आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार

नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि

पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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आदर्श और मर्यादा के प्रतिमान

आदर्श और मर्यादा के प्रतिमान


भगवान श्री राम का चरित्र आदर्श मानव जीवन की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है । श्रीराम का नाम लेते ही सहज रूप से श्री रामचरितमानस की स्मृति जाग उठती है और इसके विपरीत भी, यदि श्री रामचरितमानस का नाम ले तो तत्काल मन - मस्तिष्क में श्री रामकी छवि उभरकर सामने आ जाती है। राम और रामचरितमानस मानों एक दूसरे के प्रतिरूप हो और साथ ही गोस्वामी तुलसीदास जी को भी भूलाया नहीं जा सकता।


गोस्वामी जी व रामचरितमानस के विषय में एक संत का भाव है -

‘जब तक सूरज चांद रहेगा,जब तक सागर में पानी,
तब तक बाबा अमर रहेगी, तेरी यह राम कहानी ’

क्योंकि भगवान श्री राम को जन-जन के राम बनाने वाले  गोस्वामी जी ही है । गोस्वामी जी के मन में रामचरितमानस लेखन के पहले यही विचार आया कि कैसे राम वन - वन से जन-जन के मन में विचरण करें? क्योंकि उन्हें पता था कि राम तो चिरपुरातन व नितनूतन पुरुष हैं । आज से लाखों वर्ष पहले से हैं लेकिन अभी तक राम जन-जन के मन में नहीं आया है । इसलिए गोस्वामी जी ने ऐतिहासिक और भौगोलिक वर्णन को प्राथमिकता ना देते हुए तथा संस्कृत भाषा की दुरुहता को त्यागकर ग्राम्य-भाषा (अवधी) में रचना करने का निश्चय करतें हैं,ताकि जनसाधारण भी राम को पढ़ सके व समझ सके- ‘ भाषाबद्ध करबि मैं सोई1 व ‘ ग्राम्यगिरा’ से स्पष्ट है।

गोस्वामी जी स्पष्ट कहते हैं कि मैं कोई अलग रचना नहीं कर रहा हूं, मैं तो महर्षि वाल्मीकि के रामायण जो संस्कृत में है उसे मैं केवल अपने ग्राम-भाषा में बद्ध कर रहा हूं । न मैं कवि हूं और ना मुझ में कविता करने की बुद्धि ही है ‘कबित बिबेक एक नहिं मोरे’2 गोस्वामी जी के इस प्रश्न के हल होते ही दूसरा प्रश्न सामने आ गया कि यह ग्रंथ यदि गंवारू -भाषा में लिखा जाए तो कम-पढ़े लिखे लोग तो इसकी सराहना करेंगे,लेकिन जो विद्वतवृंद हैं वह कहीं महत्त्व ही न दें। इस समस्या के समाधानस्वरूप गोस्वामी जी प्रत्येक कांड की शुरुआत संस्कृत श्लोक से किए और फिर आगे चौपाई को अवधी भाषा में लिखें । संस्कृत श्लोक से विद्वतसमुदाय में व ग्रामभाषा से साधारण-जन के बीच वंदनीय रहा । इसलिए रामचरितमानस का जितना आदर एक गांव के साधारण लोगों में है उतना ही एक शिक्षित विद्वत समुदाय में भी है । पूरी दुनिया में ऐसा कोई ग्रंथ नहीं ना ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो इन दोनों वर्गों में समान रूप आदर प्राप्त करता हो?

पूरी रामचरितमानस में भगवान श्री राम के जिस रूप को देखें जी चरित्र को देखें वह एक आदर्श वह मर्यादा से युक्त चरित्र है कहीं भी कहीं मर्यादा का उल्लंघन करते नहीं मिलते। चाहे वह पुत्र हो, भाई, मित्र, पति या राजा का रूप हो सभी जगह अपनी मर्यादा में रहे, इसलिए आज भी अधिकांश लोगों के लिए आदर्श का प्रतिमान बने हुए हैं । जब वह पुत्र की भूमिका निभाते हैं, तो लगता है कि उनके जैसा पुत्र कोई हो ही नहीं सकता। आज हम कल्पना करके देखें हमें कल राज मिलने वाला हो, आज उसकी पूरी तैयारी हो गई हो और सुबह होते ही पता चले कि यह राजपद आपको नहीं, आपके भाई को दिया जाएगा, वह भी सौतेले भाई को और इतना ही नहीं,अब आप यहां रह भी नहीं सकते, जंगल में रहना पड़ेगा, भगवा वस्त्र में बिना कोई राजसी संसाधन के । आज थोड़े से लाभ के लिए भाई-भाई का प्राण लेने को तैयार हो जाता है ।

