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पर्व विशेष : | तदनुसार 20 अप्रैल 2026

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मधुर नाद और मंगल ज्योति का केरलीय उत्सव-तृश्शूर पूरम

मधुर नाद और मंगल ज्योति का केरलीय उत्सव-तृश्शूर पूरम

स्वतंत्रता संग्राम के महारथियों में पूज्य पं. जवाहरलाल नेहरू जी अग्रणी थे। उनके ग्रंथों में हिन्दुस्तान की खोज का हिन्दुस्तान की कहानी भारत को जानने की सबसे अच्छी कुंजी रही है। उन्होंने ग्रंथ का बड़ा सुंदर शीर्षक चुना डिस्कवरी। हम भारतीय भारत में रहते हुए भी अपने देश के बारे में अनजान होते हैं। हम नियाग्रा जल प्रपात का वर्णन कर सकते हैं, पर समीपस्थ कोवलम समुद्र तट का सौंदर्य नहीं पहचानते। ऐसी कमजोरी दूर करने का अचूक उपाय- घूमना है। घूमने का नया नाम पर्यटन है। पर्यटन आज अंतर्राष्ट्रीय महत्व का विषय है। प्रत्येक राज्य की सरकारें और केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर पर्यटन का प्रचार करने में परस्पर होड़ लगाती हैं।

रेलयात्रा के दौरान आप स्टेशन की दीवारों पर तथा रेल के डिब्बों में हमारे प्रसिद्ध पर्यटन स्थानों के मनोरम चित्र देख सकते हैं। पर्यटन विभाग ने हमारे नगरों को प्यारी उपाधि दे रखी है पिंक सिटी-गुलाबी शहर (जयपुर), लेक सिटी झील का शहर (उदयपुर), सिटी ऑफ गार्डन्स-बागों का शहर (बैंगलोर) आदि। केरल का नाम है- "गाँड्स ओन कंट्री"- ईश्वर का प्वारा देश।

अर्थात् ईश्वर ने विशेष श्रद्धा से केरल को सिरजा। इस नामकरण के पीछे हम शास्त्रार्थ न करें। इतना तो स्पष्ट व प्रमाणित है कि केरल में ईश्वर की सन्निधि सर्वत्र है, जहां देखो वहां मंदिर हैं। इन मंदिरों ने केरलीय जन-जीवन एवं सांस्कृतिक विकास को रूपायित किया है। प्रायः अनेक नगरों व ग्रामों का जन-विकास वहां के मुख्य मंदिर पर आधारित है। आप तुरंत काशी का स्मरण करेंगे। केरलीय में, तिरुवनन्तपुरम और तृश्शूर का स्मरण करता हूं। ये दोनों महानगर केरल के दो नयन हैं। इनमें तिरुवनन्तपुरम के बारे में थोड़ी सी जानकारी आप रखते होंगे तृश्शूर की जानकारी कम। इसलिए हम तृश्शूर की खोज करें।

विलक्षण बात है कि हम बड़े नगरों से परिचित न होते हुए भी उनके समीप कुछ गांवों के नाम जानते हैं। आप भले ही तृश्शूर को न जानते हों पर श्री शंकराचार्य की जन्मस्थली कालटी और प्रसिद्ध वैष्णव मंदिर के स्थान गुरुवायूर के नाम जरूर सुन चुके होंगे। दोनों तृश्शूर के नजदीक हैं- घंटे भर की बस यात्रा तृश्शूर ले जाएगी, गुरुवायूर भी। एक दक्खिन में है, एक उत्तर में।

अगर आप केरल चलना चाहें तो यात्रा का पूरा लाभ उठाइये अर्थात् मध्य व उत्तर केरल के उत्सवों के मौसम में आइए। शुद्ध केरलीय जीवन कलाएं और उत्सव आनंद दे सकते हैं। संपूर्ण भारत कृषि प्रधान देश है। केरल कैसे अपवाद हो। बीसवीं सदी ने खेतों को हाशिये पर खड़ा कर दिया है। यहां के घरानों की धान की कोठियां प्रायः खाली रहती हैं। पड़ोसी तमिलनाडु व आंध्र प्रदेश केरल के अन्नदाता रहे हैं। फिर भी ईश्वर को धन्यवाद, अब भी कुछ नामसमझ लोग खेती का महत्व भूले नहीं।

