आस्था के अनूठे स्वरूप में कोटा के खड़े गणेश जी
September 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार
नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा में कोटा का स्थान केवल राजपूत शौर्य, दुर्ग, महलों और विशिष्ट चित्रकला शैली के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहाँ भक्ति, चित्रकला और धार्मिक आस्था के अद्भुत समन्वय की एक विशिष्ट परम्परा भी विकसित हुई। कोटा को जिस प्रकार चम्बल की धरती, हाड़ा शासकों और कोटा चित्रशैली के लिए जाना जाता है, उसी प्रकार यह वल्लभ सम्प्रदाय की प्रथम पीठ श्री मथुराधीश जी के कारण कृष्णभक्ति की महत्वपूर्ण भूमि भी रहा है। राजस्थान पर्यटन विभाग भी पाटनपोल स्थित मथुराधीश मंदिर को प्रथम वल्लभपीठ बताते हुए कोटा को रियासतकाल से कृष्णभक्ति का प्रमुख केंद्र मानता है।
कोटा की इसी कृष्णभक्तिमय चेतना ने यहाँ की चित्रकला को केवल सौंदर्याभिव्यक्ति न रहने देकर उसे उपासना और आराधना का माध्यम बना दिया। उपलब्ध सामग्री के अनुसार, कोटा में वल्लभ सम्प्रदाय की जड़ें मजबूत होने के साथ अनेक वैष्णव मंदिरों का निर्माण हुआ फूलबिहारी जी मंदिर, मथुराधीश मंदिर और महाप्रभु जी का मंदिर आदि। इस धार्मिक वातावरण ने कोटा की चित्रकला के विषय, स्वरूप और प्रयोजन को गहराई से प्रभावित किया।
भारतीय धार्मिक परम्परा में देवता की धातु, पत्थर अथवा काष्ठ की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा की परम्परा प्राचीन रही है। परंतु कोटा की वल्लभ सम्प्रदाय-प्रभावित परम्परा का एक विशेष पक्ष यह रहा कि भगवान के चित्र को भी केवल कलाकृति न मानकर आराध्य स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित करने की धारणा विकसित हुई। वल्लभाचार्य द्वारा ऐसी नवीन परम्परा का आरम्भ किया गया जिसमें भगवान के चित्रों को भी मंत्रोच्चार द्वारा प्रतिष्ठित किया जाने लगा और उन्हें सम्मानपूर्वक ‘चित्र जी’ कहकर संबोधित किया जाता था। यह तथ्य कोटा की चित्रकला के इतिहास को एक विशिष्ट आयाम प्रदान करता है। यहाँ चित्रकार की तूलिका से निर्मित कृष्ण केवल देखने की वस्तु नहीं थे; वे भक्ति के अनुभव का केंद्र बन सकते थे। इसीलिए कोटा में चित्र और पूजा के बीच की सीमा बहुत हद तक समाप्त होती दिखाई देती है। चित्र में अंकित कृष्ण भक्त के लिए कृष्ण की लीला, स्वरूप और सान्निध्य का माध्यम बन जाते थे। इसी भाव को पुष्टिमार्ग की मूल अवधारणा ‘सेवा’ से भी जोड़ा जा सकता है। वल्लभ परम्परा में भगवान को बालस्वरूप में मानकर दैनिक जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़ी सेवा की जाती है। इस परम्परा में मंदिर को सामान्य अर्थों में केवल ‘मंदिर’ न कहकर ‘हवेली’ कहने की परम्परा भी विकसित हुई और वहाँ की संगीत परम्परा को ‘हवेली संगीत’ कहा जाता है।
