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जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत और पुरावशेष

जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत और पुरावशेष

किसी भी सभ्यता, संस्कृति, देश और समाज को जानने के लिए उसके इतिहास को जानना अत्यावश्यक है । और इतिहास को जानने के लिए हमारे पास विभिन्न स्त्रोत उपलब्ध होते है जिसके  दो मुख्य प्रकार है लिखित और पुरातात्विक साक्ष्य।ध्यातव्य है कि यदि विश्वसनीयता की बात करें तो  लिखित साक्ष्यों  की तुलना में पुरातात्विक साक्ष्य अधिक विश्वसनीय माने जा सकते है।

यदि यह विचार किया जाये कि ऐसे क्या कारण है जिससे लिखित प्रमाणों की तुलना में पुरातात्विक प्रमाणों की विश्वसनीयनियता अधिक है तो समझ आता है कि लिखित इतिहास को तोड़-मरोड़ कर वास्तविक तथ्यों  में परिवर्तन करना बहुत सरल है किन्तु पुरातात्विक साक्ष्यों में आमूल-चूल परिवर्तन करना भी बहुत कठिन कार्य है।पुरानी वस्तुएं जैसे- पत्थरों, ईंटों एवं  लकड़ी आदि से बनी इमारतों के अवशेष, औजारों, हथियारों के टुकड़े इसके अलावा बर्तन, आभूषण, मूर्तियों, चित्रों एवं सिक्के आदि सभी के अवशेष पुरातात्विक साक्ष्यों की श्रेणी में आते  हैं।


पुरातात्विक साक्ष्यों के प्रमुख स्त्रोत

यदि आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि हम आज  इतिहास के किसी घटनाक्रम अथवा किसी व्यक्तित्व के बारे में बात न करके ऐतिहासिक स्त्रोतों पर केन्द्रित क्यों हैं !तो इसका उत्तर है- आज हम इन ऐतिहासिक स्त्रोतों के माध्यम से आपको भारतीय समाज के मूल अर्थात जनजातीय समाज से परिचित करवायेंगे । ब्रिटिश काल में जिस समाज को कभी असभ्य, कभी बर्बर तो कभी संग्रहालय में रखने लायक एक विचित्र वस्तु की तरह देखा गया आज उसी समाज के गौरवशाली अतीत के अवशेषों से हम आपका प्रत्यक्षीकरण करायेंगे ।

इस आलेख में हम आपको उस जनजातीय समाज के कुछ पुरातात्विक साक्ष्यों से अवगत कराएँगे जिन्हें उन लूटेरे और धोखेबाज अंग्रेजों ने असभ्य और बर्बर कहा जिन्होंने अपने 200 साल के शासनकाल में बर्बरता और भारतियों से असभ्य व्यव्हार करने में मानवता की सभी सीमाओं को लांघ दिया । इन अवशेषों और प्राप्त साक्ष्यों से हमें उनकी उच्च कोटि तकनीक और ज्ञान का पता चलता है जिन्हें सुशिक्षित और सभ्य बनाने का दायित्व खुद ही अंग्रेजो ने ले लिया था ।

महाराष्ट्र का एक बड़ा शहर है “नागपुर” जिसका नाम आप सब ने ज़रूर सुना होगा । क्या आप जानते हैं कि इस शहर को सुनियोजित और व्यवस्थित बसने का कार्य जिस महिपत सिंह उर्फ़ बख्त बुलंद शाह ने किया था वे गोंड समाज से आते थे । आज हम जिस नागपुर को एक मेट्रोपोलिटन शहर की गणना में सम्मिलित करते हैं कहीं न कहीं वह इन्हीं गोंड शासक की दूरदर्शिता का परिणाम है, इन्होने बारह अलग अलग बस्तियों को मिलाकर एक शहर बसाया इन बस्तियों में सीताबर्डी, गाडगे, भानखेड़ा,  रायपुर,  राजापुर,  सक्करदरा, फुटाला,  हरिपुर और कई अन्य बस्तियां सम्मिलित थीं । उन्होंने सड़कों के निर्माण पर पर्याप्त ध्यान दिया और स्थानों को चिन्हित किया और कई इमारतें बनाईं, नागपुर में किले और मस्जिद निर्माण का श्रेय भी इन्ही को दिया जाता है । ऐतिहासिक ग्रंथो के अनुसार मुग़ल शासक अकबर से बख्त बुलंद शाह के दादा ने युद्ध किया था जो जटबा गोंड सरदार थे । उनके शासनकाल में किले को मजबूत किया गया और पांच प्रमुख द्वार बनाये गए । 


नागपुर के संस्थापक - बख्त बुलंद शाह 

सर रिचर्ड जेन्किन्स ने गोंडवाना और नागपुर में कृषि, उद्योग और वाणिज्य के विकास का बहुत सारा श्रेय बख्त बुलंद शाह को दिया है । उन्होंने न केवल नागपुर की नींव रखी बल्कि मेहनती लोगों को उदारतापूर्वक भूमि अनुदान देकर इस क्षेत्र में मानव बसाहट को  विस्तार देने  में भी अहम् भूमिका निभाई । शहर और सड़क निर्माण और क्षेत्र का विभाजन करने के पश्चात उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु इसके चारों ओर दिवार खड़ी करने का आदेश भी पारित किया । अंतिम गोंड शासक बुरहान शाह हुए जिन्होंने नागपुर में प्रत्यक्ष शासन किया तत्पश्चात अंग्रेजो के कब्ज़ा करने से पहले तक नागपुर भोंसलों के अधीन रहा ।