हरे खेतों में पकी बालियां हवा के झोंकों से मस्ती से झूमती नजर आती हैं। प्रतिवर्ष मार्च-अप्रैल तक फसल की कटाई पूरी हो जाती है। इसके बाद किसानों के मन मनोरंजन में लगते हैं। वे मंदिरों में उत्सव मनाते हैं। उत्सवों में देशी कलाकारों की महारत प्रकट होती है। ये नजारा देखते ही बनता है।

 

हमने तुश्शूर जाने का कार्यक्रम बनाया सो उसका रास्ता भी सुनिए। दिल्ली, हावड़ा, मुंबई आदि प्रमुख नगरों से आप कन्याकुमारी का टिकट प्राप्त कर सकते हैं। अधिकांश गाड़ियां तिरुवनन्तपुरम पर समाप्त होती हैं। वहां आपको गाड़ी बदलनी पड़ती है। किंतु तृश्शूर केरल के मध्य में स्थित मुख्य स्टेशन है। हर छोटी-बड़ी रेलगाड़ी तृश्शूर को सलाम बजाकर ही आगे बढ़ती है। केरल के बाहर से आने वाले प्रथम केरलीय स्टेशन पालघाट को उसके प्राकृतिक परिवेश के कारण स्मरण करेंगे ही।

यहां पहली बार आपको मोटे व लंबे केले (नेत्रनकाय) और उसके तले चिप्स मिलेंगे। इन दोनों की पूरी बहार आप आगे तृश्शूर में पायेंगे। पालघाट से घंटे भर की यात्रा तृश्शूर ले चलेगी। हर गाड़ी में तृश्शूर उतरने वाले अच्छी संख्या में मिलेंगे। इसलिए तृश्शूर स्टेशन को पहचानना बिल्कुल मुश्किल नहीं। तृश्शूर त्रिश्शिवपेरूर का संक्षिप्त रूप है। यह नाम यहां के प्रसिद्ध शिवमंदिर के आधार पर रखा गया है।

इस नगर का मुख्य केंद्र भी यही शिवमंदिर है। मंदिर नगर के मध्य में है। उसके चारों द्वार बड़े परिक्रमापथ पर खुलते हैं। यह दृश्य अन्य नगरों में भी मिलता है। किन्तु यहां सुनियोजित क्रम से वृत्ताकार परिक्रमा पथ बने हैं, जैसे रिंग रोड है-उस पथ पर मैदान हैं जो मंदिर की संपत्ति है। आगे इसी वृत्ताकार में नगर की मुख्य सड़क बनी है और सड़क के एक बाजू में बाजार सजा है। इसी मुख्य सड़क से चारों तरफ गलियां और दूसरी सड़कें निकलती हैं।

चंडीगढ़ जैसे आधुनिक सुनियोजित नगर में इंजीनियरी का कमाल है तो इस नगर में दो सौ से अधिक वर्ष पहले के एक आदर्श शासक शक्तन तंपुरान की सूझ का कमाल दिखाई देता है। इस नगर का भी इतिहास सैकड़ों वर्षों के दुख-सुख का साक्षी रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार यह परशुराम से संबंध रखता है और केरलीय ब्राह्मण (नम्बुदरी) लोगों का मुख्य केंद्र रहा है। इस नगर की गाथा सुनाने के लिए अलग आलेख चाहिए।

हम तृश्शूर जा रहे हैं, उसका सबसे प्रसिद्ध उत्सव 'पूरम' देखने। मेरे कानों में अभी 'चेंडमेलम' गूंज रहा है। जब तक उत्सव केंद्र पर पहुंचें तब तक इस उत्सव के आरंभ की कथा आपको सुनाऊं। तृश्शूर के शिवजी को वटक्ककुनाथन पुकारते हैं- अर्थात् ऋषभ की पहाड़ी के देवता। इसकी प्रसिद्धि के कारण इसे दक्षिण कैलाश भी कहा करते हैं। पुराने दिनों में तृश्शूर से थोड़ी दूर का 'पेरूमनम' गांव और मंदिर सब से प्रभुत्वशाली थे।

