आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

मानव- संस्कृति को भारत का अवदान

मानव- संस्कृति को भारत का अवदान

नई शताब्दी और नई सहस्राब्दी के कगार पर खड़े हमें विहंगावलोकन करने की आवश्यकता है। इस शती में अस्मिता की नई खोज है। हमारी क्या अस्मिता रही और हमने विश्व को योगदान करके अपना जो विशिष्ट स्थान बनाया क्या वह आगे नए आयाम दे पाएगा। भारत को चिंतन में स्वयंभूत आयाम प्रशस्त करने होंगे। अन्यथा हम अनुकृति के लिए विवश हो जाएंगे।

भारत का मानव-चिंतन में सबसे विशेष अवदान भाषा है। संस्कृत परिवार की समस्त भाषाओं में विराट् शब्दावली का सृजन हुआ। यह जीवन की आवश्यकताओं से बढ़कर मनन की शब्दराशि का प्रवाह बना। उपसर्गों से भाषा में विलक्षण सम्पदा का सृजन हुआ जैसे लैटिन द्वारा in-spect, pro-spect, re-spect आदि। यदि यूरोपीय भाषाएं संस्कृत के उपसर्गों और प्रत्ययों से लाभान्वित नहीं होतीं तो वे बोलियां मात्र रह जातीं। प्रत्ययों से भी संज्ञाओं और धातुओं की अभिव्यक्ति बढ़ी।

भाषा के संस्कार के बिना आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास संभव न हो पाता। समस्त योरोपीय भाषाओं की गिनती संस्कृत से है। हजार के लिए 'सहस्र' शक्ति का द्योतक है। सहस् से साहस बनता है। सब जानते हैं कि शून्य और उसके लिखने का प्रतीक भारत की देन है। शून्य के बिना आज का संगणक आदि का विज्ञान असंभव था।

जब केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रो. रथफोर्ड ने परमाणु का विखण्डन किया, तब प्रो. कीथ ने ऑक्सफोर्ड विष्ठवविद्यालय से 'भारतीय परमाणुवाद' पर पुस्तक छापकर प्रमाणित किया कि परमाणु की सबसे पुरातन कल्पना वैशेषिक दर्शन में है और आज से 3000 वर्ष पहले भारत में इस आधारभूत तत्व की मीमांसा की गई थी।

आधुनिक भौतिकी के प्रवर्तकों में वरेण्य प्रो. श्रोडिंगर और ग्योटिंगन विश्वविद्यालय के हाइजन्बर्ग ने भारतीय दर्शन के प्रभाव को स्पष्टतः स्वीकार किया है। दोनों नोबल पुरस्कार विजेता थे।

गन्ने से गुड़ और शक्कर का उत्पादन आर्यावर्त के इक्षुक्षेत्र की देन है। प्राचीन काल में मिठास के लिए मधु का मुख्यतः प्रयोग किया जाता था। जब गन्ने से शक्कर का आविष्कार हुआ तब भारत से विश्व में नई मधुरिमा का प्रसार हुआ। इसके कारण अयोध्या नगरी अजेय और सुसम्पन्न होती गई। यहां के सम्राट् भगवान राम की कीर्ति चारों ओर फैली। पारसियों के अवेस्ता धर्मग्रन्थ में 'ह्वस्त्र राम' का उल्लेख है।

'ह्वस्त्र राम' का अर्थ 'स्वस्त्र राम' अर्थात् उत्तम शस्त्रों से सज्जित राम है। गन्ना भारत में जंगली पौधे के रूप में उगता था और वनस्पति वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधा मूल रूप से भारत में होता था। यहां से शर्करा शब्द ग्रीक, रोमन, फारसी और अरबी भाषाओं में गया। पहली शताब्दी के ग्रीक और लैटिन ग्रन्थों में 'साखारोन्' एक प्रकार का मधु है जो भारत में है, नमक के समान होता है और दांतों से चबाया जाता है।

प्लिनी ने लिखा है कि भारत में शर्करा एक प्रकार का मधु है, जो बांस से मधुमक्खियों के बिना पाया जाता है। चीन में शर्करा को 'शि-मि' (पाषाण-मधु) कहते थे। पाषाण का अर्थ कंकड़ अथवा कणात्मक है। सन् 285 में कम्बुज देश ने पहली बार चीन को गन्ने उपहार-स्वरूप भेजे थे। सन् 647 में चीन के सम्राट् थाई-त्सुङ् ने मगध में भारतीय शर्करा निर्माण की पद्धति सीखने के लिए शिष्टमंडल भेजा था।

जब अरब सेनाओं ने ईरान को सन् 640 में पराजित करके धर्मांतरित किया, तब सर्वप्रथम ईरान से शर्करा-निर्माण ले गए। ईरान में शर्करा का उत्पादन भारत से बहुत प्राचीन काल में गया था। कपास और सूती वस्त्र सर्वप्रथम भारत में प्रचलित हुए। ये 5000 वर्ष पूर्व मोहेंजोदाड़ो की खुदाई से मिले हैं। ऋग्वेद में भी कपास से बने कपड़े का उल्लेख है। ग्रीक इतिहासकार हीरोडोटस लिखते हैं कि भारत की महिलाएं बीजों से कपास बिनती हैं, उसका सूत कातती हैं और भव्य वस्त्र बनाती हैं।

