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शिवलिंग की प्रतीकात्मकता

शिवलिंग की प्रतीकात्मकता

संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इस प्रकार शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का चिह्न। शिव के इन चिह्नों के अनेक स्वरूप हैं, जिनकी चर्चा शिव पुराण में इस प्रकार की गई है-

लिंगानां च क्रमं वक्ष्यै यथावच्छणुतः द्विजाः । तदैव लिंग प्रथमं प्रणवं सर्व कामिकम् ।।

सूक्ष्म प्रणव रूपं हि सूक्ष्म रूपं हि निष्कलम् । स्थल लिंग हि सकलं तत्पचाक्षरमुच्यते ।।

तपौ पूजा तपः प्रोक्तं साक्षान्मोक्ष प्रदै उमै । पुरुष प्रकृति भूतानि लिंगानि सुबहुनि च । तानि विस्तरतौ वृक्त शिवौवाति न चापरः ।।

अर्थात् "हे ब्राह्मणों ! मैं लिंगों का यथावत् क्रम तुमसे कहता हूं। सर्वप्रथम शिव का लिंग प्रणव (ऊंकार) है। वह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। शिव का सूक्ष्म लिंग प्रणव स्वरूप है और सूक्ष्म ही निष्कल हुआ करते हैं। उसका नाम पंचाक्षर (नमः शिवाय) है। स्थूल और सूक्ष्म लिंगों की पूजा ही तप है। ये दोनों प्रकार साक्षात् मोक्ष देने वाले हैं। पुरुष, प्रकृति तथा आकाशादि पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) इत्यादि शंकर के अनेक लिंग हैं। इनका विस्तार से वर्णन करने की शक्ति स्वयं शिव में ही है। दूसरा कोई व्यक्ति उन समस्त लिंगों को जान नहीं सकता।"

पूजन की दृष्टि से देखें तो शिवलिंग दो ही प्रकार के होते हैं। एक चर और दूसरा अचर। चर शिवलिंग से अभिप्राय उन छोटे लिंगों से है, जिन्हें कहीं भी आसानी से इधर-उधर ले जाया जा सकता है और जिन्हें सुविधानुसार स्थापित करके पूजन किया जा सकता है। ये लिंग प्रायः पाषाण के बने हुए होते हैं।

पौराणिक साहित्य में हमें सर्वप्रथम "शिव पुराण" में शिवलिंग की चर्चा विस्तार से पढ़ने को मिलती है। उसमें "ज्योतिर्लिंग" के रूप में इसकी विस्तृत कथा है, जिसका उल्लेख कुछ परिवर्तनों के साथ स्कंद पुराण तथा लिंग पुराण में भी किया गया है। इस कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में इस बात पर विवाद हो गया कि उन दोनों में कौन बड़ा है। दोनों ही अपने को बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न करने लगे। जब कोई निर्णय नहीं हो पाया तो दोनों के बीच का विवाद युद्ध में बदल गया। लम्बे समय तक युद्ध चलता रहा, मगर फिर भी कोई निर्णय नहीं हो पाया। तब अकस्मात् ही उन दोनों के बीच एक स्तम्भ प्रकट हो गया, जिसके न आदि का पता था और न अंत का। तब उन दोनों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि वे उस स्तम्भ के आदि और अंत का पता लगाने का प्रयत्न करेंगे तथा उनमें से जो भी इस कार्य में सफल होगा, वही बड़ा माना जायेगा। निर्णय के अनुसार ब्रह्मा तो हंस बनकर ऊपरी सिरा ढूंढ़ने के लिए उड़ चले और विष्णु, वाराह का रूप धारण करके नीचे की ओर चल दिए। कथा के अनुसार ये दोनों ही एक हजार वर्षों तक अपने पथ पर आगे बढ़ते हुए उस स्तम्भ का ओर-छोर ढूंढ़ने का प्रयत्न करते रहे, मगर असफल रहे। तब दोनों निराश होकर वापिस लौट आए और बुझे मन से स्वीकार किया कि उन दोनों में से कोई भी बड़ा कहलाने का अधिकारी नहीं है। उसी समय वहां शिव प्रकट हुए। उन्होंने बतलाया कि वह स्तम्भ स्वयं उन्हीं का ज्योतिर्लिंग है, जो उनके विराट स्वरूप का द्योतक है। इसके उपरान्त जनहित के लिए शिव ने यह भी कहा कि अब यह ज्योतिर्लिंग छोटा हो जाएगा ताकि संसार के लोग सरलता से उसके दर्शन और पूजन कर सकें। तद्नुसार उस विशाल स्तम्भ ने छोटे शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। यह घटना फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को घटी और तभी से इसे महा शिवरात्रि के रूप में मनाया जाने लगा। शिव पुराण के उल्लेख के अनुसार इस दिन निराहार रहकर श्रद्धानुसार और निश्चल भाव से की गई शिवलिंग की पूजा, वर्ष भर की शिव पूजा के समान फलदायी होती है।

