आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

क्या है तिल-गुड़ का विज्ञान

क्या है तिल-गुड़ का विज्ञान

भारतीय त्योहार केवल उत्सव के अवसर नहीं पुरातन ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के भी प्रतीक हैं। मकर संक्रांति पर हम बड़े चाव से जिस तिल-गुड़ के लड्डुओं का आनंद लेते हैं उसके पीछे बहुत से वैज्ञानिक कारण भी हैं।

भारतीय संस्कृति में मनाये जाने वाले हर पर्व में कुछ व्यंजन विशेष तौर पर बनाये जाते हैं। क्या कारण है कि जिस तरह प्रत्येक तीज- त्योहार को मनाने के विधि-विधान अलग-अलग हैं उसी तरह व्यंजन भी अलग-अलग हैं!

शोध की दृष्टि से देखने पर समझ आता है की इस विविधता में निहित कारण है मौसम, मान्यता, ज्योतिष और स्वास्थ्य । सभी के मध्य निहित अंतर्संबंध। इसी विज्ञान को समझने के लिए हम मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डू जो घर-घर में बनाए, खाए और बांटे जाते हैं पर बात करेंगे।

यह परंपरा केवल स्वाद या रिवाज भर नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक और व्यावहारिक समझ का सुंदर उदाहरण है। मकर संक्रांति वह दिन है जब सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है।

तिल-गुड़ और पतंगबाजी का त्यौहार- मकर संक्रांति
तिल-गुड़ और पतंगबाजी का त्यौहार- मकर संक्रांति

इस बदलाव को शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे प्रकाश, ऊर्जा और नए आरंभ का संकेत समझा जाता है। ऐसे समय में तिल और गुड़ का उपयोग, सूर्य और शनि से जुड़े प्रतीकात्मक अर्थों के कारण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस दिन तिल और गुड़ से बने लड्डू सूर्यदेव को अर्पित किए जाते हैं और फिर उनका प्रसाद के रूप में सेवन और वितरण किया जाता है।तिल के लड्डू देना और लेना शुभ माना जाता है,क्योंकि इसे पुण्य,दान और सद्भाव का प्रतीक माना गया है।

इससे सम्बंधित पौराणिक कथा और लोकमान्यता के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब सूर्यदेव के तेज से शनिदेव के कुंभ राशि वाले स्थान पर सब कुछ जलकर नष्ट हो गया।

कथा में वर्णन मिलता है कि वहां केवल काले तिल ही ऐसे थे जो सूर्य के प्रचंड ताप के बाद भी साबुत रह गए। इससे यह संकेत मिलता है कि तिल में विशेष शक्ति और पवित्रता निहित है।

कहा जाता है कि जब सूर्यदेव शनिदेव के घर आए तो शनिदेव ने उनकी पूजा काले तिल और गुड़ से की। इस पूजा से सूर्यदेव प्रसन्न हुए और उन्होंने वर दिया कि जो भी मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ से उनकी आराधना करेगा, उस पर सूर्य और शनि दोनों की कृपा बनी रहेगी।

इसी आशीर्वाद की मान्यता के कारण तिल-गुड़ के लड्डू इस पर्व पर विशेष रूप से बनाए और चढ़ाए जाते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मकर संक्रांति के अवसर पर तिल और गुड़ का संयोजन शनिदेव और सूर्यदेव के मध्य संतुलन का प्रतीक है।

तिल-गुड़, सूर्यदेव और शनिदेव के मध्य संतुलन का प्रतीक
तिल-गुड़, सूर्यदेव और शनिदेव के मध्य संतुलन का प्रतीक

तिल को शनिदेव का और गुड़ को सूर्यदेव का प्रिय माना जाता है। तिल और गुड़ का संगम, सूर्य और शनि के संतुलन का प्रतीक रूप माना जाता है।जीवन की चुनौतियों, कर्मफल और अनुशासन से जुड़े शनि और प्रकाश, ऊर्जा तथा आत्मबल से जुड़े सूर्य दोनों का सामंजस्य इंसान के जीवन में स्थिरता और प्रगति का प्रतीक माना जाता है।

