आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार

नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि

पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

असम के चाय बगान समुदाय का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

असम के चाय बगान समुदाय का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

असम के चाय बगानो में कई समुदाय कार्य करते है। इन्हें अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1860 से 1890 के बीच वर्तमान के पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों के पिछड़ी जाति और जनजाति बहुल क्षेत्रों से अंग्रेज औपनिवेशिक चाय बागान के मालिकों ने छल कपट से असम के चाय बागानों में काम करने के लिए लेकर आये थे। 'आड़काठिया' और 'गिरमिटिया' अनुबंध के अनुसार उन लोगों को गुलाम बनाकर रखा गया। ये लोग अपने क्षेत्र को भूलकर असम को ही अपना जन्मभूमि और कर्मभूमि के रूप में अपना लिया आज असम की विश्व प्रसिद्ध चाय के बागान और इसकी 'एक कलि दो पात' का इतिहास भी काफी रक्तरंजित है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर देखा जाए तो असम के चाय जनजाति समुदाय का एक बहुत ही गौरवशाली इतिहास रहा है।

Brewing a Revolution - The Tea Gardens of Bengal - Sarmaya
विभिन्न प्रदेशों के लोग चाय बागानों में

चाय जनजाति लोगों ने असम की कला- संस्कृति, शिल्प कला, साहित्य को अपनाकर असमिया संस्कृति को समृद्ध किया है। ये लोग यहाँ के दुःख में दुःखी और सुख में सुखी होते हैं। जरूरत के समय ये लोग असम मातृ के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने को भी तैयार रहते हैं। चाय जनजाति के लोगों का असम के चाय बागानों में आगमन के ठीक आस-पास छोटानागपुर प्रान्त में कई संघर्ष हुए थे। इन सभी संघर्षों का अभी तक हमारे इतिहासकारों ने सटीक विश्लेषण और मूल्यांकन नहीं किया है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय विद्रोहों के नाम हैं- सुवैर विद्रोह (1766-1778) जिसको अंग्रेजों ने रासकेल मूवमेन्ट आख्यायित किया था, कोल विद्रोह (1833-1837), कन्ध उत्थान (1837-1856), सर्दारी लड़ाई अथवा मुक्ति लड़ाई (1858-1895), मानभूम का भूमिज विद्रोह, धलभूम राजाका विद्रोह, हु- मुंडाका विद्रोह (1795 1800), तामार विद्रोह (1820), छोटानागपुर का जनजातीय विद्रोह (1807-1808) जिसको तामाभक्त विद्रोह के नाम से जाना जाता है, विख्यात कोल विद्रोह (1831-1932), इतिहास प्रसिद्ध सिदु काहु का साउतला विद्रोह (1858-1895), राई आन्दोलन (1857), गोंड़ विद्रोह, खेड़ोवार विद्रोह (1833), बिरसा मुण्डा का उलगुलान आदि।

आंध्र प्रदेश: पहली बार आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पट्टिकाओं पर  अंकित होंगे - Mainbhibharat

ये सभी विद्रोह 1857 की क्रांति से पहले हुए थे। अगर सटीक मूल्यांकन किया जाये तो शहीद रघुनाथ महतो के नेतृत्व में सम्पन्न सुवैर विद्रोह भारतवर्ष का पहला स्वतंत्रता संग्राम का स्थान ले सकता है। इन दोनों क्रांतियों की चिंगारी ने बहुत से लोगों के हृदय में आग लगा दी। कुछ लोगों ने गोरे साहबों के प्रति घृणा का मन लेकर ही असम में प्रवेश किया था। बाबू साहब के अत्याचार और उत्पीड़न से चाय बागान के भाई-बहनें देश को स्वतंत्र करने का सपना देखने लगे। चाय बागानों के मजदूर भी भारत माता की स्वतंत्रता की कामना करने लगे। लेकिन बागानों के काम के बोझ के कारण उन्हें कभी भी एकत्र होकर अपनी इच्छा जाहिर करने का मौका नहीं मिलता था, इसलिए स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी कभी डिब्रूगढ़ जिले के चाय बागान तो कभी बराक घाटी तो कभी दरंग जिले के चाय बागानों में थोड़ा बहुत दिखाई पड़ती थी।

शहीद रघुनाथ महतोः गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों के छुड़ा दिए थे पसीने – जनचौक
रघुनाथ महतो 05 अप्रैल 1778, लोटा में शहीद हुए

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम हमारे गौरवशाली इतिहास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में असम के दूसरे समुदायों के साथ ही असम के चाय जनजाति समुदायों के लोगों ने समय-समय पर बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। असम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चाय जनजातियों की भूमिका पर चर्चा के बिना असम का इतिहास अधूरा रहेगा।

