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नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा

सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में रामकथा


श्रीरघुनाथजी की गाथा भारत के पूरे लोकसमाज के सुमधुर लोकगीतों में रची-बसी है। श्री अजय कुमार चतुर्वेदी जी ने लोकगीतों की इस राममय परम्परा में छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल की लोक परम्पराओं में रामकथा के अद्भुत स्वरूप को उद्घाटित किया है। इस लेख में उन्होंने अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत उरांव, गोण्ड, कोडाकू, और कोरवा जैसी जातियों के गीतों में राम के जन्म से लेकर माता सीता की खोज, लक्ष्मण के मूर्छित होने और वनवासियों के साथ होली खेलने तक के मार्मिक प्रसंगो का अत्यन्त भावपूर्ण संकलन किया गया है। यह लेख हमारी उस लोकमान्यता की पुष्टि करता है कि जहाँ जनमानस का निश्छल प्रेम होता है वहाँ साक्षात् ईश्वर भी अवतार लेने से स्वयं को रोक नहीं पाते हैं।


प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ को अनेक नामों से जाना जाता था। रामायण काल में इसे दक्षिण कोसल, और दंडकारण्य कहा जाता था। रामायण की कथा से ज्ञात होता है कि अयोध्या के राजा दशरथ की बड़ी रानी कौसल्या, दक्षिण कोसल के राजा भानुमन्त की पुत्री थीं। कोसल खंडकाव्य नामक ग्रन्थ से भी इसकी पुष्टि होती है। राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्रीराम, लक्ष्मण, और माता सीता ने वनवास काल की एक लम्बी अवधि दंडकारण्य में व्यतीत की।

ऐसी मान्यता है कि माता शबरी ने अपने जूठे बेर प्रभु श्रीराम को छत्तीसगढ़ के जांजगीर चाम्पा जिले के शिवरीनारायण में खिलाकर नवधा भक्ति का ज्ञान लिया, और मुक्ति प्राप्त की। यह स्थल महानदी, शिवनाथ नदी, और जोंक नदी के संगम तट पर स्थित एक प्राचीन नगर है। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार रामायण के समय से यहाँ शबरी आश्रम स्थित है। जनश्रुति के अनुसार बलौदा बाजार जिले के तुरतुरिया नामक स्थल में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहाँ श्रीराम के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ था। राजा राम के बाद उत्तर कोसल का राज्य लव को, और दक्षिण कोसल का राज्य कुश को मिला।

बलौदाबाजार में स्थित है वाल्मीकि आश्रम
बलौदाबाजार में स्थित है वाल्मीकि आश्रम

सम्पूर्ण भारत में माता कौसल्या का एकमात्र मन्दिर रायपुर जिले के चन्दखुरी ग्राम में है। यह स्थल भगवान श्रीराम की माता कौसल्या जी का जन्म स्थान माना जाता है। जलसेन तालाब के अन्तस्थल में माता कौसल्या मन्दिर बना हुआ है, जिसमें भगवान श्रीराम को माता कौसल्या गोद में लेकर बैठी हुई हैं। इसे सोमवंशी राजाओं के द्वारा 8वीं सदी में बनवाया गया था।

सरगुजा अंचल के अनेक स्थानों पर प्राचीन मूर्त धरोहरों में रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का शिल्पांकन देखने को मिलता है। भगवान श्रीराम के वनवास काल का छत्तीसगढ़ में पहला पड़ाव उत्तरी छत्तीसगढ़ के सरगुजा सम्भाग के कोरिया जिले के भरतपुर तहसील के सीतामढ़ी हरचौका को माना जाता है। कोरिया जिले के सीतामढ़ी हरचौका, सीतामढ़ी घाघरा, महादेवन खमरौध, कोटाडोल, सीतामढ़ी छतौड़ा आश्रम, सिद्ध बाबा का आश्रम, देवसील, सीतामढ़ी रामगढ़, जटाशंकरी गुफा, और अमृतधारा भगवान श्रीराम, माता सीता, और रामायण से सम्बन्धित प्रमुख प्राचीन स्थल हैं।

