फाग का लोकरंग
February 27, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल से आस्था का केन्द्र बिंदु रहा है। यहां सिरपुर, शिवरीनारायण, राजिम, मल्हार, रतनपुर, पाली, ताला, भोरमदेव, आरंग, जांजगीर, देवबलौदा, बारसूर, जैसे अनेक पुरातात्विक स्थलों का अपना पृथक-पृथक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व है।
यहां के मंदिरों में उत्कीर्ण शिल्पांकन तत्कालीन समाज की धार्मिक व सांस्कृतिक स्थितियों के जीवन्त साक्ष्य हैं। ये मूक होकर भी बोलते हैं। आवश्यकता केवल उनकी मूक भाषा को समझने की है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में अनेक मंदिर इतिहास, कला व संस्कृति के साक्षी के रुप में विद्यमान हैं। ऐसा ही एक भव्य व प्राचिन शिवमंदिर गण्डई जिला-राजनांदगांव में स्थित है।

गंडई का शिवालय
गण्डई, राजनांदगांव जिले का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां आसपास अनेक प्राचिन मंदिर प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण स्थान हैं। गण्डई का शिव मंदिर टिकरीपारा, वार्ड नं.15 में स्थित है। यह मंदिर इस अंचल में ”भांड देउर“ के नाम से विख्यात है। भांड छत्तीसगढ़ी शब्द भठ से व्युत्पन्न है। जिसका अर्थ है-भग्न या गिरा हुआ और देउर का अर्थ देवालय से है। भांड देउर अर्थात् ऐसा देवालय जो भग्न हो।
कालान्तर में यह मंदिर भग्न था जिसे केन्द्रीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित कर पुनर्निर्मित किया है। पुनर्निर्माण के चिन्ह आज भी इस मंदिर में स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं। मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पुरातत्ववेत्ता इस मंदिर को भग्न मानते हैं। क्योंकि इस मंदिर का अंतराल व महा मंडप नहीं है। केवल गर्भगृह व विमान ही शेष है। पर जो है वह अतिसुंदर और कलात्मक है।
मंदिर की निर्माण शैली व स्थापत्य कला की दृष्टि से पुरातत्ववेत्ताओं ने इस मंदिर को कलचुरी काल में 11वीं -12वीं शताब्दी में निर्मित माना है। यह मंदिर की तरह भव्य एवं मूर्तिकला की दृष्टि से समुन्नत है। नागर शैली में निर्मित यह पंचरथ प्रकार का व पूर्वाभिमूखी है। इस मंदिर में महामंडप नहीं है किंतु अंतराल का कुछ भाग सुरक्षित है। इससे यह प्रमाणित होता है कि मंदिर का महामंडप व अंतराल भी भव्य और अलंकरण युक्त रहा होगा।
मंदिर के सम्मुख नंदी की अंलकारिक पश्चिमाभिमुख प्रतिमा स्थापित है। आंशिका रूप से सुरक्षित अंतराल के ऊपर पृथक शिखर स्थापित है। इस शिखर में ज्यामितीय आकृतियां व पुष्प वल्लरियों के साथ नारी मूर्तियां विद्यमान हैं। शीर्ष में गर्जन की मुद्रा में सिंह विराजमान है, जिसकी भव्यता कला प्रेमियों को सम्मोहित करती है।

अश्वमेघ यज्ञ का अश्व
ललछोंहे पत्थर से निर्मित मंदिर का प्रवेश द्वार सर्वाधिक अलकृंत है। लगता है इस भाग में शिल्पियों ने मूर्तियों में कोई लेप किया है। अथवा महीन घिसाई की है, जिसके कारण ही यह भाग आभामय है। किरणें पड़ती हैं तो एक अलौकिक चमक पैदा होती है। निर्माणकाल से लेकर वह चमक आज भी सुरक्षित है। इसकी भव्यता और सजीवता शिल्पी की कल्पनाशीलता और उसकी कला कुशलता को मुखरित करती है।
प्रवेश द्वार का शिल्पांकन अद्वितीय है। प्रवेश द्वार के अधोभाग में प्रस्तर खंडों पर उत्कीर्ण वादन रत व नित्य रत नर-नारियों की मूर्तियां लघु रूप में भी होकर कला की सक्ष्म भाव-भंगिमा व उसकी निपुणता के भव्य रूप को उद्घाटित करती हैं। शिल्पी ने नृत्यमग्न कलाकार के पाँवों में बॅंधे घुंघरूओं को भी बड़ी कुशलता के साथ उकेरा हैं। चौखट के चारों ओर सूक्ष्म रूप से उत्कीर्ण लता वल्लरियाँ और पुष्प् वल्लरियाँ अंकित हैं। खड़े चौखटों पर नृत्यरत मयूर शोभायामान हैं। सूक्ष्म अंकन आखों को संतृप्त करते हैं। अधोभाग में गणेश जी व सरस्वती की छोटी किंतु सजीव मूर्तियां हैं।
प्रवेश द्वार के दोनों भाग में भगवान शिव का मानुषी रूप हाथ में त्रिशुल, डमरू व सर्प के साथ प्रदर्शित है। नीचे नंदी विराजित है। दोनों ओर सहचर भी साथ हैं। अन्य मंदिरों की तरह द्वारपाल के रूप में मकरवाहिनी गंगा तथा कुर्मवाहिनी यमुना का सुन्दर व सजीव अंकन है। इसी स्थान पर सात-सात की संख्या में नाग कन्याओं की अति सूक्ष्म आकृतियां अंकित हैं, जो परस्पर लक्ष्मी, दुर्गा सरस्वती की शोभायामान मूर्तियां हैं।

