलाने के लिए सरकार की आवश्यकता ही नहीं है। तो क्या यह विशिष्ट ज्ञान नहीं है? आज के आधुनिक विश्व को अपनी सामाजिक व्यवस्था पर इससे मार्गदर्शन नहीं लेना चाहिए? फिर क्यों हम जनजातीय समाज और इतिहास में उनके योगदान को समझने के लिए इन मापदण्डों का उपयोग नहीं करते?

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आत्मनिर्भर समाज

आज जिनेवा की मीटिंग में आधुनिक विश्व के नेता ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चा करते तो जरूर हैं; पर क्या वर्तमान में हमारा वह सामर्थ्य है कि हम ग्लोबल वार्मिंग को कम कर सके? जंगलों को दोगुना करने की बातें हम करते हैं; पर क्या हम वास्तव में जंगल को दोगुने करने की क्षमता रखते हैं? नहीं न! लेकिन अपने जिस जनजातीय समाज को हम गरीब-पिछड़ा और मुख्य धारा से दूर हाशिए में पड़ा समाज कहते हैं; वह पिछले कई हजार वर्षों से ऐसा करता आ रहा है।

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वनों के संरक्षण में जनजातीय समाज की भूमिका

आज जब हम घर बनाते है, तो उसमें लकड़ी के कितने सारे फर्नीचर्स का उपयोग करते हैं। सागौन, शीशम आदि की लकड़ी से बने फर्नीचर हमारे लिए वैभव-विलास की वस्तुए हैं। परन्तु जो घने जंगलों में सागौन, शीशम जैसी इमारती लकड़ी के पेड़ों के बीच रहते हैं, वे हमारे जनजातीय बन्धु अपने घर के दरवाजे आम, बबूल जैसी लकड़ियों से ही बनाता है। वे भी चाहते तो सोफ़ा सेट, दीवान, पलंग आदि बना सकते थे। पर आप जाएंगे, तो वे खाट बिछा कर ही आपकी मेजबानी करेंगे। क्या यह हमारे लिए सीखने की बात नहीं हैं कि आवश्यकता और व्यर्थ के विलास में क्या अन्तर है? उनके घर में आप बॉउन्ड्री वाल भी नहीं पाएंगे, क्योंकि उनकी मान्यता में तो दो घरों के बीच बॉउन्ड्री वाल की आवश्यकता ही नहीं है। क्या विश्व इस पर जनजातीय समाज का मार्गदर्शन नहीं ले सकता?

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आवश्यकता और व्यर्थ के विलास के अंतर को दर्शाता:चित्र

बस्तर के अनेक लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने पक्के मकानों में वे नहीं रह पाते, क्योंकि उन्हें खुले, वायु-संचारित झोपड़ीनुमा घरों की आदत है। वे नए मकानों के पास ही अपनी परंपरागत झोपड़ी बनाकर रहते हैं और पक्के घरों में पशु रखते हैं। शहरी लोग इसे “पिछड़ी सोच” कहते हैं, पर क्या यह सच है? जिन्होंने गोंड साम्राज्य बसाए, दुर्ग और महल निर्मित किए, वे वास्तुकला नहीं जानते होंगे? दरअसल हमने कभी उनसे पूछा ही नहीं कि वे किस प्रकार के घर में सहज हैं। परिणामस्वरूप योजनाएँ असफल रहीं और दोष उन्हीं पर मढ़ दिया गया कि वे विकास नहीं चाहते।

और हमारी यह दूषित इतिहास-दृष्टि ही वह कारण है कि अब तक हम जनजातीय समाज को जानने-समझने के अपने प्रयासों में विफल रहे हैं। अतएव यह आवश्यक है कि जनजातीय अध्ययन की Anthropology पर आधारित दोषपूर्ण दृष्टि का सर्वथा त्याग कर हम उनका भी ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अध्ययन करें।

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ज्ञान परम्परा का भंडार जनजातीय समाज के पास