अंग्रेजों द्वारा असम पर कब्जा करने के बाद बाहरी लोगों के लिए एक नया द्वार खुल गया। अंग्रेज व्यापारी वर्ग थे, हमेशा व्यापार और अपने फायदे को महत्व देते थे। उन्होंने नए बाजार बनाने के लिए कच्चे माल प्राप्त करने हेतु नई कालोनियों की खोज की। असम में चाय की खोज करने और इस व्यापार में प्रवेश करने के बाद उन्होंने इस व्यावसायिक फसल को राज्य के विभिन्न हिस्सों में लगाया। शुरूआत में उन्हें चाय बागान में काम करने के लिए मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ा। इस कमी को दूर करने के लिए वे उत्तर और मध्य भारत जैसे बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, बंगाल और आंध्र प्रदेश से लोगों को मजदूर के रूप में आयात किया। ये आयातित दिहाड़ी मजदूर शुरू से ही अपने अधिकारियों द्वारा शोषित होते रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे ये आयातित चाय जनजाति समुदाय के लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के साथ ही समकालीन भारत के विभिन्न राष्ट्रवादी आन्दोलनों से प्रेरित हुए। विशेष रूप से राष्ट्रवादी नेताओं और उनकी साहसिक गतिविधियों की प्रेरणा से असम के चाय जनजाति के लोग धीरे-धीरे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

भारत छोड़ो आंदोलन' में महिलाओं की हिस्सेदारी | फेमिनिज़म इन इंडिया
भारत छोडो आन्दोलन के दौरान की तश्वीर

1915 की शुरूआत में शोणितपुर के रंगापारा में बागान मालिक राज के खिलाफ विद्रोह की आग के कारण 1916 में कम्पनी सरकार द्वारा क्रिस्टियन मुण्डा को सार्वजनिक रूप से फांसी दे दी गई। ऐतिहासिक रूप से वह असम का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले पुरुष शहीद थे जो चाय जनजाति समुदाय से थे। 1921 का वर्ष भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस समय गांधी का असहयोग आन्दोलन पूरे भारत के साथ असम में लोकप्रिय हो चुका था। इसके साथ ही 1921 में गांधी की पहली बार असम यात्रा से असम में राष्ट्रवाद अधिक शक्तिशाली और प्रभावी हो गया। गांधी जी के कार्यों और विचारों की प्रेरणा से असम के चाय जनजाति समुदाय के लोग अपनी झोंपड़ियों से निकल पड़े और कम्पनी राज के खिलाफ हड़ताल शुरू कर दी।

असम के विभिन्न हिस्सों में उन्होंने कम्पनी के नियमों के खिलाफ असहयोग गतिविधियाँ शुरू की। उस दौर में असम के शोणितपुर जिले के कछारीगांव के हेलेम के चाय मजदूरों ने अपने-अपने इलाकों में यह आंदोलन शुरू किया। 1921 में असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण तेजपुर, घागरा चाय बागान की रहने वाली मालती में या मंगरी ओरॉव की कम्पनी द्वारा हत्या कर दी गई। वह असम की पहली शहीद होने के साथ-साथ असम की चाय जनजाति भी र्थी जिन्होंने देश के नाम अपने प्राणों की आहुति दी। उसी वर्ष एक अन्य चाय मजदूर प्रताप गोंड़ को कांग्रेस की सदस्यता लेने के कारण जेल में डाल दिया गया। फिर शम्भूराम गोंड को उसके दोस्त जगमोहन के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। शंभू को दो महीने के लिए जेल में डाल दिया। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण जगमोहन पर 50 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

इसके बाद 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान दरांग पुलिस स्टेशन में अन्य देशभक्तों के साथ चाय जनजाति समुदाय के दयालु पणिका, मंगोल कुर्मी अपनी देशभक्ति और वीरतापूर्ण गतिविधियों के कारण मारे गए। वे दरांग पुलिस स्टेशन में भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराने गए थे। वहीं रामचरण गोंड सहित अन्य लोगों को हेलेम में पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया गया। उसी समय अन्य दो व्यक्तियों को भी पुलिस ने प्रताड़ित किया था, उनमें से एक स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप में भाग लेने वाले और नियमित रूप से कांग्रेस कार्यालय का दौरा करने वाले डेकियाजुली, शोणितपुर के अर्जुन घाटोवार थे। ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर विशेष रूप से असम के गोलाघाट जिला चाय जनजाति के लोगों का एक अन्य महत्वपूर्ण संघर्ष क्षेत्र था।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण बिदेश कुमार को पुलिस ने जेल में डाल दिया। अंश भुइयां को भी चार महीने के लिए जेल में डाल दिया। वे गोलाघाट के गरगा चाय बागान के थे। बेतियानी चाय बागान के राधा मुण्डा और गोबिंद तांती को भी छह महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। उसी जिले में कुछ अन्य चाय मजदूरों को उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के लिए जेल में डाल दिया गया था। वे थे बलिया भुइयां, बुढ़ा लिकसन बटियाली गांव के अतोया भुइयां, महाबीर गोबाला, गरंगा चाय बागान के संतारा तांती, कर्मा दास, पनिका कौर, मोहन पकिका, बर्मा गढ़, सस्पधर के सुकुरा नागवंशी, बेगेना खोबा गांव के भानु खेरिया आदि। 1937-1946 के बीच राशन और वेतन की कमी के कारण असम के चाय जनजाति समुदायों के बीच एक समस्या उत्पन्न हुई। इसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने फिर से अपने अधिकार के लिए विद्रोह शुरू कर दिया। इसके अलावा उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ गुप्त संदेश देने के लिए चाय बागानों के भीतर कुछ गुप्त समितियों की भी व्यवस्था की थी।