माता कैकई से राम वन जाएंगे कि बात सुनकर राजा दशरथ अधीर हो, विह्वल हो गए, उन्हें बहुत दु:ख हुआ इस पर भगवान श्री राम कहते हैं, पिता श्री! आप तो बहुत थोड़े ही बात के लिए इतना दुखी हो रहे हैं ‘ थोरिहि बात पितहि दु:ख भारी3 भगवान श्री राम प्रसन्नता पूर्वक वन जाने को तैयार हो जाते हैं ।  तभी गोस्वामी जी एक आदर्श पुत्र का चित्र खींचते हुए लिखते हैं ‘धन्य जनम जगतीतल तासु’4 अर्थात्-उस पुत्र का जन्म इस पृथ्वी पर धन्य है जिसका चरित्र सुनकर उसके पिता को प्रसन्नता हो ।

यदि हमें यह देखना हो कि एक भाई को कैसे होना चाहिए? एक सच्चे भाई का आदर्श स्वरूप क्या होता है? तो भी हम रामचरितमानस में  देख सकते हैं ।  केवल राम के चरित्र में ही नहीं,लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न व राक्षसराज रावण के भाई कुंभकरण के चरित्र से भी हम भात्तृप्रेम देख सकते हैं । लेकिन हमारा विषय यहां राम है तो हम राम की ही चर्चा करेंगे। भगवान राम को जब राजा बनाए जाने की बात आती है, तो भगवान राम इस पर आपत्ति जताते हुए कहते हैं कि-

‘हम सब भाइयों का एक साथ जन्म हुआ है भोजन, भजन, शयन खेलकूद कर्णबेध,जनेऊ व विवाह संस्कार सब साथ-साथ हुआ है, तो राजा मैं अकेले क्यों?’5

वहीं भरत को राज दिए जाने की बात पर भी श्री राम तनिक भी विरोध प्रकट नहीं करते हैं, अपितु प्रसन्न होते हैं । यदि हम एक अच्छे अच्छे मित्र का पहचान करना चाहें,अच्छे मित्र का लक्षण जानना चाहें तो भी हमारा आदर्श राम व रामचरितमानस ही होगा । कैसे? भगवान श्री राम का वानर राज सुग्रीव व निषादराज गुह से मित्रता यह संदेश देता है कि मित्रता का मापदंड पैसा, पद नहीं प्रेम होना चाहिए और वह प्रेम अंधा नहीं होना चाहिए । इतनी दृष्टि तो हो ही के अपने मित्र के गुण व अवगुण देख सके, गुण को उन्हें दिखा सके वह अवगुण को दूर करने का प्रयास करें ‘गुन  प्रगटै अवगुनहि दुरावा6

अपने मित्र के दुख में दुखी होना चाहिए, इतना ही नहीं अपने पहाड़ जैसे दुख को रज-कण की तरह मानें व मित्र के राज-कण के समान दुख को पहाड़ के जैसा मानें ‘निज दुख गिरिसम रज कर जाना7  यह श्री राम के जीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। राम वानराज सुग्रीव से मित्रता करते हुए यह तनिक भी विचार नहीं किया कि मैं चक्रवर्ती सम्राट दशरथ नंदन श्री राम हूं,वह सहज ही मित्रता स्वीकार कर लेते हैं और मित्रता स्वीकार करते ही सबसे पहले मित्र के कष्ट को दूर करने का निश्चय करते हैं।

अपनी अथाह प्रियविरह -वेदना को भूलकर पहले अपने मित्र की संकट को दूर करते हैं ।  वहीं जब निषादराज गुह से मिलते हैं तो सीधा उनको गले लगाते हैं और गदगद हो जाते हैं यहां एक दिव्य प्रेम परिलक्षित होता है। कोई उच्च-नीच नहीं छोटे-बड़े का भेद कहीं दिखाई नहीं देता है।   

श्री राम हर रूप में आदर्श हैं पुत्र,मित्र ही नहीं एक आदर्श पति भी हैं । आदर्श पति कहते ही एक प्रश्न हमारे समक्ष कौंध जाती है,कि आदर्श पति कैसे हो सकते हैं? जो अपनी गर्भवती पत्नी को अकेले वन में छोड़ दिए, वह भी उस समय, जब उन्हें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। वह कैसे आदर्श हो सकते हैं? तो मैं प्रबुद्ध पाठकगणों से विनम्र निवेदन करना चाहता हूं, जो मुझे अब तक के नियमित मानस पाठ व संत महात्माओं की कृपा से जो भाव समझ में आया ।

