राजिम की पंचकोसी यात्रा
March 12, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण शुक्ल चतुर्थी | रविवार
नक्षत्र: हस्त | योग: साध्य | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 16 अगस्त 2026

प्रकृति जीवन है, हमारा प्राण है। प्राण के बिना हम अपने होने की कल्पना भी नहीं कर सकते। जो प्रकृति के निकट हैं, प्रकृति से जुड़े हुए हैं। वे सुरक्षित हैं। जो प्रकृति से कट गए हैं, या जो दूर हो रहे है, उनका जीवन खतरे में है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने अभी कोरोना काल में देखा। ऑक्सीजन की कमी के कारण लाखों लोगों की मौत हो गई। पेडों की अंधाधुंध कटाई और प्रकृति से खिलवाड़ के कारण ऐसी विषम परिस्थितियाँ पैदा हो रही हैं।
हमें सचेत होना हेगा, हमें जगना होगा, तभी हम जीवन को सुरक्षित रख सकेंगे। पेड़ों को हम बचायेंगे, तो हरियाली बचेगी, हरियाली बचेगी, तभी जीवन में खुशहाली रहेगी। गाँव के लोगों का जुड़ाव अभी भी प्रकृति से है। इसलिए वे काफी हद तक सुरक्षित रहे। कोरोना ने तो शहरो में कहर बरपाया। तब हमारी आंखे खुली और हम प्रकृति की शरण में जा रहे हैं। प्रकृति की एक ऐसी ही एक शरण स्थली है, बैताल रानी घाट।
वैसे तो छत्तीसगढ़ में अनेकानेक घाटियाँ हैं जो रम्य और मनभावन हैं। उनमें केशकाल घाटी, चिल्फी घाटी, मोटियारी घाटी साल्हेवारा आदि प्रमुख हैं। इन दिनों जो चर्चा में सर्वाधिक रूप से लोगों की जुबान पर है, वह है बैताल रानी घाट, यह राजनांदगांव जिले के छुईखदान नगर से लगभग 25 कि.मी. दूर देवरचा-कुम्हरवाड़ा मार्ग पर स्थित है।
यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और हरितिमा के साथ-साथ रोमांच के लिए सबको आकर्षित कर रही है यह घाटी। बैताल रानी घाट में जहाँ प्रकृति का नैसर्गिक सौन्दर्य है, वहीं पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं, जहाँ इतिहास की छोटी, किन्तु महत्वपूर्ण कहानी है, वहीं पुरातत्व की मुँह जुबानी भी है। बैताल रानी घाट कैसा है ? बैताल रानी कौन थी ? आइए इसे जानने का प्रयास करें।

हमारी बड़ी भौजी ग्राम साल्हेकला से आई हैं, जो लोक कथाओं की अच्छी जानकार हैं। जब हम छोटे-छोटे थे तब वह बैताल रानी की कथा कहती थी, आज भी सुनाती हैं। उनके पिता जी अपनी गायों को लेकर वर्षाकाल में देवरचा और बंसतपुर के जंगलों में जाते थे। वहीं दईहान भी रखते थे। उनके पिता जी वहाँ के लोगों से सुनी कहानियों को घर में आकर सुनाते थे। वो बताते थे कि बैताल रानी की खंडित मूर्ति तीन टुकड़ों में पड़ी है। भौजी अपने पिता जी से सुनी कहानियाँ हम बच्चों को सुनाती तो मन बड़ा उत्सुक होता।
वह यह भी बतातीं कि वहाँ घना जंगल है। जंगली जानवर हैं। बड़े-बड़े अजगर साँप हैं। एक बार उनका चरवाहा अजगर साँप को लकड़ी का ठूंठ समझ कर बैठ गया था। बीड़ी का अंतिम कश लेकर जलती आधी बीड़ी को जब ठूंठ पर रगड़ा तो जलन के कारण अजगर में हलचल पैदा हुई, तब चरवाहा डर कर भागा। हम बच्चों को सुनकर बड़ा मजा आता था। यह बात लगभग 50-55 साल पहली की है। तब से बैताल रानी स्मृतियों में है।
