राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी | सोमवार
नक्षत्र: पुनर्वसु | योग: वज्र | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

प्रस्तुत लेख छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य ‘रहस’ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। रामगढ़ की प्राचीन गुफाओं से लेकर ग्रामीण जीवन तक, यह कला कृष्ण-लीला और गम्मत के समन्वय का प्रतीक है। आधुनिकता और आर्थिक अभावों के कारण इस समृद्ध परम्परा के सिमटने की समस्या को उभारते हुए, यह आलेख हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का गम्भीर विमर्श खड़ा करता है।
प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ नाट्य कला का प्रमुख केन्द्र रहा है। सरगुजा के रामगढ़ में स्थित सीता बेंगरा और जोगीमारा गुफाएं इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। यहाँ प्राचीन नाट्य मंच उपस्थित हैं। प्राचीन काल में इन स्थानों पर नाटकों का प्रदर्शन होता था। पहाड़ को काटकर यह नाट्य मंच बनाया गया था। इससे सिद्ध होता है कि छत्तीसगढ़ में नाट्य कला की परम्परा बहुत पुरानी है। यह परम्परा आज भी छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में लोकनाट्य के रूप में जीवित है।

प्राचीनत नाट्यशाला सीता बेंगरा
छत्तीसगढ़ के लोकनाट्यों में 'रहस' का विशिष्ट स्थान है। इसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं के साथ गम्मत का भी प्रदर्शन होता है। रहस का सम्बन्ध सीधे श्रीकृष्ण की लीलाओं से है। यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। कोई व्यक्ति या गाँव जब कोई मन्नत मानता है तब वह इसका आयोजन करता है। रहस लोकनाट्य का प्रदर्शन 7, 9 या 10 दिनों तक चलता है। इसके प्रमुख व्यक्ति को रासधारी कहते हैं। रहस समूह में 20 से 25 कलाकार होते हैं। इनमें रासधारी के अतिरिक्त बाजा मास्टर, हारमोनियम वादक, चिकरहा, तबलची और मंजिरहा शामिल होते हैं। शेष कलाकार लीला के पात्रों के अनुसार अपना अभिनय करते हैं।
ग्रामीण लोग रासधारी को रहस प्रदर्शन के लिए आमन्त्रित करते हैं। इसके बाद वे शुभ मुहूर्त देखकर स्थान चिह्नित करते हैं। इसी स्थान पर 'रहसबेड़ा' का निर्माण होता है। रहसबेड़ा मुख्य मंच होता है। कलाकार इसी मंच पर लीला का अभिनय करते हैं। ग्रामीण एक पूरक मंच गाँव के चौराहों, देवस्थलों या तालाब के पास भी बनाते हैं। इससे कृष्णलीला से सम्बन्धित प्रसंगों को खेलने में सुविधा होती है। उदाहरण के लिए कालिया दमन प्रसंग के लिए कलाकार तालाब या नदी के घाट को चुनते हैं।

गांवों में रहस का मंचन
रहस लोकनाट्य के प्रदर्शन में मूर्तिकला का भी महत्व है। इस अवसर पर कलाकार 126 देवी और देवताओं की मूर्तियाँ बनाते हैं। ये मूर्तियाँ कृष्ण के चरित्र से सम्बन्धित होती हैं। इनमें भीम की मूर्ति अनिवार्य रूप से बनती है। रहसबेड़ा यज्ञ वेदी की तरह वर्गाकार होता है। इसके बीच में कदम्ब वृक्ष के प्रतीक के रूप में कागज से बने फूल और पत्तियाँ लगाई जाती हैं। इसके नीचे श्रीकृष्ण, राधा, रिद्धि, सिद्धि और गणेश की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं। कलाकार इन्हीं मूर्तियों की परिक्रमा करते हुए लीला का गायन और अभिनय करते हैं। मंच के भीतर चारों कोनों में राजा परीक्षित, शुकदेव, ब्रह्मा और शिव की मूर्तियाँ होती हैं। दर्शक मंच के चारों ओर बैठते हैं।

