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छत्तीसगढ़ की स्थापत्यकला में रामकथा

छत्तीसगढ़ की स्थापत्यकला में रामकथा


भारत में इतिहास केवल लेखन की विषयवस्तु नहीं रहा है। हमारे यहाँ इतिहासप्रसंगों को विभिन्न माध्यमों से लोगों को बतलाने की पद्धतियाँ फली-फूलीं। मन्दिर इनमें सबसे चिरस्थायी माध्यम रहे, जिनकी पाषाण भित्तियों पर इतिहास व पुराणों के विभिन्न कथा प्रसंगों को उकेर कर लोकमानस पर अंकित करने के प्रयास किए गए। डॉ. कामता प्रसाद वर्मा जी ने इस लेख में छत्तीसगढ़ अर्थात् प्राचीन दक्षिण कोसल की स्थापत्य कला और मूर्तिकला में अंकित रामकथा के प्रसंगों को सिरपुर में विद्यमान 6वीं शताब्दी के पुरावशेषों से लेकर 19वीं शताब्दी के गिरोद शिवमन्दिर में किए गए पुरात्त्विक शोध से एकत्रित प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया है। 


भारतवर्ष के लगभग मध्य में स्थित वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य, जिसे प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था, पुरातात्विक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। वर्ष 2000 में एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया यह विस्तृत भूभाग मेकल, रायगढ़ और सिहावा की पर्वत शृंखलाओं से घिरा हुआ है।

विभिन्न पुराणों में विंध्य, मेकल, शुक्तिमान और सोम जैसे अनेक पर्वतों का उल्लेख मिलता है, जो इस क्षेत्र को एक कटोरे के समान स्वरूप प्रदान करते हैं। यहाँ की जीवन रेखा चित्रोत्पला अर्थात् महानदी है, जिसका उल्लेख महाभारत सहित अनेक पुराणों में प्राप्त होता है। महानदी की प्रमुख सहायक नदियों में शिवनाथ, मांद, खारून, जोंक, हसदो और अरपा प्रमुख रूप से शामिल हैं। इनमें से जोंक नदी का उल्लेख मार्कण्डेय, ब्रह्माण्ड, वायु और कूर्म पुराण में 'पलाशिनी' के नाम से हुआ है।

रामायण काल के सन्दर्भ में बात करें तो अयोध्या के महाराजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी माता कौशल्या इसी दक्षिण कोसल की एक महान बेटी थीं। अनेक प्राचीन अनुश्रुतियों के अनुसार वर्तमान रायपुर जिले के तुरतुरिया नामक स्थान पर महर्षि वाल्मीकि का प्राचीन आश्रम स्थित था, जहाँ भगवान श्रीराम के दोनों पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था।

इस विस्तृत प्रदेश पर समय-समय पर अनेक महान राजवंशों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत से यह ज्ञात होता है कि मौर्य सम्राट अशोक ने दक्षिण कोसल की राजधानी में भव्य स्तूपों और इमारतों का निर्माण कराया था। मौर्यों के पश्चात् यहाँ सातवाहन और कुषाण राजाओं का प्रभाव रहा। गुप्त वंश के प्रतापी शासक समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से यह प्रमाणित होता है कि उसने अपने दक्षिणापथ अभियान के दौरान यहाँ के राजा महेन्द्र और महाकान्तार अर्थात् बस्तर के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया था।

बस्तर क्षेत्र में नल वंश का प्रबल शासन था, जिनके महान राजाओं में भवदत्त वर्मा, अर्थपति भट्टारक और स्कंदवर्मा का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। इसके पश्चात् यहाँ क्रमशः शरभपुरीय, पाण्डुवंश अर्थात् सोमवंश, कलचुरी (त्रिपुरी, रतनपुर और रायपुर शाखा), कांकेर के सोमवंशी, बस्तर के छिंदक नाग और कवर्धा के फणिनाग वंशी शासकों ने सुदीर्घ समय तक शासन किया।

