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भारतीयता की पहचान

भारतीयता की पहचान

किसी भी देश व अंचल के निवासियों की असली पहचान उनकी भाषा वा वेष-भूषा से नहीं बनती। वह बनती है मूल्यों तथा सांस्कृतिक विशेषताओं से। कुछ मूल्य तो सार्वभौमिक हैं जिनमें मानव समाज द्वारा सहस्राब्दियों के चिन्तन और अनुभव के आधार पर स्थापित व्यक्तिगत गुणों के आदर्श तथा सामाजिक आचरण के मानदण्ड सम्मिलित है। सत्यनिष्ठा, दया, परोपकार, कर्त्तव्य, परायणता जैसे गुण इसी श्रेणी में आते हैं जो देश-काल से अतीत हैं।

इनके आधार पर मानव समुदाय विभिन्न वर्गों अथवा विभिन्न देशों में अन्तर नहीं खोजा जा सकता इस अन्तर की खोज सम्भव है केवल विभिन्न देशों की सांस्कृतिक विशेषताओं या परम्पराओं के आधार पर। अतः भारतीयता की पहचान का अर्थ है भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों अथवा भारतीय परम्परा का अन्वेषण।भारतीय परम्परा के सन्दर्भ में किसी विद्वान ने उसके मूल स्वरों की बात की है।

यह अत्यन्त सार्थक प्रयोग है क्योंकि परम्परा के ये मूल स्वर कभी वैदिक ऋचाओं के रूप में गूंजे, तो कभी गीता के श्लोकों में, कभी रामचरित मानस की चौपाइयों में, तो कभी सूफी सन्तों की बानियों या गीतांजलि के पदों में। इन स्वरों में जो सर्वोपरि स्वर सहस्त्रों वर्षों से अनवरत गूँजता चला आ रहा है वह है सत्य अथवा आत्यान्तिक सत्ता की तलाश का। इस तलाश की परिणति हुई सत्य के स्वरूप, चिन्तन और धर्म की अवधारणा में तथा इस उपलब्धि में सत्य और धर्म का शाश्वत सम्बन्ध है।

भारतीय चेतना ने बहुत पहले इस बात की उपलब्धि कर ली थी कि दृश्यमान जगत विभिन्नताओं और विसंगतियों से भरा हुआ है किन्तु सारे अस्तित्व के मूल में एक परम सत्य है जो नित्य है, शाश्वत है, अविभाज्य है। और जगत का सारा व्यापार धर्म से नियन्त्रित होता है। धर्म शब्द अंग्रेजी के Religion शब्द से सर्वथा भिन्न है। इसकी कल्पना बड़ी विशाल है। सारा जगत, जड़-चेतन, मनुष्य पशु सभी धर्म से बंधे हैं। इस प्रकार धर्म से जड़ चेतन सभी के स्वभाव का भी बोध होता है और बुद्धियुक्त मनुष्यों के कर्तव्याकर्तव्य का भी।

परम सत्य अलग-अलग लोगों को अलग-अलग रूप में दिखाई देता है-एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, पर वह है एक ही। इस सिद्धान्त की उपलब्धि भारत में वैचारिक दार्शनिक धरातल पर तो हुई ही है साथ ही सामाजिक व्यवहार के निर्देशक सिद्धान्त के रूप में भी इसे स्वीकार किया गया। इस सिद्धान्त का सीधा तात्पर्य यह है कि हर व्यक्ति स्वतन्त्र है अपना रास्ता चुनने के लिए। वह जो रास्ता चुनता है ।

वही उसका धर्म है। इस सिद्धान्त ने भारत में एक मूलभूत सहिष्णुता को जन्म दिया जिसके आधार पर भारत में अनेक धर्म, जातियाँ और भाषाएँ फली फूलीं। कभी भी एकरूपता का आग्रह नहीं किया गया। विविधता का सम्मान हुआ। धर्म और दर्शन के क्षेत्र को लें तो हम पाते हैं प्राचीन भारत में अनेक सम्प्रदायों और दर्शनों का जन्म हुआ। इनमें नास्तिक दर्शन भी था। अति अल्पसंख्यक नास्तिकों को भी भारतीय समाज में वही स्थान मिला जो बहुसंख्यक ईश्वर-वादियों या आस्तिकों को । सहिष्णुता भारतीय मानस की बहुत बड़ी पहचान है।