इस दृष्टि से, मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ के लड्डू बनाना और उनका दान करना केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं। बल्कि यह संदेश भी देता है कि जीवन में कठोरता और कोमलता, तप और मधुरता दोनों का संतुलित मेल आवश्यक है।

तिल की कड़वी-मंद तासीर और गुड़ की मिठास मिलकर यही भाव प्रकट करती है। भारतीय परंपरा में मकर संक्रांति को दान-पुण्य के लिए अत्यंत उत्तम दिन माना गया है।

तिल का दान विशेष रूप से ‘महादान’ और ‘अक्षय दान’ माना जाता है, यानी जिसका फल लंबे समय तक बना रहता है। तिल-गुड़ के लड्डू जरूरतमंदों, ब्राह्मणों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को बांटे जाते हैं।

इससे सामाजिक एकता और अपनापन बढ़ता है। गहन विचार करने पर समझ आता है कि हमारे पूर्वजों ने परम्पराओं को स्थापित करते समय इस बात का भी बहुत ध्यान रखा कि कैसे उनके माध्यम से सामाजिक सौहार्द्र और पारस्परिक प्रेम को बढ़ाया जाए।

उत्तरायण पर तिल-गुड़ के दान का है विशेष महत्त्व
उत्तरायण पर तिल-गुड़ के दान का है विशेष महत्त्व

“तिल गुड़ घ्या, गोड गोड बोला” जैसे लोकवाक्य इस बात को रेखांकित करते हैं। जैसे तिल-गुड़ मीठे हैं, वैसे ही व्यवहार में भी मधुरता और सौहार्द होना चाहिए। यह पर्व रिश्तों में कड़वाहट खत्म कर मीठे संबंध बनाने का सांस्कृतिक संदेश देता है।

हमारा भारतीय समाज प्राचीन काल से ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान का धनी रहा है। जिसकी पुष्टि हमारे ग्रन्थ,वेद-पुराण सभी करते हैं अतः स्वास्थ्य की दृष्टि से भी कौन सा पर्व कैसे और कब मनाना इसका ध्यान हमारे पूर्वजों ने भली भांति रखा।

यह भी एक कारण है कि मकर संक्रांति पर क्यों तिल-गुड़ का प्रयोग किया जाता है। तिल और गुड़ दोनों की तासीर गर्म मानी जाती है, जो मकर संक्रांति के समय पड़ने वाली कड़ाके की ठंड में शरीर को भीतर से गर्माहट देती है।

चूँकि यह पर्व हमेशा शीतकाल के बीच आता है यही कारण है कि इस मौसम में तिल-गुड़ का सेवन विशेष लाभदायक माना जाता है। तिल में कैल्शियम, फास्फोरस, जिंक, आयरन जैसे कई पोषक तत्त्व पाए जाते हैं। जो हड्डियों को मजबूत बनाने, त्वचा व बालों के लिए उपयोगी होने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं।

गुड़, परिष्कृत चीनी की तुलना में अधिक खनिजों से भरपूर होता है और पाचन के लिए सहायक माना जाता है। तिल के लड्डू स्वाद, सेहत और मौसम तीनों के लिए उपयुक्त संयोजन बन जाते हैं।धार्मिक मान्यता में तिल के छोटे-छोटे बीज को पवित्रता और दीर्घायु से भी जोड़ा गया है।

कई मान्यताओं में तिल को यमदेव से भी संबद्ध माना जाता है और इसे ‘अमरत्व के बीज’ कहा जाता है। इसलिए तिल का उपयोग पितरों के तर्पण और अनेक धार्मिक कर्मकांडों में किया जाता है।

पोषक और लाभदायक तत्वों से भरपूर है तिल के छोटे दाने
पोषक और लाभदायक तत्वों से भरपूर है तिल के छोटे दाने

मकर संक्रांति पर तिल के लड्डू बनाने और बांटने की परंपरा एक तरह से यह संकेत भी देती है कि जीवन में छोटे-छोटे सत्कर्म, छोटी-छोटी शुभ आदतें ही मिलकर बड़े पुण्य और स्थिर भविष्य का आधार बनती हैं। जैसे तिल के असंख्य छोटे दाने एक साथ मिलकर एक पूरा लड्डू बनाते हैं।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

Follow us on social media and share!