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पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

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बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"

बैगा समुदाय की परम्परागत"मड़ई"

छत्तीसगढ़ के बैगा चक क्षेत्र में निवास करने वाली बैगा जनजाति में हाठ क्रय विक्रय केन्द्र के साथ वे स्थान भी है जिसमें पहुंचने के लिए युवक युवतिया सदैव तत्पर रहते है, इसमें भाग लेने वाले युवक-युवतिया अपनी ‌भावी पति-पत्नियो को ढूंढने आते हैं तथा सामुहिक उत्सव मनाने के लिए एकत्र होते हैं। मड़ई अगहन मास से प्रारंभ होकर माघ महीने तक चलता हैं, जिसमें देव आराधना करते हैं जीवन के विविध रंगों से रंगा मड़ई का अलग महत्व होता है।

The Mysterious Baiga Tribe Of Madhya Pradesh, India | MP Tourism

मड़ई का शाब्दिक अर्थ....
बैगा जनजाति में मड़ई का शाब्दिक अर्थ मड़वा (मंडप)होता हैं। जहां से अपना ‌शुभ कार्य सिद्ध करते हैं,बैगाओ के अराध्य दौगनगुरु का विवाह गगाईन माई से हुआ था, हिन्दू धर्म में इसे कार्तिक एकादशी देव उठानी,ग़ौरी गौरा,शिव पार्वती के विवाह के रुप में मानते हैं,कहा जाता है कि नागा बैगा व नागा बैगिन के द्वारा पवित्र संस्कार को बैगा गुनिया अपना कर पुरोहित का कार्य किया करते है , तथा अपने खैर वो गढ़ की बातें आपस में हल करते हैं

मड़ई के दिन संबंधित ग्राम के बैगा ,हैजा,धुकी,क्षय,बड़े माता, आदि ब्याधियो और विपत्ति को दूर करने के निमित्त गांव बांधता है,अनेक ग्रामों की ग्राम देवी देवता,अपने सेवक के साथ मड़ई आती है, उनकी ध्वजा एक बड़े बांस को सजाकर बनाई जाती है,इस ध्वाजा को निसान कहा जाता है, मड़ई में विभिन्न ग्रामों के सेवक अपने निसान को दूसरे ग्राम के निसान से भेंट करवाते हैं। मड़ई की घोषणा गांव के गुनिया बैगा के द्वारा किया जाता है। मड़ई एक हाट बाजार पर ही लगता है।

Madai Festival in Bokkar Khar by Baiga Tribe

मड़ई में चोर विवाह...
मड़ई देखने के दौरान यदि किसी बैगा युवक को हम उम्र बैगा युवतियां पसंद आया तो उसे युवक करमा गीत के माध्यम से उनका पसंद पुछता है,यदि लड़की अपनी पसंद के अनुसार लड़के के पक्ष में आ जाता है तो मना राजी विवाह हो जाता है,यदि लड़की पसंद नहीं करतीं तो युवक अपने साथियों के साथ युवती को उठाकर अपना घर ले जा कर हल्दी पानी डाल देते हैं, युवतियां के साथी छुड़ाने की कोशिश करते हैं, बाद में उनके माता-पिता को बुलाया जाता है और शराब पिलाकर विवाह के लिए राजी करते हैं। बैगा चक क्षेत्र के बैगा आदिवासियों में चोर विवाह का प्रचलन है। गांव प्रमुख के सहमति से मात्र 22रुपये में विवाह सम्पन्न कराया जाता है।

मड़ई में गंधर्व विवाह.….
मड़ई में बैगा जनजाति के युवक युवतियों में गंधर्व विवाह करने की प्रथा का चलन है, अगर बैगिन युवती किसी समवयस्क युवक पर आसवक्त होगी तब युवक के गले में बंधे गमछे को पकड़ कर उसकी हों जाने की मनुहार करती है, युवक अगर पूर्व से शादी शुदा है तो वह हाथ जोड़कर उसे अपनी बहन स्वीकार करता है,और मड़ई का खर्चा पानी देता है।एक दूसरे के राज़ी होने पर युवक अपने टोले के साथियों और युवती की‌ सहेलियों की सहमति से उसे अपनी सहचारी मान लेता है,और घर ले आता हैं। युवती की सहेली की सूचना पर उसके पिता वर पक्ष के ग्राम जाकर नेग करता है,इस तरह मड़ई में गंधर्व विवाह सम्पन्न होता हैं जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है।

बैगा चक क्षेत्र की प्रमुख मड़ई....
छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले बैगा आदिवासियों की अनुठी परम्परा हैं मड़ई जहां जनजाति समाज की प्रमुख रीति-रिवाजों को ढूंढने कारगार सिद्ध होता हैं।