कोटा के शासकों पर वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव बढ़ने के साथ चित्रकला के विषयों में भी परिवर्तन आया। कोटा शैली में जहाँ आखेट, दरबारी जीवन, प्रकृति और राजसी वैभव के दृश्य महत्वपूर्ण रहे, वहीं कृष्णलीला और वैष्णव विषयों को भी प्रमुख स्थान मिला। कला-संबंधी स्रोतों में महाराव भीमसिंह प्रथम के समय वल्लभ सम्प्रदाय के प्रभाव तथा कृष्ण विषयक चित्रों की वृद्धि का उल्लेख मिलता है। इस धार्मिक प्रभाव का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि कृष्ण कोटा चित्रकला के प्रमुख नायक बन गए। कृष्ण का श्यामवर्ण, पीताम्बर, मुरली, गोपियों के साथ रास, गोवर्धन धारण, कालियादमन, ग्वाल-बालों के साथ उनकी लीलाएँ और ब्रज का प्राकृतिक परिवेश इन सबने चित्रकारों को धार्मिक अनुभूति को दृश्य रूप देने का अवसर दिया।
उपलब्ध सामग्री के अनुसार कोटा के गढ़ में चार प्रमुख प्रकार के वैष्णव चित्रांकन की परम्परा दिखाई देती है श्रीनाथ जी, ब्रजनाथ जी, कृष्ण-लीलाएँ तथा धार्मिक अवतारों और उत्सवों का चित्रण। साथ ही चित्रोपासना की परम्परा में कोटा के अनेक शासकों का योगदान उल्लेखनीय रहा।
श्रीनाथजी से मथुरेशजी तक : चित्रों में जीवित भक्ति
कोटा की चित्रकला में श्रीनाथजी, ब्रजनाथजी और मथुरेशजी जैसे वैष्णव आराध्यों का अंकन केवल धार्मिक विषय का चित्रण नहीं था। इन चित्रों में भक्त और भगवान के संबंध को दृश्य रूप दिया गया। कृष्ण के श्यामवर्ण को आकाश की अनंतता का प्रतीक और उनके पीतवस्त्र को ज्योति का द्योतक मानने की व्याख्या भी उपलब्ध सामग्री में मिलती है। यही कारण है कि कोटा की कृष्ण-प्रधान चित्रकला में रंग स्वयं प्रतीकात्मक भाषा बन जाते हैं। श्याम रंग कृष्ण के दिव्य स्वरूप का, पीला रंग प्रकाश और ऊर्जा का तथा हरा रंग ब्रज की प्रकृति और जीवन का बोध कराता है। इस प्रकार चित्रकला में रंग केवल सौंदर्य नहीं रचते, बल्कि धार्मिक भावभूमि भी निर्मित करते हैं।
कोटा की चित्रपूजा परम्परा को समझने के लिए कोटा गढ़ के भित्तिचित्रों का विशेष महत्व है। राजमहल और अन्य राजकीय भवनों की दीवारें केवल सजावट के लिए नहीं थीं; वे तत्कालीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का दृश्य दस्तावेज भी थीं। कोटा के महलों और हवेलियों में भित्तिचित्रों की समृद्ध परम्परा रही है और कोटा चित्रशैली के महत्वपूर्ण उदाहरण राजमहल, देवता जी की हवेली तथा झाला जी की हवेली आदि में मिलते हैं। विशेष रूप से बड़ा महल, अर्जुन महल, लक्ष्मी भंडार की तिबारी और कंवरपदा की ड्योढ़ी को 1720–1800 ई. के बीच चित्रोपासना और चित्रांकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है। इस प्रकार महल की दीवारें एक प्रकार से धार्मिक आख्यानों की खुली पुस्तक बन गई थीं। जहाँ एक ओर शासक का राजसी जीवन अंकित था, वहीं दूसरी ओर कृष्ण की लीलाएँ, धार्मिक उत्सव और वैष्णव आराध्य चित्रित थे। दर्शक जब इन चित्रों के सामने आता था तो वह केवल कला का अवलोकन नहीं करता था, बल्कि उस दृश्य संसार के माध्यम से धार्मिक कथा और भक्ति से जुड़ता था।
मंदिर, पिछवाई और चित्रपूजा
