बैगा लोकगीत-बिलमा
July 11, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

बैगा जनजाति अपने आप को प्रकृति पुत्र मानते हैं, चूंकि बैगा लोग सघन वनों में निवास करते हैं,अतैव उनका शिकारी होना स्वाभाविक ही है। कुल्हाड़ी या फरसा बैगाओ के कंध पर अवश्य मिलता है। जंगल की यात्रा में बैगा धनुष -बाण रखना बैगा कभी नहीं भूलते हैं।ये धनुष -बाण (बिसाड़) के द्वारा जंगली पशु -पक्षियों का शिकार करते हैं।शिकार के लिए गांव के पूरे जवान पुरुष एक साथ निकल जाते हैं। जंगल में जाकर वे अलग-अलग टोलियों में वे जानवर का हांका लगाते हैं।
हांका लगाते समय वे झाड़ियों में छिप जाते हैं।कई बार वे अपने शरीर से झाड़ियां बांध लेते हैं ताकि शिकार को भ्रम हो जाये। बैगा निशाना साधने में अत्यंत कुशल होते हैं एवं उसके अचूक निशाने से छोड़ा गया तीर जानवरों को या तुरंत मार डालता है या घायल कर देता है। घायल पशु का वे सावधानी से पीछा करते रहते हैं। बैगा लोग विष बुझे तीरों या फंदों आदि का भी प्रयोग करते हैं।
बैगा की शिकार कला विकसित और वैज्ञानिक है। अब बैगा लोग सीधा शिकार बहुत कम करते हैं। अपनी बुद्धि का परिचय विभिन्न फंदे डालकर शिकार करने में देते हैं। चूहे का शिकार हो या शेर का या मछली का, सबके लिए अचूक फंदे का प्रयोग करते हैं। फंदे की कारीगरी देखकर दंग रह जाना पड़ता है। अलग-अलग महीनों में अलग-अलग फंदे लगायें जातें हैं। कुंवार माह में खोजीं फांदा, अगहन मास में दबकी फांद, पुस मास चिड्डी फांदा, चैत मास दलगा फांदा लगाते हैं।

खुज्जी फांदा - खुज्जी फांदा तीन तरह के होते हैं। खुज्जी फांदा,धोपी फांदा और बड़ा फांदा। तीनों फांदा बांस की कमानी से बनाये जातें हैं। कमानी से सरफूंद वाला फांदा लगाया जाता है। ऐसे फंदे कम से कम दो -दो चार-चार जानवरों के आने के रास्ते में लगा दिए जाते हैं। बाकी रास्ता घास से बंद कर देते हैं जानवर रास्ता समझकर फंदे की तरफ ही जाता है। जानवर वहीं दब जाता है। चीता फंसाने के लिए तने के नीचे कुत्ते बांधें जाते हैं, जो भोंकते रहते हैं। कुत्तों की आवाज से चीता खींचा चला आता है और फंस जाता है।
सूरी फांदा -सूरी फांदा चीतल, सांभर, जंगली भैंसे तथा शेर फंसाने के लिए बांधा जाता है। सूरी छह या आठ इंच लंबी लोहे की छूरी है।इसे चार या पांच हाथ की लकड़ी के सिर पर लगाते हैं।यही सूरी फांदा है।बेवर या बांड़ी में उतार की तरफ़ एक गड्ढे में गाड़ देते हैं। गड्ढे के पास की उतार को और खोद देते हैं ताकि जानवर छलांग लगाकर निकले। रात्रि में जानवर बेवर या बांड़ी में घुस जाता है। कोई आदमी चुपके से घुसने का रास्ता बंद कर देता है। फिर हल्ला मचाया जाता है। जानवर को उसी गड्ढे की ओर भागने की जगह मिलती है जैसे की वह छलांग लगाता है, उसके अगले पैर गड्ढे में होते हैं और छूरी गरदन या पैरों के बीच छाती में घुस जातीं हैं।
वघधनुर्हा फांदा - वघधनुर्हा फांदा दो ऊंचे खूंटे गड़ाकर बनाया जाता है। दोनों खूंटों पर आड़ा धनुष बांध देते हैं। धनुष की प्रत्यंचा पर दो-तीन तीर चढ़ा देते हैं। रौंदे से एक डोरी बांधकर तीरों की फरो की दिशा में एक कील बांध देते हैं।कील से डोर को तीरों की फलकों की दिशा में एक खूंटे से बांध देते हैं। जैसे ही जानवर खूंटे की डोरी से टकराते हैं कील की रस्सी ढीली हो जाती है और तीर तेजी से जानवर की शरीर में फंस जाता है। इसी फंदे में गरदन फंसती है और तीतर फंसाये जातें हैं। खुज्जी फांदा खेत की मेड़ में या कछार में रोपते है। धोपी फांदा से मुर्गा-मुर्गी तथा मोर फंसाये जातें हैं।
