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छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस

छत्तीसगढ़ का पारम्परिक लोकनाट्य: रहस


प्रस्तुत लेख छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य ‘रहस’ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करता है। रामगढ़ की प्राचीन गुफाओं से लेकर ग्रामीण जीवन तक, यह कला कृष्ण-लीला और गम्मत के समन्वय का प्रतीक है। आधुनिकता और आर्थिक अभावों के कारण इस समृद्ध परम्परा के सिमटने की समस्या को उभारते हुए, यह आलेख हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का गम्भीर विमर्श खड़ा करता है।


प्राचीन काल से छत्तीसगढ़ नाट्य कला का प्रमुख केन्द्र रहा है। सरगुजा के रामगढ़ में स्थित सीता बेंगरा और जोगीमारा गुफाएं इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। यहाँ प्राचीन नाट्य मंच उपस्थित हैं। प्राचीन काल में इन स्थानों पर नाटकों का प्रदर्शन होता था। पहाड़ को काटकर यह नाट्य मंच बनाया गया था। इससे सिद्ध होता है कि छत्तीसगढ़ में नाट्य कला की परम्परा बहुत पुरानी है। यह परम्परा आज भी छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में लोकनाट्य के रूप में जीवित है।


प्राचीनत नाट्यशाला सीता बेंगरा

छत्तीसगढ़ के लोकनाट्यों में 'रहस' का विशिष्ट स्थान है। इसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं के साथ गम्मत का भी प्रदर्शन होता है। रहस का सम्बन्ध सीधे श्रीकृष्ण की लीलाओं से है। यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है। कोई व्यक्ति या गाँव जब कोई मन्नत मानता है तब वह इसका आयोजन करता है। रहस लोकनाट्य का प्रदर्शन 7, 9 या 10 दिनों तक चलता है। इसके प्रमुख व्यक्ति को रासधारी कहते हैं। रहस समूह में 20 से 25 कलाकार होते हैं। इनमें रासधारी के अतिरिक्त बाजा मास्टर, हारमोनियम वादक, चिकरहा, तबलची और मंजिरहा शामिल होते हैं। शेष कलाकार लीला के पात्रों के अनुसार अपना अभिनय करते हैं।

ग्रामीण लोग रासधारी को रहस प्रदर्शन के लिए आमन्त्रित करते हैं। इसके बाद वे शुभ मुहूर्त देखकर स्थान चिह्नित करते हैं। इसी स्थान पर 'रहसबेड़ा' का निर्माण होता है। रहसबेड़ा मुख्य मंच होता है। कलाकार इसी मंच पर लीला का अभिनय करते हैं। ग्रामीण एक पूरक मंच गाँव के चौराहों, देवस्थलों या तालाब के पास भी बनाते हैं। इससे कृष्णलीला से सम्बन्धित प्रसंगों को खेलने में सुविधा होती है। उदाहरण के लिए कालिया दमन प्रसंग के लिए कलाकार तालाब या नदी के घाट को चुनते हैं।


गांवों में रहस का मंचन

रहस लोकनाट्य के प्रदर्शन में मूर्तिकला का भी महत्व है। इस अवसर पर कलाकार 126 देवी और देवताओं की मूर्तियाँ बनाते हैं। ये मूर्तियाँ कृष्ण के चरित्र से सम्बन्धित होती हैं। इनमें भीम की मूर्ति अनिवार्य रूप से बनती है। रहसबेड़ा यज्ञ वेदी की तरह वर्गाकार होता है। इसके बीच में कदम्ब वृक्ष के प्रतीक के रूप में कागज से बने फूल और पत्तियाँ लगाई जाती हैं। इसके नीचे श्रीकृष्ण, राधा, रिद्धि, सिद्धि और गणेश की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं। कलाकार इन्हीं मूर्तियों की परिक्रमा करते हुए लीला का गायन और अभिनय करते हैं। मंच के भीतर चारों कोनों में राजा परीक्षित, शुकदेव, ब्रह्मा और शिव की मूर्तियाँ होती हैं। दर्शक मंच के चारों ओर बैठते हैं।


