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दक्षिण कोसल की वैज्ञानिक प्रेरणा और रसतत्त्व के महान् ऋषि - आचार्य नागार्जुन

दक्षिण कोसल की वैज्ञानिक प्रेरणा और रसतत्त्व के महान् ऋषि - आचार्य नागार्जुन

क्या आप जानते हैं कि आधुनिक रसायनशास्त्र से सदियों पहले छत्तीसगढ़ की पावन माटी ने विश्व को एक ऐसा वैज्ञानिक दिया, जिसने ताँबे को सोने में बदलने की असाधारण कला खोजी थी? गरियाबन्द जिले के 'बालूका ग्राम' में जन्मे और प्राचीन सिरपुर विश्वविद्यालय के आचार्य रहे नागार्जुन ने पारद विज्ञान और आयुर्वेद व भेषजविज्ञान (Pharmacy) के वे रहस्य सुलझाए, जो आज भी आधुनिक विज्ञान को चकित करते हैं। आइए, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर दक्षिण कोसल के इस महान ऋषि की प्रेरक वैज्ञानिक विरासत का पावन स्मरण करें और नई पीढ़ी में महान् प्रेरणा का संचार करें!

आज जब संपूर्ण भारत 'राष्ट्रीय विज्ञान दिवस' मना रहा है, तो हमारी दृष्टि अनायास ही आधुनिक प्रयोगशालाओं, उपग्रहों और क्वांटम भौतिकी की ओर जाती है। किंतु, विज्ञान की यह यात्रा शून्य से प्रारंभ नहीं हुई थी। इस यात्रा की नींव हमारे उन ऋषियों और वैज्ञानिकों ने रखी थी, जिन्होंने उस काल में प्रकृति के रहस्यों को सुलझाया जब विश्व वैज्ञानिक चेतना के शैशव काल में था। 'दक्षिण कोसल टुडे' के इस विशेष सम्पादकीय में, आज हम एक ऐसे महामानव का स्मरण कर रहे हैं, जिनका जन्म हमारी अपनी माटी में हुआ और जिन्होंने पूरी मानवजाति के इतिहास में रसायनशास्त्र को एक नई दिशा प्रदान की -  आचार्य नागार्जुन।

छत्तीसगढ़ का बालूका ग्राम - नागार्जुन की जन्मस्थली

आज का छत्तीसगढ़, जिसे प्राचीन काल में 'दक्षिण कोसल' के रूप में जाना जाता था, केवल अपनी प्राकृतिक छटा, कला व व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि बौद्धिक संपदा के लिए भी विख्यात रहा है। वर्तमान गरियाबन्द जिले में पैरी नदी (जिसे प्राचीन काल में पार्वती नदी कहा जाता था) के तट पर स्थित बालूका ग्राम (आज का बालू गाँव) आचार्य नागार्जुन की जन्मस्थली है। सुरम्य पर्वतमालाओं की गोद में बसे इस ग्राम में कौडिन्य गोत्र के एक सात्विक दाक्षिणात्य ब्राह्मण परिवार में नागार्जुन का जन्म हुआ। उनके जन्म के साथ जुड़ी लोककथाएँ उन्हें एक ईश्वरीय वरदान बताती हैं। ऐसा कहा जाता है कि ज्योतिषियों ने उनकी जन्म कुंडली देखकर उनके अल्पायु होने की भविष्यवाणी की थी, किंतु नियति ने उनके लिए कुछ और ही निर्धारित कर रखा था। अपनी मेधा के बल पर उन्होंने अल्पायु में ही न केवल वेद-वेदांगों का अध्ययन पूर्ण किया, बल्कि वे वैज्ञानिक अनुसंधान की उस दिशा में मुड़ गए जिसने उन्हें अमर बना दिया।

श्रीपुर विश्वविद्यालय मे नागार्जुन

नागार्जुन की शिक्षा-दीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव श्रीपुर (आज का सिरपुर) रहा। ईसा की दूसरी शताब्दी के आसपास, श्रीपुर महाकौशल की राजधानी ही नहीं, बल्कि भारत में शिक्षा का एक महान वैश्विक केंद्र था। यहाँ एक विशाल विश्वविद्यालय था, जहाँ देश-देशांतर के छात्र अध्ययन करने आते थे। नागार्जुन यहाँ विद्यार्थी बनकर आए, बौद्ध दर्शन में दीक्षित हुए और अपनी अद्वितीय विद्वत्ता के कारण कालान्तर में इसी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक और आचार्य बने। सिरपुर की वह धरती, जहाँ आज हम केवल खंडहर देखते हैं, कभी नागार्जुन की रासायनिक प्रयोगशालाओं की साक्षी रही होगी।

सिरपुर का पुरातात्विक अवशेष
सिरपुर का पुरातात्विक अवशेष 

रसायनशास्त्र में योगदान

आचार्य नागार्जुन को प्राचीन भारत का 'रसायनशास्त्री' कहना उनके व्यक्तित्व के केवल एक पक्ष को छूना है; वे वास्तव में आधुनिक 'मेटालर्जी' (धातु विज्ञान) के जनक थे। उनके हस्तलिखित नोट्स और ग्रंथों, जैसे 'रसरत्नाकर', 'रसेन्द्रसार संग्रह', और 'रस हृदय' में जिन प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है, वे आज भी वैज्ञानिकों को चकित करती हैं।

