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जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था

जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था

विकास के क्रम में जब मानव घुमंतू जीवन छोड़ स्थाई जीवन जीने लगा तब “समाज” की अवधारणा अस्तित्व में आई और समाज के इस संगठित स्वरुप से बहुत सी नई और आवश्यक अवधारणाओं का उदय हुआ । विविध जीवन संस्कार, गोत्र परंपरा आदि सभी समाजों का अभिन्न हिस्सा बन गए और न्याय की संकल्पना भी साकार हुई । समाज में न्याय की संगठित प्रणाली का इतिहास कितना पुराना है यह जानने के लिए  जब हम जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था का अध्ययन करते है तो विस्मित हो जाते हैं की यह समाज कितन ज्ञानवान, चिंतनशील और मननशील रहा है जिन पर हम केवल उनके रहन-सहन और सादगीपूर्ण वेशभूषा के आधार पर असभ्य, एनिमिस्ट, जंगली और न जाने क्या-क्या तमगा लगा दिया हैं । यहाँ दण्ड की व्यवस्था बहुत कठोर नहीं नज़र आती लेकिन न्याय का विधान और न्यायाकर्ताओं का अनुक्रम इतना सुव्यवस्थित और संगठित है, लगता है आधुनिक न्याय व्यवस्था इसी की नक़ल हो ।

हमारे इस मूल समाज में न्याय की प्रणाली कैसी थी इसे हम संक्षेप में कुछ जनजातीय समुदायों की न्याय व्यवस्था से समझने का प्रयास करेंगे-
जनजातीय समुदाय (मुख्यतः मुण्डा-उराँव परिवार) जब खुखड़ा पठार के घने जंगलों को साफ कर छोटे-छोटे हातू (गांव) बसाने लगे, तब उन्होंने अपने समाज को संगठित करके ग्राम प्रशासन की बुनियाद डाली। धीरे-धीरे, हर गाँव के चारों ओर उनकी खेती की तय सीमा बनी, और गांव की जिम्मेदारी एक प्रमुख, जिसे मुण्डा या मुद्धा कहा जाता था के हाथों में होती थी। आसपास के कई गांवों का एक संगठन ‘मानकी’ के नेतृत्व में चलता,जिसकी यह पदवी वंशानुगत हुआ करती थी, लेकिन कोई ज़मीन उसके क्षेत्राधिकार में नहीं होती थी  । कई गांवों और मानकी के ऊपर का  संगठन ‘पड़हा’ कहलाता था, और इनकी देख-रेख ‘बड़ा रैय्या’ या ‘पड़हा राजा’ करता था। उराँव समाज में इसे ‘पड़हा  गोल्लस’ और इन सबके ऊपर समुदाय के बड़े संगठन का नेतृत्व ‘बड़ा रैय्या’ या ‘महाराजा’ करता, जिसे उराँव भाषा में ‘बेलम’ कहते थे। प्रत्येक स्तर का अपना स्पष्ट कर्तव्य, अधिकार और जिम्मेदारी थी। पंचायत में हर विषय पर चर्चा के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाता, और समाज के सभी नियम इसी तरह सामूहिक सहमति से बनते थे ।
मुण्डा क्षेत्रों में गाँव ‘पट्टियों’ में बंटे होते, हर पट्टी में दस-बारह गांव शामिल रहते। हर पट्टी के गांवों में जमीन या अन्य विवादों को सुलझाने, अपराधियों को दंडित करने, और पंचायत के निर्णय को लागू करवाने की जिम्मेदारी ‘मानकी’ की होती थी, जो अपनी टीम के साथ काम करता। उराँव समाज का स्थानीय प्रशासन ग्राम पंचायत पर आधारित था। यहाँ पंचायत एक स्थायी परिषद की तरह काम करती और गाँव के अनुभवी लोग इसके आजीवन सदस्य होते। विवादों की सुनवाई, गवाहों और प्रमाण के आधार पर पंचायत फैसला लेती। पंचायत के फैसले को इष्ट धर्मेश का आदेश मानकर उसका पालन करना अनिवार्य था, इसका उल्लंघन करने पर समाज निकाला जैसी सजा दी जाती थी।


