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पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

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वैश्विक समस्याओं के निदान में जनजातीय समाज की भूमिका

वैश्विक समस्याओं के निदान में जनजातीय समाज की भूमिका

 

भारत के माननीय प्रधानमंत्री ने 2022 से लेकर 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक के काल को अमृतकाल कहकर तब तक भारत को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का विचार रखा है। और इसलिए हम आजकल विकसित भारत के तमाम विचार और उस संकल्प को पूरा करने के अनेक करणीय सुनते रहे हैं। पर इसमें एक विषय आता है कि क्या विकास केवल आर्थिक-भौतिक प्रगति को कहा जाना चाहिए? परस्पर सहयोग, सामाजिक सद्भाव, उच्चतर जीवनमूल्यों आदि को समाविष्ट नहीं करना चाहिए?

क्या विकास में एक पक्ष सांस्कृतिक धरोहरों, मान्यताओं, परम्पराओं को नहीं बनाना चाहिए? तो कोई दो-मत नहीं है कि इन सबका उत्तर 'हाँ' ही होगा। और जब इन सबको समाहित करते हुए हम विकास का एक समग्र मॉडल बनाने की दिशा में बढ़ेंते, तो उसमें जनजातीय समाज से मार्गदर्शन लेने के विचारों की उपेक्षा भी हम नहीं कर सकेंगे। क्योंकि अभी यह जो सारी चर्चा हुई उसके सार में यह बात है कि सारा विश्व जनजातीय समाज से बहुत कुछ सीख सकता है। और उसे सीखना पड़ेगा भी। क्योंकि आधुनिक विश्व की ज्यादातर समस्याओं के समधान हमें जनजातीय परम्पराओं में ही मिलेंगे। उदाहरण के लिए आज हम 21वीं सदी में ग्लोबल वार्मिंग, जीरो कार्बन उत्सर्जन, सतत विकास की बात करते है। पर यह कार्य जनजातीय समाज तो सदियों से करता आ रहा है कि कैसे प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना भी जीवन निर्वाह किया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति के संरक्षण के प्रति इनकी निष्ठा हमें सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरित भी करती हैं।

पर इसके लिए पहले हमें जनजातीय समाज को, उनकी अस्मिता को समझना होगी। उनकी अस्मिता के उन आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक पक्षों को जानना और उन्हें उजागर करना होगा। उनकी ऐतिहासिक पहचान को देखना होगा। हमें उनकी ज्ञान परम्परा को जानना और फिर सहेजना होगा। हमें उन तत्त्वों को प्रकाश में लाना होगा, जिनके कारण जनजातीय समाज बिना किसी प्रशासन, बिना किसी सरकार के अपना समाज-जीवन इतना सुचारू रूप से चला पा रहे हैं। इनके बिना हम जनजातीय समाज को नहीं समझ पाएंगे। और जिस दिन हमने Anthropology की दूषित दृष्टि त्यागकर अस्मिता के उपर्युक्त आधारों पर जनजातीय समाज को समझ लिया, तब ही हम विनम्रतापूर्वक उनसे कुछ सीख पाएंगे। और तभी हम विकास का वह Sustainable मॉडल विकसित कर पाएंगे, जो वैश्विक स्तर पर जेनेवा जैसी अनेकानेक बैठकों के बाद भी हम नहीं कर पाए हैं। तो आइये हम सभी हमारे मूलस्थ जनजातीय समाज के प्रति दूषित पूर्वाग्रहों को छोड़ कर छोड़ कर, उन्हें उनकी ही दृष्टि से जानने और समझने के प्रयासों को बढ़ावा दें। इससे हमें अपनी जड़े ढूँढने में भी आसानी होगी और फिर उन्हें मजबूत कर आकाश की अधिक ऊँचाइयों तक पहुँचने में सहायता भी मिलेगी।
 

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