सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम
April 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

भगवान राम का चरित्र केवल शास्त्रीय ग्रन्थों तक सीमित नहीं है, अपितु यह भारत की वनवासी और जनजातीय लोकचेतना में भी बहुत गहराई तक रचा-बसा है। डॉ. रत्ना त्रिवेदी जी का यह शोधपरक लेख दक्षिण गुजरात के डांग अंचल में प्रचलित 'कुंकना रामकथा' की अत्यन्त विलक्षण और प्रामाणिक विवेचना करता है। वाचिक परम्परा की इस कथा में श्रीराम को एक राजा के स्थान पर वनवासी नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है और माता सीता को एक सशक्त स्त्री के रूप में उकेरा गया है। रावण के असामान्य जन्म से लेकर औपनिवेशिक स्मृति को समेटे हनुमान जी के प्रसंगों तक, यह लेख जनजातीय समाज की समृद्ध सांगीतिक और सांस्कृतिक धरोहर को हमारे सम्मुख जीवन्त कर देता है।
भारतवर्ष की सनातन और सांस्कृतिक परम्परा में रामकथा का स्थान अत्यन्त व्यापक, अगाध और सर्वस्पर्शी है। यह केवल एक धार्मिक या पौराणिक आख्यान मात्र नहीं है, अपितु यह भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों, सामाजिक संरचना और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का सबसे सुदृढ़ आधार रही है। हमारे देश के विभिन्न भौगोलिक अंचलों में रामकथा ने स्थानीय संस्कृति, लोकभाषा और जीवनशैली के अनुसार अपने अनेक नव्य और मौलिक रूप विकसित किए हैं।
इन्हीं विविध और बहुरंगी रूपों में दक्षिण गुजरात के प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण डांग जिले और उसके आसपास के जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित कुंकना रामकथा एक अत्यन्त विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण लोकपरम्परा है। यह रामकथा वास्तव में जनजातीय समाज की आत्मा, उनकी प्रकृति से जुड़ाव और उनकी सहज लोकचेतना को अत्यन्त प्रामाणिक रूप में अभिव्यक्त करती है।
कुंकना रामकथा की सबसे बड़ी और विलक्षण विशेषता यह है कि यह किसी भी प्रकार के लिखित ग्रन्थों या पाण्डुलिपियों पर आधारित न होकर पूर्णतः मौखिक परम्परा में ही जीवित और पल्लवित है। इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जनजातीय समाज के "भगत" या लोकगायक अपने गहरे अनुभव, प्रखर स्मृति और अद्भुत कल्पना-शक्ति के आधार पर प्रस्तुत करते आ रहे हैं। इसी मौखिक प्रकृति के कारण यह कथा किसी कठोर शास्त्रीय ढांचे में स्थिर या आबद्ध नहीं है, बल्कि यह समय, स्थान और कथावाचक की मनोभूमि के अनुसार निरन्तर बदलती और विकसित होती रहती है।
हर प्रस्तुति में कथा का स्वरूप थोड़ा अलग हो सकता है, पात्रों की भूमिकाएं बदल सकती हैं और घटनाओं की दार्शनिक व्याख्या भी एक नई दृष्टि के साथ श्रोताओं के सम्मुख आ सकती है। वस्तुतः यही इस लोककथा की सबसे बड़ी जीवन्तता और अजेय शक्ति है। यह किसी एक व्यक्ति का साहित्य न होकर एक सम्पूर्ण जनजातीय समुदाय के सामूहिक अनुभवों और स्मृतियों का निरन्तर विकसित होता हुआ लोकमहाकाव्य है।
डांग क्षेत्र अपनी सघन हरियाली, घने वनों, दुर्गम पहाड़ियों और अपार प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण एक अत्यन्त सुरम्य अंचल है। यहाँ निवास करने वाले जनजातीय समाज का सम्पूर्ण जीवन प्रकृति के साथ अत्यन्त गहरे और आत्मीय सम्बन्ध पर आधारित है। इसी अमूल्य कारण से कुंकना रामकथा में श्रीराम केवल एक दिव्य राजा, अवतारी पुरुष या मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में नहीं उभरते, बल्कि वे एक सहज वनवासी नायक के रूप में लोकमानस में प्रतिष्ठित होते हैं।
इस कथा में श्रीराम का चौदह वर्ष का वनवास कोई राजकीय दण्ड या भारी दुःख का प्रतीक नहीं माना गया है, अपितु वह उनके लिए एक स्वाभाविक, सहज और आनन्दमयी जीवन का ही हिस्सा प्रतीत होता है। जनजातीय समाज राम को बिल्कुल अपने जैसा मानता है। वे राम को एक ऐसा आत्मीय व्यक्ति मानते हैं जो जंगलों में निवास करता है, जो वन के पशु-पक्षियों और प्रकृति के साथ अपना पूर्ण सन्तुलन बनाए रखता है और जो अत्यन्त कठिन परिस्थितियों में भी अपने धर्म, सत्य और मर्यादा का अडिगता से पालन करता है।