सूरजपुर जिले का जोगी माड़ा चपदा, कुदरगढ़ वन देवी पूजा, सीता लेखनी पहाड़, और लक्ष्मण पंजा, रक्सगंडा, रामेश्वरनगर का तीर धनुष, सारासोर, श्री राम लक्ष्मण पाहन मरहट्ठा, साल्हो, और बेसाही पहाड़ पोड़ी, अर्धनारीश्वर जलेश्वरनाथ शिवपुर, बिलद्वार गुफा, विश्रवा ऋषि का आश्रम, लक्ष्मण पंजा पिलखा पहाड़, और सरगुजा जिले का अम्बिकापुर, देवगढ़, महेशपुर, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, मिरगा डाड़, चन्दन मिट्टी गुफा, नान दमाली, बड़े दमाली के समीप बन्दरकोट, अंजनी टीला, मैनपाट शरभंजा, देउरपुर, सीतापुर में मंगरेलगढ़, और जशपुर जिले के पत्थलगांव तहसील का किलकिला आश्रम, बगीचा तहसील का शिव मन्दिर रजपुरी, लेखा पत्थर रेंगले, कुनकुरी तहसील लक्ष्मण पंजा रिंगारघाट आदि भगवान श्रीराम, माता सीता, और रामायण से सम्बन्धित प्रमुख प्राचीन स्थल हैं।

सरगुजा अंचल में भगवान श्रीराम, माता सीता, और लक्ष्मण जी के वन गमन की कहानी यहाँ के पर्वतों, गुफाओं, नदियों, और पत्थरों में देखने, और सुनने को जितनी मिलती है, उससे कहीं अधिक सरगुजा अंचल के पारम्परिक लोकगीतों में उसका उल्लेख हुआ है। सरगुजा अंचल की मुख्य क्षेत्रीय बोली सरगुजिहा है। सरगुजा अंचल एक अनुसूचित क्षेत्र है, जहाँ रहने वाली अधिकांश जातियों को अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

जनजाति बहुल क्षेत्र है सरगुजा
जनजाति बहुल क्षेत्र है सरगुजा

यहाँ गोंड, कंवर, उरांव, कोडाकू, कोरवा, पंडो, खैरवार, चेरवा, और अघरिया जाति के लोग मुख्य रूप से निवास करते हैं। यहाँ जातीय बोलियां भी प्रचलित हैं, जिनमें मुख्य रूप से उरांव जाति की कुडुख, कोडाकू जाति की कोडाकू, पंडो जाति की पंडो, और कोरवा जाति की कोरवाई बोली प्रमुख है। वनवास काल के समय ये लोग ही भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, और माता सीता के साथ रहें। इसलिए इनके लोकगीतों में राम कथा का वर्णन अधिक सुनने को मिलता है।

ये लोग अपने सभी पारम्परिक पर्वों में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, और माता सीता को आलम्बन बनाकर पारम्परिक सरगुजिहा लोकगीतों का गायन करते हैं। सरगुजा अंचल की जनजातियां अपनी जातीय बोली कुडुख, कोरवाई, पंडो, और कोडाकू में भी रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का गायन करती हैं। सरगुजा अंचल में सैला, करमा, डोमकच, लोकड़ी, बानबहुली, रोपा, सुवा, ददरिया, और गाना लोकगीतों में राम जन्म से लेकर धनुष यज्ञ, विवाह, वन गमन, सीता हरण, सीता की खोज, राम रावण युद्ध, वन वापसी, और राज्याभिषेक तक के सभी प्रसंग सुनने को मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सरगुजिहा पारम्परिक लोकगीत प्रस्तुत हैं।

1.  लोकगीत

गदा गदा गिरे लोचन भरे नीरा।
कहाँ जगे भिजताहाँ राम रघुबीरा।
राम रघुबीरा हो राम रघुबीरा।
कहाँ जगे भिजताहाँ राम रघुबीरा।

भावार्थ, इस सरगुजिहा गाना लोकगीत में बताया गया है कि बरसात के मौसम में भगवान श्रीराम कहाँ भींग रहे होंगे। इसे सोचकर आँखों में अश्रु भर आते हैं, और अश्रु जलधारा बहने लगती है।

