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जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वे ही राम हैं!

जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वे ही राम हैं!


भगवान श्रीराम का पावन चरित्र न केवल भारतीय संस्कृति का मूलाधार है, अपितु यह सम्पूर्ण विश्व, और मानव जीवन के आन्तरिक प्रबन्धन का एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक ग्रन्थ भी है। अनुग्रह कुमार प्रसाद जी द्वारा रचित यह आलेख रामायण के दार्शनिक, और मनोवैज्ञानिक स्वरूप का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस लेख में यह उद्घाटित किया गया है कि अयोध्या, दशरथ, कौशल्या, राम, सीता, और रावण वास्तव में हमारे ही शरीर, इन्द्रियों, आत्मा, मन, और अहंकार के प्रतीक हैं। यह आलेख हमें यह सिखाता है कि जब हमारा मन अहंकार के वशीभूत होकर सांसारिक माया में भटक जाता है, तब श्वास रूपी हनुमान ही उसे पुनः आत्मा रूपी राम से जोड़ते हैं।


हमारे इतिहास में अनेक ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने मानव सभ्यता पर अमिट छाप छोड़ी है। उनमें से एक भगवान श्रीराम का जीवन है, जिसने समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए सदियों से करोड़ों लोगों के विश्वास को आकार दिया है।

भारतीय परम्परा में भगवान श्रीराम को केवल एक दिव्य पुरुष के रूप में ही नहीं, अपितु आदर्श मानव मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में भी पूजनीय माना जाता है। उनका जीवन इस बात का जीवन्त मार्गदर्शन है कि संसार के उत्तरदायित्वों, और चुनौतियों में पूर्ण रूप से भाग लेते हुए धर्म के मार्ग पर कैसे चला जाए।

राम के आदर्श केवल भारतीय संस्कृति तक सीमित नहीं हैं। उनके गुण सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों सत्य, करुणा, और न्याय का प्रतिनिधित्व करते हैं। अतएव विभिन्न संस्कृतियों में भी राम के चरित्र से प्रेरणा ली जा सकती है।

राम के आदर्श जीवन ज्योति को करते हैं जागृत
राम के आदर्श जीवन ज्योति को करते हैं जागृत 

विश्व के अनेक देशों में श्रीराम का प्रभाव अत्यन्त व्यापक है। थाईलैंड में रामायण को रामकियेन कहा जाता है। वहाँ के राजा स्वयं को राम का वंशज मानते हैं, और अपने नाम के आगे राम लगाते हैं। इंडोनेशिया विश्व की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने के उपरान्त भी वहाँ रामकथा बहुत लोकप्रिय है, जिसे काकावीन रामायण के नाम से जाना जाता है।

कम्बोडिया में रामायण को रिमकर कहा जाता है, जिसका अर्थ राम की महिमा है। नेपाल में राम को दामाद माना जाता है, और माता जानकी के साथ उनकी पूजा की जाती है। लाओस में रामायण को फरा लक फरा लाम कहा जाता है, जिसे उनका राष्ट्रीय महाकाव्य माना जाता है।

श्रीलंका में रामायण का सम्बन्ध सीता हरण से है, और वहाँ रामकथा को जानकी हरण के नाम से भी जाना जाता है। मलेशिया की स्थानीय रामायण परम्परा में राम को श्री राम के नाम से ही पूजा जाता है। रामायण केवल एक कथा से कहीं अधिक है। इसमें दार्शनिक, और आध्यात्मिक महत्त्व के साथ साथ एक गहरा सत्य भी निहित है, जिसके विषय में हम में से अधिकांश लोग नहीं जानते।


विश्वव्यापी हैं श्रीराम

राम आत्मा का प्रकाश हैं। जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वही राम हैं। श्रीराम का जन्म अयोध्या के राजा दशरथ, और माता कौशल्या के यहाँ हुआ। संस्कृत में दशरथ का अर्थ दस रथों वाला है। यहाँ दस रथ हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियों (आँखें देखना, कान सुनना, नाक सूंघना, जीभ स्वाद लेना, और त्वचा स्पर्श महसूस करना) और पाँच कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर, मुख, गुदा, और उपस्थ, जो क्रमशः ग्रहण, गति, भाषण, त्याग, और प्रजनन का कार्य करती हैं) के प्रतीक हैं।

कौशल्या का अर्थ कुशल है। राम का जन्म वहीं हो सकता है, जहाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियों, और पाँच कर्मेन्द्रियों के कार्य में कौशल, और सन्तुलन हो। राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या का अर्थ है वह स्थान जहाँ युद्ध नहीं हो सकता। जब हमारे मन में कोई संघर्ष नहीं होता, तभी परम प्रकाश का उदय होता है।

राम हमारी आत्मा के प्रतीक हैं, लक्ष्मण चेतना के, और रावण अहंकार तथा नकारात्मकता का प्रतीक है। माता सीता हमारे मन का प्रतीक हैं। जैसे जल का स्वभाव बहना है, वैसे ही मन का स्वभाव चंचल होना है। हमारा मन भौतिक वस्तुओं से आकर्षित होता है। माता सीता स्वर्ण मृग से मोहित हो गईं।