नागार्जुन ने पारे (Mercury) पर अभूतपूर्व शोध किए। उन्होंने पारे के अयस्क 'सिनाबार' (Cinnabar) से शुद्ध पारा प्राप्त करने की आसवन विधि (Distillation) खोजी। उनका मानना था कि पारा धातुओं का राजा है। उन्होंने केवल धातुओं का शोधन ही नहीं किया, बल्कि मिश्र धातुओं (Alloys) के निर्माण और धातुओं के मारण (Bhasma process) की विधि भी सुझाई। 'कैलेमाइन' से जस्ते (Zinc) का निष्कर्षण करने की उनकी तकनीक आधुनिक विज्ञान के लिए भी एक मील का पत्थर है।

उनके ग्रंथ 'कक्षकपुटतंत्र', 'आरोग्य मंजरी', 'योगसार' और 'योगाष्टक' न केवल रसायन, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के अनमोल कोष हैं। उन्होंने सुश्रुत संहिता में 'उत्तर तन्त्र' नामक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़कर आयुर्वेद को एक नई गहराई प्रदान की।

आचार्य नागार्जुन द्वारा रचित रसायन - ग्रन्थ 
आचार्य नागार्जुन द्वारा रचित रसायन - ग्रन्थ 

विज्ञान का लक्ष्य है मानवता की सेवा

नागार्जुन केवल प्रयोगशाला के बंद कमरों के वैज्ञानिक नहीं थे। उनका विज्ञान लोक-कल्याण के लिए समर्पित था। महाकौशल के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि जब यहाँ बारह वर्षों का भीषण अकाल पड़ा, तब प्रजा दाने-दाने को मोहताज हो गई। उस समय यहाँ के राजा आर्यदेव ने आचार्य नागार्जुन से सहायता माँगी।

नागार्जुन ने एकांतवास में जाकर अपनी रासायनिक प्रतिभा का उपयोग किया और राज्य के समस्त ताँबे को अपनी वैज्ञानिक प्रविधि से स्वर्ण में परिवर्तित कर दिया। उस स्वर्ण को बेचकर अन्न खरीदा गया और प्रजा को भुखमरी से बचाया गया। यद्यपि आधुनिक विज्ञान में 'कीमियागिरी' (Transmutation) को एक विवादास्पद विषय माना जाता है, किंतु यह जनश्रुति उस भारतीय जीवनदृष्टि का प्रतीक है कि समस्त मानवीय कार्यकलापों का ध्योय जीवमात्र की सेवा करना ही है। इसी परम्परा में नागार्जुन का समग्र वैज्ञानिक अनुसंधान ही समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान के लिए समर्पित था।

दार्शनिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्मकता

नागार्जुन केवल एक वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि एक महान् दार्शनिक भी थे। उन्होंने 'शून्यवाद' का सिद्धांत दिया और बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय के 'माध्यमिक सिद्धांत' की नींव रखी। उन्होंने वैदिक दर्शन और बौद्ध दर्शन के बीच एक सामंजस्यपूर्ण समन्वय स्थापित किया, जिससे भारत की राष्ट्रीय एकात्मकता को बल मिला। उनकी विद्वत्ता का ही प्रभाव था कि उन्हें विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति (Vice-Chancellor) बनाया गया और कश्मीर में हुई अखिल विश्व बौद्ध महासंघ की अध्यक्षता का सम्मान भी उन्हें मिला।

वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज जब हम विज्ञान दिवस मना रहे हैं, तो हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम नागार्जुन की उस शोध-परंपरा को आगे बढ़ा पा रहे हैं? छत्तीसगढ़ के बालक-बालिकाओं और किशोर-किशोरियों के लिए नागार्जुन एक प्रेरणास्रोत होने चाहिए। उनका जीवन हमें सिखाता है कि:

संसाधनों का अभाव बाधा नहीं है: एक छोटे से गाँव बालूका से निकलकर नालंदा के कुलपति बनने तक की यात्रा केवल जिज्ञासा और कठोर परिश्रम से ही संभव है।
प्रकृति ही सबसे बड़ी प्रयोगशाला है: नागार्जुन ने वनस्पति, अम्ल और खनिजों के माध्यम से औषधियों का निर्माण किया। हमारे छत्तीसगढ़ की जैव-विविधता आज भी नए शोधों के लिए हमे पर्याप्त संसाधन प्रदान रही है।
विज्ञान का लक्ष्य जनकल्याण हो: हमारा शोध केवल पेटेंट लेने के लिए न हो, बल्कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के कष्टों को दूर करने के लिए हो।


पिछले दो हजार वर्षों से भारत की उज्ज्वल वैज्ञानिक परमेपका के ध्वजवाहकों के प्रेरणास्रोत आचार्य नागार्जुन की स्मृति को जीवित रखने के लिए आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी पर बने विशाल बाँध का नाम 'नागार्जुन सागर' रखा गया है। रायपुर में स्थित छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े विज्ञान महाविद्यालय का नाम भी आचार्य नागार्जुन के सम्मान में “शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय रखा गया है। किंतु छत्तीसगढ़ के लिए वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि 'मिट्टी का सौरभ' हैं। नागार्जुन की मेधा की प्रयक्षदर्शी रहां सिरपुर के खण्डहरों की वे ईंटें आज भी हमें उनके उत्स का परिचय करा रही हैं।

नागार्जुन सागर
नागार्जुन सागर

इस विज्ञान दिवस के इस अवसर पर, आइए हम संकल्प लें कि हम अपने बच्चों में नागार्जुन जैसी वैज्ञानिक दृष्टि विकसित करेंगे। हम छत्तीसगढ़ की इस धरा को पुनः अनुसंधान और नवाचार का केंद्र बनाएँगे। यदि हम ऐसा कर पाए, तभी हम सच्चे अर्थों में इस महान वैज्ञानिक ऋषि को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे।

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