पट्टी- बारह गांवों का एक समूह


मुण्डा समाज में मुण्डा का स्थान वर्तमान में पाहन के प्रमुख सहायक से बदलकर गांव के नेता में तब्दील हो गया। हर समुदाय की परंपरा में गाँव के मुखिया के लिए भिन्न-भिन्न नाम होते हैं – उराँव में महतो, मुण्डा में मुण्डा, संथाल में मांझी हड़ाम, हो में मुण्डा, और खड़िया में सोहोर। समाज की सबसे बड़ी खासियत थी कि पंचायत अपनी प्रक्रिया में समाज के हर सदस्य की सीधी भागीदारी और सहमति सुनिश्चित करती थी। इस स्वशासन व्यवस्था में ग्राम इकाई के स्तर पर ही विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सारी शक्तियाँ निहित थीं ।
गाँव के धार्मिक रीति-रिवाज और सांस्कृतिक कर्तव्यों का दायित्व ‘पाहन’ के पास होता था।

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पूजा-अर्चना करते हुए पाहन

कहीं-कहीं नौ पदेन सदस्यों की व्यवस्था में दिखाई देती है। किसी विवाद की स्थिति में, शिकायतकर्ता महतो के पास जाकर विवाद दर्ज कराता। महतो पंचायत बुलाता, पंचायत में दोनों पक्षों की बात सुनी जाती और बड़े बुजुर्गों/पंचों द्वारा विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से निर्णय दिया जाता। जरूरत पड़ने पर मामला ‘पड़हा राजा’ के समक्ष ले जाया जाता और दोषी को दंड (आमतौर पर आर्थिक) पंचायत द्वारा ही दिया जाता।


जनजातीय समाज में प्रचलित नौ सदस्यीय व्यवस्था 

 

सामाजिक-पारंपरिक और धार्मिक विश्वास आदिवासी त्योहारों और पर्वों से जुड़े होते हैं,जो ऋतुओं, कृषि, और फसल चक्र के साथ मिलकर पूरे समुदाय की एकता, सामूहिकता और साझा संस्कृति को उजागर करते हैं।जनजातीय समाज की न्याय व्यवस्था यह प्रमाणित करती है कि बिना किसी लिखित विधान, आधुनिक संस्थान या जटिल प्रशासनिक संरचना के भी एक समाज कितनी परिपक्व, संगठित और मानवीय न्याय प्रणाली विकसित कर सकता है। मुण्डा–उराँव जैसे समुदायों में ग्राम-स्तर से लेकर पड़हा और बड़े रैय्या तक का अनुक्रम केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं था, बल्कि सामूहिक सहमति, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक अनुशासन पर आधारित स्वशासन की उत्कृष्ट परंपरा थी।


स्थानीय न्याय व्यवस्था

यह व्यवस्था दंड की कठोरता पर नहीं, बल्कि समुदाय की एकता, पारदर्शिता, गवाह और प्रमाण के आधार पर न्याय, तथा धार्मिक-सामुदायिक मान्यताओं के प्रति गहरी निष्ठा पर टिके हुए थी। ग्राम पंचायत की सर्वसम्मति से होने वाली निर्णय-प्रक्रिया और समाज द्वारा दिए गए आदेशों का निर्विवाद पालन इस बात का प्रमाण है कि न्याय केवल सत्ता का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक मूल्य का परिणाम था।
जनजातीय समाज की यह न्याय प्रणाली हमें यह समझने की प्रेरणा देती है कि आधुनिक कानून व्यवस्था चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, न्याय का वास्तविक आधार समुदाय की भागीदारी, सामाजिक नैतिकता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता ही है। इनके अनुभव आज भी स्वशासन, स्थानीय लोकतंत्र और समुदाय-आधारित निर्णयों के लिए एक मूल्यवान मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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