रहस में उपयोगी मूर्तियाँ
कलाकार प्रतिदिन गणेश और सरस्वती की वन्दना के साथ लीला का प्रारम्भ करते हैं। सूत्रधार दर्शकों को प्रसंग की सूचना देता है। रहस के संवाद प्रसंग और पात्र के अनुसार होते हैं। ये संवाद अलिखित होते हैं। पात्र अपने संवाद स्वयं गढ़ता है। कई प्रसंगों में व्यास केवल मूल वाक्य गाता है। इससे पात्र को संवाद बोलने में सुविधा मिलती है। रहस लोकनाट्य का आधार 'राधाविहार' और 'बृजविलास' पुस्तकें हैं। कुछ लोग बाबू रेवा राम के गुटका को भी इसका आधार मानते हैं। कलाकार रहस में श्रीकृष्ण के चरित्र को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करते हैं। कृष्णलीला की एकरसता को तोड़ने के लिए कलाकार बीच में गम्मत भी प्रस्तुत करते हैं। इससे दर्शकों का मनोरंजन होता है।
रहस में वादक समूह की वेशभूषा बहुत सामान्य होती है। वे धोती और कुरता पहनते हैं तथा गले में दुपट्टा डालते हैं। उनके सिर पर टोपी या पगड़ी और माथे पर टीका होता है। अन्य कलाकार पात्र के अनुसार अपनी रूपसज्जा करते हैं। कलाकार आवश्यकता के अनुसार मुखौटों का उपयोग भी करते हैं। चमकदार मुकुट और कोट रहस की शोभा बढ़ाते हैं। रहस में गम्मत प्रस्तुत करने वाली छैला पार्टी में नाचा की तरह जोकड़ और परी होते हैं। पुरुष ही स्त्री पात्रों की भूमिका निभाते हैं। ये कलाकार अपनी साज और सज्जा स्वयं करते हैं। वादक कलाकार खड़े होकर अपने वाद्यों को बजाते हैं। वे आवश्यकता के अनुसार केन्द्र में स्थापित श्रीकृष्ण की मूर्ति के चारों ओर परिक्रमा करते हुए भी वादन करते हैं। यह रहस की एक बड़ी विशेषता है। लोकनाट्य की यही सहजता दर्शकों को सबसे अधिक प्रभावित करती है।

रहस का दृश्य
देवकी: मैं कितनी अभागिन हूँ। सात बालक मेरी गोद से अलग हो गए। यह बालक भी मेरी गोद से अलग हो जाएगा। वसुदेव: मुझे ले जाने दो। मैं अपनी इच्छा से थोड़ी ले जा रहा हूँ। मैं प्रभु की इच्छानुसार इन्हें ले जा रहा हूँ। देवकी: स्वामी क्या आप नहीं मानेंगे? वसुदेव: प्रभु की यही इच्छा है। देवकी: क्या आप इन्हें ले ही जाएंगे? वसुदेव: भगवान की ऐसी ही इच्छा है। देवकी (कृष्ण को वसुदेव की गोद में देते हुए): जाओ, जाओ मेरे लाल यशोदा की गोद में पलने के लिए। मेरी गोद के लाल जाओ। यशोदा मुझसे अधिक तुम्हें प्यार करे और तुम्हारे प्यार की माता बने। (वसुदेव जाने लगते हैं) देवकी: ठहरो प्रभु, एक बार तो मुझे जी भर के देख लेने दो।
रहस में कृष्ण और कंस की भूमिका निभाने वाले कलाकार स्थायी होते हैं। शेष कलाकारों की भूमिका आवश्यकता के अनुसार बदलती रहती है। इस कारण उनके संवाद भी बदल जाते हैं। कलाकार अपने संवाद स्वयं गढ़ते हैं। इससे उनके चरित्र में उतार और चढ़ाव बना रहता है। सभी कलाकारों की अभिनय क्षमता एक समान नहीं होती है।
रहस लोकनाट्य की कथा पौराणिक है। इसके बाद भी इसमें छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कथा प्रसंगों में स्थानीय जीवन शैली और सामाजिक विचार शामिल होते हैं। कलाकार मनोरंजन के लिए गम्मत और छैला पार्टी का आयोजन करते हैं। रहस के आयोजन में पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। इस कारण रहस की परम्परा अब सिमट रही है। वर्तमान समय में टेलीविजन और आधुनिक माध्यमों का प्रभाव भी इसका एक बड़ा कारण है। इन चुनौतियों के बाद भी लोकनाट्य की यह गौरवशाली परम्परा आज भी कई स्थानों पर देखने को मिल जाती है। यह लोक संस्कृति की जीवन्तता का सीधा प्रमाण है।