(1) दलदली मड़ई...
कबीरधाम जिला मुख्यालय से62किलोमीटर एवं बोड़ला विकास खण्ड से 52किलोमीटर की‌ दूरी पर मैकल श्रेणी में दलदली गांव ‌बसा हुआ है यहां मड़ई माघ महिना में दो दिवसीय मड़ई मेला लगता है, जहां मंडला,बालाघाट  बिलासपुर, मुंगेली, कवर्धा से व्यापारी अपना सामान बेचने आते हैं, इस मड़ई में सभी बैगाजन अपने पारम्परिक वेशभूषा में होते हैं। पुरुष धोती,बन्डी, कलगी,फेटा, और वाद्ययंत्र मांदर के साथ आते हैं, युवतियां पाटीदार साड़ी, भंवरी, बिछी माला, फुदरा, बीरन, पटा,कायचूरा, साफा, आदि पहनें हुए होते हैं। दलदली मड़ई में लाला बरघटिया बरघाट के वंशज के द्वारा चोंगी ‌चढाकर मड़ई को शुभारम्भ किया जाता है।

युवक की टोली मांदर बजाते हैं युवतियों के द्वारा चावल छीचने काम करते है, बांस से बना मड़ई को पूजा के बाद घुमाया जाता है, मड़ई के साथ नर्तक दल भी आगे मांदर के थाप पर नृत्य करते हैं। मड़ई का पहला दिन  मौज मस्ती के साथ,गुड़गप्पा मिठाई का आनंद लेते हैं ,बैगा जनजाति बीरापान के शौक़ीन होते हैं, मड़ई के दूसरे दिन को बासी मड़ई या गोदरी मड़ई कहते हैं,गोदरी मड़ई मेला में सामाग्री क्रय विक्रय किया जाता है, सामाग्री क्रय में महिलाओं का महत्व पूर्ण कार्य होता है।

हर बैगा आदिवासी साल भर के लिए नमक गड़ा वाला खरीदना अनिवार्य है,साथ में सोना ‌ , चांदी, बर्तन आदि खरीदा जाता हैं। दलदली इलाका का मड़ई में आदिवासी समुदाय के लोगों के द्वारा  बैगानी करमा नृत्य कार्यक्रम रात-भर करतीं हैं। सुबह बासी मड़ई में ‌सामान खरीदने के पश्चात् अपने गांव को जाते हैं।

(2) तरेगाव जंगल का मड़ई....
बोड़ला दलदली मुख्य मार्ग पर तरेगाव जंगल का मड़ई  प्रतिवर्ष 26जनवरी को लगता है ,इस मड़ई की घोषणा गांव के बैगा जनजाति के द्वारा किया जाता हैं,इस मड़ई में खिचराही के पण्डा के द्वारा गुण्डी ध्वजा खम्ब बांधने के साथ पुजा आराधना किया जाता है।सागौन वन के बीच में तरेगाव का मड़ई भरता है,इस मड़ई में विदेशी पर्यटक भी आते हैं। साथ में कवर्धा राज के राजा भी तरेगाव जंगल के मड़ई में बैगा आदिवासियों से मिलने आते हैं तथा बैगा जनजाति राजा को अपने बीच पाकर  नृत्य गान से स्वागत करते है। खासकर बैगा जनजाति अपना मड़ई लेकर आते हैं,देव आराधना, शक्ति पूजा के साथ बैगा जन आगामी वर्ष हेतु ,इष्टकामना के साथ अच्छी फसल,, दैवीय शक्ति के प्रकोप से बचने के लिए, गुरु देवगन को याद करते हैं। साथ ही अपने जरूरत की सामग्री को खरीदते हैं।

(3) मवाई मड़ई,.....
मैकल श्रेणी के प्रमुख मड़ई मवाई हैं जो छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदाय बैगा गोड़ अगरिया जनजाति के लोगों का आस्था का केंद्र है।मवाई मड़ई मध्यप्रदेश के मंडला जिले के मवाई विकास  खण्ड मुख्यालय हैं।जो मंडला से 98किमी की दूरी पर स्थित है, तथा छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले से 78किमी की दूरी पर स्थित है एवं दलदली से 13 किमी की दूरी पर है।यह मड़ई बैगा चक क्षेत्र की प्रमुख मड़ई मेला हैं जो एक सप्ताह तक चलता हैं यह मड़ई 18फरवरी के आस पास भरता है, मड़ई की घोषणा सिरहा के द्वारा किया जाता है, छत्तीसगढ़ के बैगा आदिवासियों यहां अपने देवी देवताओं के साथ ‌शामिल होते हैं।