2. लोकगीत

सरगुजिहा लोकगीतों में सीता हरण के बाद खोज की कथा का चित्रण मनोहारी ढंग से हुआ है।

राम धरे धनुस लछिमन धरे बान।
सीता माई ला खोज बर निकले हनुमान।
निकले हनुमान रे निकले हनुमान।
सीता माई ला खोज बर निकले हनुमान।
सीता माई कर मुंदरी रावण मांगे दान।
रावण मांगे दान रे रावण मांगे दान।
सीता माई कर मुंदरी रावण मांगे दान।

भावार्थ, इस सरगुजिहा गाना लोकगीत में बताया गया है कि माता सीता के हरण होने के बाद भगवान श्रीराम, और लक्ष्मण धनुष बाण लेकर खोज करने निकल गये हैं। इस पुनीत कार्य में पवन पुत्र वीर हनुमान भी साथ में हैं। आगे बताया जा रहा है कि माता सीता की अंगूठी को रावण द्वारा दान में मांगा जा रहा है।

3.  लोकगीत

राम बर रामायण लेहे लछिमन बर पतरा।
सीता माई बर लूगा लेहे फूलघारी अंचरा।
फूलघरी अंचरा रे फूलघरी अंचरा।
सीता माई बर लूगा लेहे फूलघरी अंचरा।


राम के जीवन का हर पहलू निहित है सरगुजिहा लोकगीतों में 

भावार्थ, इस सरगुजिहा गाना लोकगीत में राम के लिए रामायण, लक्ष्मण के लिए पतरा, और माता सीता के लिए फूलदार अंचरा वाली साड़ी लेने की बात कही जा रही है।

4.  लोकगीत

सरगुजिहा लोकगीत में धनुष यज्ञ, और सीता विवाह का भी मनोरम चित्रण देखने को मिलता है।

राम उठिन गुरू कर आज्ञा ला पाये।
यज्ञ में शंकर धनुस ला तोर गिराये।
सब राजा मन कर अभिमान नसाये।
जनक बेटी ला जयमाल पहिराये।
जनकपुर बाजे लागिस बाजा बधाई।
गांव में दूरा दूरा मंगल गान गवाई।

भावार्थ, इस सरगुजिहा गीत में बताया गया है कि भगवान श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर शिव के धनुष को तोड़ कर धनुष यज्ञ सभा में उपस्थित सभी राजाओं का घमंड चूर किया। धनुष तोड़ने के बाद श्रीराम ने राजा जनक की पुत्री सीता को जयमाला पहनाई, और चारों तरफ लोग आनन्दित होकर मंगल गान गाने लगे। जयमाला की इस प्रसन्नता में जनकपुरी नगरी में आनन्द की बधाइयां बज उठीं।

5. दसराहा धन्धा लोकगीत

कहाँ आहा राम कहाँ आहाँ लछिमन कहाँ आहाँ भरत भगवान।
राम बने राम आहाँ अयोध्या में लछिमन भरतपुर में भरत भगवान।

भावार्थ, इस सरगुजिहा दसराहा धन्धा लोकगीत में प्रश्न उत्तर किया जा रहा है। एक नायक नायिका से पूछता है कि कहाँ राम, कहाँ लक्ष्मण, और कहाँ भरत भगवान हैं। नायिका उत्तर में कहती है कि राम वन में, अयोध्या में लक्ष्मण, और भरतपुर में भरत भगवान हैं।

6. रमचर्चा करमा सरगुजिहा

रमचर्चा करमा लोकगीतों में राम वन गमन के समय का प्रसंग भी सुनने को मिलता है। 

जीवन के समुद्र में चले लागेल डोंगा।
हाय रे धर्म डोंगा चले लागे धीरे धीरे।
राजा प्रजा नर नारी हो गए दुखियारी।
अवधपुर मे भईगे वीपती भारी।
पिता के वचन निभाय राम लखन वन गये।
सीया संग धीरे धीरे। हाय रे धरम डोंगा चले लागे धीरे धीरे।
आगे आगे राम चले पीछे में लछुमन।
माझे में चले लागीन सिया जानकी धीरे धीरे।
हाय रे धर्म डोंगा चले लागीस धीरे धीरे।