अंग्रेज सरकार तथा चाय बागानों के मालिकों की पाबंदियों को तोड़कर मातृभूमि की मुक्ति के लिए हजारों लोग जुड़े थे। लेकिन असम तथा भारत सरकार ने लोगों को सरकारी स्वीकृति अभी तक प्रदान नहीं की है। इतिहासकार और साहित्यकारों ने भी उपेक्षा कर इन मुक्ति योद्धाओं के साथ अन्याय किया है। हाल के कुछ वर्षों से एक आध शोधकर्ता अपने शोधपत्र और कतिपय साहित्यकारों ने असम के इन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में लिखना प्रारम्भकिया है। परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर अभी तक इन लोगों को स्वीकृति नहीं मिली हैं यह बड़े दुःख की बात है।

ऐतिहासिक रूप से हमने देखा कि चाय जनजातियों के नेतृत्व में जन आन्दोलन के माध्यम से हमारे देश को स्वतंत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यद्यपि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में असम के चाय जनजाति के लोगों की भूमिका हमारे इतिहास का अविभाजित हिस्सा है, लेकिन फिर भी उनका इतिहास अधूरा है।

चाय जनजाति समुदाय की स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक गतिविधियां अभी भी पूरी तरह से अनदेखी हैं। साथ ही असम की चाय जनजाति समुदाय के लोग आज भी अपने गौरवशाली इतिहास के प्रति अनभिज्ञ हैं। वे अपनी पूर्व पीढ़ी की वीरतापूर्ण गतिविधियों के बारे में नहीं जानते। दरअसल तथ्य कुछ और है। पर्याप्त स्रोतों का अभाव, अध्ययन और लेखकों और शोध कर्ताओं की रुचि अभी भी इनसे बहुत दूर है। असम की चाय जनजाति के लोग अभी भी दूसरों की लापरवाही और अकेलेपन का सामना कर रहे हैं। असम के चाय बागानों को अभी भी राजनैतिक नेताओं द्वारा सिर्फ वोट बैंक माना जाता है।

No photo description available.

यहाँ तक कि उनके प्रतिनिधि अभी भी अपनी अलग-अलग स्थितियों को बढ़ावा देने में विफल रहे हैं। उन्हें बढ़ावा देने के लिए उचित योजना का अभाव, आधुनिक तकनीकी शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इस समुदाय की कुछ अन्य गंभीर समस्याएं हैं। कड़वा सच यह है कि ये सभी इस समुदाय की ऐतिहासिक समस्याएं हैं, क्योंकि असम की चाय जनजातियों की ये समस्याएं शुरु से लेकर आज तक मौजूद हैं। बावजूद इसके अच्छी खबर यह है कि वर्तमान में कुछ लेखक अपने गौरवशाली इतिहास को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही कुछ शोधकर्ता सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक विकास के संदर्भ में अपने अतीत और वर्तमान की खोज के लिए आगे आ रहे हैं। वे उनकी समस्याओं का अध्ययन करने का भी प्रयास कर रहे हैं और उन्हें हल करने की सिफारिश करने का भी प्रयास कर रहे हैं। निस्संदेह यह हमारे लिए एक महत्वपूर्ण खबर है।

इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन यह कभी खत्म नहीं होता। हम अपने इतिहास को नहीं बदल सकते लेकिन नए स्रोतों, नई सूचनाओं की खोज करके हम इसे आगे बढ़ा सकते हैं। असम की चाय जनजातियों का इतिहास और विभिन्न अवधियों में उनकी विभिन्न गतिविधियाँ, जैसे कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। साथ ही असम के अन्य समुदायों का हमें पता होना चाहिए, हमें इस अध्याय पर ठीक से यान देना चाहिए। हम आशा करते हैं, असम में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चाय जनजाति समुदायों का योगदान हमेशा हमारे इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय बना रहेगा और साथ ही हम असम की चाय जनजातियों की स्थिति में गिरावट के बजाय समृद्धि देखना चाहते हैं।

लेख:
लाल जी सोनारी

Follow us on social media and share!