दलगा फंदा -दलगा फंदा खरगोश, घुटरी, चीतल, सांवर फंसाने के लिए लगाया जाता है। जानवर की ताकत के मान से फंदा मजबूत या कम मजबूत बनाया जाता है। दलगा फंदा बांस या झाड़ को झुकाकाकर बनाते हैं। वृक्ष इस प्रकार ढ़ुंढा जाता है कि जिसे झुकाया जा सके। झाड़ के नीचे बारह इंच व्यास का तथा नौ-दस इंच गहरा गड्ढा बना दिया जाता है। गड्ढे में एक लकड़ी का खूंटा गाड़ दिया जाता है। जिसके उपरी सिरे में एक कनखा होता है। वृक्ष के ऊपर से रस्सी बांधकर गड्ढे की ओर झुका दिया जाता है। रस्सी के दूसरे सिरे में गोलाकार सरफूंद लगाई जाती है।
सरफूंद के पास एक लकड़ी की कील फंसाई जाती है। कील को बर्रु की छोटी सी नेर द्वारा खूंटे से फंसा दिया जाता है। वृक्ष का झुकने का बोझ नेर थामे रहती है। अब बांस के तिकोने छिटवे को गड्ढे पर ढंक कर ऊपर घांस -फूस डाल देते हैं। जैसे ही जानवर का पैर गड्ढे में पड़ता है छिहवा पैर के साथ गड्ढे में जाता है। नेर को धक्का लगता है, कील का आधार हटते ही वृक्ष सीधा हो जाता है और सरफूंद सिमटकर जानवर के पैर को जकड़ लेती है और जानवर रस्सी के सहारे वृक्ष पर उल्टा लटक जाता है। दलगा फंदा जानवरों को पानी पीने के रास्ते में रोपते है।
थोंगा फांदा - थोंगा फांदा खरगोश, सांभर, चीतल, चीतों के शिकार के लिए लगाया जाता है। कभी-कभी बेवर में भी लगाया जाता है। यह फांदा बाड़ी के बाहर लगाया जाता है। एक वृक्ष के भारी तने को खूंटे पर आड़ा इस प्रकार रखते हैं कि वह कील पर टिका रहे। कील बांस की मोटी सींक से जुड़ी रहती है। जिसे थोंगा के समानांतर रखते हैं। सींक का लंबा सिरा तने को नीचे की ओर छूता रहता है।
तने के आजू-बाजू कांटे लगाकर मार्ग बंद कर दिया जाता है। थोंगा फांदा में जाने के लिए रास्ता रास्ते में से निकलने की कोशिश करता है। जानवर के घुसते ही सींक को धक्का लगता है और वह गिर पड़ती है और कील पर रखे थोंगे का संतुलन बिगड़ जाता है। वह भी जानवर पर पूरी तरह से गिर जाता है। तीर विष बुझे होते हैं। थोड़ी देर में जानवर मर जाता है।
मलन्दा फंदा - ये एक विशेष फंदा है जिसे "मलन्दा"कहते हैं, तैयार किया जाता है। वृक्ष की टहनी को स्पिंग जैसा उपयोग में लाया जाता है। इस फंदे में सांभर और कभी-कभी कभी शेर तक फंस जाता है, यह इतना मजबूत होता है कि एक बार फंस जाने पर शक्तिशाली जानवर भी छूटकर नहीं जा पाते। कभी-कभी बेचारे शिकारी का भी शिकार हो जाता है।
चेंप फंदा (गोंद फंदा)- चेंप फंदा पक्षियों को फंसाने के लिए है। चेंप एक चिपकने वाला तरल पदार्थ है। जो बैगा स्वयं बड़ी मेहनत से बनाते हैं। तीन-चार फुट लंबी किमची में एक फुट के करीब चेंप का अच्छी तरह लेप कर देते हैं। इस किमची को किसी पेड़ की डाल में सीधा या तिरछा बांध देते हैं। पक्षी इसी किमची के चेंप लगें स्थान पर बैठ जाते हैं, लेकिन जब उड़ने की कोशिश करते हैं तो उनके पंख वहीं चिपककर रह जातें हैं।
पक्षियों को पकड़ने के लिए ऊंबर कैर और बड़ के दूध का लेप उन डालियों, टहनियों एवं पत्तों पर कर दिया जाता है, जहां पक्षी आदतन बैठा करते हैं। पक्षी के बैठने पर चिपकने वाला दूध उनके परो को उड़ने के अयोग्य कर देता है। बैगा ऐसे पक्षियों को गुलैल से आसानी से मार गिराते हैं।
दुबका फांदा- दुबका फंदा चूहा पकड़ने के काम आता है। दुबका फांदा बेवर की बाड़ी में लगाया जाता है। खेत में कई फंदे लगायें जातें हैं। प्रायः चार-चार हाथ की दुरी पर लगाये जाते हैं । दुबका फांदा थोंगा फंदा का छोटा रुप है।

शिकार के लिए फंदा बनाते बैगा समुदाय के लोग
कठबिलाई- कठबिलाई चूहा फंसाने के लिए होती है। कठबिलाई काठ की एक डेढ़ फीट की डोंगी होती है। डोंगी में एक गुलेल होती है। गुलेल की रस्सी को सींक से कसकर उसमें एक तीर फंसाया जाता है। डोंगी में रोटी के टुकड़े या दाने रख दिए जाते हैं। जैसे ही चूहा सींक को धक्का लगाता है तीर की डोरी तीर को चूहे की तरफ फेंकती है और तीर चूहे के शरीर में घुस जाता है।
