आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

जानिए नरक चौदस का महत्व

जानिए नरक चौदस का महत्व

नरक चतुर्दशी,यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली से एक दिन पहले आता है, इसलिए इसे ‘छोटी दीपावली’ कहा जाता है। इस दिन को नरक चौदस, रूप चौदस या नरका पूजा के नाम से भी जाना जाता है। ‘नरक’ शब्द का अर्थ है मलिनता या अशुद्धता और इस दिन का उद्देश्य शरीर, मन और आत्मा की अशुद्धियों को दूर करना है। परंपरा के अनुसार इस दिन स्नान, दीपदान और यमराज की पूजा का विशेष महत्व होता है। यह त्योहार केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और मानसिक शांति के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

नरक चतुर्दशी का धार्मिक महत्व गहरा है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। यह सुनने में विरोधाभासी लग सकता है कि दीपावली जैसे उत्सव के अवसर पर यमराज की आराधना क्यों की जाए, पर इसका कारण अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक है। यमराज केवल मृत्यु के देवता नहीं हैं बल्कि धर्म और न्याय के भी रक्षक हैं। यमराज की पूजा का तात्पर्य मृत्यु से भयमुक्त होकर धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा लेना है। इस दिन श्रद्धा से यमराज की पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और व्यक्ति को दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह पूजा परिवार की सुरक्षा, मानसिक शांति और आत्मिक बल के लिए की जाती है।


मृत्यु के देवता - यम 

इस दिन दिशाओं के रक्षक देवताओं जिन्हें दिग्पाल कहा जाता है, उनमें से दक्षिण दिशा के स्वामी यमराज की विशेष पूजा की जाती है। दिग्पालों का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है जिनमें ब्रह्मा, शिव, इंद्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, कुबेर और अन्य देवताओं को विभिन्न दिशाओं का संरक्षक बताया गया है। चूंकि दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है, इसलिए नरक चतुर्दशी पर यम की दिशा में दीप जलाने और पूजा करने का विधान है। यह पूजा व्यक्ति को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त करती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।


शास्त्रों में वर्णित दस दिशाएं

प्राचीन काल में मंदिरों की दीवारों पर दिग्पालों की मूर्तियां उनकी दिशाओं के अनुसार स्थापित की जाती थीं। रंतिदेव नामक एक धर्मात्मा राजा थे जो सदैव पुण्य कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमदूत उन्हें नरक ले जाने आए। राजा ने आश्चर्य से पूछा कि उन्होंने कोई पाप नहीं किया फिर उन्हें नरक क्यों भेजा जा रहा है। यमदूतों ने बताया कि एक बार उनके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण वापस चला गया था, इसी कारण उन्हें नरक जाना होगा। राजा ने एक वर्ष का समय मांगा जो उन्हें मिल गया। तब ऋषियों ने बताया कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करने, ब्राह्मणों को भोजन कराने और क्षमा मांगने से वे पाप से मुक्त हो सकते हैं।


दानवीर राजा- रंतिदेव

नरक चतुर्दशी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की है। कथा के अनुसार नरकासुर नामक राक्षस ने देवताओं और मनुष्यों को अत्याचार से त्रस्त कर दिया था। उसने 16,000 कन्याओं का अपहरण कर उन्हें बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ युद्ध कर उसका वध किया और सभी कन्याओं को मुक्त कराया। यह घटना कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुई थी, इसलिए इस दिन को नरक चतुर्दशी कहा गया। नरकासुर के वध के बाद लोगों ने दीप जलाकर भगवान कृष्ण की विजय का उत्सव मनाया और तभी से दीपदान की परंपरा शुरू हुई।


नरकासुर 

इसी तिथि से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण मान्यता भगवान हनुमान जी के जन्म की है। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हनुमान जी के जन्म की मान्यता का पौराणिक आधार अत्यंत मजबूत है। उत्सवसिन्धु, अगस्त्य संहिता, वायु पुराण और व्रतरत्नाकर जैसे प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथों में इस तिथि का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वाल्मीकि रामायण में दिए गए खगोलीय संकेत भी इस मान्यता का समर्थन करते हैं। धार्मिक परंपराओं में यह भी माना गया है कि चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जी के पुनर्जीवन या दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का दिन था, जब इंद्र के वज्र प्रहार से मूर्छित बाल हनुमान को सभी देवताओं ने पुनर्जीवित कर अमरता का वरदान दिया था। परंतु उनका वास्तविक जन्मदिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का दिन माना गया है। इसीलिए इस दिन हनुमान जी की विशेष पूजा का विधान है। भक्त इस दिन वायु पुत्र हनुमान को शक्ति, साहस और अमरता के प्रतीक रूप में पूजते हैं।


रुद्रावतार- हनुमान

नरक चतुर्दशी पर शाम के समय यम दीपक जलाने की परंपरा भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह दीपक आटे से बनाया जाता है और उसमें सरसों का तेल डाला जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह दीपक यमराज को प्रसन्न करता है और अकाल मृत्यु के भय से रक्षा करता है। कई घरों में यह दीपक घर के चारों ओर घुमाकर बाहर रखा जाता है ताकि नकारात्मक ऊर्जा घर से बाहर चली जाए। दीपक के साथ काले तिल और धान के लावा रखने का भी विधान है जो समृद्धि और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।


आटें और सरसों के तेल से बने दिए

नरक चतुर्दशी की पूजा दो भागों में होती है, सुबह अभ्यंग स्नान और शाम को यम दीपदान। स्नान के समय एक विशेष मंत्र का जाप किया जाता है जिससे शरीर और मन की पवित्रता बनी रहती है। शाम को घर के आंगन और द्वार पर दीपक जलाए जाते हैं और यमराज के नाम का विशेष दीप रखा जाता है। इस दिन व्रत रखने, तेल दान से बचने, मांसाहार न करने और देर तक न सोने की सलाह दी जाती है।

नरक चतुर्दशी केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं बल्कि जीवन के संतुलन का भी प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो, अच्छाई की विजय निश्चित है। नरकासुर की कथा से धर्म की जीत और रंतिदेव की कथा से प्रायश्चित की महत्ता का संदेश मिलता है। इस दिन किया गया तेल स्नान, दीपदान और यम पूजा न केवल परंपरा है, बल्कि यह हमारे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के लिए भी लाभकारी है। यह पर्व बताता है कि जीवन में स्वच्छता, अनुशासन और आध्यात्मिकता को अपनाकर मनुष्य सभी प्रकार के भय, पाप और नकारात्मकता से मुक्त हो सकता है। इसी कारण नरक चतुर्दशी दीपोत्सव का एक अर्थपूर्ण और जीवनोपयोगी पर्व माना जाता है जो धर्म, विज्ञान और लोकजीवन तीनों का सुंदर संगम है।

लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

Follow us on social media and share!