दलदली क्षेत्र के बैगा जनजाति ,गोड़ आदिवासी समुदाय के लोग अच्छी मित्रता का परिचय देते हुए मेहमान बाजी करते हैं और इस क्षेत्र में दलदली, पंडरिया,चिल्पी क्षेत्र के ‌लोग शामिल होने आते हैं। मड़ई मेला में युवाओं की भागीदारी अधिक होती है जो पारम्परिक वेशभूषा में रहते हैं और हाथ में मांदर ‌लिए होते हैं ,वहि युवतियां अपने पसंद के अनुसार आभूषण के साथ नर्तक दल में शामिल होते हैं।मवाई मड़ई में खास यह हैं कि यहां बैगा महापंचायत का आयोजन प्रतिवर्ष होता है जिसमें बैगा जनजाति के ‌गाव प्रमुख मोकडदम दीवान शामिल होते हैं।

मवाई मड़ई जिस जगह पर लगता है उस जगह प्रा‌चीन सरोवर है उस सरोवर पर साल का पेड़ है जिसके प्रत्येक शाखा पर भवर छत्ता है इसलिए उस जगह को भंवर माछ स्थल कहते हैं जो सभी के लिए आस्था का केंद्र है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि यह  सरोवर काफी पुराना है, साल का पेड़ भी ‌पुराना हैं,कहते हैं कि तीन वर्ष में एक‌ जीव‌ की ‌बलि‌ लें लेता है।जो मैकल श्रेणी के प्रमुख आदिवासी समुदाय के लोगों का आस्था का केंद्र है।इस मड़ई में देश ‌विदेश के शैलानी आते हैं। मड़ई के द्वारा लोक जीवन की संस्कृति के समन्वय दिखाई देता है।

(4)पण्डा मड़ई कलवाखेरो....
कलवाखेरो मड़ई चिल्पी से जबलपुर मार्ग पर मगली व मोतीनाला के बीच सड़क से लगा हुआ है जिसे बस से‌ बैठकर देखा जा सकता है।यह चौगान मड़ई, भीमडोगरी,पण्डा मड़ई कलवाखेरो के नाम से जाना जाता है।यह मड़ई ‌गोड़ जनजाति का का पण्डा मड़ई है । कलवाखेरो में दोनो नवरात्रि में ज्वारा बोया जाता है, यहां देवगन गुरू,गगमाई,शाक्तदेवी की चांदी की मूर्ति विराजमान हैं। यहां साल लकड़ी का 5फीट खम्बा गड़ा है जिसमें साकर बधा हुआ है , मनोरोगी का इलाज साकर में ‌बाधकर किया जाता है।                        

कलवाखेरो मड़ई गोंड समाज के प्रमुख ‌पण्डा पुजारी का महापंचायत पुन्नी के दिन लगताहै इसलिए पुन्नी मेला भी कहा जाता है। मड़ई बांस की लकड़ी पर मयूर पंख,लाल, सफेद,काला,हरा, रंग ‌के निसान (झण्डा) लगाकर बनाते हैं। मड़ई की आगवानी प्रमुख पण्डा के द्वारा किया जाता है,जो हाथ में सकड़, तथा वनभैंसा के सींग का तुरही रखते हैं,जिसे बीच-बीच में बजाते जाते हैं।

महिलाएं मड़ई के साथ अपने घर से लाये चांवल को मड़ई के ऊपर फेंकते हैं, मड़ई को सामने से नहीं देखा ‌जाता हैं,ऐसी मान्यता है।इस मड़ई में पण्डा पुजारी के द्वारा दैवगन गुरु के अनुसार पूजा पाठ की निगरानी का जायजा लेते हैं।इस मड़ई मे बली प्रथा का‌ प्रचलन है,बकरा का बलि देने की प्रथा है जो बदना  बदते है। कलवाखेरो मड़ई खैर माई को समर्पित है, यहां खेरो माई की चांदी की मूर्ति है जिसे देखकर पुन्नी की चन्दा की याद आता है,यह मड़ई पण्डा पुजारी के आस्था का केंद्र है।

इसके अलावा चाणाबजाग, नेऊर,बाकी,चिल्पी,बोक्करखार, आदि जगहों पर बैगा आदिवासियों की मड़ई लगता हैं। छत्तीसगढ़ में मड़ई मेला का आयोजन दशहरा पर्व से प्रारंभ होकर मार्च माह तक चलता हैं। छत्तीसगढ़ में बस्तर को मड़ई का संसार कहते हैं। मड़ई मेला का बाहय रुप मेलों की तरह ही दिखाई पड़ता है किन्तु आंतरिक रुप में धार्मिकता इसका प्रमुख तत्त्व है, मड़ई देवताओं की उपासना में उल्लास का पर्व है। मड़ई के दौरान आदिवासी संस्कृति का सम्पूर्ण प्रर्दशन देखा जा सकता है, आदिवासी समुदाय का नृत्य, गीत, एवं पारम्परिक वेशभूषा,श्रृंगार का खुलकर प्रर्दशन होता हैं।

संकलन कर्ता: प्रहलाद पात्रे
दलदली तरेगाव जंगल
मो.न.9893294373

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