ऐसे ही एक अन्य गोंड शासक से सम्बंधित जानकारी हम आपसे साझा करना चाहेंगे जिनके नाम पर “हटा शहर” का नाम पड़ा । वर्त्तमान में “हटा शहर”  मध्यप्रदेश के दमोह जिले की सबसे बड़ी तहसील है जिसे तेरहवीं शताब्दी में गोंड शासक हट्टे शाह ने बसाया था यह संग्राम सिंह के बावन गढ़ों में भी शामिल था जिसका अस्तित्व रानी दुर्गावती के काल में भी विधमान था।


हटा का किला 

यदि इतिहासकारों की माने तो रानी दुर्गावती आवश्यकता पड़ने पर अपने सिंगौरगढ़ किले से एक सुरंग के माध्यम से हटा के किले तक पहुँच जाती थीं । इस किले का निर्माण पत्थर एवं चूने के गारे को मिलकर बनाया गया था और नीचे दी गयी फ़ोटोज़ से आप स्वयं इसकी मजबूती का अंदाज़ा लगा सकते हैं । किले का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में स्थित है जिससे यह सहज ही पता चलता है कि तत्कालीन कालीन स्थापत्यकला में  वास्तु का भी पर्याप्त ध्यान रखा जाता था।


रानी दुर्गावती और सिंगौरगढ़ का किला 

इस किले में निर्मित झरोखों को देखने से समझ आता है कि प्राकृतिक प्रकाश और वायुसंचार पर भी विशेष ध्यान दिया गया था।बावड़ी तक पहुँचने  का मार्ग  इतने सुनियोजित ढंग से बनाया गया था कि किले के अन्दर और बाहर दोनों ओर से बावड़ी तक पहुंचा जा सकता था।विशेष बात यह है कि यह बावड़ी एक दुमंजिला भवन थी जहाँ भूतल का प्रयोग संभवतःशासकों द्वारा व्यक्तिगत एवं रानियों के प्रयोग हेतु किया जाता रहा होगा।

सुरक्षा की दृष्टि से भी यह किला अद्भुत है यहाँ दीवारों पर बीच-बीच में कुछ खाने इस तरह से बनाये गए थे जहाँ छुपकर किले के सैनिक तो आसानी से वार कर सकते थे, गोलियां चला सकते थे लेकिन उन दीवारों पर पत्थरों को कुछ इस तरह से रखा गया कि बाहरी हमला दीवार से टकरा कर विफल हो जाता था । किले की दीवारों से लगे हुए छज्जे सड़कों की तरह चौड़े हुआ करते थे ताकि युद्ध और आपातकाल में सैनिको को किले के बाहर घेराबंदी करने में आसानी हो।

हरियागढ़ किला :- मध्य गोंडवाना की एक महत्त्वपूर्ण रियासत हरियागढ़ जो की वर्त्तमान छिंदवाड़ा शहर के निकट स्थित है । यह किला हजारों वर्ष पुराने  धुरवा गोंड महाराजाओं के गौरवशाली अतीत की कथा समेटे हुए है । 1500 ऊँचाई पर स्थित  हरियागढ़ किला सोलहवीं शताब्दी में धुरवा गोंड शासक जाटवा के काल में अपने सौंदर्य और भव्यता के लिए और अधिक चर्चित रहा । इस शासक ने अनेक सिक्के भी जारी किये जो वर्तमान में नागपुर संग्रहालय में सुरक्षित हैं । इस किले में कई सुरंगे भी हैं और स्थानीय बड़े-बुजुर्गों की माने तो इन सुरंगों का उपयोग महाराष्ट्र से आवागमन हेतु गुप्त मार्ग के रूप किया जाता था ।


गोंड शासक जाटवा धुरवा का समाधिस्थल

ऐसे पुतात्विक साक्ष्यों की कमी नहीं पर उन्हें सीमित शब्दों में बंधना कठिन अवश्य है अतः आज हम अपनी कलम को यहीं विराम देते हैं। सार यह है कि भारतीय समाज की जड़ों को समझने के लिए पुरातात्विक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं, क्योंकि इनमें समय के साथ हेरफेर संभव नहीं होता। जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न अवशेष यह प्रमाणित करते हैं कि जिसे औपनिवेशिक शासन ने कभी असभ्य और पिछड़ा कहा, वही समाज उन्नत तकनीक, स्थापत्यकला और सुव्यवस्थित नगरीय जीवन से सम्पन्न था।

जिसप्रकार नागपुर जैसे आधुनिक महानगर की आधारशिला गोंड शासक बख्त बुलंद शाह ने रखी थी। इसी प्रकार मध्यप्रदेश का हटा नगर गोंड शासक हट्टे शाह की दूरदर्शिता का परिणाम है। किले की बावड़ी, सुरंगें, झरोखे और चौड़े छज्जे इस समाज की तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक परिपक्वता को उजागर करते हैं। हरियागढ़ किला धुरवा गोंड राजवंश की समृद्ध परंपरा का परिचायक है। यहाँ से प्राप्त शासकीय सिक्के और गुप्त सुरंगों का जाल उस समय की प्रशासनिक क्षमता और सामरिक समझ को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

इन सभी पुरातात्विक प्रमाणों से यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि जनजातीय समाज किसी भी रूप में पिछड़ा नहीं था। भारत की सभ्यता के निर्माण में उसकी भूमिका अत्यंत गौरवपूर्ण और समृद्ध रही है। औपनिवेशिक इतिहासकारों की धारणाओं से परे जब हम इन साक्ष्यों को देखते हैं, तो यह समाज ज्ञान, तकनीक और संगठन कौशल में अत्यंत उन्नत दिखाई देता है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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