वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव
March 17, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख कृष्ण द्वादशी | गुरुवार
नक्षत्र: रेवती | योग: प्रीति | करण: तैतिल
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 मई 2026

विकास के क्रम में जब मानव घुमंतू जीवन छोड़ स्थाई जीवन जीने लगा तब “समाज” की अवधारणा अस्तित्व में आई और समाज के इस संगठित स्वरुप से बहुत सी नई और आवश्यक अवधारणाओं का उदय हुआ । विविध जीवन संस्कार, गोत्र परंपरा आदि सभी समाजों का अभिन्न हिस्सा बन गए और न्याय की संकल्पना भी साकार हुई । समाज में न्याय की संगठित प्रणाली का इतिहास कितना पुराना है यह जानने के लिए जब हम जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था का अध्ययन करते है तो विस्मित हो जाते हैं की यह समाज कितन ज्ञानवान, चिंतनशील और मननशील रहा है जिन पर हम केवल उनके रहन-सहन और सादगीपूर्ण वेशभूषा के आधार पर असभ्य, एनिमिस्ट, जंगली और न जाने क्या-क्या तमगा लगा दिया हैं । यहाँ दण्ड की व्यवस्था बहुत कठोर नहीं नज़र आती लेकिन न्याय का विधान और न्यायाकर्ताओं का अनुक्रम इतना सुव्यवस्थित और संगठित है, लगता है आधुनिक न्याय व्यवस्था इसी की नक़ल हो ।
हमारे इस मूल समाज में न्याय की प्रणाली कैसी थी इसे हम संक्षेप में कुछ जनजातीय समुदायों की न्याय व्यवस्था से समझने का प्रयास करेंगे-
जनजातीय समुदाय (मुख्यतः मुण्डा-उराँव परिवार) जब खुखड़ा पठार के घने जंगलों को साफ कर छोटे-छोटे हातू (गांव) बसाने लगे, तब उन्होंने अपने समाज को संगठित करके ग्राम प्रशासन की बुनियाद डाली। धीरे-धीरे, हर गाँव के चारों ओर उनकी खेती की तय सीमा बनी, और गांव की जिम्मेदारी एक प्रमुख, जिसे मुण्डा या मुद्धा कहा जाता था के हाथों में होती थी। आसपास के कई गांवों का एक संगठन ‘मानकी’ के नेतृत्व में चलता,जिसकी यह पदवी वंशानुगत हुआ करती थी, लेकिन कोई ज़मीन उसके क्षेत्राधिकार में नहीं होती थी । कई गांवों और मानकी के ऊपर का संगठन ‘पड़हा’ कहलाता था, और इनकी देख-रेख ‘बड़ा रैय्या’ या ‘पड़हा राजा’ करता था। उराँव समाज में इसे ‘पड़हा गोल्लस’ और इन सबके ऊपर समुदाय के बड़े संगठन का नेतृत्व ‘बड़ा रैय्या’ या ‘महाराजा’ करता, जिसे उराँव भाषा में ‘बेलम’ कहते थे। प्रत्येक स्तर का अपना स्पष्ट कर्तव्य, अधिकार और जिम्मेदारी थी। पंचायत में हर विषय पर चर्चा के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाता, और समाज के सभी नियम इसी तरह सामूहिक सहमति से बनते थे ।
मुण्डा क्षेत्रों में गाँव ‘पट्टियों’ में बंटे होते, हर पट्टी में दस-बारह गांव शामिल रहते। हर पट्टी के गांवों में जमीन या अन्य विवादों को सुलझाने, अपराधियों को दंडित करने, और पंचायत के निर्णय को लागू करवाने की जिम्मेदारी ‘मानकी’ की होती थी, जो अपनी टीम के साथ काम करता। उराँव समाज का स्थानीय प्रशासन ग्राम पंचायत पर आधारित था। यहाँ पंचायत एक स्थायी परिषद की तरह काम करती और गाँव के अनुभवी लोग इसके आजीवन सदस्य होते। विवादों की सुनवाई, गवाहों और प्रमाण के आधार पर पंचायत फैसला लेती। पंचायत के फैसले को इष्ट धर्मेश का आदेश मानकर उसका पालन करना अनिवार्य था, इसका उल्लंघन करने पर समाज निकाला जैसी सजा दी जाती थी।

पट्टी- बारह गांवों का एक समूह
मुण्डा समाज में मुण्डा का स्थान वर्तमान में पाहन के प्रमुख सहायक से बदलकर गांव के नेता में तब्दील हो गया। हर समुदाय की परंपरा में गाँव के मुखिया के लिए भिन्न-भिन्न नाम होते हैं – उराँव में महतो, मुण्डा में मुण्डा, संथाल में मांझी हड़ाम, हो में मुण्डा, और खड़िया में सोहोर। समाज की सबसे बड़ी खासियत थी कि पंचायत अपनी प्रक्रिया में समाज के हर सदस्य की सीधी भागीदारी और सहमति सुनिश्चित करती थी। इस स्वशासन व्यवस्था में ग्राम इकाई के स्तर पर ही विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सारी शक्तियाँ निहित थीं ।
गाँव के धार्मिक रीति-रिवाज और सांस्कृतिक कर्तव्यों का दायित्व ‘पाहन’ के पास होता था।

