खैरागढ़ – एशिया का प्रथम संगीत विश्वविद्यालय
February 04, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | माघ कृष्ण एकादशी | शुक्रवार
नक्षत्र: मूल | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 13 फ़रवरी 2026

कोणार्क का सूर्य मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य, खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक दर्शन का अद्वितीय उदाहरण है। रथनुमा संरचना, प्रतीकात्मक पहिए और सूर्य उपासना से जुड़ी यह विश्व धरोहर भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक ऊँचाई को दर्शाती है ।
कोणार्क (ओडिशा) का सूर्य मंदिर भारत का सबसे प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है। 13वीं शताब्दी में गंगवंशी राजा नरसिंह देव द्वारा निर्मित यह मंदिर अपनी रथनुमा आकृति के लिए विख्यात है, जिसमें सात घोड़ों द्वारा रथ खींचे जाने और 12 जोड़ी पहियों को प्रदर्शित किया गया है ।
वर्तमान में सात घोड़ों में से अब केवल एक ही घोड़ा बचा हुआ है, जो अत्यंत दुखद और विडंबनापूर्ण है । बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित इस स्थापत्य शैली के अद्भुत मंदिर की बनावट इतनी मोहक है कि कालांतर में यह मंदिर 'सूर्य मंदिर' का पर्याय बन गया ।

सात घोड़ों में से शेष एक घोड़ा
सात घोड़े एक साथ जुते हैं, जो सात रस्सियों या सात ध्वनियों (सात स्वरों) से जुड़े माने जाते हैं, जो भारतीय संगीत के "सप्त स्वर" (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) का प्रतिनिधित्व करते हैं । 12 जोड़ी पहिये (24 पहिये) वर्ष के 12 महीनों को और 24 पहिये दिन-रात के 24 घंटो का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
प्रत्येक पहिया लगभग 3 मीटर व्यास का है और उस पर घड़ी की तरह 8 चतुर्भुज खंड, 12 बाहरी दांतेदार आकृतियाँ और अत्यंत सुंदर नक्काशी के साथ सजा है। यह न केवल सौंदर्य की दृष्टि से अद्भुत है, बल्कि इसे एक प्रकार की प्राचीन कैलेंडर प्रणाली के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता था। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इन पहियों के आधार पर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय की गणना भी की जा सकती थी ।

सूर्य मंदिर का अलंकृत पहिया
19वीं शताब्दी से पूर्व इस मंदिर के विमान (मुख्य पूजास्थल) के ऊपर एक मीनार थी, जिसे बाद में क्षतिग्रस्त कर दिया गया। मंदिर के निर्माण में लाल बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट का उपयोग हुआ है । इसकी अद्भुत संरचना के कारण UNESCO ने सन् 1984 में इसे विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित किया ।
यहाँ स्थित सूर्य देव को स्थानीय लोग “बिरंची नारायण” कहकर संबोधित करते हैं । स्थानीय कथाओं के अनुसार, नरसिंह देव ने महासागर के किनारे एक कठोर लड़ाई जीतने के बाद इस मंदिर का निर्माण करवाया, जिसमें उन्होंने बंगाल के मुस्लिम आक्रमणकारियों को पराजित किया था ।

गंगवंशीय शासक- नरसिंह वर्मन
कहा जाता है कि उनकी विजय का श्रेय सूर्य देव की कृपा को देते हुए उन्होंने स्थापत्यकला की इस महान कृति का निर्माण करवाया । इसके माध्यम से वे भगवान सूर्य के प्रति भक्ति व्यक्त करने के साथ-साथ अपनी राजनीतिक शक्ति और साम्राज्य की विजय को भी स्थायी रूप देना चाहते थे ।
मंदिर के स्तंभों और दीवारों पर फूल-पत्ती, बेलबूटे, ज्यामितीय नमूनों के अलावा कामुक मुद्राएँ भी उकेरी गई हैं। मुख्य मंदिर में मूल रूप से तीन मंडप विद्यमान थे, जिनमें से दो मंडप ढह चुके हैं, इसलिए केवल एक मंडप शेष रह गया है ।