मेरी रूचि प्रकृति पर बचपन से ही रही है। जंगल-पहाड़, नदी-सरोवर, प्राकृतिक और पुरातात्विक स्थल मुझे बचपन से आकर्षित करते रहे है। पेंटिंग में भी मेरी रूचि रही है। शिक्षकीय वृत्ति से पहले पेंटिग करके ही जीवन यापन करता रहा। शिक्षक की नौकरी लगने के बाद भी पार्ट टाईम छुट्टी के दिनों में पेंटिग का काम करता था। पी. डब्ल्यू. डी. विभाग, फारेस्ट विभाग व सिंचाई विभाग में साईन बोर्ड बनाने व सड़क किनारे लगे पत्थरों में पेंटिग का काम मिल जाता था।
आज से लगभग 35-36 वर्ष पहले सन् 1984-85 में देवरचा- से कुम्हरवाड़ा सडक मार्ग का निर्माण हुआ था। ऊँचे- ऊँचे पहाड़ों के ऊपर घाटों की कटाई हुई थी। चट्टानों को तोड़कर सड़क निर्माण का कार्य शुरू हुआ था। कि.मी. व फर्लांग पत्थर लगाए गए थे। व्हाईट पेंट से पुताई की गई थी। ओवरसियर साहब ने मुझे वहाँ जाकर लेटर राइटिंग करने को कहा, जो मैं करता था। मेरी तो पहले से ही उधर जाकर बैताल रानी की मूर्ति को देखने की इच्छा थी।
उन्होंने यह भी बताया था कि छुईखदान से देवरचा तक तो साइकिल में जा सकते हो, उसके बाद देवरचा से कुम्हरवाड़ा तक साइकिल को साथ लेकर पैदल ही घाट चढ़ना होगा। जहाँ उत्सुकता होती है, वहाँ परेशानियों की चिंता नहीं रहती। मैने हामी भर दी।

उस समय पिपरिया (खैरागढ़) के संदेश वर्मा मेट का कार्य करते थे। उन्हें मेरे साथ जाने व भोजन आवास आदि की व्यवस्था के लिए साहब ने कहा। संदेश वर्मा बड़े उत्साही थे। उनकी उम्र लगभग 48 साल की थी और मेरी उम्र 30 साल की थी। काम के सिलसिले में पूर्व परिचित थे। तय हुआ कि शनिवार शाम को देवरचा पहूँच कर रात्रि विश्राम किया जाय, फिर सुबह से पेंटिग का कार्य शुरू किया जाय।
योजना के अनुसार मैं शाम चार बजे छुईखदान पहुँच गया। रेस्ट हाऊस से कालापेंट व राइटिंग ब्रश लेकर हम दोनों देवरचा पहुँचे। ठंड के दिन थे। देवरचा जंगलों और पहाड़ों से घिरा हुआ है। शाम से ही ठंड ने अपना रंग दिखना शुरू कर दिया था। हम एक मजदूर के घर जो पी. डब्ल्यू. डी. में कुली का कार्य करता था। उसी के घर ठहरे। रात में ठंड को देखते हुए उसने अंगीठी जला दी, आग तापते रहे। खाना तैयार हुआ, मिलकर सब खाना खाए। भाटा और सेमी की मनपंसद सब्जी मजा आ गया।
ठंड के हिसाब से कपड़े कम पड़ने लगे। मैंने वर्मा जी से कहा- ‘‘वर्मा जी अगर पैरा की व्यवस्था हो जाय तो अच्छा है।’’ घर वाले भाई ने पैरे की व्यवस्था की और हम सो गए। ठंड तो जैसे पैरे को देखकर फुर्र हो गई। सुबह हुई। उठा तो ठंड फिर कहर बरपाने लगी। पानी पानी नहीं, जैसे बर्फ हो। सुबह के दैनिक कार्यो से निवृत्त हुआ। मजदूर भाई तब तक चहा डबका चुका था। वह कप सासर में चाय लेकर आया। मैंने कहा ‘‘भाई मैं चाय नहीं पीता।’’ लेकिन वह माना नहीं। फिर जिद करने लगा। मैंने फिर से मना कर दिया। मैं आज भी चाय नहीं पीता।
अब सुरज पहाड़ों के ऊपर दिखने लगा। लगा कि वह गोरसी भर अंगरा को पहाड़ों के ऊपर से उंडेल रहा है, जिसकी गुनगुनी आँच धरती पर आ रही है। रउनिया पाकर हम खुश हो गए। आंगन के चूल्हे में भात-साग पक रहा था। ठंड की अधिकता के कारण गर्म पानी से स्नान किया। रउनिया में बैठकर हम दोनों खाना खाए। घर जैसा खाना खाकर आनंद आ गया। पेंट डिब्बा और ब्रश लेकर मैं वर्मा जी के साथ सायकल से निकल पड़ा पेंटिग काम के लिए। वर्मा जी की अपनी सायकल थी।
