भोरमदेव के फणिनागवंशी शासक भोणिंग देव और महाराजा सतीम
January 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में प्रसिद्द भोरमदेव का मंदिर अपने स्थापत्य और प्राचीनता के कारण छत्तीसगढ़ के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है।जिस काल में छत्तीसगढ़ के अधिकांश हिस्से में कलचुरियो का आधिपत्य था, लगभग वही समय (9वीं से 14 वीं शताब्दी) भोरमदेव क्षेत्र में फणिनागवंशी शासको के शासन का रहा है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भोरमदेव के शासक रतनपुर के कलचुरियों की अधीनता स्वीकार करते थे अथवा उनके साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाये हुए थे।

रामचन्द्र देव के मड़वा महल अभिलेख(1349 ई.) से ज्ञात होता है कि उनका विवाह हैहयवंशी(कल्चुरी) राजकुमारी अम्बिकादेवी(धन्यम्बिका) से हुआ था, इससे कलचुरियों के समक्ष फणिनागवंशियो की मजबूत स्थिति का पता चलता है। भोरमदेव मंदिर का नामकरण और मंदिर निर्माता निर्धारण पर भ्रम की स्थिति रही है।अलग-अलग मत हैं, कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। मगर इस अस्पष्टता का एक कारण मड़वा महल अभिलेख का पाठ प्रस्तुत नहीं होना भी रहा है।अध्येता कनिंघम और रायबहादुर हीरालाल द्वारा प्रस्तुत जानकारी पर ही निर्भर रहें और ऐसा प्रतीत होता है कि वे संतलाल कटारे(1960) और बालचंद्र जैन (1962 )के कार्यों से अपरचित रहें जिसके कारण भी कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने नहीं आ सके।
नामकरण-
श्री सीताराम शर्मा ने अपनी पुस्तक 'भोरमदेव क्षेत्र : पश्चिम दक्षिण कोसल की कला’(1990) में मंदिर के भोरमदेव नामकरण के संबंध में तीन मत व्यक्त किये हैं.
(1) जनश्रुति के अनुसार भोरमदेव नामक गोड़ राजा हुए थे, जिन्होंने मंदिर का निर्माण कराया।गर्भगृह में एक राजपुरुष की मूर्ति को भोरमदेव माना जाता है।लेकिन फणिनागवंशियो की वंशावली में भोरमदेव नामक कोई राजा का उल्लेख नहीं है, न ही इस नाम की कोई मुद्रा या अभिलेख प्राप्त होता है, इसलिए इसे युक्तियुक्त नहीं माना जा सकता।
(2) शिव का एक नाम क्षेत्रीय बोली में बोरमदेव (बोड़म देव)भी बताया जाता है। गोड़ भी परंपरा से शिव के उपासक होते हैं, अतः शिव मंदिर होने के कारण इसका नाम कालांतर मे बोरमदेव /बोड़म से भोरमदेव होना प्रतीत होता है। सीताराम जी बोड़म का अर्थ टोटका मानते हुए इसे मंदिर की एक मान्यता से जोड़ते हैं जिसके अनुसार पूर्व मे जिस दम्पति की कोई संतान न हो मंदिर आकर मनौती मांगने पर उन्हें संतान की प्राप्ति अवश्य होती है। इसके बाद आगामी वर्ष दम्पति यहाँ आकर बकरे की बलि देते हैं। इस प्रकार बोड़म (टोटका)एक प्रतीकात्मक देव के रूप मे स्थापित है। इसी आधार पर मंदिर को बोड़मदेव नाम दिया गया होगा जो बाद मे भोरमदेव हो गया होगा।
(3) बोड़मदेव(बोरमदेव, भोरमदेव) रायपुर के कल्चुरि नरेश ब्रह्मदेव का अपभ्रंश भी माना जा सकता है।सीताराम जी मानते हैं कि लक्ष्मीदेव का पुत्र सिंहण ने शत्रुओं से जो 18 गढ़ जीते उसमे ‘चौरागढ़’ भी हो सकता है।सम्भवतःकल्चुरियों के रायपुर शाखा की स्थापना के साथ कवर्धा क्षेत्र के फणिनागवंशी उनसे जुड़ गए होंगे। राजा रामचंद्र राय के पुत्र राजा ब्रह्मदेव ने सम्भवतया इस शिव मंदिर (भोरमदेव) का जीर्णोद्धार कराया होगा। तदनुरूप ब्रह्मदेव का अपभ्रंश बोरमदेव/बोड़मदेव होते हुए भोरमदेव हुआ होगा।
