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सामाजिकता और संस्कृति

सामाजिकता और संस्कृति

संस्कृति सामाजिक संरचना का सबसे प्रमुख घटक है, क्योंकि इसी के अनुसार विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ क्रियाशील रहती है। प्रत्येक समाज की अपनी संस्कृति होती है और समाज के स्वरूप पर ही संस्कृति का स्वरूप निर्भर करता है। हम जो कुछ है, संस्कृति की देन है। हमारे विचारों के अनुरूप ही हमारा रहन-सहन, रीति-रिवाज़, खान-पान, पहनावा, भाषा, विश्वास, आदर्श, इच्छाएँ व आचरण होता है; वैसा ही हम धर्म खड़ा करते हैं और उसी तरह की कलाकृतियां और साहित्य रच लेते हैं। अर्थात्-हमारा सृजन सापेक्षिक होता है।

मिलजुल कर संस्कृति निर्मित होती है। कभी-कभी व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप आचरण और सृजन नहीं करता है। उसका आचरण और सृजन उसके विचारों से भिन्न होता है। बहुत से व्यक्तियों के विचार तथा कर्म अनैतिक, असामाजिक और दूषित होते हैं। यदि विचारों के अनुरूप आचरण को संस्कृति मान लिया जाए तो क्या अनैतिक और असामाजिक व्यवहारो को भी सस्कृति कहा जा सकता है? निश्चित रूप से अनैतिक और असामाजिक कार्य अथवा व्यवहारों को संस्कृति नहीं कहा जा सकता।

हमारे सीखे हुए व्यवहार ही संस्कृति नहीं है, अपितु हमारे जीवन यापन के जो विशिष्ट प्रकार विकसित हो जाते हैं, हमारी संस्कृति के अंग होते है, इनका ही हम अनुकरण करते हैं या करना चाहते हैं। इसमें दो राय नहीं कि चोरी, डकैती, हिंसा, अनाचार, असत्य, भ्रष्टाचार का व्यवहार समाज में होता है, किन्तु ये सब किसी भी समाज अथवा समूह का आदर्श नहीं हो सकते।

यदि ये व्यवहार जीवन के आदर्श होते तो चोर अपने बेटे को चोरी करने की ही प्रेरणा और प्रोत्साहन देता, चरित्रहीन या लम्पट व्यक्ति अपने बच्चों को लम्पटता की प्रेरणा देता, किन्तु ऐसा नहीं होता है। चोर भी अपने बच्चों को सच्चरित्र देखना चाहता है। कोई नहीं चाहता कि उसके बच्चे झूठ बोलें या अनाचार करें, क्योंकि समाज की नज़र में ये व्यवहार अच्छे नहीं है। चूंकि अच्छे व नैतिक नहीं हैं, इसलिए आदर्श नहीं हैं।

यानी, नैतिकता ही शुभ है और संस्कृति का आधार है। दूसरे शब्दों में, हमारे नैतिक व्यवहार का ढाँचा संस्कृति है। समाज संस्कृति का निर्माण करता है और संस्कृति को समाज आदर्श के रूप में अपनाता है, इसलिए संस्कृति समाज को बनाती है। अर्थात्, संस्कृति और समाज दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं होता, समाज बनता है परस्पर मेलजोल और भाईचारे की भावना से। यह होता है सहकर्म और अन्तर्व्यवहारों से। देखना चाहिए कि अन्तर्व्यवहार इस प्रकार के हों, कि वे सामाजिक सम्बन्धों का निर्माण कर सकें और आदर्श बन सकें।

स्वार्थ, छल कपट, लूट-खसोट और विषमतामूलक व्यवहार से सामाजिक सम्बन्ध विकसित नहीं हो सकते और यदि सम्बन्ध बन जाएं तो वे दीर्घकालिक और प्रभावी नहीं हो सकते। इससे भी बड़ी बात यह है कि वे आदर्श तो हो ही नहीं सकते। इसलिए ये सभी व्यवहार न समाज का आधार हो सकते है और न संस्कृति का। संस्कृति के संबंध में हमारी यही परम्परागत सोच रही है।

कहने की जरूरत नहीं है कि एक लम्बे समय से सत्य, सदाचार, अहिंसा, प्रेम, त्याग और नैतिकता भारतीय समाज में जीवन मूल्यों के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। कोई भी आचरण या व्यवहार तभी मूल्यवान है, जब उसकी उपयोगिता है। उपयोगिता के आकलन का आधार केबल व्यवहार है। कोई चीज जितनी कम या अधिक व्यवहार में आती है, उतनी ही वह कम या अधिक उपयोगी है, उसी के अनुसार उसका मूल्य होता है।