मिश्र की ममी भारतीय सूती वस्त्रों में सहस्रों वर्षों से सुरक्षित हैं। सन् 600-700 के बीच मिश्र में कपास की खेती प्रारम्भ हुई। यूनान में भारतीय राज्य थे, संस्कृत के शिलालेख उपलब्ध हैं, महाराजाओं के संस्कृत नाम थे। यूनान से चीन में कपास की खेती 2200 वर्ष बाद पहुंची थी। चीनी इतिहास लिखते हैं कि युन्नान के नान्चाओ राज्य में रेशमी कीड़ों से नहीं अपितु पौधों के बीजों से वस्त्र बनाया जाता है।

चीनी इतिहासों में इस वस्त्र को कुपेई ( कर्पास) अथवा तुलो (तूल) कहा गया है। आज भी अंग्रेजी में Cotton wool कहते हैं। क्योंकि योरोपीय जातियां पशुओं के बालों से प्राप्त ऊन (wool) के वस्त्र पहनती थीं और उनके लिए सूती कपड़े भी ऊन के प्रकार के थे। इस प्रकार भारत ने मानव जीवन में मौलिक योगदान किया है। तन को ढंकने के लिए सूती कपड़े, स्वर्गारोहण के लिए-मिश्र में शवावरण के लिए सूती मलमल जो औषधों से ओतप्रोत होकर भौतिक काया को सहस्रों वर्षों तक रखती थी।

दक्षिण चीन की उष्णता से बचाने के लिए सूती परिधान, ... भारत की देन है। मुख मीठा करने के लिए शर्करा और उससे प्राप्त धन से अजेय अयोध्या और उसके आदर्श राजा भगवान राम की चिरजीविनी कल्पनाएं एशिया को विधि-व्यवस्था देती आई हैं। जबकि ग्रीस और चीन में गणना की चरम सीमा 10,000 (दस सहस्र) थी, वहाँ भारत ने शून्य से अनंत की परिकल्पना की। शून्य चिह्न और उसका दार्शनिक एवं गणितीय परिकल्पन मानव जाति के अनुपम विकास का कारण बना।

संस्कृत भाषा की विराट् चिंतन-धारा जिसमें असत् से सत् (शून्य से अस्ति) ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में प्रस्फुटित होता है-सतर्ता बन्धुमसति निरविन्दन्। संस्कृत भाषा, तज्जन्य संस्कृति, और उससे अनुप्राणित संस्कार सब नदी तटों पर, घनघोर अरण्यों में जन्मे थे। संस्कृत, संस्कृति और संस्कार की त्रिवेणी बहते प्रवाह की सखी थी। नदी का पानी बहता है और इसके लिए दो तटों की आवश्यकता होती है। संस्कार-धातु में ये तट मर्यादाएं हैं और बहता पानी सतत् परिवर्तनशील मूल्यों की भूमिका है।

पानी, प्रवाह, तर खुलेपन के प्रतीक हैं। गतिशीलता और प्रगति के आधार हैं। कुछ संस्कृतियां मरुभूमि की पुत्रियां हैं। मरुभूमि विराट् एकरूप है। दिन में झुलसाने वाली रेत और रात को घातक शीत से ग्रस्त। इससे कविता का उद्भव हुआ।

आज का मानव कट्टरता से, आतंक से, हिंसा से त्रस्त है। ये सब दुर्गुण और संकट विशिष्ट दर्शन के परिणाम हैं। भारतीय दर्शन से तो संतप्त मानव नई सम्यग् दृष्टि प्राप्त कर सकता है। यह बारह -सूत्री ब्रह्मजाल इस प्रकार हो सकता है-

1. विविधता ही प्रकृति का ऋत है।

2. नदी प्रवाह और प्रकृति परिवर्तन है।

3. एक केन्द्रीयता नहीं, अपितु बहु-केन्द्रीयता चाहिए।

4. आदेशना (revelation) के स्थान पर साधना।

5. कट्टर आदेश नहीं, परन्तु ब्रह्म जिज्ञासा।

6. निरपेक्ष नहीं, सापेक्ष तत्वज्ञान।

7. जिजीविषा और जिज्ञासा

8. धर्म-दुर्ग नहीं, अपितु ध्यान के तपोवन

9. मानव अधिकारों के साथ मानवीय कर्तव्य एवं मूल्य

10. सीमाओं में बंदी मन नहीं, क्षितिजों को खोजती चेतना

11. शास्त्रों का शाब्दिक निर्वचन नहीं, परन्तु मूल्यपरक दिक्काल-अनुकूल निर्वाचन

12. पश्चिम की दर्शन-भूमिकाओं से पार (पार संगते बोधि स्वाहा)।

लेख-
प्रो लोकेश चन्द्र
संस्कृति अंक-10

Follow us on social media and share!