आज का पंचांग

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नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

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वनवासी विरासत पर आधारित आज का विश्व

वनवासी विरासत पर आधारित आज का विश्व

माता भूमि: पुत्रों अहं पृथिव्याः पर्जन्य: पिता स उनः पिपर्तु। अथर्ववेद की यह ऋचा पृथ्वी और मानव के बीच माता और संतान का संबंध स्थापित करती है। अर्थात पृथ्वी लोक के समस्त जीव जंतु, हम सभी धरती माँ के संतान है। जीव जंतु, पेड़ पौधे सभी हमारे सहोदर है। ऐसा पवित्र विचार हमारे ऋषि मुनियों ने दिए है।
मानव का विकास वनों में हुआ। समय के साथ जब कृषि का आविष्कार हुआ तो मानव वनांचलों से निकल मैदानी क्षेत्रों में रहने लगा तब ग्राम्य जीवन शैली का उदय हुआ। कृषि में आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने लगा और धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा, वस्तु विनिमय वाले केंद्र आर्थिक रूप से मजबूत होकर नगर का रूप लेने लगे और नगरीय जीवन शैली का जन्म हुआ। इस प्रकार हमें यही तीन जीवन शैलियाँ आदि काल से नजर आती है:

1. आरण्यक या वन आधारित जीवन शैली
2. ग्राम्य या कृषि आधारित जीवन शैली
3, नगर या  व्यापार आधारित जीवन शैली 


वन्य, ग्राम, और नगर जीवन शैली

तीनों ही जीवन शैली के लोगों की मूल तो वन आधारित जीवन शैली ही रही है। वन में मानव ने सबसे अधिक समय व्यतीत किया है। वन्य समाज प्रकृति और स्वयं को एक ही मानता है। एक अद्वैत का भाव सदैव मन में रहता है, कि मैं और प्रकृति अलग नहीं है। 

आज का विश्व प्राचीन वनवासियों की देन:
एक समय था जब मानव प्रकृति के गोद में रहता था। अपने दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए यायावरी जीवन जीता था।  लेकिन समय के साथ मानव क्रमिक विकास करते-करते आज मानव चाँद तक पहुँच गया। बड़ी बड़ी इमारते, उन्नत विज्ञान, चिकित्सा आदि पर जो उपलब्धि हमने आज पाई है, यह हमारे पूर्वजों के ज्ञान परंपरा और परिश्रमों का नतीजा है, जो अपने आप को कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने अस्तित्व को बचा पाए। नहीं तो इस संसार में मानव कब का विलुप्त हो चुका होता।

इसका एक ठोस कारण हमें नजर आता है, वह है “प्रकृति आधारित जीवनशैली” जो भारतीय संस्कृति क जीवन शैली है। भारतीय समाज प्रकृति के साथ कदम मिला कर चलने वाला समाज है। ना कभी प्रकृति विरुद्ध आचरण करता ना कभी प्रकृति को नुकसान पहुंचाता।  इतने लंबे समय तक मानव जीवन को बचाने में जो योगदान भारतीय संस्कृति का है, वह अन्य कहीं नजर नहीं आता है।

वैश्विक पटल पर वन्यसमाज को लेकर दृष्टिकोण:
प्राचीन समय पर विश्व की सभ्यताएं एक दूसरे के संपर्क में रहती थी, उनके बीच व्यापार, मेल मिलाप हुआ करता था। सिंधु घाटी सभ्यता का मिश्र और मेसोंपोटामिया के साथ संबंध के प्रमाण आज भी मिलते है।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, सभ्यताएं अब छोटे छोटे राज्यों, गणराज्यों और साम्राज्य में विभक्त होने लगी थी। एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा और युद्ध की आपाधापी  के बीच मानवता का विनाश होने लगा।
15-16 शताब्दी में यूरोप में कई साम्राज्य का उदय हुआ। ये स्पेन, पुर्तगाल, डच और एक ब्रिटिश सम्राज्य थे।  कैथोलिक ईसाई मिशन द्वारा प्रदान की गई सहायता से कोलंबस भारत की खोज करते करते, गलती से अमेरिका के पूर्वी जा पहुँचा। उस समय वहाँ चेरोकी, चिकासौ, चोकताव , मास्कोगी और सेमीनोल इन 05 मूल निवासियों का आधिपत्य था। कैथोलिक ईसाई मिशन का उद्देश्य समुद्री खोजो से उपनिवेश, व्यापार, और सैन्य विस्तार के साथ एक प्रमुख लक्ष्य था, ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार।

कुल चार समुद्री यात्राओं से स्पेन, पुर्तगाल और अंग्रेजों ने अमेरिका में अपनी साम्राज्य स्थापित करने की योजना बना ली और धीरे धीरे ब्रिटिश सेना के प्रमुख सर जेफी आमस्टर् ने 80% मूल निवासियों को तड़पा तड़पा कर मार दिया। तथा 1775 ई.  तक पूरी आधिपत्य स्थापित कर लिया गया। ऐसा ही हाल आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के साथ किया गया। ब्रिटिश उपनिवेश ने ऐसे कई क्षेत्रों के मूलनिवासियों को वहाँ से खदेड़ दिया या मार डाला ।ब्रिटिश साम्राज्य अपनी नीतियों के बदौलत विश्व के 23% भाग पर कब्जा करने में सफल रही, लेकिन इसका खामियाजा उस  भूमि के जनों/मूल निवासियों को उठाना पड़ा जो कि मानवता के लिए शर्मसार कर देने वाला था। 

यूरोपीय दृष्टि पर आधारित हमारी शिक्षा प्रणाली का भी है। जनजातीय समाज का अध्ययन आज भी नृजातीय तत्त्वों के आधार पर किया जाता है, जैसे नाक कैसी है, होंठ कैसे हैं आदि; मानों वे मनुष्य नहीं कोई विचित्र जन्तु हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि आजतक हम अपने जनजातीय समाज का अध्ययन यूरोपीय आचार-विचारों पर आधारित भेदपरक दृष्टि से ही कर रहे हैं। अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की अपनी भेदनीति के तहत हमारे जनजाति समाज की पहचान बार-बार बदलने का यह जो षड्यंत्र किया, उसने ईसाइयों द्वारा कन्वर्ज़न के लिए रचे जा रहे नानाविध दुष्चक्रों तथा मार्क्सवादी इतिहासकारों की अनिष्टकारी गतिविधियों को बढ़ावा दिया। और इनके दुष्परिणाम यह हुए कि आज सामान्य भारतीय आत्म-विस्मृत हो गया। अपने ही जनजातीय समाज को स्वयं से पृथक् और हीन समझने लगा।

जनजातीय समाज का जो स्वरूप हमें आज नजर आता है, या हम जैसा समझ रहे हैं, वह वास्तविक नहीं है। पाश्चात्य प्रभावों, माओवाद, एवं सांस्कृतिक अतिक्रमण की वजह से ही वह हमारी दृष्टि से ओझल-सा हो गया है। अतएव आज आवश्यकता है कि हम अपने जनजातीय समाज के प्रति एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाए और साथ-साथ जनजातीय समाज की देव सृष्टि, कुल देवता, मातृ देवी से निर्मित देवलोक, गाथा-गीत, कलारूप और अनुष्ठानों में निहित आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विश्वास परंपरा के सूत्रों को भी पहचाने। ऐसी कोलोनियल मानसिकता जो हमारे मन में आ बसी है, उस विचार को हटा कर, स्वयं को जानने के लिए भी हमें नॉन-कॉलोनाइज्ड जनजातीय समाज से सीखना होगा। 


लेख:
वेद प्रकाश सिंह 
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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