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जनजातीय समाज : सनातन धर्म के दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत आधार

जनजातीय समाज : सनातन धर्म के दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत आधार

जनजातीय देवतत्त्व और परम्पराएँ उनके प्रकृति और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का मात्र प्रमाण नहीं हैं, अपितु वे सनातन धर्म के दर्शन और आध्यात्मिक चेतना की संवाहक होने के साथ-साथ उसके उत्कर्ष में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब हम औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित हुए बिना, सही दृष्टि से जनजातीय समाज के देवतत्त्व के आध्यात्मिक मूल्यों का अध्ययन करते हैं, तब पाते हैं कि उनके मूल्य और जीवन दर्शन आध्यात्मिक धरातल पर बहुत उच्चकोटि के हैं।
गौरवशाली इतिहास और वैदिक परंपराओं से संबंध-
भारत के इतिहास,चाहे वह पुरातात्विक साक्ष्य हों अथवा लिखित—के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि प्राचीन शास्त्रों में भी विभिन्न भागों में जनजातीय समाज के राज्यों का विस्तृत इतिहास मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि निषाद, भील, मुंडा, गोंड, उरांव आदि अर्थात् लगभग सभी जनजातीय समाजों के अपने राज्य रहे हैं। कई राजवंशों का मूल इन्हीं जनजातीय समाज से आता है। उदाहरण के लिए, चेर, चोल, पाण्ड्य से लेकर गोंड, चेरो, खरवार, और नागवंश आदि सभी जनजातीय वैभव की गाथा का वर्णन और प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।


दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश

ऋग्वेद (8/6/28) में कहा गया है: उपह्वरे गिरीणां संगथे च नदीनाम्। धिया विप्रो अजायत।
इसका अर्थ है कि पर्वतों तथा नदियों के संगमों के निकट वन प्रदेशों में रहने से मनुष्य मेधावी होता है, उसकी बुद्धि का विकास होता है। इस वैदिक निर्देश का पालन करते हुए ही ज्ञान-विज्ञान के समस्त केंद्र वनों में ही बनाए जाते थे। यह सिद्ध करता है कि तथाकथित 'मूलधारा' वाला समाज का भारतीय सनातन समाज के साथ अभिन्न संबंध है।
जनजातीय समाज की परम्पराएँ विशुद्ध वैदिक परम्पराओं के निकट हैं, और यह कहा जा सकता है कि सनातन की परम्पराओं में निहित दर्शन को सुदृढ़ बनाए रखने का श्रेय पूर्णतः जनजातीय समाज को जाता है, जो उनकी पूजन-पद्धति और परम्पराओं में उस विशुद्ध स्वरूप में दृष्टिगोचर होता है, जो शास्त्रीयकरण होने से पूर्व विद्यमान था।


ऋग्वेद: चतुर्वेद में प्रथम 

केवल स्थानीयता के आधार पर दिखाई पड़ने वाली भिन्नता को लेकर यह कुतर्क देना कि जनजातीय समाज असभ्य, अनपढ़ है और नृजातीय अध्ययन का विषय मात्र है, पूर्णतः अंग्रेजों की कुटिल नीति का द्योतक है, न कि वास्तविकता का। अंग्रेजी राज से पहले न ही भारतीय समाज को पिछड़ा माना गया और न ही वह अलग-थलग निवास करता था।
जनजातीय समाज का योगदान केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि तकनीकी और सामरिक भी रहा है। नल-नील जनजातीय समाज के अभियंता थे। एकलव्य और घटोत्कच जैसे महान योद्धा भी इसी समाज से आते हैं। मौर्यकाल में आटविक समाज उत्कृष्ट इस्पात का उत्पादक रहा। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में 16 आटविक राज्यों का उल्लेख है, जिनमें शासन उन्हीं राजाओं के हाथों में रहने दिया गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी आटविक राजाओं को सहयोगी के रूप में रखने की नीति का उल्लेख मिलता है।
ऐसे प्रमाणों की कमी नहीं है जो जनजातीय समाज की गौरवशाली विरासत और समृद्ध संस्कृति को पुष्ट करते हैं। अब हम इस संस्कृति को समझने के लिए उनके दर्शन पर कुछ बिंदुओं पर चर्चा करेंगे तो और अधिक स्पष्टता आयेगी।
उत्पत्ति तथा गोत्र परंपरा-अधिकांश जनजातियों की उत्पत्ति संबंधी कथाओं में सनातन धर्म में भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से मिलती-जुलती कथाएँ मिलती हैं। लगभग सभी समूह के आदि पुरुष के रूप में महादेव का ही नाम मिलता है—यह बात अलग है कि कहीं उन्हें बड़ा देव,कहीं शंभू शेख,कभी ठाकुरदेव तो कभी दूल्हादेव कहकर संबोधित किया जाता है। जिस प्रकार सनातन धर्म में समगोत्री विवाह वर्जित है, उसी प्रकार जनजातीय समाज में भी समगोत्री विवाह निषेध है जिसके पीछे तर्क बिल्कुल समान है कि एक ही गोत्र के युवक-युवती भाई-बहन माने जाते हैं।


