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कृष्ण की द्वारिका और पुरातात्विक तथ्य

कृष्ण की द्वारिका और पुरातात्विक तथ्य

मगध के राजा, जरासंध कृष्ण की राजधानी मथुरा पर अधिकार करने के लिए एक बड़ी सेना के साथ आ रहें हैं। सतहवाँ आक्रमण होने के कारण जरासंध इस बार सभी तैयारियों के साथ आ रहे थे। यह समाचार जंगल में आग की तरह फैल गयी। आसन्न विपत्ति ने संपूर्ण शहर पर एक उदासी का आवरण फैला दिया। लेकिन कृष्ण शान्त एवं प्रकृतिस्थ थे। इससे पूर्व उन्होंने स्वयं भगवान इन्द्र के आक्रमण का सामना किया था जब इन्द्र ने गोकुल का विनाश करना चाहा।

उस समय उन्होंने विशाल गोमांतक पर्वत को अंगुलियों पर उठाकर सभी लोगों को बचाया। युद्ध और विजय उनके लिए बच्चों का खेल है। परन्तु श्रीकृष्ण ने सोचा रक्तपात क्यों किया जाय जब अन्य बेहतर विकल्प उपलब्ध है? अन्य अधिक उपजाऊ स्थान पर जाकर क्यों न बसा जाय? इस प्रकार कृष्ण और उनकी प्रजा गुजरात के कुशस्थली (द्वारिका) में जाकर बस गए। अप्रवासियों की संख्या हजारों में होने के कारण यहाँ जगह की अत्यन्त कमी हो गई। पीछे अथाह समुद्र है। निर्माण के लिए एक इंच भी जगह नहीं है।


गोमान्तक पर्वत 

क्या किया जाय? समुद्र की उत्ताल तरंगों की ओर देखकर कृष्ण बुदबुदाए "यदि आप मेरा आदर करते हैं तो वापस जाइए"।अधिकृत भूमि पर एक सुन्दर नगर बन गया। यहाँ आकर्षक बाग तथा फूलों से सुसज्जित मैदान थे। भीड़ भरे बाजारों के कोलाहल का समाचार चारों तरफ फैल गया । पारलौकिक शांति की खोज में साधक विश्व के दूर-दूराज के क्षेत्र से यहाँ आने लगे। परन्तु धीरे-धीरे होनी अपनी पकड़ मजबूत करने लगी तथा विनाशकारी संघर्ष प्रारंभ हुआ। अत्यंत तीव्र गति से एकाश्मक टूटने लगा। यादव लोग आपस में लड़ने लगे।


श्री कृष्ण की द्वारिका

समुद्र से द्वारिका की रक्षा करनेवाली चाहरदिवारी, जिसकी मरम्मत करना आवश्यक था, का मरम्मत करनेवाला कोई नहीं था। एक दिन अरब सागर की वेगवान धारा चाहरदिवारी के टूटे हुए बड़े भाग से अंदर प्रवेश कर गयी जिससे संपूर्ण नगर डूब गया। इस आतंकपूर्ण कहानी का नयोत्पादक वर्णन करनेवाला कोई नहीं रहा। चूंकि कृष्ण ने आसन्न विध्वंस की पूर्व चेतावनी लोगों को दे दी थी, अतः अंतिम क्षण से पहले ही लोग इस बाढ़ से बचकर निकल गए।

इस प्राचीन कथा की गर्वित अतिश्योक्ति तथा पूर्वदेशीय अत्युक्ति को छोड़कर, हम इस बात की जाँच करें कि इसमें कितनी अधिक सच्चाई है। क्या कृष्ण एक ऐतिहासिक पुरुष थे? यदि हों, तो वे किस शताब्दी में हुए ? इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए प्रख्यात पुरातत्वविद श्री एच.डी. साकालिया ने 1963 ई. में द्वारिका के एक भाग की खुदाई की। प्राप्त भौतिक अवशेषों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में पहली बार वहाँ लोग बसने आए।

इसका मतलब यह हुआ कि ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के पूर्व यादवों के द्वारा स्थान बदलने या कृष्ण द्वारा यह स्थान प्राप्त कर एक किला बनवाने का सवाल ही नहीं उठता। इसके आधार पर बहुत से इतिहासकारों ने तर्क दिया कि महाभारत, स्कंदपुराण, गदजातक तथा द्वारिका माहात्म्य में उल्लिखित द्वारिका का निर्माण प्रथम शताब्दी ई. पू. में हुआ। यदि हम इस तर्क को स्वीकार करें तो कृष्ण का समय प्रथम शताब्दी ई.पू. मानना पड़ेगा।