भोरमदेव को ‘बोरमदेव/बोड़मदेव’ नाम का जिक्र रायबहादुर हीरालाल (1916) भी करते हैं।nमगर ‘भोरमदेव’नाम का जिक्र भी बहुत पहले से मिलता है। 1898 ई. की भोरमदेव के इतिहास से संबधित एक पाण्डुलिपि मे इसे ‘भोरमदेव’ ही कहा गया है।बाबु रेवाराम कायस्थ की ‘तवारिख-ए-हैहयवंशी’ (1858) मे ‘भोरमदेव’ शब्द का प्रयोग हुआ है।
(4)संतलाल कटारे (1960) भोरमदेव का नामकरण मंदिर के दक्षिणी प्रवेश दीवार अभिलेख संवत 1608(1551 ई.) मे उल्लेखित बाडम देव से अपभ्रंषित मानते हैं। यह बाडमदेव फणिनागवंश से भिन्न वंश का शासक जान पड़ता है जिन्होंने सम्भवतः फणिनागवंशियों के पतन के बाद कुछ समय तक इस क्षेत्र मे शासन किया था। श्री कटारे के अनुसार बाडम देव ही कलांनतर मे बोड़मदेव/भोरमदेव हुआ होगा। उनके अनुसार यह शासक बोड़म देव बाद मे गोंडो के देवता भोरमदेव से जुड़ गया होगा और राजा का नाम पीछे छूट गया होगा।
श्री कटारे लिखते हैं कि उस समय तक (1960)कुछ लोग मंदिर को बोड़म देव कहते थे। जेनकिन्स(1825) 'Bhyram Deo'(भैरमदेव) औऱ कनिंघम(1881-82) ने 'Buram Deo', 'Borarm Deo' का प्रयोग किया है।जे. डब्लू. चीजम(1868-69) ‘Booram Deo’ तथा चार्ल्स ग्रांट(1867 ‘Buramdeva’ लिखते हैं।इनसे भी बोड़मदेव/भोरमदेव नाम के उस समय प्रचलित होने का पता चलता है।
(5) दक्षिणी प्रवेश द्वार में उत्कीर्ण अभिलेख संवत 1608(1551 ई.) में इस मंदिर को भुवनपालदेव का शिवालय( भुवनपाल तस्य शिवालय) कहा गया है, जो फणिनागवंशी शासको के 8 वे नम्बर के शासक थे।
तो क्या भुवनपाल ही कालांतर में भोरमदेव हो गया है? ध्वनि साम्य की दृष्टि से यह असम्भव नहीं है। मड़वा महल अभिलेख मे जिक्र आता है कि महाराजा भुवनैकमल्ल ने चतुरापूरी के उत्तर मे शिवमंदिर का निर्माण करवाया तथा विशाल तालाब खुदवाया। यह वर्तमान भोरम देव मंदिर को ही इंगित करता है। इस दृष्टि से मंदिर निर्माता भुवनैकमल्ल हुए। मगर हम मड़वा महल अभिलेख के अनुवाद सम्बन्धी पुरानी पाण्डुलिपियों मे देखते हैं कि अभिलेख के गलत पाठ के कारण हर जगह भुवनैकमल्ल को भुवनपाल पढ़ा गया है जिसके कारण मंदिर निर्माता त्रुटिवश भुवनपाल को समझ लिया गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि यह त्रुटि दक्षिणी प्रवेश द्वार अभिलेख मे भी हुई है। इसलिए यद्यपि भुवनपाल से ही भोरमदेव हुआ प्रतीत हुआ है मगर यह मंदिर भुवनपाल देव का नहीं भुवनैकमल्ल का होना चाहिए। 1898 ई. की एक पाण्डुलिपि मे स्पष्ट लिखा है कि भुवनपाल (भुवनैकमल्ल)ने जो मंदिर बनवाया है उसे ही इस ज़माने मे भोरमदेव कहते हैं।