भगवान  श्री राम जब भगवती सीता का परित्याग करते हैं तो उस समय एक मर्यादा का निर्वाह कर रहे थे,राजधर्म की मर्यादा का निर्वाह। क्योंकि वह धोबी राजसभा में आकर राजा राम से गुहार लगाए थे, तो उनका राजधर्म कहता है की प्रजा के सुख-दुख की रक्षा करना। क्योंकि वह स्वयं कहते हैं कि ‘जासु राज प्रिय प्रजा दु:खारी । सो नृप आवसि नरक अधिकारी’8 तो अपने कहे बातों की रक्षा व राजधर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणवल्लभा,अर्धांगिनी का भी त्याग कर देते हैं। यहां भी राम आदर्श ही हैं, लेकिन यहां एक राजा के रूप में आदर्श हैं। आज के परिपेक्ष्य में सोच कर देखिए एक साधारण राजनेता अपने एक साधारण कार्यकर्ता के जघन्य अपराध को भी छिपाने का हरसंभव प्रयास करता है,लेकिन  राम एक साधारण प्रजा के कहने पर अपनी प्रियतमा का परित्याग कर दिए। राम ऐसे राजा थे जिनके राज की आज भी कल्पना की जाती है। आज भी लोग रामराज्य की ही कल्पना करते हैं। कैसा था रामराज्य? क्या था राम राज्य में? जैसे ही भगवान श्री राम राज में बैठे, ‘ सब कोई प्रसन्न हो गए,कोई किसी से बैर नहीं करता था, राम का इतना प्रताप था की विषमता सब खो गई, सब वर्णाश्रम धर्म का पालन करते थे, कहीं रोग, शोक नहीं था, दैहिक-दैविक-भौतिक ताप किसी को नहीं सताता था, सब परस्पर प्रेम करते थे, अपने-अपने धर्म का पालन करते थे, किसी की अल्प मृत्यु नहीं होती थी, सब सुंदर व जवान थे, कोई दरिद्र नहीं था, कोई दुखी नहीं थे, कोई दीन नहीं थे, कोई अज्ञानी नहीं था, कोई चरित्रहीन नहीं थे, सब धर्म परायण थे, नर और नारी सभी गुणवान थे, सब पंडित थे, सब ज्ञानी थे, कपट नहीं था,इतने सब गुण रामराज्य में विद्यमान थे।9 इसीलिए कल्पना की जाती है की राम राज्य स्थापित हो। जरा सोच कर देखें ऐसा राज्य कहां कहाँ होगा?

रही बात आदर्श पति की तो अब उनके आदर्श पति का स्वरूप देखते हैं जब वह पति रूप में थे। हम सभी को विदित है कि जब सूर्पणखा भगवान श्री राम के सामने प्रस्ताव रखती है, तो श्री राम सीता जी की ओर देखते हुए सूर्पनखा से कहते हैं - यह मेरे छोटे भाई हैं और वह कुंवारे हैं ।10 बस इतना ही कहते हैं’ सूर्पनखा पूरी बात समझ जाती है एक शब्द भी नहीं कहे कि यह मेरी पत्नी है,मैं विवाह नहीं कर सकता, मैं विवाहित हूं । बिना कुछ कहे ही  सूर्पणखा सब कुछ समझ गई। इसका क्या यह अर्थ है कि सूर्पनखा बहुत बुद्धिमान थी ? नहीं ऐसा नहीं है ।  कहते हैं प्रेम की भाषा पशु-पक्षी भी समझ जाते हैं, तो सूर्पनखा कैसे नहीं समझती,जो चारों वेदों के ज्ञाता रावण की बहन थी । लेकिन राम तो कुछ भाषा कहे ही नहीं,तो क्या समझी सूर्पनखा? नहीं ऐसा नहीं है, हमें समझने में भूल हो रही है । भाषा भावों व विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती है । लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि इसके लिए मुख से बोलना ही अनिवार्य हो,आंखें भी बोलती है। एक भाषा में नहीं कई भाषाओं में एक विचार नहीं कई विचार बिहारी जी लिखते हैं -‘कहत नटत रिझत मिलत…भरे भौन ही करत है नैनन ही सौ बात ।’11 जब बिहारी लाल एक साधारण नायिका के माध्यम से कल्पना कर सौ बातें आंख से बुलवा दिए, तो भगवान श्री राम क्या हजारों-लाखों बातें आंखों से नहीं कर सकते? निश्चित कर सकते हैं। मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि जब राम कुछ कहे ही नहीं, केवल सीता जी की ओर देखे हैं, तो ऐसे देखे होंगे, इस भाव से देखे होंगे कि उनकी आंखें ही हजारों-लाखों शब्द (भाव) एक साथ कह गए होंगे हैं।  सूर्पनखा राम की आंखों को,उनके कपोल को,उनके अधरों को व उनके पूरे अंग-प्रत्यंगों को देखकर यह समझ गई होगी, कि इनके अंग प्रत्यंग में उनके प्रति प्रेम है। फिर वह खीझकर लक्ष्मण के पास चली जाती है । मेरा मानना है कि सूर्पनखा ही क्यों? एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है,यदि हम समूह में बैठे हैं,तो किसकी आपस में शत्रुता व मित्रता है करके? मानस में गोस्वामी जी लिखते भी हैं-‘बैर पेम नहिं  दुरहि-दुराएँ ’12 वही रहीम दास जी लिखते हैं-