रहस में उपयोगी मूर्तियाँ

कलाकार प्रतिदिन गणेश और सरस्वती की वन्दना के साथ लीला का प्रारम्भ करते हैं। सूत्रधार दर्शकों को प्रसंग की सूचना देता है। रहस के संवाद प्रसंग और पात्र के अनुसार होते हैं। ये संवाद अलिखित होते हैं। पात्र अपने संवाद स्वयं गढ़ता है। कई प्रसंगों में व्यास केवल मूल वाक्य गाता है। इससे पात्र को संवाद बोलने में सुविधा मिलती है। रहस लोकनाट्य का आधार 'राधाविहार' और 'बृजविलास' पुस्तकें हैं। कुछ लोग बाबू रेवा राम के गुटका को भी इसका आधार मानते हैं। कलाकार रहस में श्रीकृष्ण के चरित्र को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करते हैं। कृष्णलीला की एकरसता को तोड़ने के लिए कलाकार बीच में गम्मत भी प्रस्तुत करते हैं। इससे दर्शकों का मनोरंजन होता है।

रहस में वादक समूह की वेशभूषा बहुत सामान्य होती है। वे धोती और कुरता पहनते हैं तथा गले में दुपट्टा डालते हैं। उनके सिर पर टोपी या पगड़ी और माथे पर टीका होता है। अन्य कलाकार पात्र के अनुसार अपनी रूपसज्जा करते हैं। कलाकार आवश्यकता के अनुसार मुखौटों का उपयोग भी करते हैं। चमकदार मुकुट और कोट रहस की शोभा बढ़ाते हैं। रहस में गम्मत प्रस्तुत करने वाली छैला पार्टी में नाचा की तरह जोकड़ और परी होते हैं। पुरुष ही स्त्री पात्रों की भूमिका निभाते हैं। ये कलाकार अपनी साज और सज्जा स्वयं करते हैं। वादक कलाकार खड़े होकर अपने वाद्यों को बजाते हैं। वे आवश्यकता के अनुसार केन्द्र में स्थापित श्रीकृष्ण की मूर्ति के चारों ओर परिक्रमा करते हुए भी वादन करते हैं। यह रहस की एक बड़ी विशेषता है। लोकनाट्य की यही सहजता दर्शकों को सबसे अधिक प्रभावित करती है।


रहस का दृश्य 

रहस में प्रस्तुत एक प्रसंग का अंश इस प्रकार है:

देवकी: मैं कितनी अभागिन हूँ। सात बालक मेरी गोद से अलग हो गए। यह बालक भी मेरी गोद से अलग हो जाएगा। वसुदेव: मुझे ले जाने दो। मैं अपनी इच्छा से थोड़ी ले जा रहा हूँ। मैं प्रभु की इच्छानुसार इन्हें ले जा रहा हूँ। देवकी: स्वामी क्या आप नहीं मानेंगे? वसुदेव: प्रभु की यही इच्छा है। देवकी: क्या आप इन्हें ले ही जाएंगे? वसुदेव: भगवान की ऐसी ही इच्छा है। देवकी (कृष्ण को वसुदेव की गोद में देते हुए): जाओ, जाओ मेरे लाल यशोदा की गोद में पलने के लिए। मेरी गोद के लाल जाओ। यशोदा मुझसे अधिक तुम्हें प्यार करे और तुम्हारे प्यार की माता बने। (वसुदेव जाने लगते हैं) देवकी: ठहरो प्रभु, एक बार तो मुझे जी भर के देख लेने दो।

रहस में कृष्ण और कंस की भूमिका निभाने वाले कलाकार स्थायी होते हैं। शेष कलाकारों की भूमिका आवश्यकता के अनुसार बदलती रहती है। इस कारण उनके संवाद भी बदल जाते हैं। कलाकार अपने संवाद स्वयं गढ़ते हैं। इससे उनके चरित्र में उतार और चढ़ाव बना रहता है। सभी कलाकारों की अभिनय क्षमता एक समान नहीं होती है।

रहस लोकनाट्य की कथा पौराणिक है। इसके बाद भी इसमें छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कथा प्रसंगों में स्थानीय जीवन शैली और सामाजिक विचार शामिल होते हैं। कलाकार मनोरंजन के लिए गम्मत और छैला पार्टी का आयोजन करते हैं। रहस के आयोजन में पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। इस कारण रहस की परम्परा अब सिमट रही है। वर्तमान समय में टेलीविजन और आधुनिक माध्यमों का प्रभाव भी इसका एक बड़ा कारण है। इन चुनौतियों के बाद भी लोकनाट्य की यह गौरवशाली परम्परा आज भी कई स्थानों पर देखने को मिल जाती है। यह लोक संस्कृति की जीवन्तता का सीधा प्रमाण है।

-पीसी लाल यादव
वरिष्ठ साहित्यकार, गंडई पंडरिया, छत्तीसगढ़

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