(6) रामचन्द्र देव के मड़वा महल अभिलेख में फणिनागवंश की उत्पत्ति की कथा बताई गयी है, जिसके अनुसार जातुकर्ण मुनि अपने दो पुत्रों तथा पुत्री मिथिला के साथ इस स्थान पर रहते थे।कुछ समय पश्चात् मिथिला शेषनाग के संपर्क में आयी और गर्भवती हो गयी,वस्तुस्थिति का ज्ञान न होने के कारण दोनों भाई एक दूसरे पर शक करने लगें. बाद में यह भ्रम टुटा और वास्तविकता पता चला और मिथिला-शेषनाग का पुत्र अहिराज हुआ जो इस वंश का प्रथम शासक बना। अपने अध्ययन के दौरान हमे भोरमदेव की दो अलग-अलग वृद्ध निरक्षर महिलाओं, ने लगभग यही कहानी सुनायीं और बताया कि मिथिला के दोनों भाइयों में गर्भ के प्रति जो भरम(भ्रम) था उसी के कारण मंदिर का भोरमदेव नाम पड़ा। यह मत(भरम से भोरम) ध्वनि साम्य की दृष्टि से आकर्षक है।
विभिन्न मतों के परीक्षण से इतना तो स्पष्ट है कि देव शब्द का जुड़ाव किसी देवता अथवा राजा के साथ ही हो सकता है। सीताराम शर्मा और संतलाल कटारे बोरमदेव/बोड़मदेव नामक गोंड देवता का जिक्र करते हैं, मगर इस क्षेत्र में निवासरत गोड़ अथवा बैगा जनजाति के देवतंत्र मे इस नाम के देवता का जिक्र नहीं मिलता। बहुत संभव है तत्कालीन समय मे स्थानीय स्तर पर उन्हें यह नाम बताया गया रहा हो अथवा इस नाम के देवता की मान्यता जुड़ गई हो।
इस दृष्टि से ब्रह्मदेव से भोरमदेव की अपेक्षा भुवनपाल से भोरमदेव अधिक संभावित प्रतीत होता है क्योंकि मंदिर निर्माता[ भुवनैकमल्ल जिसे त्रुटिवश भुवनपाल समझा गया] की स्मृति लोकमानस मे बनी रहती है।
मंदिर का निर्माता
भोरमदेव मंदिर का निर्माता कौन था, इस पर मतभेद है।सीताराम शर्मा जी ने इस पर विस्तृत चर्चा किया है और बताया है कि निर्माता की दृष्टि से तीन नाम उभरकर आते हैं, (1) श्री गोपालदेव(1089ई.) (2) श्री लक्ष्मण देव् राय(1349 ई. से पूर्व (3) श्री रामचंद्र देव(1349 ई.) उन्होंने गोपालदेव को सर्वाधिक उपयुक्त बताया है, जिसे अधिकांश लोग मानते हैं.
भोरमदेव मंदिर निर्माता के संबंध में विचार करने की दृष्टि से निम्न अभिलेखिय साक्ष्य महत्त्वपूर्ण हैं-
(1) मन्दिर के सभा मण्डप में रखी हाथ जोड़े राजपुरुष [जिसे योगी की मूर्ति कहा जाता रहा है] की मूर्ति है जिसकी चौकी पर दाएं तरफ "सिद्धि संवत 840 राणक गोपालदेव राज्ये" उत्कीर्ण है। इतिहासकार इसे कल्चुरी सम्वत मानते हैं, क्योकि कलचुरियो के व्यापक प्रभाव को देखते हुए ऐसा लगता है कि फणिनागवंशी कलचुरियो के अधीन रहे होंगे।इस दृष्टि से यह ई.सन 840+(248-49)=1088-89 का ठहरता है।
भोरमदेव के निर्माण शैली को देखा जाय तो यह ग्यारहवीं-बारहवीं सदी के लगभग प्रचलित नागर शैली में निर्मित है।गोपालदेव का कार्यकाल भी ग्यारहवीं सदी ठहर रहा है,अतः सम्भवना है कि गोपालदेव इस मन्दिर के निर्माता रहे होंगे।फणिनागवंशियो के वंशावली में गोपालदेव छठवे नंबर के शासक हैं। जैसा कि कनिंघम ने विचार किया है यदि संवत 840 को शक संवत माना जाय तो इस दृष्टि से यह ईस्वी सन 918(840+78) होगा। यदि गोपालदेव को मंदिर का निर्माता माना जाय तो मंदिर निर्माण शैली जो की ग्यारहवीं शताब्दी के आस-पास ठहरता है, की दृष्टि से यह उपर्युक्त प्रतीत नहीं होता।
लेकिन जैसा क़ि हम जानते हैं बाद के शिलालेखों (रामचन्द्र देव का मड़वा महल अभिलेख, कुछ सती स्तम्भ) में विक्रम संवत का प्रयोग हुआ है।समस्या यह है कि कहीं कल्चुरी संवत, तो कहीं विक्रम संवत का प्रयोग क्यों हुआ है? एक संभावित कारण यह हो सकता है कि शुरूआती दौर में जब कलचुरियो का प्रभाव अधिक रहा होगा तो कल्चुरी संवत का प्रयोग हुआ होगा और बाद में जब उनका प्रभाव कम हुआ होगा तो विक्रम संवत का प्रयोग हुआ होगा।