इन्हीं महान राजवंशों के शासनकाल में यहाँ की पाषाण और स्थापत्य कला में रामायण के पावन कथानकों को अत्यन्त भव्यता और सूक्ष्मता के साथ उकेरा गया। रामकथा के इन दृश्यों का अंकन मुख्य रूप से सोमवंशी काल से आरम्भ हुआ था। 6वीं शताब्दी ईस्वी में निर्मित खरोद के लक्ष्मणेश्वर मन्दिर के मंडप के एक स्तम्भ में पाशबद्ध नाग, बालि सुग्रीव का भीषण द्वन्द्व युद्ध और धनुष ताने खड़े भगवान राम का अत्यन्त सजीव अंकन है।

लक्ष्मणेश्वर मन्दिर - खरौद
लक्ष्मणेश्वर मन्दिर - खरौद

इसी ऐतिहासिक मन्दिर में नागपाश, राम लक्ष्मण और सुग्रीव की हनुमान के साथ भेंट, तथा दुष्ट रावण द्वारा अशोक वाटिका में माता सीता के अपहरण के प्रयास को पाषाण पर बहुत ही जीवन्त रूप में उकेरा गया है। 6वीं और 7वीं शताब्दी के मध्य निर्मित सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर की द्वारशाखा में दशावतार की प्रतिमाओं के साथ भगवान राम का सुन्दर अंकन प्राप्त होता है।

7वीं शताब्दी के मल्हार स्थित देउर मन्दिर के अष्टकोणीय प्रस्तर स्तम्भ में बालि वध और तारा विलाप का मार्मिक दृश्य अंकित किया गया है। 9वीं शताब्दी के चन्दखुरी स्थित शिव मन्दिर की द्वारशाखा के सिरदल में उत्कीर्ण रामायण के दृश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय हैं। इनमें वानरराज बालि की पत्नी तारा द्वारा युद्ध न करने हेतु बालि को समझाना, राम द्वारा छिपकर बालि का वध, मृत बालि के शरीर को गोद में रखकर तारा का करुण विलाप और अन्त में भगवान राम द्वारा तारा को सांत्वना देने का अत्यन्त हृदयस्पर्शी शिल्पांकन किया गया है।

शिव मंदिर - चन्द्रखुरी (जिला-रायपुर)

10वीं शताब्दी के घटियारी स्थित शिव मन्दिर परिसर में एक पेडस्टल पर भगवान राम और परम भक्त हनुमान की 24 गुणा 46 गुणा 48 सेंटीमीटर की प्रतिमाएं एक साथ विद्यमान हैं। 12वीं शताब्दी का जांजगीर स्थित विष्णु मन्दिर रामकथा के अंकन का एक बहुत बड़ा और समृद्ध केन्द्र है। इसके जंघा भाग में भगवान राम की एक धनुर्धारी प्रतिमा अंकित है।

भगवान राम - विष्णुमन्दिर, जांजगीर
भगवान राम - विष्णुमन्दिर, जांजगीर

यहाँ की जगती में जड़े गए विभिन्न प्रस्तर फलकों में राम, सीता और लक्ष्मण को स्वर्ण मृग के साथ बहुत ही कलात्मक रूप से दर्शाया गया है। एक अन्य फलक पर दुष्ट रावण का भिक्षाटन और सीता हरण उकेरा गया है। यहाँ का सबसे अद्भुत दृश्य वह है जिसमें भगवान राम एक ही बाण से 7 ताल वृक्षों को भेद रहे हैं और रावण का वध कर रहे हैं। इसी परिसर में लंका जाने के लिए सेतु निर्माण हेतु भारी पाषाण खंड ढोते हुए वानरों की भी उत्कृष्ट प्रतिमाएं उकेरी गई हैं।

रामचरितमानस के किष्किंधाकाण्ड के अनुसार जब माता सीता के हरण के पश्चात् राम और लक्ष्मण उन्हें खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत पहुँचते हैं, तो उन्हें देखकर सुग्रीव अत्यंत भयभीत हो जाते हैं और सत्य जानने के लिए हनुमान को भेजते हैं। हनुमान जी एक ब्राह्मण का रूप धारण कर भगवान राम के पास जाते हैं और उनका सत्य जानकर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं।

