आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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पौष माह और उसकी महत्ता

पौष माह और उसकी महत्ता

भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रकृति ने खुले हाथों से अपना आशीर्वाद लुटाया है। यहाँ भौगोलिक दृष्टिकोण से अनगिनत विविधताएँ दिखाई देती हैं। यह विविधता एक ओर हमारे देश को सुंदर और अनुपम बनाती है, वहीं कुछ लोग अपनी दृष्ट बुद्धि के चलते इसे विभाजन के हथियार की तरह प्रयोग करते हैं। पौष माह और उससे जुड़ी परम्पराएँ एक अवसर है जो हमें भारत की सांस्कृतिक एकता और उससे सम्बद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक यात्रा का अवसर प्रदान करती है।

जब हम अपनी संस्कृति, तीज-त्योहारों, परंपराओं और दर्शन को गहराई से जानते हैं, तो पाते हैं कि यह विविधता केवल भौगोलिक स्तर पर है। जैसे एक वृक्ष की अनगिनत शाखाएँ हों, लेकिन उसकी जड़ें ही उसे एक आधार देने का कार्य करती हैं, वैसे ही हमारे सांस्कृतिक पक्ष भी उन जड़ों की भाँति हैं जो पूरे भारतीय समाज को एक स्थान पर लाकर जोड़ती हैं।

भारतीय राष्ट्रीय पंचांग, जो शक संवत पर आधारित है, के अनुसार पौष माह वर्ष का दसवाँ महीना होता है जिसका आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत महत्व है । मान्यतानुसार यह माह देवताओं और पितरों को आदर और सम्मान देने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। पौष मास की अमावस्या या अन्य शुभ दिनों में तर्पण से पितृदोष दूर होता है और पितर प्रसन्न होते हैं।


शक सम्वंत पर आधारित भारतीय राष्ट्रीय पंचांग 

आध्यात्मिक दृष्टि से यह माह अत्यंत पवित्र माना गया है। इस माह में दान-पुण्य की सार्थकता बहुत बढ़ जाती है। कुछ विद्वान इस माह का नाम पुष्य नक्षत्र से जुड़ा हुआ बताते हैं। स्कंद पुराण में भी इस माह की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यतानुसार यदि इस माह में विशेषकर पूर्णिमा के दिन बर्तन, गुड़ और पुराण का दान दिया जाए, तो अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

यदि हम दान के आध्यात्मिक पक्ष के इतर तार्किक पक्ष पर विचार करें, तो एक स्पष्ट चित्र उभरता है। जब फसल कार्य से निवृत्त होकर लोगों के पास खर्च करने की क्षमता आ जाती है, तब दान-पुण्य के माध्यम से वे हमारी पुरातन अवधारणा "सामूहिक विकास" का कार्य करते हैं। गुड़ का दान इस बात का संकेत है कि आपसी सहयोग से हम दूसरों के जीवन में मिठास ला सकते हैं। बर्तन का दान पारिवारिक जीवन में सहयोग का प्रतीक है, और पुराण का दान संभवतः जीवन में विद्यार्जन की महत्ता को बताने के लिए किया जाता है।

पौष माह भारत के विभिन्न राज्यों में अनेक त्योहारों का साक्षी बनता है, जो हमारी सांस्कृतिक एकता को दर्शाते हैं। पौष पूर्णिमा या शाकंभरी जयंती उत्तर भारत में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। पोंगल तमिलनाडु का प्रमुख फसल उत्सव है जो चार दिनों तक चलता है - भोगी पोंगल, सूर्य पोंगल, मट्टू पोंगल और कन्नुम पोंगल। इसी समय आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति मनाई जाती है।

कर्नाटक क्षेत्र में पूजी जानी वाली बनशंकरी देवी जिन्हें शाकम्भरी देवी के नाम से भी जाना जाता है और जिन्हें माता पार्वती का एक अवतार माना जाता है उनकी भी विशेष पूजा अर्चना इसी मास में की जाती है।असम में माघ बिहू या भोगाली बिहू फसल कटाई का उत्सव है जिसमें मेजी जलाई जाती है और पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। पंजाब में लोहड़ी अग्नि देवता को समर्पित त्यौहार है जिसमें अलाव के चारों ओर नृत्य किया जाता है। गुजरात में उत्तरायण या मकर संक्रांति के दिन पतंगबाजी का विशेष आयोजन होता है।