पूजा-अर्चना करते हुए पाहन
कहीं-कहीं नौ पदेन सदस्यों की व्यवस्था में दिखाई देती है। किसी विवाद की स्थिति में, शिकायतकर्ता महतो के पास जाकर विवाद दर्ज कराता। महतो पंचायत बुलाता, पंचायत में दोनों पक्षों की बात सुनी जाती और बड़े बुजुर्गों/पंचों द्वारा विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से निर्णय दिया जाता। जरूरत पड़ने पर मामला ‘पड़हा राजा’ के समक्ष ले जाया जाता और दोषी को दंड (आमतौर पर आर्थिक) पंचायत द्वारा ही दिया जाता।

जनजातीय समाज में प्रचलित नौ सदस्यीय व्यवस्था
सामाजिक-पारंपरिक और धार्मिक विश्वास आदिवासी त्योहारों और पर्वों से जुड़े होते हैं,जो ऋतुओं, कृषि, और फसल चक्र के साथ मिलकर पूरे समुदाय की एकता, सामूहिकता और साझा संस्कृति को उजागर करते हैं।जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था यह प्रमाणित करती है कि बिना किसी लिखित विधान, आधुनिक संस्थान या जटिल प्रशासनिक संरचना के भी एक समाज कितनी परिपक्व, संगठित और मानवीय न्याय प्रणाली विकसित कर सकता है। मुण्डा–उराँव जैसे समुदायों में ग्राम-स्तर से लेकर पड़हा और बड़े रैय्या तक का अनुक्रम केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं था, बल्कि सामूहिक सहमति, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक अनुशासन पर आधारित स्वशासन की उत्कृष्ट परंपरा थी।