तृश्शूर के मंदिर को भी पेरूमनम के उत्सव में सामंत की तरफ देवमूर्ति का जुलूस लेकर उपस्थित होना पड़ता था। अलग उत्सव चलाने की अनुमति नहीं रही। श्रीराम वर्मा - शक्तन तंपुरान (शासनकाल 1789-1805) अपने साहस, आज्ञाशक्ति, जनसुधार आदि से पुराणपुरूष जैसे हो गये। उनके सुधारों में शिवमंदिर के पूरम उत्सव का प्रारंभ मुख्य था। इसके पीछे कई जनकथाएं हैं। सारांश यही है कि शक्तन तंपुरान ने मंदिर के बाहर, विस्तृत परिक्रमपथ के पूरे जंगल को काटकर मैदान बना दिया।

यह अब लोगों के आने-जाने, सभा सम्मेलन करने, बाजार लगाने व अनेक कामों में आता है। मुख्य सड़क से थोड़ी ऊंचाई पर यह बना है। महाराजा ने घोषित किया कि नगर के दो प्रमुख देवी मंदिरों के व्यवस्थापक पूरम का दायित्व लेंगे। नरेश ने नगर के सभी प्रमुख लोगों को इसके लिए सहमत कर लिया। उसी वर्ष से तृश्शूर मंदिर का परिक्रम पच उत्सव केन्द्र बन गया।

अन्य मंदिरों के उत्सवक्रम से पूरम का अंतर कुतूहल जगाता है। मंदिरों में मूर्तियां होती हैं जिनका चैतन्य पुजारियों और भक्तों की निष्ठा, जप आदि पर निर्भर है। विविध कारणों से इसमें च्युति हो जाती है। उसे दूर करना ही उत्सव का मूल ध्येय है। मुख्य पुजारी विशेष पूजा, बलि आदि का अनुष्ठान करते हैं।

सामान्य जन तो उत्सव के मनोरंजक पक्ष पर ही ध्यान देते हैं। मूल ध्येय को नष्ट करने वाले जुआ जैसे कार्यक्रम कराते हैं। तृश्शूर का पूरम महोत्सव यद्यपि इस महाशिवमंदिर के प्रांगण में चलता है तो भी मंदिर के भीतर विशेष पूजाक्रम नहीं होते। यह निराली बात है, पर सच है।

तृश्शूर नगर के मुख्य मुहल्लों में और भीतर जी देवी शास्ता मंदिर है ये प्रत्येक पूरम में अपना प्रतिनिधि भेजते हैं। पहले सब पेरूमनय जाते थे अब तृश्शूर जाते हैं। पूरम का वर्णन कैसे करूँ? इसके लिए वही सूक्ति लागू है- अनयन नयन बिनु बानी। चाहें तो आप इसे मधुर नाद और मंगल ज्योति का उत्ताव पुकार सकते हैं। यह पूर्णतः जनता का उत्सव है, केरलीय जीवन के उत्सव पक्ष का दर्पण है।

उत्सव का प्रारंभ ध्वजोत्तोलन से होता है। मई महीने के पूरम (पूर्वफाल्गुनी) के दिन पूरम उत्सव मनाया जाता है। इसके सात दिन पहले ध्वजोत्तोलन करते हैं। पुराने ग्राम जीवन की रूढ़ि थी कि किसी ग्राम या अग्रहारं (ब्राह्मणवाड़ा) के मंदिर में उत्सव का ध्वजोत्तोलन हो गया तो उत्सव की मंगलसमाप्ति के पहले ग्रामवासियों को अन्यत्र जाना नहीं चाहिए। मंदिर के उत्सव में हर परिवार प्रतिनिधि के जरिये हाजिरी देता, उत्सव के लिए तन-धन से पूरा योग देता।