राजपुरुष की मूर्ति में ही एक अन्य लेख में लक्ष्मण देव, उनके पुत्र रामचन्द्र तथा कई रानियों(अथवा पुत्रियों)के नाम अंकित हैं. इसी कारण कनिंघम ने लक्ष्मण देव को मंदिर के निर्माता होने की सम्भावना व्यक्त किया है।उनके संकेतो के आधार पर वी.वी. मिराशी ने माना है कि लक्ष्मण राय गोपालदेव के अधीनस्थ सामंत(petty chief) रहे होंगे। मगर लक्ष्मण देव फणिनागवंश के 23 वे नंबर के शासक थे।एक ही मूर्ति में गोपालदेव और लक्ष्मण देव का लेख एक ही समय का नही हो सकता, क्योंकि दोनों के बीच 17 पीढ़ी का अंतर है।

यदि वंशावली में कुछ कल्पित नाम मान भी लिया जाय तो भी यह दूरी काफी रह जाती है।इसलिए लक्ष्मण देव और गोपालदेव को एक ही समय का मानना उचित नही जान पड़ता।चूँकि लक्ष्मण देव के पुत्र रामचन्द्र देव 1349 ई में वर्तमान थे, अतः लक्ष्मण देव का कार्यकाल 1300ई के बाद होना चाहिए. मंदिर निर्माण की शैली चूँकि ग्यारहवीं -बारहवी सदी के आसपास की है, इस दृष्टि से लक्ष्मण देव बहुत बाद के हैं, अतः उनका मंदिर का निर्माता होना संभव प्रतीत नही होता।लगभग इसी समय रामचंद्रदेव द्वारा निर्मित मड़वा महल(1349) में कला का ह्रास स्पष्ट दिखाई देता है, इससे भी पता चलता है कि भोरमदेव का मुख्य मंदिर लक्ष्मण देव- रामचंद्रदेव के समय का नहीं हो सकता।
यहाँ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि राजपुरुष की मूर्ति जिस चौकी पर रखी है वह उमा-माहेश्वर के किसी अन्य मूर्ति की चौकी प्रतीत होती है जिस पर किसी दौर मे उमा-महेश्वर की मूर्ति की जगह राजपुरुष की मूर्ति रख दी गई है। इससे गोपालदेव और लक्ष्मणदेव के अलग-अलग समय के होने की समस्या का हल हो जाता है।
(2) मड़वा महल से प्राप्त रामचन्द्र का विक्रम संवत 1406(1349 ई.) का प्रस्तर अभिलेख में फणिनागवंशियो की उत्पत्ति कथा तथा वंशावली का उल्लेख है. इससे यह भी पता चलता है कि रामचंद्रदेव ने एक शिवमंदिर (रामेश्वर शिव मंदिर)का निर्माण कराया था तथा उनका विवाह हैहयवंशी राजकुमारी अम्बिकादेवी(धन्यम्बिका) से हुआ था।रामचंद्रदेव ने जिस शिव मंदिर का निर्माण कराया था वह मड़वा महल ही होना चाहिए क्योंकि अभिलेख वहीं प्राप्त हुआ है।दूसरी बात रामचंद्रदेव का कार्यकाल 14 वीं शताब्दी का है जबकि भोरमदेव का मुख्य मंदिर 11-12 वीं शताब्दी के आस-पास का है, अतः रामचन्द्र देव मुख्य मंदिर के निर्माता नही हो सकतें।

(3) भोरमदेव के दक्षिणी प्रवेश द्वार के बाएं पार्श्व में संवत1608 (1551) का एक अभिलेख है, जिससे ज्ञात होता है कि भुवनपाल देव के शिवालय के रत्नजड़ित कलश को मांडो पति साह ने तोड़ा तथा उसे रतनपुर के दादुराय ने विजय के प्रतीक के रूप में ले गया।संवत 1608 कल्चुरी संवत नही हो सकता क्योंकि 1856 ई.(1608+248) तक भोरमदेव साम्राज्य नष्ट हो चूका था।जेनकिन्स(1825) के समय और अलेक्जेंडर कंनिघम (1881-82 )भोरमदेव आये थे तब साम्राज्य का अस्तित्व नही था।1751 कवर्धा रियासत की स्थापना के समय भी भोरमदेव राज्य के अस्तित्वमान होने के साक्ष्य नहीं मिलते। अतः इसे विक्रम संवत मानना उचित है।
