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नक्षत्र: आर्द्रा | योग: अतिगंड | करण: कौलव

पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026

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ब्रज के प्रमुख लोकवाद्य

ब्रज के प्रमुख लोकवाद्य

ब्रजबिहारी श्रीकृष्ण की ब्रजभूमि के कण-कण में मृदुल लोक संगीत व्याप्त है। ब्रजलोक संगीत ब्रजलोक मानस के आनंदोल्लास का बाह्य अमृताधारा है जो ब्रज की धरा पर सहज रूप में आप्लावित और प्रवाहमान होती है। लोकसंगीत लोक जीवन के झंझावातों को दूर कर अपार शांति, संतोष और धैर्य प्रदान करता है।

ब्रजवसुंधरा लोकसंगीत की उर्वर भूमि है। श्रीकृष्ण की सरस वेणु के सप्तस्वरों से यह भूमि आप्लावित हुई और राधिका तथा ब्रजांगनाओं के सुमधुर मंजीरों, ढोलक और खड़ताल से झंकृत हुई। इस कारण ब्रज का लोकसंगीत अन्य प्रदेशों के लोकसंगीत की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी व कल्याणकारी है।

ब्रजभूमि में प्रातःकाल से ही उषा की लालिमा के संग ही घर-घर से भजन-कीर्तन की मधुर ध्वनि तथा ब्रजललनाओं की स्वर लहरी गूंजने लगती है। लीलाधारी कृष्ण का स्मरण कर ब्रजवनिताएं गुनगुनाती रहती हैंः

जागिए ब्रजराज कुंवर भोर भयो अंगना।

चिरइ जागे चिरौंटा जागे, पंछी चाले चुगना।।

 गैल के बटोडी जागे गोदी जागे ललना।

 संग की सखियां चाली हम हूं चली जमना।।

लोकसंगीत के अंतर्गत भजन, गीत, रसिया, नौटंकी, सांगीत, सपरी, मल्हार, धमार, बरना बरनी के ब्याह के गीत, मल्हार, देवी व लांगुरिया के गीत, खेल के गीत गाए जाते हैं। इनके साथ ही उपयुक्त लय व ताल की संगत हेतु ढोलक, मजीरा, खरताल, झालरि हारमोनियम, बंसी, नगाड़ा, बम, डफ, चंग, खंजरी, ढपली आदि का प्रयोग किया जाए। सुरीली मधुर ध्वनि उत्पन्न कर तन-मन अति प्रफुल्लित, पुलकित एवं हर्षित करने में सहायक होता है।

ब्रजक्षेत्र की संस्कृति का अंग संगीत है और संगीत का समन्वित रूप है-गीत, नृत्य और वाद्य। गायन, वादन व नृत्य का अनूठा संगम ब्रज है। वाद्यों के प्रकार के संबंध में प्रसिद्ध है:

जग में सब श्रोता कहे, बाजा साढ़ा तीन। खाल,
 तार और फूंक है अर्ध ताल सुरहीन ।।

(सुनने वालों का कथन है कि साढ़े तीन प्रकार के वाद्य है- खाल (ढोल, ढोलक, तबला आदि) ताल और फूंक से बजने वाले है- पूरे वाद्य है, आधे वाद्य वे हैं जिनमें ताल है किंतु स्वर नहीं मादल, बांसुरी-स्वर से बजाये जा सकें किंतु मंजीरे, झांझ, खडताल में स्तर मिलाने की क्षमता नहीं है अतएव आधे माने गए हैं। एक दोहे में सभी वाद्य आ गए है.


खाल नगारा, ढोल, डफ और चरवावज जान। तार तंबूरा वीन है, सारंगी सुरयान ।।
फूंक में पुंगी बांसुरी सेनाई नर सार। ताल, मंजीरा, झांझ है, बाजे इत तैयार।।

सुविधा की दृष्टि से चार वर्ग भी कर दिए गए हैं: तत्, घन, अवनद्य और सुषिर।।

तत् वाद्यों के अंतर्गत वे स्वर वाद्य सम्मिलित होते हैं जो उंगली, गज, कमानी की सहायता से बजाए जाते है- वीणा, सारंगी, तानपूरा, वायलिन आदि। इनको लोक वाद्यों में नहीं माना जाता है। घनवाद्यों के अंतर्गत घर्षणवाले वाद्य होते हैं, जैसे झांझ, घंटा, मंजीरा, झुनझुना आदि। अवनद्य वाद्यों को ताल श्रेणी में रखा जाता है जिनके मुख पर चर्म मढ़ा होता है और हाथ या छड़ी के प्रहार से बजाए जाते हैं, जैसे ढोल, ढोलक मृदंग, पखावज, नक्कारा, खाल, नाल, खंजरी, ढप, डमरू आदि। सुषिर वाद्यों में वायु के प्रवेश से स्तर उत्पन्न किया जाता है। इनमें शंख, बांसुरी, श्रृंग-हिरन के सींग, भैंसे के सीग (धतूरे के पुष्प के आकार मुख) शहनाई, पुंगी, तुरही, शहनाई आदि।

ततवाद्यों में से इकतारा का उपयोग त्वरित और लय दोनों के लिए होता है। मझले आकार का होता है जिसमें तूबे पर बांस लगाकर बजाते हैं। चौतारा में चार तार लगे होते हैं। भक्तजन इन पर भजन गाते हैं। मीराबाई और रामदेव जी भजन गाते हुए घूमते रहते थे। घनवाद्य में आघात दिया जाता है। ब्रज के वाद्यों का विवरण इस प्रकार है:

झांझः लोहे या पीतल की धातु से बनता है। कुछ-कुछ दूरी पर पैसे के आकार के सिक्के लगे होते हैं आपस में टकराने से अद‌भुत नाद निकलता है। आकार में आठ अंगुल से सोलह अंगुल के होते हैं।

कांसे की दो रकाबियों से बना वाद्य है। पहले यह नृत्य संगीत में प्रयुक्त होता था। झांझ का उल्लेख पर्याप्त मिलता है।

झालरिः 'झालरि' को झल्लरी भी कहते हैं। अठारह अंगुल व्यास की, मध्य में दो अंगुल गहरी डोरी से मुक्त कर ढीले हाथ से बजाई जाती है। ब्रज में झालरि फांसे की बनी होती है जो बारह से सोलह अंगुल व्यास की हो सकती है। लकड़ी से बजायी जाती है।

तालः झांझ के समान ही यह वाद्य है जो कांसे से बनता है। बीच में दो छेद जिसमें डोरी डालकर जोड़ देते हैं। हाथों में पकड़ कर बजाते हैं (बाजत ताल मृदंग झांझ ढयप मुरली मुरज उपंग)

घंटाः पूजा के समय अथवा आरती करते समय बजाते हैं। मांगलिक अवसरों पर अथवा विजयोल्लास के भाव घंटे की ध्वनि से प्रकट किए जाते हैं।

मंजीराः पीतल से बने हुए आकृति में छोटे होते हैं। इनकी ध्वनि संगीत में नाद उत्पन्न करती है। दो अंगुल से चार अंगुल व्यास के होते हैं जिनके मध्य में एक अंगुल की गहराई होती है।

कठतालः यह ब्रज का विशिष्ट वाद्य है जो लकडी के ग्यारह अंगुल लंबे डंडों से बनाया जाता है। इसको ढीले हाथ से बजाते हैं। इसको हाथों में पहन कर बजाया जाता है।

डोलः ढोल (दुहुल) अत्यंत प्राचीन वाद्य है जिसको नृत्य, उत्सव पर बजाया जाता है (बाजत ताल मृदंग ढोल ढप)।

ढोलकः लोकवाद्यों में सबसे प्रधान ढोलक है। बालक के जन्म, मुंडन संस्कार पर ढोलक बजाना शुभसूचक है। वर्षगांठ, विवाह, देवी के गीत, खेल के गीत बिना ढोलक बजाये संभव ही नहीं हैं। इसको मंजीरों की संगत से बजाया जाता है (ढोलक झांझन झमक लगाये)। यह गोलाकार धनुष की सी आकृति की होती है जिसके दोनों ओर के मुख टाल से मढ़े रहते हैं। पीतल अथवा अन्य धातु के छल्लों से डोरी को कस दिया जाता है।

खंजड़ी: गोलाकार वाद्य है जो एक ओर खाल से मढ़ी हुई तथा दूसरी ओर खुली हुई होती है। इसको चंग' भी कहते हैं जिसका प्रयोग टप्पा

गायिकी में विशेष रूप से होता है। खाल वाले भाग को हाथ से बजाया जाता है। दूसरे हाथ का आघात छल्ले पर होता है।

नवकाराः मिट्टी का बना हुआ खाल से मढ़ा होता है। लोक में इसको 'ताशा' भी कहते हैं। किसी शुभ अवसर पर बजाया जाता है। इसका ही बड़ा रूप 'दप' है।

बांसुरीः बांसुरी बांस की पोली छह आठ छेदवाली बजायी जाती है। श्रीकृष्ण के अनेक नाम बांसुरी-वशी पर पड़ गएः वंशीधर, मुरली मनोहर वेणुगोपाल आदि।

श्रीकृष्ण की वशी का प्रभाव व्यापक रूप से लोक पर पड़ाः

मोहन की बसी वाजे तीन लोक धुनि छाय। सुर, नर मुनि मोहित भए महिमा कही न जाय।।

होलिकोत्सव के प्रारंभ होने की सूचना ही लोक वाद्य ढप से दी जाती है। डफ' मुस्लिम फकीरों की देन है जो ब्रज में आकर 'ढप' बन गया-

होरी आई रे, बसंता बफ ले लै होरी ।। बहुरि इप बाजन लागे री। बाजत मृदंग झांझ ढप ढोलक बीन मंजीरन जोरी ।

एक प्रकार से वाद्यों का एक साथ बजना ही होली का सूचक है। छोटे आकार का ढप ही 'दपली' है।

ब्रज के मंदिरों में मंगल ध्वनि नौबत बजने से होती है। ब्रज जनपद में विवाह के लोकगीत नौबत बजने से प्रारंभ होते हैं-

बडे सबेरे न्हौबत बाजी जागे दीनदयाल। विवाह के प्रारंभ में भी न्हौबत्त बजती है-

धरती के दरबार न्हौबत बाजि रई ए। बाजि रई ए घनघोर न्हीबत ।

होली पर चंग बजाया जाता है और चौपाई गाई जाती है। मुखचंग फूंक से बजाया जाता है। ब्रजभूमि में इन वाद्यों की धूम है जो उल्लास की सूचना देते हैं

ढोल मृदंग झांझ ढप बाजै औ बाजत म्हौंचंग । रसिया गोरी होरी नाचै खेलै फाग फबंग ।।

इस प्रकार ब्रजभूमि रासरंग की भूमि है जहां पर उल्लास और उमंग इन वाद्यों से प्रकट होती है।

लेख
डा० हर्षनन्दिनी भाटिया

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