द्रौपदी चीरहरण
प्रवेश द्वार के ऊपरी भाग में पांडव परिवार द्वारा शिवपूजन का शिल्पांकन अप्रतिम है। महाभारत में स्वर्गारोहण के पूर्व पांडवों द्वारा महादेव के पूजन का प्रसंग मिलता है। संभवतः यह उसी का दृश्याँकन हो। पांडव की मूर्तियां के मध्य महिष की पीठ पर शिवलिंग की स्थापना है। दोनों पार्श्व में ऋषिगण पूजा की मुद्रा में हैं। पांडव भ्राता अपने आयुधों के साथ अंकित हैं। यहां देवी द्रोपदी व माता कुंती भी उपस्थित हैं। नाचे पट्टिका में इनका नामोल्लेख भी है। जो सुस्पष्ट एवं पठनीय है।
माता कुंती का नाम यहां ”कोतमा“ अंकित है। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने महिष मूर्ति को नंदी माना है। जबकि वह मूर्ति स्पष्टतः महिष की ही परिलक्षित हो रही है। महिष की पीठ पर शिवलिंग की स्थापना और पांडव परिवार द्वारा उसकी पूजा-प्रतिष्ठा कब की गई? यह अन्वेशण का विषय है।
मंदिर के गर्भगृह में ग्रेनाइट प्रस्तर से निर्मित बड़ी जलहरी है। जिसमें शिवलिंग स्थापित है, परंतु यह शिवलिंग मूल प्रतीत नहीं होता। क्योंकि इसकी आकृति जलहरी के अनूरूप स्वाभाविक नहीं लगती। शिवलिंग की जलप्रवाहिका उत्तर की ओर है। गर्भ-गृह की पश्चिमी भित्ति पर आले में करबद्व नारी प्रतीमा है। लोग जिसकी पूजा पार्वती के रूप में करते हैं। गर्भगृह के चारों कोनों में अलंकृत स्तंभ हैं। तीन भित्तियों पर छः भारवाहकों की प्रतिमाएं हैं। ऊपर का शीर्ष भाग पांच वृत्ताकार भागों में विभक्त है जो शीर्ष की ओर क्रमषः सकीर्ण होते गये हैं। गर्भ गृह के केन्द्रीय शीर्ष पर पूर्ण विकसित कमल का अलंकरण है। यह अलंकरण बड़ा ही दर्शनीय और चित्ताकर्षक है।

गोवर्श्वन पर्वतधारी भगवाना कृष्ण
मंदिर का वाह्य शिल्प अतुलनीय और अद्वितीय है। इसमें भिन्न-भिन्न विषयों और भाव-भंगिमाओं से युक्त मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर का अधिष्ठान, जंघा, शिखर व आमलक अत्यंत ही अलंकृत हैं। मंदिर की जगती भूमि पर निर्मित है। अधिष्ठान के प्रथम भाग में ताड़ पत्रों व पत्रावलियों का अलंकरण है। द्वितीय भाग में प्रथम गजथर है जिसमें हाथियों को गतिशील मुद्रा में अंकित किया गया है। कहीं हाथी युद्ध की मुद्रा में है तो तरू पल्लवों के साथ क्रीड़ारत।
कुछ दृश्यों में शिकारियों द्वारा हाथियों के शिकार का दृश्य है। गजथर के ठीक ऊपर अश्वथर है। इस थर में विभिन्न मुद्राओं में अश्वारोहियों को अंकित किया गया है। अश्वारोही हाथ में तीर-कमान, तलवार, भाला आदि धारण किये हुए हैं। अश्वथर में कुछ मिथुन मूर्तियां भी उत्कीर्ण हैं। इन प्रस्तर खंडों में शिल्पकला का अद्भुत नमूना विद्यमान है।
अश्वथर के ऊपर नरथर है। नरथर में स्त्री-पुरूष की विभिन्न भाव-भंगिमाओं के साथ-साथ रामायण व कृष्णलीला से संबंधित दृश्यों का सजीव शिल्पांकन है। दक्षिण दिशा में कृष्ण द्वारा कलिया नाग का मर्दन, गोवर्धन पर्वत का धारण तथा त्रिभंग मुद्रा में बंशीवादन की मनोहारी दृष्यावलियां हैं। कुछ मिथुन मूर्तियां भी हैं।
पश्चिम दिशा के नरथर में मैथुन क्रिया में रत मिथुन मूर्तियों तथा मल्ल युद्ध आदि का अंकन है। उत्तर दिशा में राम लीला से संबंधित चित्रण है। बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि-वध, अशोक वाटिका में शोकमग्न सीता, स्फटिक शिला पर बैठे राम लक्ष्मण के सम्मुख करबद्ध हनुमान तथा बानरों का नृत्य संगीत आदि का सहज दृश्यांकन इस मंदिर में कला वैभव को द्विगुणित करता है।