तृश्शूर के उत्सवारंभ से मंदिर के कर्मचारी हाथी और छोटे बाजे के साथ घर-घर जाकर धान का हिस्सा वसूल करते। किसानों का युग था और किसान खुशी से भगवान को हिस्सा देते। अब तो कर्मचारी साथ धान लाते हैं। उसके पैसे हिसाब लगाकर वसूल किये जाते हैं।

तृश्शूर का दो खंड माना गया- 'वारमेक्कायु' और 'तिरूवंषाडी'। ये दोनों देवस्वम (मंदिर की संस्था) काफी धनी हैं। ये उत्सव का नेतृत्व करते हैं। तृश्शूर नगर व आसपास के कई मंदिर भी यह उत्सव मनाते हैं और उत्सव के दिन अपनी भूमिका अदा करते हैं। इस उत्सव के तीन खण्ड हैं। (1) शोभायात्रा, (2) कुडमाट्टम और (3) आतिशबाजी।

इस शोभायात्रा का प्राण गजराज है। पारमेक्कालु और तिरूवंपाठी दोनों मंदिरों से 15-15 हाथियों का एक दल शोभायात्रा का रूप धारण करके चलता है। इसके लिए हाथियों को रेशमी कपड़े का झूल पहनाते हैं। लक्षणयुक्त गज चुने जाते हैं। मंदिर प्रांगण में इन हाथियों को ऊंचाई व अन्य लक्षणों के अनुसार खड़ा करते हैं। सबसे ऊंचे व लक्षणयुक्त गजराज को ही मुख्य मूर्ति वहन करने का अधिकार प्राप्त होता है।

केरल के उत्सव में हाथियों को सोने का मुलम्मा चढ़ाया हुआ तथा विशेष बेलबूटों वाला मुखपट्ट पहनाया जाता है। रात को मशालों की ज्योति में इनकी जो दमक होती है वह राजस्थान के मुखपट्ट में नहीं। प्रत्येक गज की पीठ पर मंदिर का प्रतिनिधि देवता की मूर्ति या प्रतीक हाथ से संभाले रहता है। उसके पीछे दो-तीन लोग और भी होते हैं। एक सज्जन झालरदार रेशमी छाता (आनपत्र) तानता है। दूसरा चंबर के पंखे दोनों हाथों से झलता है तो तीसरा निश्चित गति पर मोरपंख पंखा झुलाता है। गजराज की मंदगति के आगे वर्जत्रियों का पूरा दल पंक्तिशः खड़ा होकर वाद्य बजाता है। इनको प्रोत्साहन देने हजारों दर्शकों की भीड़ यात्रा में शामिल होती है। प्रत्येक मंदिर की शोभायात्रा भिन्न-भिन्न पथ से तृश्शूर वडवकुनाथन मंदिर के प्रांगण में अपने लिए नियत स्थान पर पहुंचती है। बड़ी दूरी नहीं है पर वाद्यवृन्दों के हृदयहारी संगीत को पद-पद पर रूक-रूककर बजाया जाता है, इसमें कई घण्टे लगते हैं। इसे 'मेलम' कहते हैं।

मेलम की चर्चा में केरल के खास तालवाद्यों और सुक्षिरवाद्यों का उल्लेख करना चाहिए। सबसे लोकप्रिय और गंभीर नाद वाला चेण्डा है। यह आम लोगों का भी बाजा है। सरकारी नीलामी की सूचना से लेकर हर प्रचार में चेण्डा चलता है। किंतु कला की दृटि से चेण्डा का जादू देखना हो तो पूरम आयें। जब बीसियों कलाकार आमने-सामने खड़े होकर सम्मिलित रूप से निश्चित तालक्रम से बेण्डा पर अपनी ऊंगलियों से नाद प्रपंच रचते हैं तब पश्चिमी आर्केस्ट्रा फीका लगता है। चेण्डावादन में पारंगत कलाकार इसका नेतृत्व करते हैं। चेण्डा का "तायम्पका" एक विशेष दक्षता मांगता है। मुख्य वादक वाधों का प्रयोग चेंडक्कोल (छोटी लकड़ी) और ऊंगलियों से करता है। साक्षी नियमित ताल पर संगत देवे हैं। इसमें गति बढ़ाने, टेड़ा करने आदि की कला प्रदर्शित की जाती है। विलंचित मंद्र नाद से शुरू करके तेजी बढ़ाते-बढ़ाते द्रुतकाल में घनगर्जन करते कलाकार श्रोताओं को पुलकित करते हैं।