भावार्थ, इस सरगुजिहा रमचर्चा करमा लोकगीत में भगवान श्रीराम के वन गमन समय का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि जीवन रूपी समुद्र में धर्म रूपी नाव धीरे धीरे चल रही है। अयोध्या में राजा, प्रजा, और सभी नर नारी दुखित हो गए हैं, क्योंकि राम के वन गमन की भारी विपत्ति आ पड़ी है। रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाए को ध्यान में रखते हुए पिता के वचनों का पालन करते हुए श्रीराम, लक्ष्मण, और माता सीता धीरे धीरे वन की ओर चल पड़े हैं। बताया जा रहा है कि आगे आगे राम, पीछे पीछे लक्ष्मण, और बीच में माता सीता धीरे धीरे चल रही हैं।

7. रमचर्चा करमा

ए मोर सोना रे चौदा बछर बनवास।
राम लखन बने बने सीया के संगे संगे।
मोर सोना रे चौदा बछर बनवास।
काकर बीना है सूना अयोध्या काकर बीन चौपाई।
ए मोर सोना रे काकर बीन सूना है रसोई।
ए मोर सोना रे बनवास।
राम बीनू सुना अयोध्या लखन बिन चौपाई।
हे मोर सोना रे सिया बिना सुना है रसोई।

भावार्थ, इस सरगुजिहा रमचर्चा करमा लोकगीत में बताया गया है कि सुवर्ण के समान राम, लक्ष्मण, और माता सीता 14 वर्ष के लिए वनवास चले गये हैं। वनवास के बाद किसके बिना अयोध्या, किसके बिना खाट, और किसके बिना रसोई सूनी हो गयी है। आगे बताया जा रहा है कि राम के बिना अयोध्या, लक्ष्मण के बिना खाट, और माता सीता के बिना रसोई पूर्णतः सूनी हो गई है।

8. देवी भजन

आपे दला जाए देवी रामें गली।
काकर डेरा रुखा तो विरूछ तरी।
काकर तो डेरा आहे तम्बू तो तरी।
आपे दला जाए देवी रामें गली।
रामें कर डेरा आहे रुखा तो विरूछ तरी।
लक्ष्मण कर तो डेरा आहे तम्बू तो तरी।
आपे दला जाए देवी रामें गली।
काकर डेरा मा बाजे नरसिंगा बाजा।
काकर डेरा मां बिन बसूरी।
आपे दला जाए देवी रामें गली।
रामा कर डेरा मा बाजे नरसिंगा बाजा।
लक्ष्मण कर डेरा मां बाजे बिन बसूरी।
आपे दला जाए देवी रामें गली।

भावार्थ, इस सरगुजिहा देवी भजन में यह प्रश्न है कि राम जब वन की ओर जाते हैं, तो किसका निवास वृक्ष के नीचे, और किसका निवास तम्बू के नीचे बना हुआ है। इसके उत्तर में बताया जाता है कि राम का निवास वृक्ष के नीचे, और लक्ष्मण का निवास तम्बू के नीचे बनाया गया है। अगली पंक्ति में बताया जा रहा है कि किसके निवास में नरसिंगा बाजा, और किसके निवास से बीन बांसुरी बज रही है। इसके उत्तर में बताया जाता है कि राम के निवास में नरसिंगा बाजा, और लक्ष्मण के निवास में बीन बांसुरी बज रही है।

9. होली गीत

गोंड जनजाति में भी भगवान श्रीराम, माता सीता, और लक्ष्मण से सम्बन्धित मनमोहक होली गीतों का गायन किया जाता है। इस सरगुजिहा होली लोकगीत में सीता हरण के बाद माता सीता, और मन्दोदरी के संवाद का मनमोहक चित्रण हुआ है।