‘खैर खून खांसी खुशी बैर प्रीति मदपान।
रहिमन दाबे ना दबे जानत सकल जहान।’13

श्री राम के उपरोक्त व्यवहार से क्या यह नहीं लगता, कि यह आदर्श पति का गुण है?  

दूसरी दृष्टि है, हम सब जानते हैं कि राम अपने जीवनपर्यंत सीता के साथ ही रहे,वियोगकाल में  भी दूसरा विवाह नहीं किए। जबकि स्वयं उनके पिता के ही तीन रानियां थी और उस समय के राजाओं-महाराजाओं में अनेक रानियां रखने की परंपरा थी। चलो हम मान लिए की राम बहुत क्रूर, निर्मम,निर्दयी थे इसलिए सीता जी का परित्याग कर दिए। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचने का प्रयास किया कि क्या कारण था? क्या कमियां रही होगी?कि राम दोबारा विवाह नहीं किया। क्या कभी हमने सोचा? निश्चित रूप से भगवान श्री राम एकपत्नी व्रतधारी थे और होते भी क्यों ना? जिसके राज के सभी पुरुष एकपत्नी व्रत धारी थे, तो राजा क्यों ना होता। और राजा का आदर्श स्वरुप व उनकी मर्यादा ही तो प्रजा के रूप में आता है - ‘एक नारि ब्रत रत सब झारी14  गोस्वामी जी कहते हैं कि रामराज में सभी पुरुषमात्र एक पत्नीव्रती है। इसी प्रकार स्त्रियां भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली है। निश्चित रूप से भगवान श्री राम एक आदर्श पति भी थे, मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वह जीवन की प्रत्येक अच्छे-बुरे सभी परिस्थितियों में एक आदर्श मर्यादा के प्रतिमान है।  इसलिए आज जन-जन के मन में रचे बसे हैं।  राम त्रेतायुग में ही नहीं आज भी पूरे पूरे भारतवर्ष में व्याप्त है। आपको जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि आज पुरे देश में 56 लाख लोगों के नाम के आगे या पीछे राम लगा हुआ है हर 245 व्यक्ति में एक व्यक्ति के नाम में राम है। मुझे लगता है राम के बिना इस देश की कल्पना नहीं की जा सकती। यहाँ राम कण-कण में है लोगों के रग-रग में हैं। सभी पाठक बंधुओ से विनम्र आग्रह है, कि अपने जीवन में श्री रामचरितमानस को समझने का व श्री राम के जीवन चरित्रों का अनुकरण करने का प्रयास करें।जो भी व्यक्ति, समाज व राष्ट्र जितने अंश में श्री राम के जीवन चरित्रों को आत्मसात  करेगा वह राष्ट्र उतने ही अंशों सफलता, समृद्धि व शांति को प्राप्त करेगा।

                                                               धन्यवाद!

 संदर्भ ग्रंथ -

1. गोस्वामी तुलसीदास श्री रामचरितमानस,बालकांड दोहा 30 चौपाई 2

2....बालकांड दोहा 8 चौपाई 11

3....अयोध्याकांड दोहा 41 चौपाई 6

4....अयोध्या कांड दोहा 45 चौपाई एक

5....अयोध्या कांड 9 चौपाई 3,4

6.... किष्किंधाकांड दोहा 6 चौपाई 4

7....किष्किंधाकांड दोहा 6 चौपाई 2

8.... अयोध्या कांड दोहा 70 चौपाई 6

9....उत्तरकांड दोहा 20 से 21 तक

10.... अरण्यकांड 16 चौपाई 11

11. बिहारीलाल, बिहारी सतसई

12. अयोध्या कांड दोहा 263 चौपाई 2

13. रहिमदास रहिम के दोहे

14. उत्तरकांड दोहा 21 चौपाई 8

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