मंदिर की दीवारों पर अलंकृत कलाकृतियाँ
वर्तमान में तीसरा मंडप भी देखा नहीं जा सकता, क्योंकि औपनिवेशिक काल में इसके सभी द्वारों को रेत और पत्थरों से भरकर स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। इसका कारण मंदिर को क्षतिग्रस्त होने से बचाना बताया गया, किंतु जिन विदेशियों ने संपूर्ण देश की असीमित दुर्गति की, उनका यह संरक्षणवादी भाव कुछ संदेहास्पद लगता है ।
महान कवि और नाटककार रविंद्रनाथ टैगोर ने कोणार्क के संबंध में कहा था कि यहाँ के पत्थरों की भाषा मनुष्यों की भाषा से कहीं अधिक श्रेष्ठ है । इन्हीं शब्दों से हम इस मंदिर की सुंदरता का अंदाजा लगा सकते हैं । एक अन्य महान व्यक्तित्व, डॉ. बी.सी. रॉय, जो बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री थे, ने कहा था कि कोणार्क भारतीय कला के पाँच प्रमुख स्तंभों में से एक है ।
संरचना की दृष्टि से मंदिर मूल रूप से तीन मुख्य भागों में विभाजित था-रेखा देउल (मुख्य गर्भगृह) जहाँ सूर्य देव की मूर्ति स्थापित थी, जगमोहन (महामंडप या भक्तों के लिए सभागृह), नाट्यमंडप (नृत्य और कार्यक्रमों के लिए स्थान) कोणार्क सूर्य मंदिर की जो विशाल संरचना आज दिखाई देती है, वह वास्तव में मंदिर का अग्रभाग या जगमोहन है ।
इसकी पिरामिडनुमा संरचना देखकर विस्मय होता है कि आज हम बड़े चाव से मिस्र के पिरामिडों पर बातें करते हैं और उन्हें वहाँ की अद्वितीय कला मानते हैं, लेकिन हमारे देश में स्थापत्य कला कितनी उन्नत थी, इसका ज्ञान ही नहीं है यह बड़ी विडंबना है ।
प्राचीन भारत में स्थापत्य कला के ज्ञाताओं को वास्तुकला का भी पर्याप्त ज्ञान था, इसका प्रमाण जगमोहन के मुख्य द्वार का पूर्वाभिमुख होना है। इसकी दीवारों पर क्लोराइट पत्थर से सुंदर नक्काशी की गई है। जिन सात घोड़ों को रथ खींचते हुए दिखाया गया है, वे पूर्वी द्वार पर स्पष्ट देखे जा सकते थे, चार दक्षिण ओर और तीन उत्तर की ओर ।
किंतु कालांतर में दक्षिणी द्वार तो पूर्णतः क्षत-विक्षत हो गया है, जबकि उत्तरी भाग आंशिक रूप से सुरक्षित है। इस मंदिर का एकमात्र संपूर्ण चित्र दुर्लभ ताड़ के पत्तों की पाण्डुलिपि में मिलता है जो सन् 1610 की हैं ।

दुर्लभ ताड़पत्रों पर मिला वास्तविक चित्र
मुख्य मंदिर का शिखर, जिसमें मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित थी, गिर चुका है और अब केवल उसके अवशेष ही देखे जा सकते हैं । जगमोहन भक्तों को आश्रय देने के लिए बनाया जाता है और इसे सभा मंडप, समागम कक्ष या दर्शक कक्ष के नाम से भी जाना जाता है ।
स्थानीय ओड़िया भाषा में इसे 'मुखशाला' या 'मुखमंडप' भी कहा जाता है। 'जगमोहन' शब्द दो शब्दों 'जग' और 'मोहन' से मिलकर बना है । 'जग' का अर्थ है 'संसार' और 'मोहन' का अर्थ है 'जो प्रसन्न करे', इसलिए जब दोनों मिलते हैं तो इसका अर्थ होता है वह जो संपूर्ण विश्व को प्रसन्न करे' ।
यह सूर्य देवता को समर्पित है यह मंदिर प्राचीन भारतीय ज्योतिष, खगोल विज्ञान, धार्मिक दर्शन और कला का एक अद्भुत सम्मिलन है। इस मंदिर को अक्सर "ब्लैक पैगोडा" के नाम से भी जाना जाता है, रतीय स्थापत्य कला और धार्मिक आस्था के इस अद्वितीय उदाहरण का उल्लेख पुर्तगाली और अंग्रेज नाविकों ने अपने यात्रा वृत्तांतों में भी मिलता है ।