-पीसी लाल यादव
वरिष्ठ साहित्यकार, गंडई पंडरिया, छत्तीसगढ़
राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
फाग का लोकरंग
February 27, 2026
हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ी संस्कृति में खेलों की जीवंत परंपरा
July 24, 2025
लोक परंपरा में नारी शक्ति का उत्सव : तीजा-तिहार
July 22, 2025
आस्था और विश्वास का केन्द्र : नर्मदा
July 02, 2025
जनजातीय अनुष्ठान : गौरी-गौरा पूजा
April 30, 2025
छत्तीसगढ़ी फाग का लोकरंग
March 25, 2024
कुदरत का नजारा, धाँस की जलधारा
December 05, 2023
छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में नदियों का महत्व
October 13, 2023
नरोधी नर्मदा जहाँ झिरिया से बुलबुलों में निकलता है जल
August 05, 2023
रमणीय बुजबुजी एवं नथेला दाई
July 15, 2023
प्रदक्षिणा की संस्कृति : राजिम की पंचकोशी यात्रा
June 15, 2023
लोक संस्कृति का जीवन सरिताएं
June 05, 2023
परम्परा के संवाहक भ्रमणशील कथा गायक : बसदेवा
May 15, 2023
बकरकट्टा के बैगा और उनका देवलोक
May 08, 2023
कोल जनजाति का देवलोक
May 01, 2023
छत्तीसगढ़ का लोक पर्व : तीजा तिहार
August 30, 2022
मोटियारी घाट की बंजारी माता : नवरात्रि विशेष
October 09, 2021
छत्तीसगढ़ का पर्यटन स्थल : बैताल रानी घाट
September 01, 2021
चोड़रापाट के डोंगेश्वर महादेव : सावन विशेष
August 11, 2021
छत्तीसगढ़ का हरेली त्यौहार एवं लोक प्रचलित खेलों की परम्परा
August 08, 2021
जानो गाँव के प्रस्तर शिल्पकार
July 14, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक में रचा बसा रथदूज का त्यौहार
July 12, 2021
लोक जीवन की शक्ति, लोक पर्व अक्ति
May 14, 2021
पंडवानी के सूत्रधार श्रीकृष्ण
April 26, 2021
कुँवर अछरिया की लोक गाथा एवं पुरातात्विक महत्व
April 09, 2021
छत्तीसगढ़ी बालमन की मनोरंजक तुकबंदियाँ
April 05, 2021
छत्तीसगढ़ के लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ
April 01, 2021
दे दे बुलौआ राधे को नगर में : होली फाग गीतों के संग
March 27, 2021
लोक का सांस्कृतिक उत्सव: मड़ई
February 10, 2021
छत्तीसगढ़ी लोक शिल्प : कारीगरी
February 03, 2021
छेरिक छेरा छेर बरकतीन छेरछेरा : लोक पर्व छेरछेरा पुन्नी
January 28, 2021
प्राचीन इतिहास की साक्षी घटियारी
January 16, 2021
प्राकृतिक हरितिमा और भौगोलिक सौंदर्य का अतुलनीय संगम : कुआँ धाँस
December 08, 2020
अन्न बहन-बेटी तथा मां के प्रति सम्मान का लोकपर्व पोला
August 18, 2020
लोक आस्था का दर्पण : आठे कन्हैया
August 11, 2020
प्रकृति-प्रेम का प्रतीक : भोजली
August 04, 2020
छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार और खेल की लोक परम्परा
July 20, 2020
प्रकृति का अजूबा मंडीप खोल : छत्तीसगढ़
June 03, 2020
सुरही नदी के तीर देऊर भाना के पुरातात्विक अवशेष
March 23, 2020
छत्तीसगढ़ का लोक साहित्य एवं वाचिक परम्परा
March 19, 2020
गंडई का शिवालय जहाँ पाषाण बोलते हैं
March 12, 2020
विश्व मूलनिवासी दिवस की अवधारणा और इतिहास
August 09, 2026