13वीं और 14वीं शताब्दी के कवर्धा स्थित सहसपुर के बजरंगबली मन्दिर की सुकनासिका में इसी महान प्रसंग को पाषाण पर उकेरा गया है, जहाँ राम लक्ष्मण के साथ सुग्रीव और हनुमान का भव्य मिलाप दर्शाया गया है। इसी कालखंड में फिंगेश्वर के फणिकेश्वरनाथ महादेव मन्दिर की बाह्य भित्ति पर राम बलराम और राम लक्ष्मण तथा माता सीता की प्रतिमाएं अंकित हैं।


बजरंगबली मन्दिर - सहसपुर (जिला-कवर्धा )

बस्तर के छिंदक नागवंशीय शासनकाल में 14वीं शताब्दी में दन्तेवाड़ा के दन्तेश्वरी मन्दिर से एक अद्भुत समभंग मुद्रा वाली प्रतिमा प्राप्त हुई है, जिसमें श्रीराम के एक हाथ में धनुष और दूसरे में बाण है। अग्निपुराण, रूपमण्डन और वैखानस आगम में भगवान राम की द्विभुजी प्रतिमा निर्मित करने के जो स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं, बस्तर के जगदलपुर स्थित काकतीय शासकों के बालाजी मन्दिर में प्राप्त प्रतिमा ठीक उसी का प्रतिरूप है, जहाँ हनुमान अंजलिबद्ध मुद्रा में उनके नीचे अंकित हैं।

1553 और 1554 ईस्वी के मध्य निर्मित रायपुर के ऐतिहासिक दूधाधारी मन्दिर के ऊर्ध्व विन्यास में राम सुग्रीव मैत्री, राम रावण युद्ध, भव्य राम दरबार, माता सीता द्वारा रावण को भिक्षा देना और मृग मरीचिका के दृश्य अत्यन्त मनोहारी हैं। 18वीं और 19वीं शताब्दी में निर्मित गिरोद के शिव मन्दिर के शिखर में राम रावण युद्ध का सजीव दृश्य अंकित है। जैतूसाव मठ के मन्दिर के बाह्य भाग में भी राम दरबार का सुन्दर अंकन मिलता है।

इन स्वतन्त्र कथा प्रसंगों के अतिरिक्त, सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में दशावतार के रूप में भी राम का अत्यन्त व्यापक अंकन हुआ है। 10वीं से 11वीं शताब्दी के तुम्मान के बंकेश्वर मन्दिर, राजिम के अनुषांगिक वामन मन्दिर, धमधा के महामाया मन्दिर और 9वीं से 10वीं शताब्दी की सरगुजा के महेशपुर से प्राप्त विष्णु प्रतिमा में भगवान राम दशावतार के एक अभिन्न अंग के रूप में विद्यमान हैं।

रायपुर के महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय में रतनपुर से प्राप्त 11वीं और 12वीं शताब्दी की काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित विष्णु प्रतिमा, कांकेर के देवीनवागांव और कुर्ना से प्राप्त लक्ष्मीनारायण प्रतिमा, तथा खैरागढ़ के संगीत विश्वविद्यालय में प्रदर्शित गरुणासीन लक्ष्मीनारायण की प्रतिमाओं में भी सातवें अवतार के रूप में श्रीराम बहुत ही भव्यता के साथ उकेरे गए हैं।

महंत घासीदास स्मारक संगहालय ,रायपुर
महंत घासीदास स्मारक संगहालय ,रायपुर

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि सोमवंशी काल से आरम्भ होकर कलचुरी, फणिनागवंश, छिंदक नाग और मराठा कालीन मन्दिरों से लेकर आधुनिक काल तक, रामकथा का यह अद्भुत पाषाण शिल्प छत्तीसगढ़ की गहन आध्यात्मिक चेतना और इसके गौरवशाली इतिहास का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाण है।

-डॉ. कामताप्रसाद वर्मा
(
लेखक छत्तीसगढ़ शासन के सेवानिवृत्त उपसंचालक व प्रबुद्ध चिंतक हैं, जो अपने सुदीर्घ प्रशासनिक अनुभवों और वैचारिक लेखनी से निरंतर सामाजिक योगदान करते हैं।)

 

 

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