परम्परा और सैद्धांतिकता से अलग हटकर देखें तो हम पाते हैं कि आज के सामाजिक जीवन में प्रस्थापित जीवन मूल्यों में तेजी से बदलाव आ रहा है। इससे सामाजिक सम्बन्ध भी प्रभावित हो रहे हैं। सामूहिकता और राहकार या सहकर्म की जगह वैयक्तिकता प्रबल होती जा रही है। समाज विघटित हो रहा है, सम्बन्धों की मधुरता और प्रेम कम हो रहे हैं। मेल-जोल कम हो रहा है, साथ रहने की भावना खत्म होती जा रही है। समाज का परम्परागत ढौचा बदल रहा है, परिवार टूट रहे हैं। संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बदल रहे है, हालाँकि इसका कारण बहुत हद तक आर्थिक है। परम्परागत समाज व्यवस्था कृषि आधारित थी। साधन कम थे। खेती ही अर्थ-व्यवस्था अथवा जीविका का आधार थी और एक व्यक्ति खेती नहीं कर सकता था, उसके लिए समूह की आवश्यकता थी।

 

 

समूह की आवश्यकता ने ही संयुक्त परिवार व्यवस्था को जन्म दिया था। संयुक्त परिवार में रहते हुए परिवार के सभी सदस्यों के पारस्परिक संबंध प्रेमपूर्ण, सहयोगी और त्यागपूर्ण होते थे। सब मिल-जुलकर एकता और समता के साथ रहते थे। किन्तु औद्योगीकरण के विकास ने परिवारों की इस एकता को तोड़ा है।

आज दो भाई साथ-साथ नहीं रहते, उनके बच्चे एक-दूसरे से परिचित तक नहीं होते। विवाह होकर चले जाने के बाद भाई-बहनों के संपर्क बहुत कम हो पाते हैं। इससे स्वाभाविक रूप से संबंधों की गर्मी कम हो जाती है। पहले जीवित रहते भाइयों के बीच सपत्ति का बटवारा शायद ही होता था, लेकिन अब वयस्क और विवाहित होते ही भाइयों के बीच बटवारा हो जाता है। इसके लिए कलह और मार पीट तक होती है।

कानून बन जाने के बाद भी कुछ दशक पहले तक महिलाएँ माता-पिता की सम्पत्ति में से अपना हिस्सा नहीं मांगती थीं। प्रायः भाइयों के लिए ही वे सब कुछ छोड़ देती थी और भाई जीवन भर उनका मान-सम्मान और स्वागत सत्कार करते थे, उनके हर दुःख तकलीफ में काम आने को तत्पर रहते थे। लेकिन आज शहरी समाजों में बहुत बड़ी संख्या में लड़कियों भाईयों के साथ लड़-झगड़कर माता-पिता की सम्पत्ति में से अपना हिस्सा ले रही है।

भाई बहन के सबंध और त्याग की भावना हमारी संरकृति की विरासत रहे है। अर्थ के कारण यह विरासत नष्ट होने के कगार पर पहुँच रही है, क्योंकि अर्थ सामाजिक संबंधों का बहुत बड़ा आधार है। अर्थ के आधार पर संबंध बनते बिगड़ते है। इसलिए सामाजिक संबंधों की मधुरता, प्रेम, सद्भाव इत्यादि अर्थ पर निर्भर हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि औद्योगीकरण के विकास से जहाँ समाज आर्थिक प्रगति की दिश में आगे बढ़ा है, वही सामाजिक सबंध भी प्रभावित हुए हैं। आर्थिक उन्नति और शिक्षा का प्रसार जहाँ व्यक्ति को सभ्य और स्वावलम्बी बनाते हैं, जीने के नए रंग-ढंग सिखाते है, वहीं वे संस्कृति से लोगों को विमुख भी करते हैं। आजकल अंग्रेजी पढ़ना और बोलना एक चलन है। इसलिए चारों ओर पब्लिक और कान्वेंट स्कूलों की भरमार है। बच्चों को इन स्कूलों में प्रवेश दिलाने की होड़ लगी है।

अंग्रेजी पश्चिम की भाषा है इसलिए जाहिर है, अंग्रेजी के जरिए पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का प्रवेश भारतीय जीवन में तेजी से हुआ है। उसे अपनाने के लिए नयी पीढ़ी तत्पर है। आचरण और व्यव्हार में खुलापन होना किसी भी समाज के लिए अच्छी बात है, किन्तु खुलेपन का मतलब स्वछन्दता मानकर उसे अपनाने से समाज का कितना हित होगा कहना मुश्किल है।

अर्द्धनग्न अवस्था में रहना, सिगरेट-शराब अर्थात मादक पदार्थों का सेवन करना, कपडो की तरह पति-पत्नी बदलना मुख्य रूप से पश्चिम की सभ्यता या सस्कृति को दर्शाते हैं। भारत के संदर्भ में ये मानवीय विकास में कितने सहायक होंगे यह विचार का विषय है। इनके अन्धाकुरण का भारतीय सामाजिक जन-जीवन पर क्या असर पड़ेगा, यह भी सोचनीय है। सदैव अच्छी और प्रगत्तिमूलक बातों का अनुकरण किया जाना चाहिए।
 

