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पूस माह में पूजी जाती हैं बनशंकरी देवी

पूस माह में पूजी जाती हैं बनशंकरी देवी

कर्नाटक राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में बनशंकरी देवी, जिन्हें शकुंभरी देवी के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। तिलकारण्य वन से जुड़ी उनकी पौराणिक कथा तथा चोलाचिगुड में स्थित बनशंकरी मंदिर, दोनों मिलकर देवी के उस स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं जो विनाश नहीं, बल्कि संरक्षण, पोषण और लोककल्याण का प्रतीक है। देवी को माता पार्वती का अवतार माना जाता है, जिनका प्राकट्य अधर्म के नाश के साथ-साथ जीवन के पुनर्स्थापन के लिए हुआ।

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में तिलकारण्य वन क्षेत्र दुर्गमासुर नामक एक क्रूर दैत्य के अत्याचारों से ग्रस्त था। उसके भय और उत्पीड़न के कारण निर्दोष स्त्री, पुरुष और छोटे-छोटे बच्चे भीषण कष्ट भोग रहे थे। दैत्य के आतंक के साथ-साथ क्षेत्र में भयंकर अकाल भी फैल गया, जिससे अन्न और जल का अभाव हो गया और जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। विवश होकर लोगों ने एक स्वर में माता पार्वती से करुण प्रार्थना की।

भक्तों की पुकार सुनकर माता पार्वती ने सहायता का संकल्प लिया। उन्होंने अपनी एक योगिनी को यज्ञ से अवतार लेने का आदेश दिया। यज्ञ की पावन अग्नि से देवी प्रकट हुईं और दुर्गमासुर के साथ एक भीषण युद्ध किया। इस युद्ध में देवी ने दैत्य का संहार कर अधर्म का अंत किया और क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त कराया।


दुर्गामासुर वध
 

दैत्य-वध के पश्चात देवी ने केवल विजय प्राप्त कर लौटने का मार्ग नहीं चुना, बल्कि पीड़ित मानव समाज के जीवन के पुनर्निर्माण का दायित्व भी स्वयं वहन किया। उन्होंने लोगों को शाक-सब्जियाँ और जल प्रदान किया, जिससे अकाल का अंत हुआ और धरती पुनः उर्वर हुई। शाक प्रदान करने वाली देवी होने के कारण उन्हें शकुंभरी देवी कहा गया। देवी के आशीर्वाद से जनजीवन में पुनः आशा और स्थिरता का संचार हुआ। संभवतः इसलिए इसे पौष माह में मनाया जाता है क्योंकि इस माह में दान-पुण्य का विशेष महत्त्व होता है ।


शकुंभरी देवी

देवी को बनशंकरी अथवा वनशंकरी के नाम से भी पूजा जाता है। ‘बन’ या ‘वन’ का अर्थ है जंगल और ‘शंकरी’ का अर्थ है भगवान शिव की अर्धांगिनी। चूँकि देवी का प्राकट्य वन क्षेत्र में हुआ और वे माता पार्वती का अवतार हैं, इसलिए उन्हें बनशंकरी कहा गया। यह नाम देवी के वनवासी स्वरूप और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को भी दर्शाता है। प्राचीन ग्रंथ स्कंद पुराण में भी बनशंकरी देवी का उल्लेख मिलता है, जहाँ उनके द्वारा दुर्गमासुर वध का वर्णन किया गया है।

बनशंकरी मंदिर कर्नाटक का एक प्रसिद्ध एवं अत्यंत पूजनीय तीर्थस्थल है। यह मंदिर चोलाचिगुड में स्थित है, जो बादामी से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है। बादामी अपने प्राचीन गुफा मंदिरों के लिए प्रसिद्ध एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और पर्यटन केंद्र है।


बनशंकरी मंदिर-कर्नाटक

माना जाता है कि प्रारंभ में बनशंकरी मंदिर का निर्माण कल्याण के चालुक्य राजाओं द्वारा किया गया था, जबकि वर्तमान मंदिर संरचना का स्वरूप 17वीं शताब्दी से संबंधित है। यह मंदिर प्राचीन स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है और दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला की परंपरा को प्रतिबिंबित करता है। यह भी माना जाता है कि बनशंकरी देवी चालुक्य वंश की कुलदेवी थीं।

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित बनशंकरी देवी की प्रतिमा देवी को बैठी हुई मुद्रा में दर्शाती है। देवी सिंह पर विराजमान हैं और अपने चरणों से एक दैत्य का दमन करती हुई दिखाई देती हैं। यह प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित है। देवी को आठ भुजाओं के साथ दर्शाया गया है, जिनमें वे त्रिशूल, डमरू, कमलपत्र, घंटा, वेद ग्रंथ तथा खड्ग और खेट धारण किए हुए हैं। यह स्वरूप देवी की शक्ति, विद्या और संरक्षणकारी भूमिका को एक साथ अभिव्यक्त करता है।


माता का अष्टभुजी स्वरुप

मंदिर के सामने स्थित विशाल जलकुंड को हरिद्रा तीर्थ कहा जाता है। यह नाम ‘हरिश्चंद्र तीर्थ’ का परिवर्तित रूप माना जाता है। यह सरोवर तीन ओर से पत्थर के मंडपों से घिरा हुआ है और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हरिद्रा तीर्थ देवी के जीवनदायिनी स्वरूप और शुद्धता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।


हरिद्रातीर्थ

बनशंकरी मंदिर में प्रतिवर्ष जनवरी–फरवरी के महीनों में एक भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर देवी की प्रतिमा को रथ में स्थापित कर पूरे क्षेत्र में शोभायात्रा निकाली जाती है। इस उत्सव में कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र सहित अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं और संपूर्ण क्षेत्र भक्तिमय वातावरण से भर उठता है।
इस प्रकार बनशंकरी देवी अथवा शकुंभरी देवी की कथा और उनसे जुड़ा बनशंकरी मंदिर केवल एक पौराणिक या स्थापत्य विरासत नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, प्रकृति और करुणा के गहरे संबंध की जीवंत अभिव्यक्ति है। देवी का यह स्वरूप हमें यह संदेश देता है कि सच्ची शक्ति केवल विनाश में नहीं, बल्कि जीवन के संरक्षण, पोषण और संतुलन में निहित होती है।

लेख-
सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

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