पारमेक्कावु की शोभायात्रा दोपहर को बारह बजे अपने मंदिर के प्रांगण से निकलकर धीरे-धीरे शाम तक शिवमंदिर के प्रांगण में नियत स्थान पर पहुंचती है। तिरूवम्पाटी की शोभायात्रा अपने नियत पथ से बढ़ती है। उसका पंचवाद्य कानों को नादामृत पिलाता है। केरल में पांच वाद्यों का एक समवाय है-तिभिला, मद्दलम, इहक्का, कुषल और कॉयू भी। मंदिर के ये विशिष्ट वाद्य वैसे प्रायः सभी मंदिरों में होते हैं। किंतु पंचवाद्यम का कलापूर्ण प्रयोग कम कलाकार कर पाते हैं। चेण्डा का असुरगर्जन नहीं-मदलम का मधुर गर्जन और तिमिला का तालवाद्य वादन तथा बीच में इडक्का का मधुर नाद संग मिलकर जो नाद प्रस्तुत करते हैं यह अनुपम है। हजारों लोग उसका अनुमोदन ताल देते, हाथ हिलाते और तरह-तरह से करते हैं।

जब शाम तक दोनों शिवमंदिर के सामने पहुंचते हैं तब उस स्थान पर भी वाद्यों का सम्मिलित वाद्य प्रयोगों की कई शैलियां होती हैं। घरों तक दोनों दलों के कलाकार एक दूसरे को अपनी कला से मात करने पर तुले रहते हैं। इसका आनंद जैसे सहृदय दर्शक श्रोता लेते हैं वैसे गजराज भी वाद्यसंगीत का मजा लेता है। वह खुश होने पर अपने कान झुलाकर अभिनंदन प्रकट करता है।

पूरा दिन तपने के बाद सूरज जब अस्ताचल को अरूण बनाते विदा लेने लगते हैं तब दोनों दलों के गजराजों का गुडमाट्टम (छातों का बदलाव) नामक रोमांचक कार्यक्रम होता है। पंक्ति में खड़े पंद्रह हाथियों के रेशमी छाते बदले जाते हैं। इसके लिए वे विविध रंगों के छाते सुरक्षित रखते हैं। एक दल के सारे हाथियों ने अगर हरा छाता तान दिया तो उसकी प्रतियोगिता में अगली बारी दूसरे दल की है। उसके 15 हाथी दूसरे रंग का छाता तानते हैं। संध्या को किरणों की ज्योति में ये छाता परिवर्तन के दृश्य नयनों का महोत्सव प्रस्तुत करते हैं। यह करीब घंटाभर चलता है। इस कार्यक्रम के बाद दोनों दलों के हाथी शिवजी की वंदना करके अपने-अपने स्थान को लौटते हैं।

दो घंटे के अंतराल के बाद शिवमंदिर के प्रांगण में हाथियों की शोभायात्रा फिर से आ जाती है। अब पूरा मैदान तेल से जलती मशालों को ज्योत्ति से ज्योतिर्मय रहता है। बिजली को अभी आने नहीं दिया है। फिर वही वाद्यमेलम चलता है। सवफा क्रम नियत है। उस परंपरा का उल्लंघन नहीं होता। करीब बारह बजे तक यह मोहक दृश्य जारी रहता है। उसके बाद सब कुछ देर के लिए विदा होते हैं।