वल्लभ सम्प्रदाय की पूजा परम्परा में पिछवाई का विशेष महत्व है। देवता के पीछे लगाए जाने वाले वस्त्र अथवा चित्रपट पर कृष्ण की विभिन्न लीलाओं, ऋतुओं, उत्सवों और धार्मिक प्रसंगों का अंकन किया जाता है। इस परम्परा ने चित्रकला को सीधे मंदिर की सेवा से जोड़ दिया। वल्लभ परम्परा से संबंधित स्रोतों में भी कृष्ण की प्रतिमा के पीछे दीवार अथवा पर्दे पर बनाए जाने वाले चित्रों को ‘पिछवाई’ कहा गया है। कोटा में भी श्रीनाथजी, मथुरेशजी और कृष्ण-लीला से जुड़े चित्रों ने धार्मिक कला को समृद्ध किया। कोटा चित्रशैली के संबंध में उपलब्ध सामग्री यह बताती है कि मथुराधीश मंदिर की धार्मिक पृष्ठभूमि और वैष्णव प्रभाव ने कृष्ण-प्रधान चित्रांकन को प्रोत्साहन दिया। इस संदर्भ में चित्रपूजा और पिछवाई परम्परा के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध दिखाई देता है चित्र मंदिर के वातावरण को बदलता है, उत्सव के अनुरूप देवता के पीछे दृश्य संसार रचता है और भक्त के लिए दर्शन को अधिक अर्थपूर्ण बनाता है।
कोटा की चित्रपूजा परम्परा को केवल स्थिर चित्रों तक सीमित नहीं किया जा सकता। यहाँ जन्माष्टमी, नंद महोत्सव, अन्नकूट, होली और अन्य वैष्णव उत्सव धार्मिक जीवन के महत्वपूर्ण अंग रहे हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार मथुराधीश जी के प्रथम पीठ के अनुयायी देश-विदेश में हैं और जन्माष्टमी जैसे अवसरों पर बड़ी संख्या में कोटा आते हैं। इन उत्सवों ने चित्रकारों को कृष्ण के जीवन और ब्रज संस्कृति के विविध प्रसंगों को चित्रित करने के लिए विषय प्रदान किए। इसीलिए चित्रों में केवल कृष्ण की प्रतिमा नहीं, बल्कि कृष्ण का पूरा सांस्कृतिक संसार दिखाई देता है गोपियाँ, ग्वाल-बाल, गायें, वृक्ष, यमुना, उत्सव, झूले, होली और ब्रज का प्राकृतिक परिवेश। इस दृष्टि से चित्रपूजा केवल पूजा की एक विधि नहीं थी, बल्कि स्मृति, कथा, कला और आस्था को सुरक्षित रखने की सांस्कृतिक व्यवस्था भी थी।

महाराव किशोर सिंह द्वितीय द्वारा बृजराज जी की पूजा
कोटा के शासकों की धार्मिक आस्था ने इस परम्परा को संरक्षण प्रदान किया। उपलब्ध सामग्री में महाराव अर्जुन सिंह, महाराव दुर्जनसाल, महाराव अजीतसिंह, महाराव शत्रुसाल प्रथम, महाराव गुमानसिंह तथा महाराव उम्मेदसिंह आदि के चित्रोपासना संबंधी योगदान का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से 18वीं शताब्दी में कोटा की चित्रकला ने धार्मिक और राजकीय दोनों विषयों को अपने भीतर समाहित किया। यही वह समय था जब कोटा चित्रशैली ने अपनी विशिष्ट पहचान विकसित की। एक ओर शिकार और राजसी जीवन को चित्रित किया गया, तो दूसरी ओर कृष्णभक्ति और धार्मिक आख्यानों को भी समान कलात्मक महत्त्व मिला। कोटा शैली के विकास में महाराव उम्मेदसिंह के काल को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
‘नंदगाँव’ के रूप में कोटा की सांस्कृतिक पहचान
