जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर
February 10, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का पावन चरित्र किसी एक देश की भौगोलिक सीमा या किसी एक सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है। वरिष्ठ इतिहासकार ललित शर्मा जी का यह लेख श्रीरामकथा की उसी विश्वव्यापी लोकप्रियता को उद्घाटित करता है। लेखक ने इस लेख में यह बतलाया किया है कि कैसे रामायण ने दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर पश्चिम के देशों तक अपनी गहरी सांस्कृतिक छाप छोड़ी है। इस्लामिक विचारकों और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा राम के आदर्शों की भावपूर्ण स्वीकारोक्ति यह प्रमाणित करती है कि श्रीराम केवल भारत के नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के महानतम सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सेतु हैं।
रामायण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श चरित्र की वह पावन कथा है जो अनेक युगों से एक प्रचंड प्रेरक शक्ति के रूप में भारतीय संस्कृति को आदर्शोन्मुख दिशा की ओर प्रवृत्त किए हुए है। आदिकवि वाल्मीकि ने जहाँ देवभाषा संस्कृत में इसका आदि संकलन किया, वहीं गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के रूप में इस कथा को जन-जन के बीच अत्यधिक लोकप्रिय बनाया।

रामादर्श को शब्दरुप में लाने वाले महर्षि वाल्मीकि व तुलसीदासजी
महाकवि कम्बन द्वारा रचित रामायण के रूप में इसने दक्षिण भारत में अगाध लोकप्रियता पाई। इस तरह नाना भाषाओं में इस पावन श्रीरामकथा के भाषान्तरण के साथ भारतवर्ष में यह इतनी लोकप्रिय हुई है कि यहाँ घर-घर में बसे हैं श्रीराम की उक्ति पूर्णतः चरितार्थ होती है।
श्रीरामकथा अर्थात् रामायण कथा की अपार लोकप्रियता का मूल कारण इसमें निहित जीवन की समग्रता का बोध है। इसमें पाठक, श्रोता एवं दर्शक को आदर्श तथा व्यवहार का, लौकिकता एवं अलौकिकता का, काम, अर्थ एवं धर्म मोक्ष का ज्ञान और निर्मल भक्ति का अत्यन्त सुन्दर संयोग मिलता है। जीवन के हर पक्ष को छूते इसके उदात्त आदर्श पात्रों के प्रेरक प्रसंगों में दिशा निर्धारक दृष्टि सहज ही प्राप्त हो जाती है।
अतिपावन श्रीरामकथा वस्तुतः मानवीय जीवन के समस्त पाप-ताप, दुःख और दारिद्र्य एवं संकटों को हरने वाली है। दशहरे के पावन पर्व पर तो इसकी महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। दशहरा असुरता के प्रतीक रावण के वध और संस्कृति की प्रतीक माता सीता की स्वतन्त्रता के साथ अधर्म के नाश व धर्म की स्थापना का विराट उद्घोषक पर्व है। नवरात्र की शक्तिपूजा के बाद इस पर्व की स्थिति इसे और भी विशिष्ट रूप प्रदान करती है।
महर्षि शुक्राचार्य कृत शुक्रनीति के अनुसार दस प्रकार के पाप बताए गए हैं जिनमें हत्या या किसी को कष्ट पहुंचाना, चोरी करना, अवैध आचरण, चुगलखोरी, कटुवचन, मिथ्याकथन, भेदवार्ता से हृदय विदारण, विनयहीनता दिखाना, नास्तिकता तथा शास्त्र विरुद्ध आचरण सम्मिलित हैं। यदि गहराई से देखा जाए तो वास्तव में पाप ही जीवन को दुःख, रोग और संतापमय बनाने का मूल कारण है।
दशहरे में भक्तिभाव से पूर्ण किया गया श्रीरामकथा का श्रवण, दर्शन एवं पारायण मानव को इन दस पापों से सर्वथा मुक्त करने वाला है। श्रीरामकथा की इसी अद्भुत विशेषता के कारण ही यह केवल भारतवर्ष में ही नहीं, बल्कि विश्व के हर कोने में लोकप्रिय होती गई और आज इसका स्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार लिए हुए है।

