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तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4

तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4

पीतल उद्योग और बढ़ईगिरी जैसे पारंपरिक ग्रामोद्योग भारतीय संस्कृति, कौशल और आधुनिक इंजीनियरिंग विकास के बीच सेतु का कार्य करते हैं। ये उद्योग कम पूंजी में अधिक रोजगार, पर्यावरणीय टिकाऊपन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का सशक्त मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

भारतीय ग्रामोद्योग की इस श्रृंखला में हमने खादी, बांस कला और कृषि उपज की महत्वपूर्ण भूमिकाओं को समझा। अब इस अंतिम भाग में हम उन दो पारंपरिक व्यवसायों की चर्चा करेंगे जिन्होंने न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संजोया है, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग और औद्योगिक विकास की नींव भी रखी है ।
भारतीय संस्कृति में धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक समारोह केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और कला का अद्भुत समन्वय हैं। इन आयोजनों में पवित्रता और भव्यता का वातावरण तैयार करने में पीतल और कांसे के नक्काशीदार बर्तनों की विशेष भूमिका होती है ।
पीतल, जो तांबे और जस्ते की मिश्र धातु है, अपने प्राकृतिक जीवाणुनाशक गुणों के कारण प्राचीन काल से स्वास्थ्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आज तक, पीतल और कांसे  के बर्तनों का उपयोग भारतीय घरों में निरंतर जारी है।
इन बर्तनों पर की गई नक्काशी देव-देवियों के चित्र, मंडल, स्वस्तिक, ओम और श्रीयंत्र भारतीय शिल्पकला की उच्च परंपरा को दर्शाती है। आज भी राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और बंगाल में पारंपरिक तरीकों से पीतल के बर्तनों का निर्माण होता है।
इस तरह यह धातुएं हमारी उन्नत ज्ञान परंपरा के साथ-साथ हमारी आस्था और औद्योगिक समृद्धि तक सभी घटकों का प्रतिनधित्व करती है ।

पीतल के बर्तन जो अब है विलासिता का प्रतीक 
पीतल के बर्तन जो अब है विलासिता का प्रतीक 

मुरादाबाद, जिसे "पीतल नगरी" या "पीतल सिटी" के नाम से जाना जाता है, भारत से कुल हस्तशिल्प निर्यात का 40% से अधिक हिस्सा अकेले उत्पादित करता है।
इस शहर में लगभग 850 निर्यात इकाइयां और 25,000 धातु शिल्प औद्योगिक इकाइयां कार्यरत हैं । शहर की संकरी गलियों में कारीगर दिनभर परिश्रम करते हुए अत्यंत उत्कृष्ट पीतल के उत्पाद तैयार करते हैं ।
बिहार के पारेव गांव में भी पीतल के बर्तनों का निर्माण सैकड़ों परिवारों को आजीविका के अवसर प्रदान करता है। हाल के वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में आय बढ़ने से विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों में पीतल के बर्तनों की मांग में वृद्धि हुई है।
 यह उद्योग 1.5 लाख से 8 लाख तक रोजगार सृजित करता है, जिसमें अधिकांश कारीगर और श्रमिक निर्माण, पॉलिशिंग, नक्काशी और तामचीनी के कार्यों में संलग्न हैं ।

हमारी परंपरागत ज्ञान परंपरा में एक अन्य शिल्पकला बहुत प्रचलित है – “बढ़ईगिरी (कारपेंट्री)” जो विश्वभर में कौशल से संबद्ध प्राचीनतम व्यवसायों में से एक है।
भारतीय संस्कृति में जब भी धार्मिक या सामाजिक आयोजन होते हैं, तो मंडप, तोरण, पालकी और मंच जैसी संरचनाओं का निर्माण बढ़ईगिरी के कौशल पर निर्भर करता है।

ग्रामीण भारत में यह व्यवसाय केवल फर्नीचर निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि उपकरण, खिलौने, घरेलू सामान और सांस्कृतिक कलाकृतियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आवश्यकता- मनोरंजन तक लकड़ी से बनता है सबकुछ
आवश्यकता- मनोरंजन तक लकड़ी से बनता है सबकुछ

इस कला से सम्बंधित एक ऐसा तथ्य भी जो अचंभित भी करता है और हमें अपनी पारंपरिक ज्ञान परंपरा पर गर्व करने का अवसर भी देता है और वह है “चन्द्रगुप्त मौर्य” का राजप्रासाद
यूनानी लेखक ने अपनी पुस्तक इंडिका में इसकी चर्चा करते हुए इसे बहुत भव्य बताया जी लकड़ी और मिट्टी का स्तम्भ्युक्त महल था जिसकी वास्तुकला और भव्यता अत्यंत आकर्षक थी । इसके अवशेष आज भी कुम्हरार (पटना) में देखे जा सकते हैं।

चन्द्रगुप्त मौर्य के राजप्रसाद के अवशेष - कुम्हरार 
चन्द्रगुप्त मौर्य के राजप्रसाद के अवशेष - कुम्हरार 

ग्रामीण औद्योगिक कौशल को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू की हैं । प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत 7.38 लाख नई इकाइयां स्थापित की गई हैं, जिनमें से 80% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत बढ़ई, नाव निर्माता और खिलौना निर्माता जैसे पारंपरिक कारीगरों को 5-7 दिन का बुनियादी प्रशिक्षण और 15 दिन का उन्नत प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान लाभार्थियों को ₹500 प्रतिदिन की सहायता राशि और आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए ₹15,000 की अनुदान राशि दी जाती है।
राजस्थान के पाली जिले में स्वयं सहायता समूहों ने लकड़ी का काम सीखकर स्थानीय बाजार में फर्नीचर बेचना शुरू किया, जिससे न केवल आय बढ़ी बल्कि सामाजिक पहचान भी मजबूत हुई। भारतीय कौशल विकास विश्वविद्यालय (BSDU) जयपुर अब बढ़ईगिरी में डिग्री-डिप्लोमा से लेकर पीएचडी तक की शिक्षा प्रदान कर रहा है, जो पारंपरिक बढ़ईगिरी को आधुनिकीकरण की दिशा में ले जा रहा है।


Logo- कौशल विकास विश्वविद्यालय, जयपुर

पीतल उद्योग और बढ़ईगिरी जैसे ग्रामोद्योग ग्रामीण परिवारों को रोजगार प्रदान करते हैं, ये उद्योग कम पूंजी और उच्च रोजगार का मॉडल प्रस्तुत करते हैं, जो भारत की श्रम-अधिशेष ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त है।
स्थानीय कच्चे माल का उपयोग, पारंपरिक कौशल और कम ऊर्जा प्रक्रियाएं इन्हें पर्यावरण की दृष्टि से भी टिकाऊ बनाती हैं ।इस श्रृंखला के माध्यम से हमने देखा कि खादी, बांस कला, कृषि उपज, पीतल उद्योग और बढ़ईगिरी ये सभी ग्रामोद्योग भारत की आर्थिक संरचना के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
ये न केवल हमारी सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण करते हैं, बल्कि आधुनिक इंजीनियरिंग और औद्योगिक विकास को मजबूत बुनियाद भी प्रदान करते हैं । इनके सतत विकास से ग्रामीण भारत में रोजगार, आत्मनिर्भरता और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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