सहिष्णुता का ही परिणाम था कि भारत ने कभी भी आक्रमणकारी की भूमिका नहीं अपनायी। इस देश पर विदेशियों के अनेक आक्रमण हुए जिनसे इसने कभी सफलतापूर्वक जूझा तो कभी हार खायी। पर जब-जब भारत ने हार खायी उसने अन्ततः आक्रामको को आत्मसात् कर लिया। यह भारतीयता की ही शक्ति थी जिनके कारण भारत राजनीतिक रूप से पराजित होने पर भी सांस्कृतिक रूप से सदा विजयी होता रहा। भारतीयता आक्रामकता में नहीं, एकात्मता में है।

आक्रामक की मानसिकता से दूर होने के कारण इस देश के आदर्श पुरुष कभी भी चक्रवर्ती सम्राट् या विजेता सेनापति नहीं रहे। इस देश ने सर्वोच्च आदर और बद्धा सन्तों और महात्माओं को समर्पित की तथा पूजा के लिए भगवान के अवतारों की अवधारणा की। सन्तों ने हमें सहिष्णुता और स्वधर्मनिष्ठा के पाठ पड़ाये तथा अवतारों ने अन्याय का नाश कर धर्म की प्रतिष्ठा की। इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध विचारणीय है।

   

लोक-व्यवहार में सहिष्णुता की एक सीमा आवश्यक है अन्यथा सहिष्णुता की परिणति कायरता हो सकती है। हर व्यक्ति अपने कर्तव्याकर्तव्य का अपने धर्म का चयन करने के लिए स्वतन्त्र है। किन्तु यह भी आवश्यक है कि वह एक ऐसा रास्ता न चुनने लगे जिससे समाज में कुरूपताएँ या ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न होने लगे जो नाश की ओर अग्रसर करें। अतः मर्यादा आवश्यक है।

अमर्यादित व्यवहार वा आचरण अन्याय और अनीति को जन्म देता है और इसे सहन करने की अनुमति भारतीय परम्परा नहीं देती। इसे सहन करना सहिष्णुता के सिद्धान्त का विपर्यय तथा कायरता होगी। सहिष्णुता उसके प्रति होती है जो स्वधर्म में स्थित है: चाहे उसका 'धर्म' मेरे 'धर्म' से कितना ही भिन्न क्यों न हो। किन्तु यदि वह अमर्यादित है तो वह धर्म में स्थित हो ही नहीं सकता; वह धर्म से च्युत है अतः दण्ड का पात्र है।

अवतारों की कल्पना इसी सिद्धांत को उजागर करती है। सारे अवतार अधर्म या दुष्कृतों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए हुए। भारतीयता की पहचान अन्याय के विरोध से होती है। राम द्वारा रावण का वध हो, या अपने धर्म पर दृढ़ रहने के लिए सरमद का सूली पर चढ़ जाना सभी अन्याय से लड़ने के उदाहरण हैं। प्रसंगवश यह भी उल्लेख योग्य है कि अवतारों की सारगर्भित अवधारणा में ईश्वर को केवल मनुष्य रूप में अवतार लेते हुए नहीं माना गया है।

ईश्वर ने अवतार लिया है मत्रय, कच्छप और शुकर जैसे पशुओं के रूप में भी। सत्य एक है, ईश्वर एक है, सारा चराचर जगत एक उसी के कारण है अतः सर्वत्र उसी की सत्ता को देखना ही श्रेय है-इस बात का आभास हमें अवतारों की कल्पना कराती है। साथ ही मनुष्य में यह भाव होना कि वह जगत का केन्द्र तथा ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है, यह अहंकार भी अनुचित है। अरे, ईश्वर तो मछली के रूप में भी अवतार ले सकता है।