कोटा के महाराव भीमसिंह प्रथम द्वारा कृष्ण भक्ति से प्रेरित होकर स्वयं को कृष्णदास संज्ञापित किया गया वहीं कोटा नंदगांव और शेरगढ़ को बरसाना से विभूषित किया गया तभी से कोटा के पाटनपोल स्थित मथुराधीश मंदिर के आसपास का धार्मिक वातावरण इतना गहरा कृष्णमय रहा कि इस क्षेत्र को ‘कोटा का छोटा नंदगाँव’ भी कहा गया है। यहाँ वर्ष भर वैष्णव परम्परा के अनुसार उत्सवों का आयोजन होता रहा है और अन्नकूट, नंद महोत्सव तथा होली जैसे पर्व विशेष उत्साह से मनाए जाते हैं। यह उपमा केवल धार्मिक भावुकता नहीं, बल्कि कोटा की सांस्कृतिक संरचना को समझने का एक उपयोगी संकेत है। जिस प्रकार ब्रज में कृष्ण की लीला ने लोकजीवन, संगीत, चित्रकला और उत्सवों को प्रभावित किया, उसी प्रकार कोटा में मथुराधीश जी की उपस्थिति ने शहर के धार्मिक और कलात्मक जीवन को कृष्णमय रंग प्रदान किया।
आज जब सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से कोटा की नई पहचान निर्मित की जा रही है, तब इस चित्रपूजा परम्परा को केवल अतीत की कला के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे हाड़ौती की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझने की आवश्यकता है।
राजस्थान सरकार के स्तर पर मथुराधीश मंदिर कॉरिडोर के विकास की योजना इसी व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व को नई दिशा देती है। राजस्थान विधानसभा के अभिलेख में मंदिर कॉरिडोर एवं हेरिटेज विकास कार्यों के लिए लगभग 66.57 करोड़ रुपये की DPR तैयार किए जाने का उल्लेख है। फरवरी 2026 में कॉरिडोर के प्रथम चरण का शिलान्यास भी हुआ, जिसमें सड़क चौड़ीकरण, परिक्रमा मार्ग के सौंदर्यीकरण, पार्किंग और यात्रियों के लिए सुविधाओं जैसे कार्य शामिल बताए गए।
कोटा की चित्रपूजा परम्परा भारतीय संस्कृति में चित्र और चेतना के अद्भुत संबंध को सामने लाती है। यहाँ चित्र केवल रंग और रेखाओं का संयोजन नहीं रहा; वह भक्त और भगवान के बीच संवाद का माध्यम बना। वल्लभ सम्प्रदाय की कृष्णभक्ति, मथुराधीश जी की प्रथम पीठ, हवेली संस्कृति, पिछवाई, भित्तिचित्र, कृष्णलीला और राजकीय संरक्षण इन सभी ने मिलकर कोटा को एक विशिष्ट चित्र-आधारित धार्मिक संस्कृति प्रदान की। इस परम्परा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ कला पूजा में परिवर्तित हुई और पूजा ने कला को जीवंत बनाए रखा। चित्रकार की तूलिका से जन्मा कृष्ण भक्त के लिए केवल चित्र नहीं था वह ‘चित्र जी’ था। यही भाव कोटा की चित्रकला को राजस्थान की अन्य चित्र परम्पराओं से एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करता है। उपलब्ध स्रोत में वर्णित चित्रोपासना की यह परम्परा आज कोटा की धार्मिक, कलात्मक और पर्यटन-विरासत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है “जहाँ तूलिका ने केवल कृष्ण को चित्रित नहीं किया, बल्कि रंगों में उनकी उपस्थिति को प्रतिष्ठित किया वही है कोटा की चित्रपूजा की विशिष्ट परम्परा।”
लेख:
डॉ नेहा प्रधान
कोटा, राजस्थान
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