ए होरी रे अशोक विरूछ तरी छोड़ तो रखें।
रानी जो मन्दोदरी हर मिले बर आए मोला छोड़ राखे।
रानी मन्दोदरी हर मिले बर आए।
काकर तंय लागस बहिन धिया तो पतोहिया रे 2। होरी होरी रे।
काकर हवस बरजो नारी।
रानी मन्दोदरी हर मिले बर आए।
राजा दशरथ कर धिया तो पतोहिया 2। रे होरी होरी।
राम करा हों बरजोरी नारी।
रानी मन्दोदरी हर मिले बर आए। होरी होरी रे।

भावार्थ, इस सरगुजिहा लोकगीत में माता सीता के हरण के बाद का वर्णन किया गया है। रावण के द्वारा माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वृक्ष के नीचे छोड़ दिया गया है। वहाँ पर रानी मन्दोदरी माता सीता से मिलने आती हैं, और पूछती हैं कि तुम किसकी बहन, किसकी पुत्रवधू, और किसकी सुन्दर नारी हो। मन्दोदरी की बातों को सुनकर माता सीता उत्तर देती हैं कि मैं राजा दशरथ की पुत्रवधू, और श्रीराम की सुन्दर नारी हूँ।

10. होली गीत

राम रावण युद्ध के पूर्व की तैयारी का वर्णन भी इस सरगुजिहा लोकगीत में सुनने को मिलता है। 

दला साजे भगवान सीता के करना दला साजे।
कोने साजे संग सहेली ला रे कोन साजे पांचों बान।
कोने साजे खंडा लोहा जेमे चढ़ाए लेबे सान।
राम तो साजे संग सहेली रे लछन साजे पांचों बान।
अंगद साजे खंडा लोहा धराए सान।
कइसन चले संग सहेली कईसन चले पांचों बान।
कइसन खंडा लोहा कईसन चले हनुमान।

भावार्थ, इस सरगुजिहा होली गीत में माता सीता के हरण के बाद युद्ध की तैयारी के समय का वर्णन करते हुए बताया जा रहा है कि माता सीता के कारण आज युद्ध के लिए दल तैयार किया जा रहा है। जिसमें बताया जा रहा है कि कौन अपने साथ संग सहेली, और कौन पांचों बान तैयार कर रहा है, और कौन खंडा लोहा में सान चढ़ा रहा है। जवाब में बताया जा रहा है कि राम अपने साथ संग सहेली, और लक्ष्मण पांचों बान तैयार कर रहे हैं।

अंगद खंडा लोहा में सान चढ़ा रहा है। आगे बताया जा रहा है कि किस प्रकार राम के साथ संग सहेली, और किस प्रकार पांचों बान लेकर लक्ष्मण चल रहे हैं। साथ ही बताया जा रहा है कि खंडा लोहा के साथ किस प्रकार हनुमान जी आगे बढ़ रहे हैं।

11. होली गीत

कंवर जनजाति के लोग भगवान श्रीराम, माता सीता, और लक्ष्मण से सम्बन्धित मनमोहक होली गीतों का गायन करते हैं। लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने के समय का वर्णन इस होली गीत में मनोहारी चित्रण के रूप में मिलता है। 

ए होरी रे राम हाय हाय करी।
लछिमन लाल तो बेहाल में परी।
रामा हाय हाय करी। लछिमन लाल तो बेहाल में परी।
शक्ति कर बान तो लछन ला लागे रे।
लछन गीर ना परे धरी बांह अनुज ला उठावें।
जे 
घीर बन्धु हाय हाय करी। लछिमन लाल तो बेहाल में परी।
अइहा पवन सुत एही घरी लानिहा संजीवन हो जरी।
भवन कृपा उगही न पावे सिर में चउरा हो डोली।
लछिमन लाल तो बेहाल में परी। ए होरी रे बेहाल में परी।
अंजनी के पुत पवन सूत हो गइन लेहे बर जरी।
दस गुणा गिरी परवत में दसो विनती ला जोरी।
लछिमन लाल तो बेहाल में परी। ए होरी रे बेहाल में परी।
जाइके देखे तो हनुमान बीरा रे रावण दियना जलाये।
संजीवन चिन्ही न पारे पर्वत को लेहे हथोरी।
लछिमन लाल तो बेहाल में परी। ए होरी रे बेहाल में परी।
लाइन के मडावे तो पर्वत बीरा रे। रस मुख में डाले रे।
रस डालते लछिमन जय जय करी। ए होरी रे बेहाल में परी।