सडक क्या थी ? केवल उबड़-खाबड़ जमीन। देवरचा से ही पहाड़ दिखाई देने लग जाते है। चारों ओर हरियाली, ऊँचे-ऊँचे पेड़ साजा, बीज, सागोन, सलिहा, मोंदे, कुरूलू, तेन्दू, चार, भिरहा आदि के हरे भरे पेड़ मन को आनांदित कर रहे थे। चिड़ियों का कलरव कानों में अमृत घोल रहा था। धूप भी पेड़ों से छनकर आ रही थी। धूप तन को स्पर्श करती तो मन आनंदित हो जाता। मैं पत्थर पर नंबरिग करता। कि.मी. पत्थर पर देवरचा व कुम्हरवाडा का नाम पेंट कर दूरी दर्शाता।
जैसे -जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, चढ़ाई और कठिन होती जा रही थी। लेकिन ऊँचे पहाड़ों पर प्रकृति का विंहगम दृश्य देखकर थकान दूर हो जाती और मैं नए उत्साह के साथ अपने काम पर लग जाता। संदेश वर्मा थोड़े मजाकिया स्वभाव के थे। मजेदार बात करते, मन बहल जाता। सायकल को लेकर घाट चढ़ने में ज्यादा परेशानी होती। धूप चढ़ने के साथ सुहानी लगने लगी। चढ़ाई के समय तो पसीना भी निकलने लगा। इतनी मोड़दार और खतरनाक घाटी पहिली बार देखा। साल्हेवारा की मोटियारी घाट चढ़ने-उतरने का मैं अभ्यस्त हो चुका था।
यहाँ फर्लांग दो फर्लांग पर घाट का कटाव। कभी दाएं गहरी खाई तो कभी बाएं गहरी खाई। मन रोमांच से भर जाता। लगभग चार कि.मी. घाट चढ़ने के बाद समतल स्थल मिला, जहाँ पर सायकल से यात्रा सुगम हुई। बसंतपुर गांव से पहले सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे प्रस्तर प्रतिमा के टुकड़े पड़े हुए मिले। पास ही गाय चरा रहे चरवाहे ने बताया कि यह बैताल रानी की प्रतिमा है। यह जानकर मन प्रसन्नता से भर गया। बैताल रानी की कहानी मैं अपनी बड़ी भाभी से सुन चुका था। संदेश वर्मा चूंकि इस रास्ते से मेट काम के सिलसिले में कई बार आ-जा चुके थे। इसलिए वे पूर्व से ही परिचित थे।

हमारी भौजी के कथनानुसार बैताल रानी लांजी राज की राजकुमारी थी। वह बड़ी सुंदर और रूपवती थी। उसका विवाह धमधा के राजा से हुआ था। तब गोंड़वाना राज्य था। धमधा, ठाकुरटोला, गंडई और लांजी के राजा गोंड ही थे। धमधा के राजा अपनी रानी के साथ वन भ्रमण के लिए आते थे। लांजी आते-जाते वे ठाकुरटोला राजा के यहाँ कुछ दिन विश्राम करते फिर अपने गंतव्य को निकल जाते।
इस बीच बैताल रानी एक चरवाहे की बांसुरी सुन कर सम्मोहित हो गई और उससे प्रेम करने लगे। प्रेम कहाँ जाति-पाति या अमीर-गरीब देखता है। चरवाहा भी रानी पर आसक्त हो गया। दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा। वन भ्रमण के बहाने रानी चरवाहा से मिलती। चरवाहा गाय चराता, बांसुरी बजाता।उसकी बांसुरी की धुन सुन रानी अपनी सुध-बुध बिसर जाती। राजा के गुप्त चरों ने जब बताया कि रानी चरवाहा से प्रेम करती है और जंगल में चोरी-छिपे उससे मिलने जाती है। तब राजा आग बबूला हो गया। तब तक बैताल रानी और चरवाहा भाग कर जंगल में छुप गए थे।
इधर राजा हाथ में तलवार लेकर घोड़े पर सवार हुआ और रानी को ढूढंते हुए बसंत पुर जंगल की ओर गया। पहाड़ी में आहट हुई तो राजा रूक गया। देखा तो बैताल रानी चरवाहे के साथ थी। राजा का खून खौल गया। उसने उसी स्थान पर रानी को तलवार से तीन टुकड़ों में काट दिया। चरवाहे को भी मार डाला।
तब से यह किवदंती लोक में प्रचलित है कि बैताल रानी पत्थर बन गई और आज भी तीन टुकड़ों में पड़ी हुई है। हमारी बड़ी भौजी ने यह भी बताया था कि ‘चल रानी लांजी जाबो ’ कहने पर मूर्ति के टुकडे अपने स्थान से हट जाते हैं। और ‘चल रानी धमधा जाबो’ कहने पर मूर्ति के टुकड़े अपने स्था न से नहीं हिलते। संदेश वर्मा ने भी एैसा ही बताया।