रात को करीब 3.00 बजे दोनों दलों के प्रतिनिधि आतिशबाजी के विविध चमत्कार दिखाते हैं। तृश्शूर पूरम का पूरा आनंद पाना हो तो यह आतिशबाजी देखनी चाहिए। केवल आतिशबाजी देखने लोग रातभर जागते हैं। कुछ लोग केवल आतिशबाजी देखने दूर-दूर से आते हैं। दोनों दलों (देवस्वों) के प्रतिनिधि उत्सव से महीनों पहले ही आतिशबाजी की तैयारी में लग जाते हैं। इसमें भी एक दल दूसरे दल को मात करना चाहता है। कहते हैं कि पहले किसी-किसी साल में यह वैर-भाव खतरे में समाप्त होता था। तब से सरकार ने आतिशबाजी को कठोर अनुशासन के भीतर आयोजित कराती है। फिर भी मानव मन अपनी इच्छा के पीछे चलता है। आतिशबाजी के लिए स्थान सुरक्षित रखा जाता है। उसके चारों ओर विशाल पेरा बनाकर लोगों को हटाया जाता है।

कहते हैं कि प्रारंभ में तृश्शूर की आतिशबाजी भी सामान्य होती थी। लेकिन एक साल आतिशबाजी के एक ईसाई ठेकेदार को चीनी पटाखे और कई नुसखे मिले। दूसरे साल से यह चमत्कार करने लगा। उल्लेखनीय है कि इस हिन्दू मंदिर की आतिशबाजी के ठेकेदारों में ईसाइयों की संख्या अच्छी रही है। यह धार्मिक समन्वय अभिनंदनीय है।

आतिशबाजी के चमत्कार को शब्दों में बताना असंभव है। कभी बिजली को नीचा दिखाता प्रकाश बिखेरता हुआ बीर धमाका होता है, कभी आकाश से फूलों की सी वर्षा होती है। कभी कई स्तरों पर अनार छोड़े जाते हैं। कभी किसी अनार से छोटी कागज की छतरियां नीचे गिरती हैं। कभी सम्मिलित धड़ाकों की एक माला सी सुनाई देती है। क्यों न आप स्वयं यह सब सुनकर आनंद उठायें ?

पूरम की कई विशेषताओं में मुख्य बात यह है कि यह मंदिर के बाहर खुले मैदान में चलता है। इसलिए सभी धर्मों के लोग किसी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के बिना भाग लेते हैं। आतिशबाजी में ईसाई परिवार विशेष कुशल हैं। यद्यपि मंदिर के प्रांगण के कार्यक्रम ही इसके मुख्य अंग हैं तो भी पूरम पूरे तृश्शूर नगर का उत्सव होता है। पूरम के कई दिन पहले से तृश्शूर वाले पुरम के लिए घर आते हैं। दृश्य देखने मेहमान व रिश्तेदार आते हैं। बाजार में पूरम की खरीद अलग होती है। व्यापारी लोग जरूर इस मौके से पूरा फायदा उठाते हैं और आप नगर को शाप देने लगते हैं। फिर भी पूरम का मोहक अनुभव आप को फिर से खींच लाता है।

तृश्शूर पूरम की औपचारिक समापन दूसरे दिन दोपहर को होता है। सभी दर्शक अगले साल के पूरम की कल्पना करते लौटते हैं। पूरम की देन बहुमुखी है। स्थानीय छोटे व्यापारियों को भी पूरम की खरीदारी से लाभ होता है। सबसे बढ़कर सैकड़ों वाद्य कलाकारों का जीवन निर्वाह होता है। तृश्शूर की देखादेखी अनेक मंदिरों में छोटे-छोटे उत्सव होते हैं। इन सब में हाथी और वाद्यवृन्द की भूमिका रहती है, आतिशबाजी की भी। उत्सव के अंग रूप में कई प्रकार के लोकगीतों, लोकनृत्यों की प्रस्तुति होती है।

वैश्वीकरण की अंधी दौड़ तूफान की तरह स्थानीय, ग्रामीण और जातोय कलाओं पर कहर बाती चल रही है। ऐसे घाव से कुछ न कुछ बचाव देने वाले तुश्यशूर पूरम जैसे उत्सवों की जय मनायें।

 डा. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर
मधुर नाद और मंगल ज्योति का केरलीय उत्सव-तृश्शूर पूरम
"संस्कृति:अंक-04"

 

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