पुराणों के अनुसार शिवलिंग में केवल शिव का ही नहीं, तीनों प्रमुख देवताओं का निवास है। जन्म देने वाले देवता ब्रह्मा उसके मूल में, पालन-पोषण करने वाले देवता विष्णु उसके मध्य में तथा संहार करने वाले देवता उसके अंत में निवास करते हैं। इस प्रकार शिवलिंग उस परमब्रह्म परमेश्वर का प्रतीक है, जो सृष्टि को बनाते हैं, उसका पालन-पोषण करते हैं और उसका विनाश करते हैं। दूसरी ओर यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी उस विराट प्रभु का ही रूप है, जिसमें सब कुछ बनता और नष्ट हो जाता है। स्कंद पुराण में इसी बात को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है-

आकाशं लिंगमित्याहः पृथ्वी लस्य पीठिका । आलयः सर्व देवानां लयनाल्लिंगमुच्यते ।।

अर्थात् अन्तरिक्ष लिंग है, पृथ्वी उसकी पीठिका है, सब देवों का आलय है। इसमें सबका लय होता है। अतः इसे लिंग कहते हैं।

शिव, ब्रह्माण्ड के प्रतीक हैं। इसका प्रमाण एक अन्य पौराणिक कथा में भी मिलता है। इस घटना के अनुसार एक बार गणेश तथा कार्तिकेय में किसी बात पर विवाद हो गया। निर्णय के लिए वे दोनों ही अपने पिता श्री शिव के पास पहुंचे। शिव ने निर्णय दिया कि उन दोनों में से जो भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके पहले लौट आएगा, उसे ही विजेता माना जायेगा। कार्तिकेय प्रसन्न होकर अपने वाहन मयूर पर बैठे और तत्काल यात्रा पर निकल पड़े। स्थूलकाय गणेय के लिए यह सम्भव नहीं था। फिर उनकी सवारी है मूषक। कैसे लगा पाते वे विश्व की परिक्रमा ? मगर गणेश बुद्धि के धनी थे। सो क्षण भर कुछ सोचा और अपने पिताश्री की ही आराम से परिक्रमा करके सामने आ खड़े हुए। फिर बोले-"आप ही तो ब्रह्माण्डस्वरूप हैं। सो आपकी परिक्रमा से स्वयमेव ब्रह्माण्ड की परिक्रमा हो गई।" शिव प्रसन्न हो गए और गणेश को विजेता घोषित कर दिया।

शिव का सम्पूर्ण व्यक्तित्व सृष्टि के स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। उनके कंठ का विष, जहां इस संसार की दारुण पीड़ा को अभिव्यक्त करता है, वहां मस्तक से गिरने वाली गंगा सुख की धारा बहाती है। उनकी लहराती हुई घनी जटाएं अंधकार का प्रतीक हैं और चन्द्रमा प्रकाश का। उनका त्रिशूल, विश्व में व्याप्त दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों प्रकार के कष्टों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। उनका डमरू संगीत का द्योतक है और उनका वाहन नंदी, धर्म का। शिव का श्मशान प्रेमी स्वभाव, इस संसार की नश्वरता को प्रकट करता है तथा उनके शरीर पर लगी हुई भस्म उस नश्वरता को सहज रूप में स्वीकारने की परिचायक है। उनके पांच अवतार