इस अभिलेख में मंदिर को भुवनपाल का शिवालय क्यों कहा गया है? तो क्या भुवनपाल ही मंदिर के निर्माता है? श्री शरद हलवाई ने अपने लेख में लिखा है "भुवनपाल देव मंदिर से अपभ्रंष होक्त कालांतर में यह भोरमदेव मंदिर कहलाने लगा होगा" । ध्वनि साम्य में यह उचित प्रतीत होता है।भुवनपाल देव फणिनागवंशियो में 8 वे नम्बर के शासक हैं। यदि गोपालदेव (6वे शासक) ग्यारहवी शताब्दी(1088) में वर्तमान थें तो भुवनपाल देव बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हो सकते हैं, क्योकि कभी-कभी युद्ध या महामारी आदि वजह से राजा जल्दी भी बदल जाते थे।
इस दृष्टि से देखा जाय तो मंदिर निर्माण शैली(ग्यारहवी-बारहवीं सदी) के हिसाब से भी भुवनपाल देव मंदिर निर्माता के रूप में उभरकर सामने आते हैं. चार्ल्स ग्रांट (गजेटियर ऑफ सेंट्रल प्रोविनेन्स 1870) को दक्षिणी दीवार अभिलेख की जानकारी मिली थी; हालांकि अभिलेख न देख पाने और स्पष्ट प्रतिलिपि प्राप्त न होने के कारण सम्वत 1608 को उन्होंने 160 समझ लिया था। लेकिन उन्हें इस बात की जानकारी थी कि भुवनपाल ने एक शिव मंदिर का निर्माण कराया था।
उन्होंने लिखा है - " The inscription is at Chapra in the Kawarda State. I have not yet been able to obtain a perfectly accurate inscript, but the gist of it is that Raja Bhawani Pal, built a temple to siva, which was partially destroyed by the Haihaya king" ।आश्चर्य जनक बात यह है कि कंनिघम से लेकर सीताराम शर्मा जी तक किसी ने भुवनपाल देव पर विचार नहीं किया।श्री शरद हलवाई का ध्यान इस ओर गया लेकिन वे इसका गहन विश्लेषण नही कर सकें। मगर हम आगे देखेंगे कि इस अभिलेख का भुवनपाल वस्तुतः भुवनैकमल्ल है जो अभिलेख के गलत पाठ के कारण लिखा प्रतीत होता है।
(4) दक्षिणी प्रवेश द्वार के ही दाहिने पार्श्व पर 'जोगी मगरध्वज 700' उत्कीर्ण है. ऐसा ही लेख कवर्धा के आस-पास के क्षेत्रो में और देश के अन्य क्षेत्रों में भी प्राप्त हुए हैं. श्री एस.एस. यादव और अतुल प्रधान के अनुसार ऐसा लेख नौ या दस जगह प्राप्त हुए हैं. लिपि को ध्यान दिया जाय तो यह लेख 1200 या 1300 ई से पहले का प्रतीत नही होता।उन्होंने इसे हर्षवर्धन के कार्यकाल से जोड़ते हुए 606+700=1306 ई. होने की संभावना व्यक्त की ह।यह विक्रम संवत नही हो सकता, क्योकि मंदिर उतना पुराना सिद्ध नही किया जा सकत।
लेकिन जैसा कि कनिंघम ने भी लिखा है, की जरुरी नही 700 कोई सम्वत ही हो।शरद जी के अनुसार 'जोगी मगरध्वज 700' शिल्पकारों की टोली रही होगी, जिसके प्रमुख मगरध्वज और 700 उसके सहायक रहे होंगे, जो आस-पास के क्षेत्रो में घूम-घूम कर मंदिर बनाते रहे होंगे।यह कोई शुभ चिन्ह भी हो सकता है; मगर ऐसी किसी परंपरा का पता नहीं चलता. या फिर कोई भ्रमणशील सन्यासी हों जो विभिन्न स्थानों पर अपने जाने के उपलक्ष्य में ऐसा उत्कीर्ण कराते रहें हो।