भावार्थ, इस सरगुजिहा होली गीत में जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लग चुका है, उस समय का वर्णन किया गया है। बताया जा रहा है कि लक्ष्मण लाल बेहाल में पड़े हुए हैं, क्योंकि उन्हें शक्तिबाण लग चुका है। शक्तिबाण लगते ही लक्ष्मण धरती पर गिर पड़े, और भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई का हाथ पकड़ कर उठाने लगे, और विलाप करने लगे। आगे बताया जा रहा है कि इस संकट के समय में हनुमान जी संजीवन बूटी लेकर आयें।

इतने में अंजनी पुत्र पवनसुत हनुमान जी जड़ी लेने चले गए, और 10 गुणों से युक्त पर्वत में जाकर विनती करने लगे। हनुमान जी जाकर देखते हैं कि रावण चारों तरफ दीपक जला कर बैठा हुआ है। हनुमान जी उस जंगल में संजीवन बूटी को पहचान नहीं पाए, और अपनी हथेली में संजीवन पर्वत को ही उठा कर ले आए। जैसे ही लेकर आते हैं, और मुख में संजीवन जड़ी का रस डालते ही लक्ष्मण जी जय जय कर उठ खड़े होते हैं।

12. छोटे भुइहारी करमा

इस छोटे भुइहारी करमा लोकगीत में भी लक्ष्मण को शक्ति बाण लगने के समय का वर्णन सुनने को मिलता है। 

लक्ष्मण ला बाड़ लागे राम कहिके गोहराय।
लक्ष्मण ला बाड़ लागे हाला बेहाला में परी।
कहा जा बीरा हनुमान लक्ष्मण ला बाड़ लागे।
टोंगरी में बीरा हनुमान लक्ष्मण ला बाड़ लागे।
जा हनुमान संजीवन जर ले आन।
कुंएच कांएच अंगा में लगाई लक्ष्मण ला बाड़ लागे।
लक्ष्मण ला बाड़ लागे हाला बेहाला में परी।

भावार्थ, इस सरगुजिहा लोकगीत में बताया गया है कि लक्ष्मण को शक्तिबाण लगने से उनका हाल बेहाल हो गया है, और वे राम राम कह कर पुकार रहे हैं। श्रीराम हनुमान जी को कहते हैं कि जाओ संजीवन की जड़ लेकर आओ। संजीवन बूटी लाकर लक्ष्मण के पूरे अंग में लगाए जाने का वर्णन इस गीत में मिलता है।

13. प्रभाती रमचर्चा करमा

वनवास काल में माता सीता के साथ श्रीराम, और लक्ष्मण वनवासी बनकर रामगढ़ पर्वत में आए थे, जिसका इस सरगुजिहा लोकगीत में मनोहारी चित्रण हुआ है। 

चला चला देख आबो जमो नर नारी।
हायरे रामगढ मेला भारी।
सीया संग राम लखन बसे रहीन ईहाँ बनवासी।
चला चला देख आबो रामगढ मेला भारी।
रामजी के चरण कमल लक्ष्मनजी का रेखा।
अबड़ सुघ्घर दीखत है सीता बेंगरा।
देखो देखो रामगढ़ मेला भारी।

भावार्थ इस सरगुजिहा प्रभाती रमचर्चा करमा लोकगीत में बताया गया है कि रामगढ़ में मेला लगा है, चलो देख कर आते हैं। क्योंकि यहाँ वनवास काल में माता सीता के साथ श्रीराम, और लक्ष्मण वनवासी बनकर आए थे। इसी पहाड़ी पर आज भी प्रभु श्रीराम के चरण चिह्न, लक्ष्मण रेखा, और माता सीता का घर सीता बेंगरा अत्यन्त सुन्दर दिखाई दे रहा है।

