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पर्व विशेष : | तदनुसार 22 अप्रैल 2026

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जनजातीय समाज का राजसी वैभव

जनजातीय समाज का राजसी वैभव

भारत की सांस्कृतिक विविधता में जनजातीय समाज एक अमूल्य रत्न के समान है, जिसने प्राचीन काल से आज तक परंपराओं, निष्ठा और आत्मबल से राष्ट्र की आत्मा को सशक्त किया है। यह समाज स्वाभिमान, श्रम, और प्रकृति के प्रति आदर सम्मान का प्रतीक रहा है। दुर्भाग्यवश, अंग्रेजो, वामपंथी विचारकों और कुछ स्वार्थी शोषणकारी तत्वों ने गरीबी, अशिक्षा और मांस-मदिरा जैसे शब्दों को जनजातीय समाज से जोड़कर उसकी छवि को विकृत करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य था वन-संपदा का अनुचित दोहन और धर्मांतरण, जो तभी संभव था जब इस समाज को मुख्यधारा से दूर कर दिया जाए। इसी प्रयोजन से मिशनरियों को सुदूर वनांचलों में भेजा गया और धर्मांतरण का कार्य योजनाबद्ध रूप से आरंभ हुआ।

परंतु यह सत्य है कि यह समाज कभी पिछड़ा या असभ्य नहीं रहा। भारतीय संस्कृति के इतिहास में जब हम गहराई से झांकते हैं तो स्पष्ट होता है कि जनजातीय समाज अत्यंत समृद्ध, संगठित और गौरवशाली रहा है। भारत के अनेक शासक और शासिकाएं जिन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति को नया वैभव दिया, इसी समाज से आते थे।

जहां विश्व की अनेक सभ्यताएं समय के साथ में लुप्त हो गईं वहीं भारत की संस्कृति आज भी जीवित है क्योंकि जनजातीय समाज ने अपनी मूल परंपराओं को अटूट निष्ठा के साथ संजोए रखा।भारत के धार्मिक ग्रंथों में जनजातीय समाज का उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलता है।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित केवट ने प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को जिस श्रद्धा और भक्ति से गंगा पार कराया, वह कार्य निषादराज गुह के आदेश पर किया गया था। निषादराज गुह श्रृंगवेरपुर के राजा और श्रीराम के बालसखा थे। जब श्रीराम वनवास के दौरान उनके राज्य में पहुंचे तो उन्होंने उनका स्वागत इतने प्रेम से किया कि स्वयं श्रीराम ने उन्हें भरत के समान स्थान दिया।


प्रभु  श्रीराम और निषादराज गुह

श्रृंगवेरपुर में आज भी निषादराज गुह का राजमहल विद्यमान है। रामचरितमानस के अयोध्याकांड में निषादराज और श्रीराम की यह पवित्र मैत्री विस्तार से वर्णित है। आज भी चैत्र शुक्ल पंचमी को निषादराज की जयंती मनाई जाती है। स्कंद पुराण में वसु और राजा टोंडमान की कथा आती है जिसमें वसु निषाद समाज से थे। यह कथा स्पष्ट करती है कि जनजातीय समाज को हमारे धार्मिक ग्रंथों में सदा सम्मान मिला है।


निषादराज गुह के किले के साक्ष्य

सत्यवती जिन्होंने वेदव्यास जैसे महर्षि को जन्म दिया और जो कौरवों पांडवों की दादी थीं निषाद समाज से थीं। महान धनुर्धर एकलव्य जो अपनी धनुर्विद्या से अधिक अपनी गुरुभक्ति के लिए पूजित हैं निषादराज हिरण्यधनुष के पुत्र थे। इसी प्रकार माता शबरी जिनके झूठे बेर श्रीराम ने प्रेमपूर्वक स्वीकार किए भीलों अर्थात जनजातीय समाज से थीं। उनके पिता अज भीलों के मुखिया थे और यह उपाधि केवल समाज के प्रतिष्ठित लोगों को दी जाती थी।


गुरुभक्त- एकलव्य 

माता शबरी को मतंग ऋषि ने अपनी पुत्री का स्थान दिया था। जिनका उद्धार स्वयं भगवान ने किया वे किसी दृष्टि से हीन नहीं मानी जा सकतीं। महाभारत में जिस विश्वावसु की चर्चा की गई और जो भगवान जगन्नाथ की कथा का एक प्रमुख पात्र हैं वे राजा विश्वावसु और माता शबरी दोनों ही सबर जनजाति से सम्बंधित थे ।