यही मत अधिक मान्य है; जिसके अनुसार मगरध्वज रतनपुर स्थित एक शैव मठ के मठाधीश थे जो जाजल्यदेव(प्रथम) के समय वर्तमान थे।मगर इसमें नाम तो समझ मे आता है; 700 की पहेली बनी रहती है.सम्भवतः 700 उनकी शिष्य मंडली रही होगी। दूसरी बात नाम उत्कीर्ण कराना दीवारों में समझ में आता है मगर कहीं यह मूर्तियों के पादतल पर भी यह अंकित है(जैसा कि पचराही में) कहीं शिवलिंग पर,जैसे देऊर बीजा, सोमनाथ में।शिवलिंग पर किसी 'व्यक्ति विशेष' का नाम अंकित करना सहज नही लगता। इससे प्रतीत होता है कि मगरध्वज की लोकमानस मे अत्यधिक प्रतिष्ठा रही होगी।
श्री जीतमित्र प्रसाद सिंहदेव के अनुसार रतनपुर के कलचुरियों के समय मे यह प्रथा प्रचलित थी कि मंदिर निर्माण करने वाले राजा, रानी, राज्य परिवार के संबंधी एवं अधिकारी अपनी प्रतिमा मंदिर में स्थापित करते थे। भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह में भी ऐसी प्रतिमा है,जो राजपुरुष ही प्रतीत होता है, लेकिन उसमें कोई शिलालेख न होने से ज्ञात नही होता कि प्रतिमा किसकी है।बहुत सम्भव है यह मंदिर निर्माता की ही हो।
ऊपर उल्लेखित सभी मतों की सीमा यह थी कि विद्वानों के समक्ष मड़वा महल अभिलेख संवत 1406(1349 ई.) का पाठ उपलब्ध नहीं था। पाठ उपलब्ध नहीं होने से उनको इस बात की जानकारी नहीं थी कि अभिलेख मे इस मंदिर के निर्माता के संबंध मे जानकारी उपलब्ध है। उनके समक्ष केवल मड़वा महल अभिलेख का राय बहादुर हीरालाल(1916) द्वारा प्रस्तुत सारांश और वंशावली ही उपलब्ध थी।
अभिलेख के पाठ तक जाने का कार्य सर्वप्रथम संतलाल कटारे (1960) का दिखाई पड़ता है जिन्होंने भोरमदेव मंदिर के दक्षिणी प्रवेश द्वार अभिलेख संवत 1608(1551ई.) के पाठ प्रस्तुत करने के दौरान मड़वा महल अभिलेख पर भी ध्यान दिया था और चार श्लोको का पाठ भी दिया जिसमे मंदिर निर्माण का जिक्र है। आगे श्री बालचंद्र जैन ने 1962 मे कुटेरा ताम्रपत्र के विश्लेषण मे कटारे जी के कार्य का विश्लेषण किया।
बालचंद्र जी ने इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए 1963 मे मड़वा महल अभिलेख को मड़वा महल शिव मंदिर से महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर मे स्थानांतरित किया और आगे उसका व्यवस्थित अध्ययन किया। इस संबंध मे मड़वा महल का उनके द्वारा किया गया पाठ और उसका विश्लेषण 2023 मे श्री राहुल कुमार सिंह ने अपने ब्लॉग ‘सिंहावलोकन’ मे प्रस्तुत किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि बालचंद्र जी ने इसे कहीं प्रकाशित नहीं कराया था।
ऐसा प्रतीत होता है कि भोरमदेव पर बाद मे क़िताब लिखने वाले विद्वान श्री सीताराम शर्मा और डॉ गजेंद्र कुमार चंद्रौल संतलाल कटारे और बालचंद्र जैन के कार्यों से परिचित नहीं हो सके थे क्योंकि उनकी किताबों इन महत्वपूर्ण कार्यों का उल्लेख नहीं है। डॉ संतलाल कटारे के मड़वा महल अभिलेख पाठ के अनुसार मड़वा महल अभिलेख में 'भुवनैकमल्ल' के बारे में कहा गया है –
"श्रीखड्गदेवाद्भुर्वंनकमल्लस्तनूभवोभूद्भुजवीर्यशाली
आसाद्य राज्यं फरिणवंशकेतोः शशास पृथ्वीं चतुरर्णावान्तां ॥४७॥
जित्वा वैरिबलानि खड़गमुह्रदा दोषणा स पूष्णा समस्ते जस्वी चतुरः पुरीमरचदद्दूर्गावलीं दुर्गमां।
