आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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भाई दूज : प्रेम, आस्था और पारिवारिक बंधन का पर्व

भाई दूज : प्रेम, आस्था और पारिवारिक बंधन का पर्व

भारत विविध संस्कृतियों, परम्पराओं और त्योहारों का देश है। यहाँ प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन दर्शन, सामाजिक एकता और पारिवारिक संबंधों की गहराई का प्रतीक होता है। इन्हीं में से एक है भाई दूज, जिसे देश के विभिन्न भागों में भैया दूज, भाऊ बीज, भाई फोंटा या यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व दीपावली के पाँचवे और अंतिम दिन मनाया जाता है और भाई-बहन के स्नेह एवं विश्वास का उत्सव है ।

 पौराणिक उत्पत्ति

भाई दूज की कथा कई धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं में वर्णित है। सबसे प्रसिद्ध कथा यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है, जो सूर्यदेव और उनकी पत्नी संज्ञा की संताने थीं । सूर्यदेव की पत्नी उनका तेज सहन करने में असमर्थ थीं इसलिए उन्होंने अपनी छाया को इन बच्चों को सौंप दिया और अन्यत्र निवास करने लगी। मातृत्व सुख से वंचित दोनों भाई-बहन में आपस में प्रगाढ़  प्रेम था विवाहोपरांत यमुना अपने भाई को मिलने आने का बहुत आग्रह करती परन्तु व्यस्तता के कारण यमदेव बहन की प्रार्थना स्वीकार करने में असमर्थ रहते।

एक दिन सहसा ही कार्तिक मास की द्वितीया तिथि के दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुंच गए । अत्यंत प्रसन्न होकर  यमुना ने उनका विधिपूर्वक स्वागत किया, स्वादिष्ट भोजन कराया और उनके माथे पर तिलक लगाया । बहन के प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि वे प्रतिवर्ष इस तिथि को अपनी बहन से मिलने अवश्य आयेंगे और जो भाई इस दिन अपनी बहन से तिलक करवाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कारण यह तिथि ‘यम द्वितीया’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।


मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना 

दूसरी कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध करने के बाद अपनी बहन सुभद्रा के घर जाकर विश्राम किया । सुभद्रा ने उनका स्वागत किया, तिलक लगाया और मिठाइयाँ परोसी । तब से यह तिथि भाई दूज के रूप में मनाई जाने लगी।


नरकासुर वध 

एक लोककथा के अनुसार एक बार एक भाई अपनी बहन से मिलने उसके ससुराल जा रहा था उस समय भाई का काल उसके सिर पर मंडरा रहा था जिससे रास्ते में सर्प, कांटे, नदी और दरवाजा सबने बाधा के रूप भाई की राह रोकी और उसे काल का ग्रास बनाने की चेष्टा की पर सबको अपनी बहन से अंतिम बार मिलने की अपनी इच्छा बताकर भाई ने सबसे कुछ समय मांग लिया।

जब भाई बहन से मिलकर लौटने लगा तब उससे अंतिम बार मिल पाने की बात कहकर सारी व्यथा सुनाई तब बहन ने अपने भाई के प्राणों की रक्षा का संकल्प लेते हुए कुछ तैयारियां की और भाई के साथ चल पड़ी । जैसे ही सर्प ने भाई का रास्ता रोका बहन ने उसे दूध पिलाकर, नदी को साड़ी अर्पण कर, काँटों पर भाई को लोहे के जूते पहनाकर और दरवाजे की पूजा कर सबको शांत किया और अपने भाई के प्राण बचाए ।

आज भी यह परम्पराएँ हमारे मध्य विधमान है संभवतः इसीलिए नर्मदा , यमुना नदी में आज भी साड़ी चढ़ाने के साथ ही अन्य परपराएँ भी दिखाई देती है ।


यमुना देवी को साड़ी अर्पित करते भक्त 

‘भाई दूज’ दो शब्दों से मिलकर बना है —
‘भाई’ अर्थात् भ्राता और ‘दूज’ अर्थात् अमावस्या के बाद का दूसरा दिन। यह दिन उस पवित्र बंधन का उत्सव है जो भाई-बहन के बीच विश्वास, स्नेह और कर्तव्य की भावना को पुष्ट करता है। दक्षिण भारत में इसे यम द्वितीया, पश्चिम बंगाल में भाई फोंटा, महाराष्ट्र और गोवा में भाऊ बीज, और नेपाल में भाई टीका कहा जाता है।


भाई टीका - नेपाल (बायें), भाई फोंटा - पश्चिम बंगाल (दायें)

 पर्व की विधि और परंपरा

शुभ मुहूर्त में बहनें चावल के आटे से चौक बनाती हैं। भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर चौकी पर बैठाया जाता है। रोली, चंदन और अक्षत से तिलक लगाया जाता है। कलावा बांधकर आरती उतारी जाती है और घी का दीपक जलाया जाता है। बहन भाई की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती है। भाई बहन को उपहार देता है और उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। फिर भाई अपनी बहन के हाथ का बना भोजन करता है, जो इस दिन शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। जहाँ सगी बहन न हो, वहाँ चाचा, मामा या मित्र की पुत्री को बहन मानकर तिलक कराना भी शुभ बताया गया है।