जनजातीय समुदायों के कुछ गोत्र चिन्ह 

प्रकृति पूजन- जनजातीय समाज में मूर्तिपूजा का बहुत अधिक प्रचलन नहीं मिलता। इसका अर्थ यह नहीं कि वह भारतीय समाज से अलग है या सनातन धारा का अंग नहीं है। यह हम भी जानते हैं कि सनातन में भी मूर्तिपूजा का प्रादुर्भाव बहुत बाद में हुआ, उससे पूर्व प्रतीकोपासना ही प्रचलित थी। जनजातीय समाज में आज भी मूर्ति-पूर्वप्रतीकों का ही प्रचलन है। इस प्रतीकात्मक पूजन पद्धति के अंश वटसावित्री,पीपल पूजा, गोवर्धन पूजा जैसे अनेक तीज-त्योहारों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं।


चित्र:करमा पूजा 

कुलदेवता तथा पितरपूजा- आज हमने अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान के लिए वर्ष में एक बार श्राद्धपक्ष की निश्चिती कर ली है जो समय के साथ केवल प्रतीकात्मक स्वरूप में शेष रह गई है। किन्तु जनजातीय समाज ने आज भी इस परंपरा को संजोकर रखा है। वे नित्य या वर्षभर अपने पेन-पुरखों (पूर्वजों) को याद कर उनका सम्मान करते हैं।


दोने में पूर्वजों के निमित्त अर्पित भोजन 


संस्कार- सनातन धर्म में जीव के जन्म के साथ ही संस्कारों का आरम्भ हो जाता है जो मृत्यु के बाद ही समाप्त होता है। उसी प्रकार जनजातीय समाज में भी कुछेक संस्कार अनिवार्य रूप से किए जाते हैं, जैसे कि जातकर्म, नामकरण,कर्णवेधन, विवाह और अंत्येष्टि। विवाह के सम्पूर्ण संस्कार में तो सनातन के रीति-रिवाज विशुद्ध रूप से नजर आते हैं, जिसमें वधू के चयन से लेकर सिंदूरदान तक सबकुछ समान ही दिखलाई पड़ता है। हालाँकि,अंत्येष्टि संस्कार में शवाधान, शवदहन और गाड़ने से पूर्व अग्नि देने की परंपरा दिखलाई पड़ती है।
जनजातीय देवतत्त्व और परम्पराएँ सनातन धर्म के मूल दर्शन, विशेषकर प्रकृति पूजन, गोत्र व्यवस्था और पितृ सम्मान, को उनके मौलिक स्वरूप में सहेजे हुए हैं। इतिहास और प्राचीन शास्त्रों के प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि जनजातीय समाज के अपने समृद्ध राज्य रहे हैं और उन्होंने इस्पात उत्पादन जैसे महत्त्वपूर्ण उद्योगों में योगदान दिया है।
यह समाज अलग-थलग या पिछड़ा नहीं है, बल्कि सदियों से भारतीय सभ्यता की मुख्यधारा का एक गौरवशाली, आध्यात्मिक और तकनीकी रूप से उन्नत हिस्सा रहा है। जनजातीय जीवन-दर्शन उस औपनिवेशिक दुष्प्रचार का खंडन करता है जिसने इन्हें असभ्य मानकर भारतीय समाज से दूर करने का प्रयास किया था। यह समाज भारतीय संस्कृति की अखंडता और आध्यात्मिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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