वास्तुकला का अप्रतिम उदाहरण- कोणार्क-सूर्य मंदिर
हालांकि, मंदिर की संरचना के क्षरण का ऐतिहासिक कारण ज्यादातर प्राकृतिक तत्वों जैसे लवणीय हवा, अत्यधिक नमी, बारिश और भूकंप के कारण है। इसके अलावा, मुगल काल और औपनिवेशिक काल में कई बार मंदिर को नुकसान पहुँचाया गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुगल सम्राट मुगल बादशाह आलमगीर (औरंगजेब) के आदेश से इसके शिखर को नष्ट कर दिया गया था, जिससे यह संरचना अधूरी दिखाई देती है ।
आज कोणार्क न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि एक पर्यटन स्पॉट और सांस्कृतिक केंद्र भी है। प्रति वर्ष कोणार्क महोत्सव आयोजित किया जाता है, जहाँ भारत के प्रमुख कलाकार कथक, ओडिसी, भरतनाट्यम और संगीत के माध्यम से प्रदर्शन करते हैं।

प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है कोणार्क उत्सव
यह उत्सव मंदिर के प्रांगण में आयोजित होता है और पूरी दुनिया से पर्यटक आकर इसका आनंद लेते हैं । इस तरह के आयोजन ने केवल हमारे गौरवशाली अतीत को स्मरण करने का सुअवसर प्रदान करते हैं अपितु पर्यटन को बढ़ावा देकर स्थानीय लोगो की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।
सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने मंदिर के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए हैं । नई तकनीकों, ड्रोन सर्वेक्षण और संरचनात्मक दृढ़ीकरण के माध्यम से इसके अवशेषों की सुरक्षा की जा रही है । कुछ विद्वानों की मांग है कि बंद द्वारों को ध्यानपूर्वक खोलकर आर्कियोलॉजिकल अध्ययन किया जाए, जिससे इस मंदिर के मूल उद्देश्य और निर्माण तकनीक के बारे में नई जानकारी मिल सके।
आज जब हम मिस्र के पिरामिडों या ग्रीस के पैराथन के बारे में बात करते हैं, तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में भी ऐसे अद्भुत स्थल मौजूद हैं, जिनकी कहानियाँ सिर्फ पत्थरों में नहीं, बल्कि सदियों के ज्ञान और श्रद्धा में उकेरी गई हैं। कोणार्क उन्हीं में से एक है जो सूर्य के समक्ष एक शिखर जैसा खड़ा है और कालजयी सौंदर्य का प्रतीक बना हुआ है ।

पिरामिड (मिस्त्र), बाएं व पैराथन (ग्रीस), दाएं
कोणार्क का सूर्य मंदिर केवल एक प्राचीन इमारत नहीं है । यह भारतीय संस्कृति, विज्ञान, कला और आध्यात्म की परंपराओं का जीता-जागता उदाहरण है । यह स्मारक याद दिलाता है कि प्राचीन भारत में न केवल धर्म और दर्शन का उच्च स्थान था, बल्कि वास्तुकला, खगोल विज्ञान और सौंदर्यशास्त्र में भी विश्व के अग्रणी स्थानों में शामिल था ।
वंदे सूर्याय! (सूर्य को प्रणाम)
लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा
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