यस्या दक्षिणतः स्वयं सुरनदी बाहोदरी शङ्करी,यत्तीरे हटकेश्वरे फणिकुले--स्वयं निर्गतः ॥४८॥
आराधिता तेन राज्ञा ब्रह्माणी देवता स्वयं ।
आरक्षको कृता यस्याः खड्गस्येवाधि देवता ॥४९॥
तामुत्तरेण नगरों तरुणेन्दुमौलेरभ्र लिहो विरचितो निलयः शिवस्य।
सिन्धो सपन्न इव तत्र तरंगलेखाभूभंग भीषणतरश्च महांस्तडागः ॥५०॥"
बालचंद्र जैन जी का पाठ भी किंचित अंतरों के साथ यही है। श्लोक से स्पष्ट कहा गया है कि भुवनैककमल्ल ने क़िलाबन्द चतुरापुरी (चौरागढ़) नगर बनाया जिसके दक्षिण में शंकरी नदी बहती है।इस नदी के किनारे हटकेश्वर मन्दिर खड़ा है,जहां राजा ब्राह्मणी देवी की पूजा करने जाता है।उसने इस नगर के उत्तर में विशाल शिव मंदिर बनवाया और वृहत तालाब खुदवाया।
इस अभिलेखिय साक्ष्य से तो भोरमदेव मन्दिर का निर्माता 'भुवनैकमल्ल' ही होना चाहिए। क्योंकि चतुरापुरी के किले (कोधईधोना तालाब वाला क्षेत्र)के उत्तर मे शिव मंदिर और तालाब वर्तमान मंदिर की ओर संकेत करते हैं। यह महत्वपूर्ण अभिलेखिय साक्ष्य है। भोरमदेव के मुख्य मन्दिर का स्थापत्य लगभग ग्यारहवीं शताब्दी के आस-पास का का माना जाता है मगर यह बारहवी शताब्दी का भी हो सकता है।
भुवनैकमल्ल का समय बारहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध ठहरता है,इसलिए मुख्य मंदिर का निर्माण काल बारहवीं शताब्दी हो सकता है ।भोरमदेव मन्दिर के उत्तर में भी एक ईंट निर्मित शिव मंदिर और है,मगर उसे मुख्य मंदिर के पूर्व का माना जाता है। अभिलेख में स्पष्ट उल्लेख होने के कारण डॉ संतलाल कटारे और बालचंद्र जैन भुवनैकमल्ल को ही मन्दिर का निर्माता मानते हैं।
संतलाल कटारे मानते हैं कि भोरमदेव मन्दिर के दक्षिणी दीवार अभिलेख संवत 1608(1551 ई.) में उल्लेखित 'भुवनपाल' वास्तव में 'भुवनैकमल्ल' होना चाहिए और उत्कीर्णकर्ता से त्रुटिवश ऐसा हुआ होगा।हमारी समझ से सम्भावना यह भी है कि उस समय भी मड़वा महल अभिलेख के 'भुवनैकमल्ल ’का त्रुटिपूर्ण पाठ कर भुवनपाल अंकित किया गया हो सकता है, जैसा कि बाद के पाण्डुलिपियों मे दिखाई पड़ता है।
डॉ कटारे भुवनैकमल्ल के कार्यकाल को 1270-1295 ई. के बीच के लगभग मानते हैं और मन्दिर निर्माण के समय को लगभग 1280 ई. मानते हैं। डॉ कटारे ने अभिलेखिय साक्ष्य का जो सन्दर्भ दिया है वह मजबूत तर्क है। हमारी समझ से डॉ सीताराम शर्मा डॉ संतलाल कटारे और श्री बालचंद्र जैन के कार्य को सम्भवतः देख नहीं सके थे इसलिए उनका जिक्र नहीं कर सके हैं।
मंदिर का निर्माण-काल
भोरमदेव मंदिर का स्थापत्य 11-12वीं शताब्दी मे मध्यभारत मे प्रचलित नागर शैली मे है। कुटेरा ताम्रपात्र के विश्लेषण मे बालचंद्र जैन जी लिखते हैं कि भोजदेव का संबंध मड़वा महल अभिलेख संवत 1406(1349 ई.) में उल्लेखित फणिनागवंश से है। इस अभिलेख में फणिनागवंशियों की वंशावली दी हुई है।
उनमें से एक शासक भुवनैकमल्ल के बारे में अभिलेख में कहा गया है कि उसने( वर्तमान भोरमदेव शिव मंदिर की तरह) एक शिव मंदिर का निर्माण कराया था।बालचंद्र जी मानते है कि वह मंदिर भोरमदेव का वर्तमान शिव मंदिर ही है। श्री संत लाल कटारे भी उक्त उल्लेख के आधार पर भुवनैलमल्ल को वर्तमान शिव मंदिर का निर्माता मानते हैं।