बिहार और झारखंड में खिचड़ी पर्व या तिल संक्रांति मनाई जाती है जिसमें तिल और गुड़ के व्यंजन बनाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और खिचड़ी दान का विशेष महत्व है। महाराष्ट्र में इस दिन को तिल गुड़ घ्या, गोड़ गोड़ बोला (तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो) की परंपरा से मनाया जाता है।


पौषमाह में देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मनाये जाने वाले त्यौहार

राजस्थान में मकर संक्रांति पर पतंगबाजी के साथ-साथ तिल के लड्डू और गजक बांटने की परंपरा है। पश्चिम बंगाल में पौष पार्बन और पौष मेला शांतिनिकेतन में आयोजित होता है, जहाँ पिठे-पुली (पारंपरिक मिठाइयाँ) बनाई जाती हैं। ओडिशा में मकर संक्रांति को मकर चौला के नाम से जाना जाता है।

इस माह को मलमास या खरमास भी कहा जाता है। मार्कंडेय पुराण में एक रोचक कथा मिलती है। एक बार जब सूर्यदेव भ्रमण पर थे, तब उनके घोड़ों को बड़ी प्यास लगी। सूर्यदेव के सामने दुविधा आ खड़ी हुई - यदि वे अपना भ्रमण रोक देंगे तो प्रकृति में असंतुलन आ जाएगा, और यदि वे अपने घोड़ों को विश्राम न दें तो यह न्यायपूर्ण नहीं होगा।

उन्होंने एक युक्ति निकाली और घोड़ों को विश्राम के लिए छोड़कर खरों (गधों) को अपने रथ को खींचने का दायित्व दे दिया। चूँकि गधों और घोड़ों की परिभ्रमण क्षमता में अंतर होता है, अतः सूर्य की गति धीमी और न्यूनकोण पर आ गई। इसलिए इस समय परछाई काफी लंबी बनती है और सूर्य की किरणों का तेज हम तक उस तीव्रता से नहीं पहुँच पाता।


खरमास 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस माह सूर्य देवगुरु बृहस्पति के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करने के लिए उनकी सेवा में रहते हैं। अपने गुरु के सम्मान में वे अपना तेज और शक्ति कुछ समय के लिए कम कर लेते हैं, और सेवाकाल के समाप्त होते ही मकर संक्रांति को पुनः अपनी पूर्ण शक्ति के साथ अपना कार्य आरंभ कर देते हैं। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि खरमास कोई अशुभ काल नहीं बल्कि यह सूर्य की गति और प्रकृति के संतुलन का वह माह है जब ऊर्जा का संक्रमणकाल होता है ।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय ध्यान, दान और पितरों के सम्मान के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। जो भ्रम फैलाया गया है कि खरमास में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए, उसके पीछे एक वैज्ञानिक तर्क निहित है। जब ऊर्जा के मूल स्रोत सूर्य का ही तेज कम हो गया है, तो प्राकृतिक तौर से हमारी भी ऊर्जा का स्तर कुछ निम्न हो जाता है।


खरमास की समाप्ति के साथ उत्तरायण होते सूर्य 

जब हमारी जठराग्नि ही मंद होगी, तब शरीर में स्फूर्ति का भी कुछ अभाव हो जाएगा। इसलिए ध्यान और आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न रहने से हम ऊर्जा के इस असंतुलन के साथ सरलता से साम्यता स्थापित कर पाएंगे। इस समय आदित्य हृदयस्तोत्र, विष्णु सहस्रनाम और सूर्यदेव से संबंधित मंत्रों का पाठन-श्रवण बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।

इस प्रकार यदि हम हमारी संस्कृति के बहुमुखी पक्षों पर विचार करें, तो सनातन सभ्यता बहुत ही वैज्ञानिक और तार्किक प्रतीत होती है। पौष माह के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि कैसे हमारी परंपराएँ आध्यात्मिकता, विज्ञान और सामाजिक कल्याण का अद्भुत समन्वय हैं। यह वह जड़ें हैं जो भारत की विविधता को एकता के सूत्र में पिरोती हैं।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

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