मैं उक्त कथनों का परीक्षण करना चाहा, तब पाया की दोनों ही कथन सही नहीं हैं। मूर्ति के टुकडे़ दोनों ही कथनों पर उठ जाते थे। तब मुझे पुरातत्व की कोई जानकारी नहीं थी। इस प्रकार बैताल रानी की सुनी किवदंती से मेरा साक्षात्कार हुआ। मैं संदेश वर्मा के साथ बंसत पुर के आगे कुम्हरवाड़ा तक पेंटिग कार्य समाप्त कर रामपुर, साल्हेवारा होते हुए अपने घर गंडई वापस आ गया।
संदेश वर्मा अपनी सायकल से उसी रास्ते से वापस देवरचा, छुईखदान होते हुए पिपरिया चले गए। तब कुम्हरवाड़ा से रामपुर तक घन घोर जंगल था, आज भी है। मेरे मन में तनिक भी भय नहीं था। प्रकृति की सुंदरता का रसपान करते हुए न थकान लगी न दूरी का भान हुआ। इस तरह बैताल रानी की अविस्मरणीय स्मृतियाँ आज भी मनो-मस्तिष्क में छाई हुई है।
लगभग 36 वर्षो बाद वही बैताल रानी घाट (देवरचा कुम्हरवाड़ा सड़क मार्ग) अपनी प्राकृतिक सुंदरता और नए निर्माण आकर्षण के साथ पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ-साथ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के निकटवर्ती जिलों के सैलानी यहाँ रोज आते है। प्रकृति का सानिध्य प्राप्त कर उसकी सुन्दरता को निहारते हैं। रविवार व त्यौहार के दिनों में यहाँ बहुत भीड़ होती है।
ढ़ाई-तीन कि.मी. की सर्पीली सड़क में लगभग 16-17 मोड हैं। जो पर्यटक को रोमांचित करते हैं। देखने वाले देखकर वाह-वाह करते हैं। युवा साथियों की तो बात ही निराली है। वे बाईक में फर्राटे से चलते-चलते मोबाईल से घाट की सूटिंग करते हैं और मस्ती में चिल्लाते हैं। इस मामले में बेटियाँ भी कम नहीं हैं। वे भी परिवार के साथ प्रकृति के इस वैभव का आनंद लेती हैं। आज चारों तरफ सोसलमीडिया के माध्यम से बैताल रानी घाट की धूम है।
यू-ट्यूब में बैताल रानी घाट की प्रशंसा देख-सुनकर बड़ी खुशी हुई और पिछले रविवार अपनी स्मृतियों को तरोताजा करते हुए मैं भी सपत्निक यात्रा पर निकल गया। बैताल रानी जाने के लिए गंडई, नर्मदा, ठाकुरटोला, देवरचा से भी कच्ची सड़क है। किन्तु यह यह बरसात के दिनों के लिए सुगम नहीं है। छुईखदान से छिंदारी देवरचा मार्ग ही ज्यादा सुविधा जनक और सुगम है। देवरचा पहुँचते ही लगा ऊँचे- ऊँचे पेड़ जैसे हाथ हिलाकर हमारा स्वागत कर रहे हैं।
पहाड़ जैसे पर्यटकों को अपनी गोदी में बैठाने को आतुर हैं। शीतल हवाओं का झोंका और हरी-भरी वादियाँ जैसे लोरियाँ गा रही हों और कह रही हों-‘‘तुम मेरे आँचल की छाँव में रहोगे तो जीवन में कोई परेशानी नहीं आयेगी। मेरी तरह भी तुम्हारा जीवन हरा-भरा रहेगा। आओ मेरे आँचल की छाँव में आओं।’’
मैं तो इस मार्ग से पूर्व से ही परिचित था, किन्तु नए रूप को देखकर मेरा मन खिल-खिल गया। प्रकृति की सुंदरता को देखकर मेरी पत्नी भी प्रसन्न हो गई। मोटर सायकल और चार पहिया वाहनों से फर्राटे भरते हुए लोगों का आना-जाना मन में उत्साह भर रहा था। सबके चहरे पर खुशी और मुस्काने बिखरी नजर आ रही थीं। घाटी की सुदरता की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। फोटो व सेल्फी लेने वाले हँस-हँस कर मोबइल क्लिक कर रहे थे। हमने भी फोटो लिए और प्राकृतिक सुषमा का भरपूर आनंद उठाया।