अभी तक हमने अपनी दोषपूर्ण दृष्टि पर चर्चा की। अब यदि हम उसका त्याग कर सम्यक् रूप से जनजातीय समाज के अध्ययन के लिए इतिहास में उनके योगदान पर विचार करें, तो हम पाएंगे कि जनजातीय/वनवासी समाज का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना इस धरती पर मनुष्य का; क्योंकि मेरे, आपके, हम सभी के पूर्वज किसी ना किसी समय वन्य समाज का हिस्सा ही थे। यदि आज हम अपने वंशानुक्रम में पीछे जाएँ तो किसी के पूर्वज 4-5 पीढ़ी पहले वन से निकल कर आए होंगे, तो किसी के 20-25 पीढ़ियों पहले। पर यह तय है कि सभी कभी-न-कभी वन्य समाज के ही अंग थे। आज जिन्हें हम जनजातीय समाज कहते हैं, उनकी तरह हमारे भी पूर्वजों का जीवन प्रकृति आधारित ही था।

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कभी न कभी हम सभी वन्य समाज के ही अंग थे : चित्र

धीरे-धीरे समय के साथ उनका जीवन घुमंतू से स्थायी होता चला गया, और वनों में ही बस्तियाँ बन गईं। इसी से एक वन्य जीवनशैली का जन्म हुआ। और जिसके अनुसार जीवन-यापन करने वालों को आज हम जनजातीय समाज कहते हैं। फिर, कृषि का आविष्कार हुआ। लोगों ने स्थायी रूप से कृषि कार्य करना आरंभ किया। वन क्षेत्रों की तुलना में मैदानी क्षेत्रों में खेती आसान थी, इसलिए कुछ लोग वनों से निकलकर मैदानों में बसने लगे। यही से ग्रामीण जीवनशैली का विकास हुआ। जहाँ रहने वालों को आज हम ग्रामीण कहते है। पर इस दौरान सभी ने खेती को नहीं अपनाया और इसलिए वन्यजीवन और ग्रामजीवन में रहन-सहन और परम्पराओं में थोड़ा अन्तर आया। हालांकि जीवनमूल्यों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।


वन आधारित जीवन शैली से कृषि की ओर समाज

कुछ लोगों ने खेती को अपनाया, जबकि कुछ लोग अपनी वन संस्कृति से जुड़े रहे। जैसे-जैसे ग्राम्य जीवन का विकास हुआ, उत्पादन और व्यापार बढ़ने लगा और धीरे-धीरे व्यावसायिक केन्द्रों के रूप में नगरों का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा कहना इसलिए तर्कसम्मत है क्योंकि प्राचीन समय से लेकर आज तक व्यापार-धन्धें नदियों के परितः फलते-फूलते हैं। हमारे प्राचीन नगर भी नदियों के किनारे बसे और आर्थिक उन्नति के केन्द्र बने। लेकिन जब यहाँ लोगों का मेल-जोल बढ़ा तो जीवन मूल्यों, विचारों के साथ-साथ आध्यात्मिक विषयों पर भी गहन चर्चाएँ होने लगी।


सिन्धु सरस्वती सभ्यता के  प्राचीन नगर

व्यवस्थागत जटिलताओं के कारण सामाजिक संरचना और उनके नियम भी जटिल होते गए। और इस कारण एक विशिष्ट नगरीय जीवन शैली का विकास हुआ। पर जीवन मूल्य इससे भी प्रभावित नहीं हुए। और इसलिए भारत में अपार भौगोलिक-सामाजिक विविधताओं के बावजूद सांस्कृतिक और मूल्यगत एकता बनी रही है। अतः यदि एक वाक्य में इन सबका सार कहा जाए, तो ये जो बड़े बड़े नगर, महानगर बने है, उन सबका आधार वही जनजातीय/वन्य समाज ही रहा है, वहाँ उपजे जीवनमूल्य ही रहे हैं। और इस नाते हम सबका मूल भी वहीं निहित है।


लेख:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर,
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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