भाई दूज का सामाजिक और भावनात्मक महत्व

यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पारिवारिक एकता और प्रेम का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि जीवन के उतार-चढ़ाव में भाई-बहन एक-दूसरे के सहायक और संरक्षक बने रहते हैं। बहनें भाई की दीर्घायु, समृद्धि और सफलता की कामना करती हैं, वहीं भाई बहन की सुरक्षा और स्नेह का वचन देते हैं। यह उत्सव भारतीय परिवार की उस आत्मीयता को भी पुनर्स्थापित करता है, जो आधुनिक जीवन की व्यस्तता में कहीं धुंधली होने लगती है।

चित्रगुप्त जयंती और कायस्थ परंपरा-

वैसे तो यह पर्व सनातन परंपरा से जुड़े हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन कायस्थ समाज के बीच यह  विशेष स्थान रखता है ।इसी दिन कायस्थ समाज अपने आराध्य देव श्री चित्रगुप्त जी की पूजा भी करता है। इस दिन कायस्थ परिवार लेखनी-दवात और बही-खातों की पूजा करते हैं, जिसे चित्रगुप्त जयंती या कलम-पूजन कहा जाता है। मान्यतानुसार इस दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने वाले व्यक्ति को मरणोंपरांत नरक की यातनाएं नहीं भोगनी पड़तीं हैं ।

कोई भी कायस्थ इस दिन चौबीस घंटो के लिए कलम दवात को हाथ नहीं लगाता, इस समयावधि को “परेवा काल” के नाम से जाना जाता है । इसकी एक रोचक कथा भगवान श्री राम से जुड़ी है। कथानुसार जब वनवास पूरा करने के पश्चात भगवान श्री राम का राजतिलक होना नियत हुआ तब भारत जी ने  कुलगुरु महर्षि वशिष्ट से मनुष्यों के साथ-साथ  समस्त देवताओं को भी आमंत्रित करने का आग्रह किया परन्तु ऋषिवर से चित्रगुप्त जी को आमंत्रित न कर पाने की भूल हो गई।

 रुष्ट होकर चित्रगुप्त जी ने अनवरत चलने वाली अपनी कलम पर विराम लगा दिया । जिससे स्वर्ग और नरक में अव्यवस्था होने लगी तब राम जी ने विशेष स्तुति कर भगवान् चित्रगुप्त को मनाया और पुनः कर्मों का लेखा-जोखा सुचारू ढंग से संचालित होने लगा ।

कौन हैं  भगवान चित्रगुप्त-
भगवान चित्रगुप्त को ब्रह्म के सोलह मानस पुत्रों में से एक माना जाता है । स्कंद्पुराण के अनुसार चित्रगुप्त की उत्पत्ति ब्रह्म जी के शरीर से मानी गयी है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब यमराज अपने कार्यभार से त्रस्त हो गये तब उन्होंने ब्रह्मदेव को अपनी व्यथा सुनायी और इस समस्या का निवारण करने का अनुरोध किया तब ब्रह्मदेव इस समस्या का समाधान निकालने के उद्देश्य से ध्यानस्थ हो गए।

जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो हाथ में एक कलम, दवात, पुस्तिका और कमर में तलवार के साथ खड़े एक पुरुष को देखकर उसका परिचय पूछा जिसके प्रतिउत्तर में उस पुरुष ने ब्रह्म जी को प्रणाम किया और कहा कि मैं अपने बारे केवल इतना ही जनता हूँ की मेरी उत्पत्ति आपके शरीर से ही हुई है। कृपा कर आप मुझे मेरे कर्तव्य और दायित्वों से अवगत कराएँ ।

इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि मेरी काया से उत्पन्न होने के कारण आज से तुम्हें कायस्थ और मेरे चित्त में गुप्त रूप से निवास करने के कारण चित्रगुप्त कहा जायेगा अतः आज से तुम्हारा नाम हुआ “कायस्थ चित्रगुप्त”।अब से तुम यमराज के सखा बनकर मनुष्य के सत्कर्मों और दुष्कर्मों का लेखा-जोखा रखने का कार्य करोगे ।


भगवान चित्रगुप्त 

क्षेत्रीय विविधताएँ-

पश्चिम बंगाल में इसे भाई फोंटा कहा जाता है, जहाँ बहनें मंत्रोच्चार के साथ तिलक लगाती हैं। महाराष्ट्र और गोवा में यह भाऊ बीज कहलाता है।नेपाल में इसे भाई टीका के रूप में बड़ी श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है । भाई दूज भारतीय संस्कृति की उस संवेदना को सजीव करता है जिसमें पारिवारिक प्रेम, आस्था और कर्तव्य का संतुलन है। कार्तिक मास में पर्वों की श्रृंखला में यह अंतिम ह पर्व न केवल भाई-बहन के रिश्ते की गहराई को दर्शाता है बल्कि भारतीय समाज की उस एकात्मता को भी रेखांकित करता है जो "संबंधों में धर्म का मूल्य" सिखाती है। भाई दूज हमें याद दिलाता है कि सच्चा सुख धन-वैभव में नहीं, बल्कि रिश्तों की आत्मीयता और प्रेम में निहित है ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

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