14. देवी भजन सेवा गीत

काकर आरी माता काकरा बारी गे काकर बारी गे दाई।
काकर रचल फुलवारी दाई सेवा ला ले ले महारानी।
काकर रचल फुलवारी गे माई।
राम कर आरी माता लक्ष्मण कर बारी।
काकर रचल फुलवारी गे दाई सेवा ला लेले महारानी गे दाई।
काकर रचल फुलवारी गे माई।
रामा कर आरी माता लक्ष्मण कर बारी गे।
ये दाई माता बुढ़ी मईया रचल फुलवारी गे माई।
सेवा ला लेले महारानी गे काकर रचल फुलवारी गे माई 2।

भावार्थ, इस सरगुजिहा लोकगीत में बताया जा रहा है कि किसकी आरी, और किसकी बारी में मनमोहक फुलवारी लगी हुई है। मैं जो सेवा कर रहा हूँ उसे स्वीकार करें। आगे बताया जा रहा है कि राम की आरी, और लक्ष्मण की बारी में मनमोहक फुलवारी लगी हुई है।

15. देवी भजन

इस सरगुजिहा देवी भजन लोकगीत में श्रीराम, लक्ष्मण, और भरत के सम्बन्ध में मनमोहक ढंग से चित्रण किया गया है। 

मुनि मांगे वरदान राम तो लछिमन मुनि मांगे।
काकर बेटा राजा रामचन्दर काकर बेटा लछिमन।
काकर बेटा भरत चतुरगुन मुनि मांगे वरदान।
राम तो लछिमन मुनि मांगे वरदान कौसल्या बेटा राजा रामचन्दर।
सुमित्रा कर बेटा लछिमन केकई कर बेटा भरत चतुर्गुन।
मुनि मांगे वरदान राम तो लछिमन मुनि मांगे।
काके ला देखे राजगद्दी में काके लिखे वनवास।
राम तो लछिमन मुनि मांगे। भरत अउ चतुर्गुन लिखे राजगद्दी में।
राम लछिमन लिखे बनवास चौदा वर्ष काटे।
मुनि मांगे वरदान राम तो लछिमन मुनि मांगे।

भावार्थ, इस गीत में मुनि से श्रीराम लक्ष्मण का वरदान मांगा जा रहा है। पूछा जा रहा है कि भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, और भरत किसके पुत्र हैं। आगे उत्तर में बताया जा रहा है कि कौसल्या के पुत्र रामचन्द्र, सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण, और कैकेयी के पुत्र भरत हैं। आगे प्रश्न पूछा जा रहा है कि किसको राजगद्दी, और किसको वनवास मिला। इसके उत्तर में बताया जा रहा है कि भरत को राजगद्दी मिली, और राम, लक्ष्मण को 14 वर्ष वनवास का दंड मिला।

16. सैला गीत

राम के भैया हे सीता के लागिन देवरा।
अइसे कच्छबन्धी राजा लक्षन कुंवारा रे।
टूटे न अनक लक्षन भोजन नही करे रे।
अइसे कच्छबन्धी आहे लक्षन कुंवारा रे।
फूटे न बन्धक लक्षन पानी नही पीये रे।
अइसे कच्छबन्धी आहे लक्षन कुंवारा रे।
राम के भैया हे सीता के लागिन देवरा।

भावार्थ इस सरगुजिहा सैला लोकगीत में बताया गया है कि लक्ष्मण श्रीराम के भाई, और माता सीता के देवर हैं। और वे ऐसे कच्छबन्धी, और कुंवारे हैं कि उन्होंने भोजन तथा जल का पूर्णतः त्याग कर दिया है।

17. सरगुजिहा होली गीत

इस सरगुजिहा होली लोकगीत में राम, और सीता के होली खेलने के समय का मनोहारी चित्रण किया गया है। 

होरी खेले सीय रघुबीरा। 
कोन हर धरे रंगा पिचकारी। 
कोन हर धरे गुलाल अबीरा। होरी खेले। 
राम कर हांथे रंग पिचकारी। 
सीया कर हांथे गुलाल अबीरा। होरी खेले। 
काकर भिंजे लाली पगरिया। 
काकर भिंजे रश्मडोरिया। होरी खेले।
राम कर भिंजे लाली पगरिया। 
सीया कर भिंजे रश्मडोरिया। होरी खेले। 