स्थानीय न्याय व्यवस्था
यह व्यवस्था दंड की कठोरता पर नहीं, बल्कि समुदाय की एकता, पारदर्शिता, गवाह और प्रमाण के आधार पर न्याय, तथा धार्मिक-सामुदायिक मान्यताओं के प्रति गहरी निष्ठा पर टिके हुए थी। ग्राम पंचायत की सर्वसम्मति से होने वाली निर्णय-प्रक्रिया और समाज द्वारा दिए गए आदेशों का निर्विवाद पालन इस बात का प्रमाण है कि न्याय केवल सत्ता का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्य का परिणाम था।
जनजातीय समाज की यह न्याय प्रणाली हमें यह समझने की प्रेरणा देती है कि आधुनिक कानून व्यवस्था चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, न्याय का वास्तविक आधार समुदाय की भागीदारी, सामाजिक नैतिकता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता ही है। इनके अनुभव आज भी स्वशासन, स्थानीय लोकतंत्र और समुदाय-आधारित निर्णयों के लिए एक मूल्यवान मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा
वारुणी पर्व : प्राणदायी “जल” के सम्मान का उत्सव
March 17, 2026
भक्त शिरोमणि माता कर्मा: भक्ति, चारित्रिक अवदान और प्रेम की पराकाष्ठा
March 15, 2026
होली- लोकजीवन का बहुरंगी त्यौहार
March 01, 2026
यज्ञोपवीत- एक सूत्र जो है पवित्रता का प्रतीक
February 11, 2026
खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय
February 04, 2026
सूर्य मंदिर मोढेरा- प्राचीन शिलाओं में परिलक्षित होता भारतीय ज्ञान
February 02, 2026
सूर्य मंदिर- कोणार्क, अद्भुत वास्तुकला और आध्यात्मिकता का संगम
January 30, 2026
सूर्य – भारतीय संस्कृति में आस्था और उपासना का केंद्र
January 27, 2026
तकनीकी को आधार देती पुरातन ज्ञान परंपरा- ग्रामोद्योग भाग 4
January 25, 2026
कृषि, अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा- ग्रामोद्योग भाग 3
January 21, 2026
हरित सोना और हस्तशिल्प - ग्रामोद्योग भाग 2
January 17, 2026
मकर संक्रांति- सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व
January 13, 2026
खादी - भारत की समृद्धि और राष्ट्रीय चेतना का संवाहक - ग्रामोद्योग भाग 1
January 13, 2026
पोंगल: प्रकृति, सूर्य और परिश्रम के प्रति कृतज्ञता का उत्सव
January 12, 2026
लोहड़ी: ऋतु, कृषि और सामूहिक चेतना का उत्सव
January 11, 2026
क्या है तिल-गुड़ का विज्ञान
January 09, 2026
ईशावास्योपनिषद के श्लोक को चरितार्थ करता त्यौहार- दियारी
January 02, 2026
सिरपुर-दक्षिण कोसल का पुरावैभव
December 28, 2025
पौष माह और उसकी महत्ता
December 26, 2025
थाईपुसम- तमिल परम्परा का एक पवित्र पर्व
December 24, 2025
पूस माह में पूजी जाती हैं बनशंकरी देवी
December 22, 2025
भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान - मृत्यु संस्कार
December 19, 2025
भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान : विवाह संस्कार
December 17, 2025
भारतीय समाज में जीवन के महत्वपूर्ण अनुष्ठान: जन्म संस्कार
December 15, 2025
छत्तीसगढ़ पर्यटन : अछूता प्राकृतिक सौंदर्य और नई संभावनाएँ
December 13, 2025
जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत और पुरावशेष
December 10, 2025
प्रकृति की गोद में छिपा स्वास्थ्य का खजाना
December 08, 2025
पंचदेव परंपरा और आदर्श वाक्य की जन्मस्थली - मदकूद्वीप
December 05, 2025
ललितकला की नाट्यविधा को समेटे सीताबेंगरा और जोगीमारा की गुफाएं
December 03, 2025
ढोकरा शिल्पकला – कठोर धातु से जीवन के सौम्य भावों को उकेरता जनजातीय समाज
December 01, 2025
भारतीय चित्रकला: प्रागैतिहासिक धरोहर से आधुनिक संवेदना तक
November 27, 2025
दक्षिण कोसल: रामायणकालीन विरासत की जीवित धरोहर
November 26, 2025
जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था
November 24, 2025
डोंगर देव : प्रकृति में निहित देवत्व की जीवित परंपरा
November 21, 2025
प्रकृति, लोककला और संस्कार: जनजातीय जीवन में सनातन की शाश्वत उपस्थिति
November 19, 2025
आत्मिक अलंकार- गोदना
November 16, 2025
जनजातीय समाज : सनातन धर्म के दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत आधार
November 05, 2025
भाई दूज : प्रेम, आस्था और पारिवारिक बंधन का पर्व
October 23, 2025
शरद पूर्णिमा का सांस्कृतिक महत्त्व
October 06, 2025
रामकथा से जीवन प्रबंधन के सूत्र
May 13, 2026
सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा
May 12, 2026
आदर्श और मर्यादा के प्रतिमान
May 10, 2026
नीति, न्याय, नेतृत्व और श्रीराम
May 06, 2026
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम
May 06, 2026
रामकथा की यह अनन्त यात्रा
May 06, 2026
भजन, रामलीला और लोकगीतों में राम
May 06, 2026
अवसाद और मानसिक अस्थिरता के कालखण्ड में : युवाओं के समक्ष स्थितप्रज्ञ राम का आदर्श
May 06, 2026
धर्म ग्रंथों से सीख
May 04, 2026
विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम
May 03, 2026
बैगा समुदाय में शिकार का परंपरागत साधन
May 02, 2026
सोशल मीडिया : जब मानव ही उत्पाद बन गया
May 01, 2026
दिव्य न्याय की प्रतिमूर्ति-विष्णु का नृसिंह स्वरूप
April 30, 2026
बलिदान दिवस : वीर हरिसिंह नलवा
April 30, 2026
भारतीय जीवन का आधार संस्कार एवं हम
April 28, 2026
हाली अमावस पर्व
April 27, 2026
ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
ब्रह्मांड की स्थिति, उत्पत्ति, संहार शक्ति सीता
April 25, 2026
जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा
April 23, 2026
गोंड समुदाय की रामायनी लोकगाथा
April 23, 2026
रामकथा से जीवन प्रबंधन के सूत्र
May 13, 2026
सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा
May 12, 2026
आदर्श और मर्यादा के प्रतिमान
May 10, 2026
नीति, न्याय, नेतृत्व और श्रीराम
May 06, 2026
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम
May 06, 2026
रामकथा की यह अनन्त यात्रा
May 06, 2026
भजन, रामलीला और लोकगीतों में राम
May 06, 2026
अवसाद और मानसिक अस्थिरता के कालखण्ड में : युवाओं के समक्ष स्थितप्रज्ञ राम का आदर्श
May 06, 2026
धर्म ग्रंथों से सीख
May 04, 2026
विश्व के कबीर पंथियों का संत समागम
May 03, 2026
बैगा समुदाय में शिकार का परंपरागत साधन
May 02, 2026
सोशल मीडिया : जब मानव ही उत्पाद बन गया
May 01, 2026
दिव्य न्याय की प्रतिमूर्ति-विष्णु का नृसिंह स्वरूप
April 30, 2026
बलिदान दिवस : वीर हरिसिंह नलवा
April 30, 2026
भारतीय जीवन का आधार संस्कार एवं हम
April 28, 2026
हाली अमावस पर्व
April 27, 2026
ज्ञान भारतम् अभियान: प्राचीन पांडुलिपियों को सहेजने का संकल्प
April 26, 2026
ब्रह्मांड की स्थिति, उत्पत्ति, संहार शक्ति सीता
April 25, 2026
जहाँ भक्ति बनी प्रेम की भाषा
April 23, 2026
गोंड समुदाय की रामायनी लोकगाथा
April 23, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
गणगौर: शिवशक्ति के एकात्म तत्व का उत्सव
March 20, 2026