श्री संतलाल कटारे अपने विश्लेषण में भोरमदेव शिव मंदिर का निर्माण काल लगभग 1280 ई. मानते हैं। बालचंद्र जी मानते है कि चूंकि भुवनैकमल्ल भोज के दादा के पिता(great –grand –father) थे और भोज 1204 ई. में शासन कर रहे थे इसलिए भोरमदेव शिव मंदिर का निर्माण काल (भुवनैकमल्ल का समय) 1140 ई. के लगभग होना चाहिए न कि 1280 ई.।
बालचंद्र जी लिखते हैं कि श्री कटारे का मत मड़वा महल के उस व्यक्तव्य के आधार पर है जिसमे रामचंद्र देव विक्रम संवत 1406(1349 ई.) में शासन कर रहे थे और उनके और भुवनैकमल्ल के बीच दो पीढ़ियों का सम्मिलन (intervened) हुआ है।(यानी रामचंद्र से तीन–चार पीढ़ी पूर्व लगभग लगभग 1280 ई.में भुवनैकमल्ल रहे होंगे) इस तरह भोरमदेव मंदिर का निर्माण काल बारहवीं शताब्दी प्रतीत होता है।
फणिनागवंशियो की वंशावली(राय बहादुर हीरालाल की सूची से)
मड़वा महल अभिलेख सम्वत 1406 (1349 ई.)के अनुसार फणिनागवंशियो की वंशावली इस प्रकार है-
(1) अहिराज (2) राजल्ल (3) धरणीधर (4) महिमदेव (5) सर्व वदन या शक्तिचंद्र (6) गोपालदेव (7) नलदेव (8) भुवनपाल देव् (9) कीर्तिपाल (10) जयत्र पाल (11) महिपाल (12) विषमपाल (13) ज(न्हु )(14) जनपाल/विजनपाल/जुवपाल? (15) यशोराज (16) कन्नड़ देव या वल्लभ देव (17) लक्ष्मा वर्मा (18) खड्ग देव् (19) भुवनैकमल्ल (20) अर्जुन (21) भीम (22) भोज (23) लक्ष्मण देव (24) रामचन्द्र
--------------------------------------------------------------
सन्दर्भ
---------
(1) भोरम देव क्षेत्र :पश्चिम दक्षिण कोसल की कला - डॉ सीताराम शर्मा(1990)
(2) भोरमदेव मन्दिर प्रदर्शिका- डॉ गजेंद्र कुमार चन्द्रौल(1984)
(3)Kotela Copper Plate Inscription of Bhojadeva Saka Year 1126 -Journal of Indian History Vol. XL, Part 2 1962, Balchandra Jain,
(4)कंनिघम सर्वे रिपोर्ट भाग 17(1881-82),शरद हलवाई का लेख(1988-92)
(5)अष्ट-राज्य- अंभोज-धानू लाल श्रीवास्तव(1925)
(6) दक्षिण कोशल का सांस्कृतिक इतिहास- जीतमित्र प्रसाद सिंहदेव
(7) मध्यप्रदेश का इतिहास- राय बहादुर डॉ हीरालाल(1939)
(8)छत्तीसगढ़ का इतिहास- प्रो. रमेन्द्र नाथ मिश्र
(9)इस्क्रिप्सन इन सी.पी. एंड बरार-राय बहादुर हीरालाल(1916)
(10)कार्पस इस्क्रिप्सन इंडिकेटम वॉल्यूम 4, पार्ट 2- वी.वी. मिराशी(1955)
(11) गजेटियर ऑफ सेंट्रल प्रोविनेन्स- चार्ल्स ग्रांट(1870)
(12)मड़वा महल अभिलेख में भुवनैकमल्ल सम्बन्धी श्लोक के लिए देखे डॉ संतलाल कटारे का आलेख 'Bhoram Deo Temple and it's Transcription, V.S. 1608 [I.H.Q. Nos.2 & 3 1960]
(13)श्री बालचंद्र जैन का आलेख ' Mandawa Mahal Inscription of Ramchandra V.S.1406 [ सम्भवतः सत्तर के दशक में लिखित, सिंहावलोकन ब्लॉग, राहुल कुमार सिंह
---------------------------------------------------------------
●अजय चंन्द्रवंशी,राजमहल चौक,
फुलवारी के सामने कवर्धा, जिला ,कबीरधाम(छत्तीसगढ़)
मो-9893728320
छत्तीसगढ़ परिचय: डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी की अद्वितीय कृति
June 10, 2026