1.मछली का शिकार- मछली बैगा का प्रिय भोजन है। बैगा जनजाति में मछली पकड़ने के तीन तरीके हैं।
1.फंदे लगाकर 2.पानी उलीचकर 3.मजाव
1.फंदे लगाकर - मछली पकड़ने के लिए बैगा छोटे -बड़े कई प्रकार के मछली फंदा बनाते हैं। मछली के फंदों की टेकनिक (बनावट) आश्चर्यजनक है। बांस की बारिख किमचियो को डोरे से गूंथा जाता है। मछली पकड़ने के कई फंदे है।
(अ.) झिटका फंदा - झिटका बांस की गोल काड़ियो को डोरे से गूंथकर बिगुलनूमा बनाया जाता है।झिटका का आकार शंकु की तरह होता है।पिछला सिरा डोरे से सभी काड़िया मिलाकर बांध दिया जाता है। इन्हें बहते हुए पानी की पतली धार में रोपा जाता है। बहाव के साथ रोपे जाते हैं। बहाव के साथ मछलियां इसी में चली आती है। झिटका में नीचे की ओर से रास्ता न होने के कारण वे उसी में फंस जाती हैं। झिटका छोटे-बड़े आकार के होते हैं।
(ब) कुमनी फंदा - कुमनी भी बांस की बारिक किमचियो से बनाई जाती है। यह चौकार लगभग एक फुट चौड़ा ऊंचा बांस तथा ढाई फुट लंबा -चौड़ा होता है।इसका द्वार झिटकानुमा होता है। जिसमें मछली आसानी से खाने की लालच में चली तो आती है लेकिन निकल नहीं पाती।फूरा पिंजरा पानी में डाल दिया जाता है।
(स) कुर्रु फंदा - कुर्रु फंदा मछली पकड़ने का कलात्मक फंदा है।यह एक या डेढ़ फीट का होता है। आकार झिटका की तरह होता है। चौड़ा मुंह तरफ बांस की बारीक-बारीक काड़ियो की शंकु का आकार की गुंथन होती है, जो अंदर की ओर खुली रहती है। इसमें मछली अंदर चली जाती है पर बाहर नहीं निकल सकती। पानी की पतली धाराओं में कुर्रु फंदा से मछली पकड़ी जाती है। मछलियों के खाने के लिए दाने भूजंकर रखें जाते हैं।
(द) चेतवा फांदा -कोसे की डोर से चौकोर जाली बुनकर बनाया जाता है। चेतवा तीन या चार फुट चौड़ा और आठ-दस फुट लंबा होता है। एक सिरे में नीचे की ओर मिट्टी के गोले लटका दिए जाते हैं। ऊपरी धागों में घास के पूले बांध दिए जाते हैं। पूले पानी के ऊपर तैरते रहते हैं और बीच की डोर उस पर सध जाती है। आसपास की डोर खूंटे से बांध दी जाती है। यह जाल का काम करतीं हैं। रात भर रखने के बाद जाल से मछली निकाल ली जाती है।

मछली पकड़ने हेतु कई प्रकार के औजार किये जाते है प्रयुक्त
2. पानी उलीचकर- पानी उलीचकर मछलियों का शिकार करना बैगाओ की पुरातन पद्धतियों में से एक है। कहते हैं "चार -छह मछलियों के लिए पूरे गांव के स्त्री -पुरुष दहार के सारे पानी को उलीच डालते हैं। सुबह से नदी के पानी को पहले बांध दिया जाता है। फिर पानी को भोरो में उलीचते हैं। नीचे जहां पानी गिरता है, उसे भी बांध देते हैं और वहां कुमनी या झिटका लगा देते हैं। इसमें पानी के साथ फेंकी गई मछलियां फंस जाती है। दहार का पानी उलीचते -उलीचते थोड़ा सा रह जाता है। मछलियां उतरने लगती है। फिर इन्हें पकड़ लिया जाता है। फिर आपस में बांट लिया जाता है।
3. मजाव- मछली मारने का मजाव सबसे भयानक और अमानवीय ढ़ंग है। किसी जलाशय में छिंद और एक वृक्ष की जड़ को कुचलकर पानी में घोल दिया जाता है। ज़हर से दहार या जलाशय की सब मछलियां मर जाति है। वन संरक्षण अधिनियम 1972 के साथ बैगा जनजाति में शिकार की परंपरा लगभग समाप्त हो चुका है। साथ ही बैगा जनजाति अपने समाज को बता दिया गया है कि जंगली जानवर का शिकार अपराध है। बैगा जीवन प्रकृति से शूरु होता है और प्रकृति के साथ मरना, जानवरों से विशेष लगाव रखने है। जिसके कारण बैगा समाज पशु पालक का कार्य करने लगे। कुछ पशु -पक्षियों के साथ टोटम जुड़ा हुआ है।
-प्रहलाद पात्रे
कवर्धा (छ.ग.)
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