बैताल रानी की टुकड़ों में विभक्त मूर्ति सड़क किनारे एक कुटिया नुमा मंदिर में रख दिया गया है। मूर्ति काफी क्षरित हो गई है। क्षरित होने के कारण उसकी पहचान नहीं हो पा रही है। फिर भी यह अनुमान लगता है कि यह मूर्ति नारी प्रतिमा हैं, जो खंडित रूप में तीन खंडों में है। ऊपरी सिर का हिस्सा गायब है। जिसमें सिर की आकृति का प्रस्तर रख दिया गया है। दोनों हाथ भी खड़ित हैं। जान पड़ता है कि यह किसी उपासिका की मूर्ति है, जो पद्मासन में है जिसका एक पांव भी खंड़ित है। लाल बलुवा पत्थर से निर्मित गोंड़ कालिन इस नारी प्रतिमा का निर्माण काल लभगभ 15 वीं- 16 वीं ई. जान पड़ता है। तब यह क्षेत्र गोड़ नरेशों के आधीन था।
उक्त प्रतिमा का अपना पुरातात्विक महत्व है। आवश्यकता है इस संदर्भ में खोज की। एक प्रश्न यह भी उठता है कि इस बीहड़ वन में एक अकेली प्रतिमा कहाँ से लाई गई होगी? क्योंकि आस-पास दस-बीस किलो मीटर के दायरे में कोई पुरातात्विक मंदिर नहीं है और ना ही कोई प्राचीन धरोहर स्थल। क्योंकि बंसतपुर से पुरातात्विक स्थल जैन मंदिर रघोली मध्यप्रदेश की दूरी लगभग 30 कि.मी. है। इसी तरह पुरातात्विक स्थल गंडई, घटियारी और नर्मदा लगभग 40 कि.मी. दूर हैं। इस घनघोर जंगल में पुरातात्विक महत्व की मूर्ति का होना काफी महत्वपूर्ण है। इस स्थान पर नए मंदिर का निर्माण कार्य जारी है। मंदिर निर्माण इस स्थान का महत्व बढ़ेगा, इसकी पूरी संभावना है।
जब हम बैताल रानी मूर्ति के पास पहुँचे तो काफी भीड़ थी। दर्शन पश्चात पत्नी की जिज्ञासा शांत करने के लिए मैंने मूर्ति को स्पर्श कर ‘चल रानी लांजी जाबो ’ कहकर हिलाया तो हिलने लगी। फिर ‘‘चल रानी धमधा जाबो ’’ कहकर हिलाया तो भी हिलने लगी। लांजी के नाम पर हिलना और धमधा के नाम पर न हिलना यह केवल किवदंती है। इसमें जरा भी सच्चाई नहीं है।
बैताल रानी से संबंधित कथा लोक का विश्वास है। लोक की आस्था है। लोक आस्था को किसी प्रमाणिकता की आवश्यकता नहीं होती। यह नारी प्रतिमा किसी देवी की है या किसी उपासिका की, इसे जानना पुरातत्व का काम है। लोक आस्था के अनुसार यह बैताल रानी की प्रतिमा है। खंड़ित होते हुए भी इस मूर्ति की लोग पूजा कर रहें है। यह लोक विश्वास फलित होगा। इसमें कोई संदेह नहीं। यह क्षेत्र पर्यटन के मामले में नया प्रतिमान गढ़ेगा ऐसा मेरा सोचना है।
बंसतपुर गांव को लेकर मेरे मन में एक और आशा जग रही हैं। वह यह कि इस क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाओं के साथ-साथ छोटे-मोटे उद्योग की भी स्थापना की जा सकती है। मुझे याद है जब हम प्राथमिक शाला में पढ़ते थे, तब कक्षा तीसरी या चौथी के भूगोल में खनिज से संबंधित पाठ में गंडई, मगरकुंड़ और बंसतपुर में लोहा पाये जाने का उल्लेख था। इसकी जानकारी खनिज विभाग के पास होगी। बैताल रानी घाट के निर्माण से विकास की शुरूआत तो हो ही चुकी है। यह क्षेत्र प्रकृति का पुजारी है। यहाँ आकर लोग प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा लेकर पेड़-पौधो की सुरक्षा करेंगे और खुद के जीवन को सुरक्षित रखेंगे। ऐसी उम्मीद है।
आलेख
डॉ. पीसी लाल यादव
‘साहित्य कुटीर’ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव(छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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