पश्चिम ने आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में बहुत प्रगति की है। उसका अनुकरण किया जाना चाहिए, न कि इस बात का कि ये किस तरह से कपड़े पहनते हैं, किस तरह शराब पीते हैं, खाना खाते है, उठते-बैठते हैं. नाचते-गाते हैं, चुम्बन लेते देते है। यह भी देखा जाना चाहिए कि वे अपने कर्तव्यों के प्रति कितने ईमानदार है. फैक्टरी या दफ्तरों में कितने परिश्रम और निष्ठा से काम करते हैं. राष्ट्र के प्रति कितने समर्पित हैं।

किसी भी समाज में शासित वर्ग की यह प्रवृत्ति होती है कि वह प्रभुतासंपन्न वर्ग को प्रसन्न कर उसकी कृपादृष्टि की लालसा में उसका अनुसरण करता है। भारतीय समाज ने अंग्रेजों की आदतों का इस हद तक अनुकरण किया कि उनको भी अपनी संस्कृति का हिस्सा मानने लगे। अनुकरण प्रायः दुष्प्रभावी होते है। किसी सम्पन्नः व्यक्ति की नकल करने के लिए उसी तरह के कपड़े, सूट, टाई, उसी की तरह का सिगरेट या पाइप, उसी की तरह गाड़ी आदि चाहिए।

एक सामान्य व्यक्ति के पास चूंकि यह सब नहीं होता, इसलिए वह इन्हें पाने का प्रयत्न करता है और चोरी, हिंसा आदि अनेक कुप्रवृत्तियों का शिकार होता है। समाज में अनाचार बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है। मीडिया की भी इसमें बड़ी भूमिका है। मीडिया में जिस तरह की चीजे दिखाई जाती है, समाज उनसे प्रभावित होता है। दूरदर्शन पर जब रामायण सीरियल का प्रसारण हुआ तो पूरा हिन्दी समाज राममय हो गया यह उदाहरण हमारे सामने है।

'शक्तिमान' सीरियल देखकर बच्चों द्वारा 'शक्तिमान' की नकल के प्रयास में अपनी जान गँवाने या घायल हो जाने की खबरें हम समाचार पत्रों में पढ़ चुके हैं। एक अर्द्धशिक्षित, अर्द्धविकसित समाज की यह त्रासदी होती है कि वह इस तरह के प्रभावों से अधिक और जल्दी ग्रस्त होता है। भारतीय समाज इस त्रासदी से मुक्त नहीं है। मीडिया जैसी भाषा बोलता है, जैसी चीज़े परोसता है, समाज उसी को आदर्श मानकर अपना लेता है।

यही वजह है कि भारतीय संस्कृति के प्रमुख घटक लोकगीत, संगीत व कलाएँ लुप्त होती जा रही है और यदि जीवित हैं तो अपने शुद्ध रूप में नहीं, विकृत रूप में। गाँवों में ढोला व सांगों में नवीनतम फिल्मी गानों की भरमार होती है और लोक कलाकार इन गानों की धुनों पर भटकते रहते है। औरतों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीत भी फिल्मी गीतों का प्रभाव लिए हुए हैं, न इनकी शब्दावली लोकजीवन के अनुरूप है, न भाव ही।

इन विकृतियों के पीछे आर्थिक कारण हैं। लोककलाकार भी आखिर मनुष्य हैं। जब लोककलाओं के प्रति समाज का रुझान कम हो रहा है तथा यह फिल्मों की चमक-दमक और लटकों-झटकों की ओर आकृष्ट है तो जन समुदाय को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए सांग तमाशों में फिल्मी लटकों झटकों का प्रयोग लोक-कलाकार की विवशता बन जाती है, क्योंकि इनको भी आखिर अपना पेट भरना होता है।

फिल्मों में प्रदर्शित अपसंस्कृति के पीछे भी यही प्रमुख कारण है। समाज परिवर्तन या मूल्यों की स्थापना या रक्षा पर कम तथा आर्थिक लाभ की ओर ज्यादा ध्यान होने के कारण फिल्मकार वही चीज दर्शक के समक्ष पेश करता है जिसे दर्शक पसंद करता है। यह भी ध्यान नहीं दिया जाता कि इसका प्रभाव या दुष्प्रभाव समाज और संस्कृति पर क्या पड़ेगा। अर्थात् अर्थ के चलते लोक कलाकार और फिल्मकार भी अपनी नैतिकता छोड़ रहे हैं। समाज के प्रति अपने दायित्व निर्वाह तथा ईमानदारी के अच्छे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।

स्पष्ट है कि सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट या अपसंस्कृतीकरण का मूल कारण समाज में नैतिकता का अभाव है। नैतिकता का हास हर क्षेत्र में, हर स्तर पर हो रहा है तथा 'अर्थ' इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कुछ मानवीय दुर्बलताएँ और जीवन की जटिलताएँ भी काम कर रही हैं। इन पर गहराई से सोचे जाने की जरूरत है।

श्री जयप्रकाश कर्दम
सामाजिकता और संस्कृति
"संस्कृति : अंक-01"

 

 

 

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