भारतीय परम्परा में आध्यात्मिक शक्ति को भौतिक अथवा सांसारिक शक्ति से हमेशा ऊँचा माना गया है क्योंकि इस परम्परा का मूलाधार आध्यात्मिक चिन्तन से बना है न कि शरीर चिन्तन से। शरीर-चिन्तन भौतिक सुख, ऐश्वर्य, राज्य आदि की ओर प्रवृत करता है और आध्यात्म-चिन्तन आत्मिक आनन्द की ओर। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि भारतीय परम्परा वैराग्यवादी रही है अथवा मनुष्य को संसार वा समाज से अलग करती है।

ऐसा कहना भारतीय परम्परा का विपर्यय होगा। आध्यात्मिकता का अर्थ संसार और जीवन से दूर होना नहीं वरन् उनकी वास्तविकता को समझाना और समझ कर धर्माचरण में प्रवृत्त होना है। आध्यात्मिकता भौतिक वास्तविकताओं को अस्वीकार करने में नहीं वरन् उनकी सीमाओं तथा मर्यादाओं को जानने में है। इसी कारण अनेक मनीषियों ने भारतीयता योग और भोग के समन्वय में देखी है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा जनक की कल्पना करती है जो विदेह थे, राजा होते हुए भी निर्लिप्त थे और ब्रह्मज्ञानी होते हुए भी राजा थे।

हर मनुष्य के लिए जीवन में ऐसा समन्वय लाना सम्भव नहीं। किन्तु इसके आधार पर परम्परा को अवास्तविक करार नहीं दिया जा सकता। ये परम्पराएँ आदर्श स्थिति की सूचक हैं जिन के लिए प्रयत्न करना श्रेयस्कर है। यह ध्रुव सत्य है कि आदर्श स्थिति तक बिरले ही पहुँच सकते हैं किन्तु महत्व इस बात का है कि ये आदर्श व्यक्ति तथा समाज को एक सूत्र में बांधते हैं तथा उस समाज की पहचान बनाते हैं। किसी समाज अथवा संस्कृति के लिए यह बात निर्विवाद रूप से लागू होती है।

जीवन में योग और भोग का समन्वय और फिर इस से भी ऊपर उठ कर परम सत्य का दर्शन कैसे हो इसके लिए भारतीय परम्परा गुरु की आवश्यकता पर बल देती है। ज्ञान वही दे सकता है जिस के पास स्वयं ज्ञान हो चाहे उसे वह ज्ञान दूसरे से मिला हो या स्वानुभव से। साधारण ज्ञान साधारण गुरु से मिल जाता है किन्तु परम ज्ञान के मार्ग पर वही ले जा सकता है जिसने उस ज्ञान का अनुभव स्वयं किया हो। गुरु ही उस ज्ञान को पाने की राह बता सकता है यद्यपि गुरु भी वह ज्ञान वाणी द्वारा नहीं बता सकता क्योंकि वह परम ज्ञान अनिर्वचनीय है।

भारतीयता की पहचान आध्यात्मिक परिचय से संश्लिष्ट है यह बात स्पष्ट हो चुकी है। लोक व्यवहार में इसका प्रतिफलन कैसे हुआ और उसमें भारतीयता कैसे परिलक्षित होती है यह अत्यन्त रोचक किन्तु अलग विषय है। इतना इंगित कर देना यथेष्ट होगा कि इस व्यावहारिक पक्ष में गुरु के प्रति निष्ठा, मातृ-पितृ भक्ति, अतिथि सत्कार जैसी अनेक बातें हैं जो स्थूल रूप से भारतीयता की पहचान निश्चित करती हैं।

न हि वेरेन वेरानि सम्मनतीध कदाचन। अवेरेन च सम्मन्ती एस धम्मो सनन्तनो।।
भगवान बुद्ध (धम्मपद से)
वैर से वैर कभी शान्त नहीं होता।
अवैर-वैर के त्याग से ही वैर का शमन सम्भव है।
यह सनातन धर्म है।

लेख
चन्द्रधर त्रिपाठी
ए-2/77, सफदरजंग एन्कलेव, नई दिल्ली-110029
संस्कृति संयुक्तांक 8/9

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