मिथुन प्रतिमा
मंदिर के जंघा भाग में स्तंभाकृतियां नौ-नौ भागों में विभक्त हैं। प्रस्तर खंडों की जुड़ाई इतनी कुशलतापूर्वक की गई है कि खंडों में विभक्त होने के बावजूद ये प्रस्तर खंड एक ही शिलाखंड के रूप में प्रतीत होते हैं। इनमें उत्कीर्ण मूतियों की भव्यता व अंकन दर्शनीय है।
इस भाग में अनेक देवी-देवताओं, दशावतार, जीव-जगत से जुड़े पहलुओं जैसे-नवयौवना, स्तनपान कराती माता, प्रेमालाप करते नर-नारी, गदाधारी व धनुषधारी सैनिकों आदि की सुन्दर मूर्तियां उत्खचित हैं। उपरोक्त शिल्पांकन तत्कालीन समाज की स्थितियों और मानवीय संबंधों का प्रकटीकरण करते हैं। जंघा में आलों का भी निर्माण हुआ है। जिसमें केवल तीन आलों में काल भैरव, सती स्तंभ व महिषासुर मर्दनी की भव्य मूर्तियां हैं। शेष सात आले रिक्त हैं।
मंदिर का शिखर भाग भी अनेक अलंकरणों से परिपूर्ण है। शिखर के निचले भाग में तीनों दिशाओं उत्तर, पष्चिम व दक्षिण में एक-एक मंदिर का शिरांग आमलक कलश निर्मित है। जिनमें मूर्तियों के तीन थर हैं। अश्वारोही थर, नरथर में कृष्ण की बंशीवादन में लीन सम्मोहित करती मूर्तियां व तृतीय थर में नायिका की दो मूर्तियां हैं।
शिखर के शीर्ष भाग में चारों कोनो में देवपुरुष उत्कीर्ण हैं। शीर्ष पर पगड़ी बांधे गंभीर भाव लिये ये मूर्तियां बड़ी भव्य हैं। इसके साथ ही शिखर में ज्यामितीय आकृतियों की बहुलता है। शिखर के शीर्ष पर वृत्ताकार आमलक सपूंर्ण मंदिर को भव्यता प्रदान करता है। इस आमलक के ऊपर क्रमश: पांच लघु आमलकों की श्रृंखला के पश्वात प्रस्तर कलश स्थापित है।
अद्भुत कलात्मक व अलंकरण युक्त ये मूर्तियां इस मंदिर के वैभव हैं और यह मंदिर है इस अंचल का, इस जिले का और संपूर्ण छत्तीसगढ़ का। जहां पुरातात्विक संपदा आज संरक्षित और सुरक्षित रूप में कला, संस्कृति और इतिहास का गौरव गान कर रही है। प्रस्तरों में उत्कीर्ण मूर्तियां हमारी आस्था, श्रद्धा-विश्वास और हमारे जीवन के विभिन्न क्रिया व्यवहारों तथा भाव-भंगिमाओं के गीत गा रही हैं। ये पाषाण सही, पर बोलते हैं। जीवन में मधुरस घोलते हैं। यहां अनजान शिल्पियों ने अपनी भावनाओं और कल्पनाओं को हथोड़े व छेनी के माध्यम से प्रस्तर खंडो में उत्कीर्ण कर कला को अमर कर दिया है। जिसे विश्वास न हो, वो यहां आये, देखे-सुने और अनुभव करे, यहां पाषाण बोलते हैं।
फ़ोटो - ललित शर्मा
आलेख-बिहिनिया से साभार
डॉ. पी. सी. लाल यादव
गंडई, छत्तीसगढ़
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