बृहदीश्वर मन्दिर: चोलकालीन शिक्षा और ज्ञान का केन्द्र
August 08, 2026
सवनाही: ग्राम देवी देवता की आराधना और ग्राम सुरक्षा की परंपरा
August 07, 2026
शब्द प्रसंग शृंखला: भाग- 01 भाषा एवं शब्दों की व्युत्पत्ति
August 06, 2026
गुजरात के वनांचलों में मनाए जाने वाला लोक पर्व: बन्दी त्योहार
August 05, 2026
स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी: हुतात्मा समशेर सिंह पारधी
August 04, 2026
मधुश्रावणी: मिथिला के गाँवों में जीवित एक गुप्त स्त्री-लोक परंपरा
August 03, 2026
नर और नारायण : एक अनोखी मित्रता
August 01, 2026
मित्रता की लोक परंपराएं
August 01, 2026
लोकजीवन में मितान बदने की परंपरा
August 01, 2026
मुंशी प्रेमचन्द: भाषा, साहित्य और कथाकार
July 31, 2026
मातृभाषा, स्वदेशी और नारी-कल्याण: ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी एक युग प्रवर्तक
July 30, 2026
चंद्र ज्योति से ज्ञान ज्योति तक: गुरु पूर्णिमा का महत्व
July 29, 2026
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय
July 28, 2026
बैगा समुदाय की अनोखी परम्परा: रसनवा खाई का पर्व
July 28, 2026
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम: राष्ट्र निर्माण में विज्ञान और युवाओं की भूमिका
July 27, 2026
कारगिल विजय दिवस: भारतीय सैन्य का शौर्य एवं राष्ट्र रक्षा का संकल्प।
July 26, 2026
देवशयनी एकादशी हरि विष्णु चतुर्मास
July 25, 2026
चातुर्मास : संयम, साधना और स्वास्थ्य की यात्रा।
July 25, 2026
बारसूर नगर का नामकरण
July 24, 2026
विश्व मूलनिवासी दिवस की अवधारणा और इतिहास
August 09, 2026
बृहदीश्वर मन्दिर: चोलकालीन शिक्षा और ज्ञान का केन्द्र
August 08, 2026
सवनाही: ग्राम देवी देवता की आराधना और ग्राम सुरक्षा की परंपरा
August 07, 2026
शब्द प्रसंग शृंखला: भाग- 01 भाषा एवं शब्दों की व्युत्पत्ति
August 06, 2026
गुजरात के वनांचलों में मनाए जाने वाला लोक पर्व: बन्दी त्योहार
August 05, 2026
स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी: हुतात्मा समशेर सिंह पारधी
August 04, 2026
मधुश्रावणी: मिथिला के गाँवों में जीवित एक गुप्त स्त्री-लोक परंपरा
August 03, 2026
नर और नारायण : एक अनोखी मित्रता
August 01, 2026
मित्रता की लोक परंपराएं
August 01, 2026
लोकजीवन में मितान बदने की परंपरा
August 01, 2026
मुंशी प्रेमचन्द: भाषा, साहित्य और कथाकार
July 31, 2026
मातृभाषा, स्वदेशी और नारी-कल्याण: ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी एक युग प्रवर्तक
July 30, 2026
चंद्र ज्योति से ज्ञान ज्योति तक: गुरु पूर्णिमा का महत्व
July 29, 2026
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय
July 28, 2026
बैगा समुदाय की अनोखी परम्परा: रसनवा खाई का पर्व
July 28, 2026
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम: राष्ट्र निर्माण में विज्ञान और युवाओं की भूमिका
July 27, 2026
कारगिल विजय दिवस: भारतीय सैन्य का शौर्य एवं राष्ट्र रक्षा का संकल्प।
July 26, 2026
देवशयनी एकादशी हरि विष्णु चतुर्मास
July 25, 2026
चातुर्मास : संयम, साधना और स्वास्थ्य की यात्रा।
July 25, 2026
बारसूर नगर का नामकरण
July 24, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस
July 22, 2026