ईशान व अघोर) या पांच मुख, सृष्टि के पांच प्रमुख कार्यों (सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव, अनुग्रह) की अभिव्यक्ति हैं। उन्हें भेंट किए जाने वाले विल्वपत्र में तीन पत्ते होते हैं, जो अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। इसी प्रकार आक पुष्प में भी पांच अलग-अलग पंखुड़ियां एक-दूसरे के साथ जुड़ी होती है। अनेकता में एकता की यह स्थिति इस सृष्टि का ही प्रतीक है, जहां पर सब एक-दूसरे से अलग-अलग दिखलाई देते हैं, फिर भी सब एक ही विश्व नियंता की डोर से बंधे हुए हैं।

शिव, हमारी राष्ट्रीय एकता के भी प्रतीक हैं। वे स्वयं सुदूर उत्तर में हिमालय के निवासी हैं और उन्हें वर रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या करती है ध्रुव दक्षिण में कन्याकुमारी में बैठी हुई पार्वती। विवाह सम्पन्न होता है और शिव अनुकरणीय सफल पारिवारिक जीवन बिताते हैं। हमारे यहां की कुंवारी कन्याएं आज भी पार्वती का पूजन करके उनसे अच्छे पारिवारिक जीवन का वरदान प्राप्त करने के लिए लालायित रहती हैं। यह उत्तर और दक्षिण के आदर्श का समन्वय है।

शिव के जो द्वादश ज्योतिर्लिंग है, वे भी देश के विभिन्न भागों में इस तरह बिखरे हुए हैं कि उन्होंने सम्पूर्ण देश को एक साथ जोड़ दिया है। अमरनाथ कश्मीर में है तो विश्वनाथ वाराणसी में, महाकाल उज्जैन में है तो रामेश्वर ठेठ दक्षिण में समुद्र के किनारे, सोमनाथ गुजरात में है तो नागेश्वर आंध्रप्रदेश में, त्र्यम्बकेश्वर महाराष्ट्र में है तो मल्लिकार्जुन आंध्रप्रदेश में और बैजनाथ झारखंड में।

शिव के मस्तक से निकलती गंगा, प्रकारान्तर से देश के ही मस्तक हिमालय से निकली गंगा है। उनका योगी स्वरूप हमारी योग तथा दर्शन के प्रति अपनत्व की भावना का प्रतीक है। उनका औघड़दानी स्वरूप भी हमारी ही प्राचीन काल से चली आयी प्रवृत्ति का परिचायक है।

शिव पुराण तथा रुद्र संहिता में वर्णित शिव का वह शब्दमय रूप भी उल्लेखनीय है, जिससे शिव सम्पूर्ण भाषा और साहित्य के प्रतीक बन जाते हैं। यह वर्णन इस प्रकार है- "अकार उनका मस्तक और आकार ललाट है। इकार दाहिना और ईकार बायां नेत्र है। उकार को उनका दाहिना और ऊकार को बायां कान बताया जाता है। एकार सर्वव्यापी प्रभु का ऊपरी ओष्ठ है और ऐकार अधर । ओकार तथा औकार ये दोनों क्रमशः उनकी ऊपर और नीचे की दो दन्त पंक्तियां हैं। अं और अः देवाधिदेव शूलधारी शिव के दोनों तालु हैं। "क" आदि पांच अक्षर उनके दाहिने पांच हाथ हैं तथा "च" आदि पांच अक्षर बांये पांच हाथ है। "ट" वर्ग तथा "त" वर्ग के पांच-पांच अक्षर उनके पैर हैं। पकार पेट है। फकार दाहिना पार्श्व और बकार बायां पार्श्व है। मकार को कंधा कहते हैं। मकार शम्भु का हृदय है। "य" से लेकर "स" तक सात वर्ण सर्वव्यापी शिव के शब्दमयी शरीर की सात धातुएं हैं तथा हकार उनकी नाभि है।

लेख-
योगेश चन्द्र शर्मा

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