स्कन्द पुराण

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि कृष्ण प्रथम शताब्दी ई.पू.के थे तो प्रथम शताब्दी ई. पू. से सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखित छान्दोग्य उपनिषद तथा पाणिनी की अष्टाध्यायी जैसी पुस्तकों में कृष्ण के संदर्भ की प्राप्ति का समाधान हम कैसे करेंगे। हस्तिनापुर की वैज्ञानिक खुदाई के आधार पर महाभारत का काल 12वीं 14वीं शताब्दी ई.पू. होता है। इन दोनों (कृष्ण तथा महाभारत) के बीच के 11वीं शताब्दि‌यों की रिक्ति को हम कैसे भरे ? इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक प्रणयात पुरातत्वविद् प्रो. एस. आर. राव का तो डॉ. सांकलिया तथा उनके अनुयायियों के तर्क से भिन्न था। सन् 1979 ई. में जब प्रो. राव ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तत्वाधान में द्वारिका के उत्खनन का कार्य प्रारम्भ किया तो उन्होंने 1400 ई. पू. के भौतिक अवशेषों को चिन्हित किया। 1400 ई.पू. के समय के द्वारिकावास की इस खोज में हवा का रुख प्रो. सांकालिया तथा अन्य के तर्क के विरुद्ध कर दिया।


द्वारिका में उत्खनन, फोटो- वर्ष 1979

इसका अर्थ यह भी हुआ कि द्वारिका हस्तिनापुर के बराबर पुराना था। यह कृष्ण की द्वारिका का एक भाग हो सकता है। परतु जब तक निश्चित साक्ष्यों क साथ समुद्र में डूबे  किले और बुर्जियों सहित डूबे हुए नगर की पहचान नहीं की जाती, तब तक हम इसे कृष्ण की द्वारिका नहीं कह सकते।

जलगत पुरातात्विक उत्खनन को लिए प्रशिक्षित गोताखोर, परिष्कृत - उपकरण तथा अन्य बुनियादी ढाँचों की सुविधा होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश, 1980 ई. तक भारत में समुद्र में उत्खनन एवं अन्वेषण के लिए लोगों को प्रशिक्षित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। यद्यपि प्रो. राव ने राष्ट्रीय समुद्रविज्ञान संस्थान की मदद तथा समर्थन से कुछ युवा पुरातत्वविदों को समुद्र में उत्खनन के लिए प्रशिक्षित किया। लेखक को भी प्रो. राव के अधीन जलगत पुरातात्विक उत्खनन के लिए 2 वर्षों तक प्रशिक्षण का मौका मिला।

इन प्रशिक्षित लोगों के साथ द्वारिका के निकट समुद्र का भौगोलिक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण से यह सिद्ध हुआ कि द्वारिका के निकट समुद्र 10,000 वर्ष पूर्व आज के स्तर से 60 मीटर नीचे तथा 3,500 वर्ष पूर्व (1500 ई. पू.. महाभारत काल) आज के स्तर से 9 मीटर नीचे था। इसलिए द्वारिका की खोज 9 मीटर से 10 मीटर जल की गहराई तक समिति हो गई।


जलगत पुरातात्विक उत्खनन

जब 'साइड स्केनर', 'सब बॉटम प्रोफाइलर' तथा 'इको साउन्डर' की सहायता से समुद्र का अन्वेषण किया गया तो किलेबंदी की दीवार के अवशेषों का पता लगा। गोताखोर दल ने समुद्र तट से आधा किलोमीटर दूर पर किलेबंदी की उत्तरी दीवार की पहचान की। सात मीटर की गहराई में चूना पत्थर से बने बुर्ज का भी पता चला।अब तक किये गये कार्य से पता चलता है कि नगर की लम्बाई चार किलोमीटर तथा अधिकतम चौड़ाई आधा किलोमीटर थी।


जलगत पुरातात्विक उत्खनन

इस स्थल से बहरीन की एक मिश्रित एकश्रृंग मुहर भी प्राप्त हुई है, जो यह स्पष्ट करती है कि द्वारिका के लोगों का व्यापारिक संबंध बहरीन से था। इस स्थान से प्राप्त दूसरी अनोखी वस्तु सौरिया और साइप्रस में व्यवहार किये जाने वाले तीन छेदों वाला लंगर है। वह तथ्य कि इन दोनों वस्तुओं का स्वतंत्र रूप से काल 1400 ई.पू. (हस्तिनापुर की खुदाई के आधार पर महाभारत काल) निर्धारित होता है द्वारिका के पुरावशेषों को और अधिक विश्वसनीयता प्रदान करता है।

लेख-
के. के. मुहम्मद,
अधीक्षण पुरातत्त्वविद,
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,
संस्कृति संयुक्तांक – 8/9

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