विश्वव्यापी है रामकथा
दक्षिण-पूर्व एशिया में थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि से लेकर मध्य एशिया, चीन तक व यूरोप, रूस से लेकर फ्रांस, इंग्लैंड तथा अमेरिका में इसके विश्वव्यापी विस्तार के स्पष्ट दिग्दर्शन किए जा सकते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीरामकथा किस कदर जनजीवन में व्याप्त है और वहाँ के सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित कर रही है, यह अत्यन्त अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है।
विश्व के इस भूखंड ने श्रीराम और उनके देश की संस्कृति को भली-भांति समझा और उसकी महत्ता स्वीकार की है। थाईलैंड इसका एक जीवन्त उदाहरण है। इसके सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में श्रीराम पूर्णतः समरस हैं। इस देश में कहीं भी श्रीराम और भगवान बुद्ध के बीच कोई पृथकता की रेखा नहीं है। यहाँ के जनजीवन में दोनों का सुन्दर सहअस्तित्व दृष्टिगोचर होता है।

थाईलैंड में राम और बुद्ध है एक-दूसरे के पर्याय
इसका सबसे बड़ा उदाहरण बैंकाक स्थित शाही बुद्ध मन्दिर है, जिसमें नीलम की मूर्ति स्थापित है। इस मन्दिर की दीवारों पर सम्पूर्ण श्रीरामकथा को उकेरा गया है। इस देश की अपनी रामायण रामकियेन है, जिसके रचयिता नरेश राम प्रथम थे। उन्हीं के वंश के नरेश राम नवम् वर्तमान में देश के शासक हैं। श्रीरामकथा यहाँ के लोकजीवन में इतनी रची-बसी है कि थाईवासियों का यह दृढ़ विश्वास है कि रामायण की घटनाएं उनके देश में ही घटी थीं। थाईलैंड में एक अयोध्या और लवपुरी भी है।
थाईलैंड की तरह कम्बोडिया भी श्रीराम के महत्त्व का जीता-जागता प्रमाण है। अंगकोरवाट जो दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक है, वहाँ बुद्ध, शिव, विष्णु और श्रीराम आदि सभी भारतीय देवों की मूर्तियां पाई जाती हैं। अंगकोरवाट में श्रीरामकथा के अनेक प्रसंग दीवारों पर उत्कीर्ण किए गए हैं। इसी तरह लाओस और म्यांमार जैसे देशों के जीवन में भी श्रीरामकथा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
इंडोनेशिया में श्रीरामकथा की लोकप्रियता अत्यन्त उल्लेखनीय है। यहाँ चाहे बाली का हिन्दू हो या जावा-सुमात्रा का मुसलमान, दोनों ही श्रीराम को अपना राष्ट्रीय महापुरुष और श्रीराम साहित्य को अपनी सांस्कृतिक धरोहर समझते हैं। जोगजाकर्ता से दूर स्थित प्रम्बनान का मन्दिर इस बात का साक्षी है, जिसकी प्रस्तर भित्ति पर सम्पूर्ण श्रीरामकथा उत्कीर्ण है।
जावा की सबसे बड़ी नदी का नाम सरयू है और वहाँ रामायण के प्रसंगों पर कठपुतलियों का नृत्य बहुत प्रसिद्ध है। सुमात्रा द्वीप का नाम रामायण में स्वर्णभूमि के रूप में उल्लिखित किया गया है। मलेशिया में भी रामायण मनोरंजन का अच्छा माध्यम है जहाँ चमड़े की पुतलियों द्वारा रात्रि में रामायण के प्रसंग दिखाए जाते हैं।

रामायण के प्रसंगों पर आधारित वायांग कुलीट(कठपुतली नृत्य- जावा)
रामायण का विस्तार जहाँ दक्षिण-पूर्व एशिया में सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के रूप में हुआ है, वहीं यूरोप एवं अमेरिका में इसकी पृष्ठभूमि प्रमुखतः साहित्यिक रही है। यूरोपीय देशों व अमेरिका के विश्वविद्यालयों में इसका पठन-पाठन स्थानीय विद्वानों द्वारा किया गया। देवभाषा संस्कृत के पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों में स्थान मिलने के कारण वाल्मीकि रामायण से उनका परिचय शताब्दियों पूर्व ही हो गया था, किन्तु रामचरितमानस के प्रति पश्चिमी देशों का रूझान पिछली शताब्दी से ही अधिक आरम्भ होता है।
फ्रांसीसी विद्वान गार्सादतासी ने रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का अनुवाद किया था। रूसी भाषा में मानस का अनुवाद करके अलेक्साई वारान्निकोव ने भारत और रूस की सांस्कृतिक मैत्री की सबसे सशक्त आधारशिला रखी थी। चीन में वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों का पद्यानुवाद हो चुका है। डच, जर्मन, स्पेनिश और जापानी आदि भाषाओं में भी श्रीरामकथा का अनुवाद हो चुका है।
फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद व हॉलैंड को श्रीरामकथा ने ही भारतवर्ष से अब तक जोड़े रखा है। यह पुनीत कार्य हमारे उन अप्रवासी भाईयों ने किया जो वर्षों पूर्व श्रीरामकथा को अपने हृदय में लेकर देश छोड़कर गए थे। विदेशी संस्कृति में रामायण कालीन संस्कारों का भारी प्राचुर्य है। पेरू देश में राजा स्वयं को सूर्यवंशी ही नहीं वरन् कौशल्यासुत राम का वंशज भी मानते हैं।