सीता-राम के होली खेलने का प्रतीकात्मक चित्र

भावार्थ, इस सरगुजिहा होली लोकगीत में बताया जा रहा है कि राम, और सीता होली खेल रहे हैं। कौन रंग पिचकारी पकड़ा है, और कौन गुलाल अबीर पकड़ा है। उत्तर में बताया जा रहा है कि राम के हाथ में रंग पिचकारी है, और सीता के हाथ में अबीर और गुलाल है। आगे प्रश्न किया जा रहा है कि किसकी लाल पगड़ी, और किसकी रेशम की डोरी भींग रही है। इसके उत्तर में बताया जा रहा है कि राम की लाल पगड़ी, और माता सीता की रेशम की डोरी भींग रही है।

18. कोडाकू लोकगीत

सरगुजा अंचल घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ विभिन्न जातियां निवास करती हैं। यहाँ के जनजाति लोग अपने लोकगीतों में श्रीराम, माता सीता, और लक्ष्मण से सम्बन्धित गीतों का गायन कर अपना पर्व मनाकर आनन्द प्राप्त करते हैं। इनके एक होली लोकगीत में राम, और लक्ष्मण के सम्बन्ध में इस प्रकार सुनने को मिलता है। 

राम हुदा सेनारे। 
राम हुदा जंगल सेनारे लछुमन। 
राम हुदाय सेन। 
ची लगड डूई सबे सतु कलेवा। 
जोमे लगड सबे सतु कलेवा। 
ची लगड डूई सबे लेमेड़ दाऊ।
नूंय लगड सबे मगा।
लछुमन नूंय लगड सबे मगा। 
लटा लगड सब लेडा रूचा मुचा पनहि। 
सीतोंग लगड छाता तनोवा लछुमन। 
राम हुदा सेनारे लछुमन। 
हो योर हो योर जंगल रे चारो। 
जंगल बुरू रेय दोहोना कि वृन्दा वुरू। 

भावार्थ, इस कोडाकू होली गीत में राम लक्ष्मण के वन जाने के समय के विषय में बताया गया है कि राम के साथ लक्ष्मण वन जा रहे हैं। श्रीराम, लक्ष्मण को कहते हैं कि सत्तू का कलेवा, और पीने के लिए स्वच्छ जल पकड़ लो। फिर दोनों भाई खाकर जल पीते हैं। आगे बताया जा रहा है कि पैर के लिए पनही, और धूप के लिए छाता लक्ष्मण जी तान रहे हैं। इस गीत के अन्त में हिरण के सम्बन्ध में उल्लेख किया गया है।

निष्कर्षतः, सरगुजा अंचल की लोक परम्पराओं के अध्ययन से यह तथ्य पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि भगवान श्रीराम सम्पूर्ण भारत की एकात्मता और राष्ट्रीयता के प्रधान सूत्र हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो सभी भारतीय पूर्णतः समान हैं। भारतवासियों की क्षेत्रीय भाषा, और वेशभूषा चाहे जो भी हो, किन्तु उन सभी के हृदय में राम अवश्य विद्यमान हैं।

उरांव, गोंड, कोडाकू, और कंवर जैसी विभिन्न जनजातियों के पारम्परिक लोकगीतों में रची बसी रामकथा इसी अटूट सांस्कृतिक एकता का साक्षात् प्रमाण है, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोती है। ये सुमधुर लोकगीत यह सिद्ध करते हैं कि राम किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, अपितु वे जन-जन के राम हैं, जो सम्पूर्ण भारतवर्ष की आत्मा में निरन्तर निवास करते हैं।

-अजय कुमार चतुर्वेदी
(लेखक राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता व अनुभवी शिक्षाविद् हैं, जो अपनी लेखनी से शैक्षणिक और सामाजिक मूल्यों के विकास में निरंतर योगदान करते हैं।)

 

 

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