माता शबरी और प्रभु श्रीराम

मध्यकाल में भी इस समाज की वीरता और राज्यशक्ति के उदाहरण मिलते हैं। रानी दुर्गावती गोंड समाज की गौरवशाली शासिका थीं। उनके पिता राजा कीर्तिसिंह चंदेल कालिंजर के शासक थे और माता रानी कमलावती थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। उनका विवाह गोंड राजा दलपतशाह से हुआ। यह वही गोंड वंश था जिसकी जनसंख्या जनजातीय समाज में सर्वाधिक थी और जिससे अनेक अन्य जनजातीय समूहों की उत्पत्ति मानी जाती है। रानी दुर्गावती ने अपने साहस, नीति और पराक्रम से मुगल सेना को चुनौती दी और भारतीय इतिहास में अमर हो गईं।


वीरांगना रानी दुर्गावती

भोपाल जिसे आज नवाबों का शहर कहा जाता है कभी गोंड राजाओं का राज्य था। उसकी अंतिम गोंड शासिका महारानी कमलापति थीं। वे अपनी अद्भुत सुंदरता, बुद्धिमत्ता और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थीं। उनके पति राजा निजामशाह की हत्या छल से की गई, पर रानी ने अपने साहस और नीति से बदला लिया। गद्दारी और लालच के कारण भोपाल बाद में मोहम्मद खान के अधिकार में चला गया। आज भी सीहोर के समीप गिल्लौरगढ़ में कमलापति का महल विद्यमान है और उनके सम्मान में भोपाल के प्रमुख रेलवे स्टेशन का नाम कमलापति रेलवे स्टेशन रखा गया है।


भोपाल की अंतिम गोंड शासिका – रानी कमलापति

नागपुर के विकास का श्रेय भी गोंड शासक बख्त बुलंद शाह को दिया जाता है, हालाँकि यह उनका मूल नाम नहीं है अपितु मुगलों द्वारा परिवर्तित किया गया है । उन्होंने बारह बस्तियों को मिलाकर आधुनिक नागपुर बसाया और सड़कें, किले तथा भवन बनवाए। सर रिचर्ड जेनकिंस ने भी लिखा है कि नागपुर और गोंडवाना में कृषि, उद्योग और व्यापार के विकास का बड़ा श्रेय बख्त बुलंद शाह को है। उन्होंने न केवल शहर की योजना बनाई बल्कि मेहनती लोगों को भूमि देकर बसाया। अंतिम गोंड शासक बुरहानशाह थे जिनके पश्चात अंग्रेजों ने राज्य पर कब्जा किया।


राजा बख्त बुलंद शाह जी

छत्तीसगढ़ के सोनाखान के प्रतिष्ठित जमींदार परिवार में जन्मे वीर नारायण सिंह भी बिंझवार जनजाति से थे। उनके पिता ने 1818-19 में अंग्रेजों और भोंसलों के विरुद्ध संघर्ष किया। बाद में वीर नारायण सिंह ने 1854 में अंग्रेजों की विलय नीति का विरोध किया। अकाल के समय उन्होंने जमाखोरों के गोदामों से अनाज निकालकर भूखी जनता में बांटा। इस कारण अंग्रेजों ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 को गिरफ्तार किया और 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक में फांसी दी। वे शहीद वीर नारायण सिंह के रूप में अमर हो गए।


शहीद वीरनारायण सिंह जी

भारत की सांस्कृतिक निरंतरता का सबसे प्राचीन और सजीव स्रोत उसका जनजातीय समाज है। यह समाज केवल भारत की भूमि का नहीं, उसकी आत्मा का भी संरक्षक है। इन्हीं जनों ने काल-कालांतर में अपने श्रम, त्याग और आस्था से इस देश की संस्कृति को जीवित रखा। जो परंपराएं, जो मूल्य और जो जीवनदर्शन आज भी भारत को अन्य सभ्यताओं से भिन्न बनाते हैं, उनका संरक्षण इन्हीं वनवासी और गिरीजनों ने किया है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास की धूल में दबे इन गौरवशाली अध्यायों को पुनः उजागर करें, और इस समाज को केवल पिछड़ा या अभावग्रस्त मानने की भूल न करें। यह समाज भारतीय सभ्यता की जड़ों में वह नमी है, जिसके कारण यह वृक्ष आज भी हरा-भरा है। इनके योगदान का सम्मान करना ही सच्चे अर्थों में राष्ट्र के प्रति श्रद्धांजलि और अपने सनातन धर्म के प्रति कृतज्ञता है।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

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