विविध भाषाओ में अनुवादित है रामायण
भारतीय साहित्य में इस्लामी कवियों और साहित्यकारों में श्रीराम के व्यक्तित्व का आकर्षण भी खूब मुखर हुआ है। अब्दुल रहीम खानखाना श्रीरामचरितमानस में वर्णित श्रीराम के आख्यान से बहुत अधिक प्रभावित थे, तभी उन्होंने इसकी तुलना कुरान से की थी। अल्लामा इकबाल ने श्रीराम का महिमा मंडन किया और कहा था कि सम्पूर्ण भारत को श्रीराम के व्यक्तित्व पर बहुत गर्व है।
शाह अब्दुल लतीफ ने कहा था कि भगवान श्रीराम उन भद्र लोगों के हृदय में विद्यमान हैं जो त्यागी हैं। सूफी रोहल फकीर ने कहा कि श्रीराम की भक्ति के रंग में रंगे हुए भक्तों ने अपने शरीर, मन, धन और शीश सब कुछ उनके चरणों में समर्पित कर दिया है।
डॉ. सत्यव्रत शास्त्री के अनुसार मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया में रामलीला को राज्याश्रय प्राप्त है। राष्ट्रपति सुकर्णो के समय जब पाकिस्तान का एक प्रतिनिधि मंडल इंडोनेशिया की यात्रा पर था, तब उन्हें वहाँ रामलीला देखने का अवसर मिला। वे इस बात से अत्यन्त हैरान थे कि एक मुस्लिम देश में रामलीला का मंचन क्यों किया जाता है। इस बारे में जब उन्होंने राष्ट्रपति से सवाल किया तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया, "हमने अपना धर्म बदला है अपने संस्कार नहीं।"
दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में रामकथा में आए बदलावों का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट होता है कि थाई रामायण में हनुमान का पात्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जो रावण की सभी चालों को विफल कर देते हैं। जब हनुमान श्रीराम के निर्देशन में वानरों से सागर पर पुल बनवाने लगते हैं, तो रावण उन्हें रोकने के लिए अपनी पुत्री सुवर्णमत्स्या को भेजता है कि वह पत्थरों को रातों-रात हटा दे।
सुवर्णमत्स्या ऐसा ही करती है। जब हनुमान खुद पहरेदारी करते हैं और सुवर्णमत्स्या को रंगे हाथों पकड़ लेते हैं, तो वह उससे कहते हैं कि यदि पिता कोई अनुचित काम करता है तो पुत्री को उसमें शामिल नहीं होना चाहिए। इस बात से प्रभावित होकर सुवर्णमत्स्या लौट जाती है।

सुवर्णमत्स्या को समझाते हुए हनुमान जी
श्रीरामकथा की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विशेषताएं इस कथा को विश्वव्यापी लोकप्रियता दिलाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। नवरात्र में किया गया इसका श्रद्धापूर्वक विधिवत पारायण या कथा श्रवण दस पाप-तापों के हरण के साथ-साथ दशहरे के नाम की सार्थकता सिद्ध करने वाला है।
श्रीरामकथा की इस विशेषता से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। इसमें मानवीय जीवन को आनन्द और शान्ति के साथ जीने की वे सारी विशेषताएं सन्निहित हैं जो प्रत्येक संसारवासी के लिये नितान्त आवश्यक हैं।

-ललित शर्मा
(लेखक प्रतिष्ठित इतिहासकार, पुराविद, मुद्राशास्त्रज्ञ व शोधकर्त्ता हैं। वे राजस्थान एवं मालवा समेत भारत के ऐतिहासिक व पुरातात्विक विमर्श के क्षेत्र में कार्यरत हैं।)
श्रीरामकथा की विश्वव्यापी लोकप्रियता
April 02, 2026