हमारी विभिन्न भावनाओं के प्रतीक हैं रामायण के पात्र

रावण ने सीता का हरण कर लिया। रावण सीता को लंका ले जाता है, जो भौतिकवाद की भूमि है, और जिस पर अहंकार का राजा शासन करता है। लंका में सीता रूपी मन राम रूपी आत्मा पर पुनः ध्यान करने लगती हैं। वे जानती हैं कि वे किसी अत्यन्त शक्तिशाली वस्तु के जाल में फँस गई हैं, जिससे केवल राम ही उन्हें बचा सकते हैं।

राम वानरों की सेना को एकत्रित करते हैं, जो हमारे चंचल विचारों की सेना का प्रतिनिधित्व करती है। यह सेना कभी शान्त नहीं रह सकती, और निरन्तर एक विषय से दूसरे विषय पर कूदती रहती है। मन रूपी सीता को आत्मा रूपी राम से अहंकार रूपी रावण ने अलग कर दिया।

पवनपुत्र हनुमान जी ने श्रीराम को सीता से मिलाने में सहायता की। यहाँ हनुमान हमारी श्वास के प्रतीक हैं। जब मन अपने स्रोत से भटकता है, तो श्वास की सहायता से ही उसे आत्मा के पावन प्रकाश से पुनः जोड़ा जा सकता है।

माता सीता को बचाने के लिए, पत्थरों से एक पुल बनाया जाता है जिस पर राम का नाम लिखा जाता है ताकि वे पत्थर सागर पर तैर सकें। इसका अर्थ यह है कि जब हम ईश्वर का पावन नाम जपते हैं, तो हम समस्याओं, और विकर्षणों के भयंकर सागर में डूबने से बच सकते हैं।

अन्ततः, जब राम रूपी आत्मा रावण रूपी अहंकार पर विजय प्राप्त करते हैं, और अपने मन रूपी सीता से पुनः जुड़ते हैं। रावण रूपी अहंकार का नाश करने के लिए राम को उसकी नाभि पर बाण चलाना पड़ता है, जिसका अर्थ यह है कि अपने अहंकार को नष्ट करने के लिए हमें अपने भीतर की जड़ों में गहराई तक जाना होगा, और स्वयं को समझना होगा।


मन के मूल स्वरुप से मिलन हेतु अहंकार का मर्दन है आवश्यक 

जब राम, और सीता अयोध्या लौटे, तब दीपावली का उत्सव मनाया गया। परन्तु हमारे लिए सच्ची दीपावली का उत्सव तब होता है, जब हमारा मन पुनः हमारे भीतर विद्यमान उस जाग्रत प्रकाश पर ध्यान केन्द्रित करने लगता है, जो हमें ईश्वर से जोड़ता है।

रामायण की यह सम्पूर्ण कथा वास्तव में हमारे मन के, और हमारी शुद्ध आन्तरिक आत्मचेतना के पुनर्मिलन की ही गाथा है। हमारा मन इन सांसारिक आकर्षणों की ओर आकर्षित होता है, और हम अहंकार, तथा माया के जाल में फंस जाते हैं।

हम माया के इस सागर में इस प्रकार डूबे हुए हैं कि हमारे मन, और अन्तर्मन के बीच का सम्बन्ध टूट गया है। भगवान का सच्चा नाम हमें माया के उस सागर में डूबने से बचाने में पूर्णतः सहायक होगा। इस प्रकार रामायण हमारे जीवन में प्रतिदिन घटित होती है। यह केवल सहस्रों वर्ष पूर्व की घटना नहीं है।

इस प्रकार अध्यात्म रामायण केवल एक धार्मिक कथा नहीं है, अपितु जीवन को सही दिशा देने वाला एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक ग्रन्थ है। धर्म, करुणा से युक्त साहस, और आत्मिक शान्ति को मिलाकर ही एक सार्थक जीवन का सम्पूर्ण ढाँचा बनता है।

वे हमें यह स्मरण दिलाते हैं कि अध्यात्म संसार से दूर होने में नहीं है, अपितु उसमें सजग, और श्रेष्ठ रूप से संलग्न होने में है। जो हमारे हृदय में प्रकाशित हैं, वही राम हैं। रामायण केवल एक प्राचीन कथा नहीं है, इसमें दार्शनिक, आध्यात्मिक महत्त्व, और अत्यन्त गहरा सत्य निहित है।

यह पूर्णतः सत्य कहा गया है कि रामायण आपके अपने ही शरीर में निरन्तर घटित हो रही है। आपकी आत्मा राम है, आपका मन सीता है, आपकी श्वास या प्राण हनुमान हैं, आपकी चेतना लक्ष्मण हैं, और आपका अहंकार रावण है। जब रावण रूपी अहंकार ने मन को चुरा लिया, तब आत्मा व्याकुल हो गई।

अब आत्मा स्वयं मन तक नहीं पहुँच सकती, उसे प्राण रूपी हनुमान की सहायता लेनी पड़ती है। प्राण की सहायता से मन पुनः आत्मा से जुड़ गया, और अहंकार पूर्णतः नष्ट हो गया।

-अनुग्रह प्रसाद
  कर्नाटक

 

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