डांग और निकटस्थ क्षेत्रों में राम का स्वरुप है वनवासी
जनजातीय जीवन-दर्शन में वन का स्थान सर्वोपरि है, और यही कारण है कि इस रामकथा में वनवास के प्रसंगों को सर्वाधिक विस्तार और महत्त्व दिया गया है। राम जब वन में प्रवेश करते हैं, तो वे वन के राजा नहीं, अपितु वन के एक विनम्र सेवक और रक्षक के रूप में आचरण करते हैं। उनके द्वारा कन्द-मूल खाना, पर्णकुटी में निवास करना और वन के पशु-पक्षियों के साथ आत्मीय संवाद करना जनजातीय समाज को अत्यन्त प्रिय लगता है। वे राम के भीतर अपने ही एक आदर्श पूर्वज की छवि देखते हैं।
कुंकना रामकथा में विभिन्न पात्रों का चारित्रिक चित्रण भी अत्यन्त रोचक और स्थानीय जीवन-मूल्यों के सर्वथा अनुरूप है। वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस की भांति माता सीता यहाँ केवल एक आदर्श पतिव्रता नारी या सुकुमार राजकुमारी नहीं हैं, बल्कि वे एक अत्यन्त सशक्त, स्वावलम्बी और संघर्षशील स्त्री के रूप में उभरकर सामने आती हैं, जो वन के कठोर जीवन का पूरे साहस के साथ सामना करती हैं।

स्त्री की असीम ऊर्जा और प्रकृति के साथ समन्वयक के रूप में सीता
अनुज लक्ष्मण, पवनपुत्र हनुमान और रामकथा के अन्य सभी पात्र भी जनजातीय दृष्टिकोण और मान्यताओं से पुनः परिभाषित होते हैं। इस कथा में नारी, प्रकृति और समाज के बीच के पारम्परिक सम्बन्धों को अत्यन्त संवेदनशीलता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया है।
इस प्राचीन लोककथा की एक अन्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें अनेक ऐसे अद्भुत प्रसंग मिलते हैं जो मुख्यधारा की शास्त्रीय रामायण से सर्वथा भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, इस कथा के कुछ मौखिक संस्करणों में रावण के जन्म की कथा अत्यन्त अनोखी और कौतूहल जगाने वाली है। इस आख्यान में रावण एक असामान्य परिस्थितियों में जन्म लेता है और कभी-कभी उसे शारीरिक रूप से अपूर्ण रूप में भी वर्णित किया जाता है।
जनजातीय लोकचेतना में यह वर्णन केवल कोई कपोल कल्पना नहीं है, बल्कि यह एक गहरी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। यह स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि बुराई या अहंकार का जन्म सदैव प्रकृति के असन्तुलन और वैचारिक विकृति से ही होता है। रावण का वध वास्तव में उस अहंकार का वध है जो प्रकृति के शाश्वत नियमों को तोड़ने का दुस्साहस करता है।
इसी प्रकार एक अन्य अत्यन्त रोचक और विशिष्ट प्रसंग हनुमान जी से जुड़ा हुआ है। कुंकना रामकथा में जब राम और रावण के मध्य लंका का प्रलयंकारी युद्ध समाप्त हो जाता है, तो उसके अन्त में हनुमान जी को यह अद्भुत आशीर्वाद दिया जाता है कि वे भविष्य में "अंग्रेज" बनेंगे और इस धरती पर एक लम्बे समय तक अपना सुदृढ़ शासन करेंगे।

देश और काल से परे चिरंजीवी हनुमान
यह प्रसंग पहली दृष्टि में पाठकों या श्रोताओं को अत्यन्त आश्चर्यजनक और कुछ अटपटा अवश्य लग सकता है, परन्तु वास्तव में यह जनजातीय समाज की ऐतिहासिक स्मृति और उनके औपनिवेशिक अनुभवों का ही एक सटीक प्रतिबिम्ब है। इससे यह भली-भांति प्रमाणित होता है कि कुंकना रामकथा केवल एक पारम्परिक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह समय के साथ निरन्तर बदलती सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का भी एक प्रामाणिक लोकदस्तावेज बन जाती है।
भाषा और अभिव्यक्ति की दृष्टि से भी यह लोककथा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और समृद्ध है। कुंकना या डांगी भाषा वास्तव में एक मिश्रित भाषा है, जिसमें गुजराती, मराठी और हिन्दी के सुमधुर तत्त्व एक साथ घुले-मिले हुए मिलते हैं। यह भाषा स्वयं एक अद्भुत सांस्कृतिक संगम का जीता-जागता उदाहरण है, और कुंकना रामकथा इस भाषायी विविधता को संरक्षित करने का एक अत्यन्त सशक्त माध्यम सिद्ध हुई है। इस कथा के निरन्तर गायन के माध्यम से न केवल लोकसाहित्य जीवित रहता है, बल्कि यह डांगी भाषा भी अपनी सम्पूर्ण मिठास के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित होती रहती है।
कुंकना रामकथा का सांगीतिक प्रस्तुतीकरण भी अत्यन्त कलात्मक, भावपूर्ण और सामूहिक होता है। इसे प्रायः रात्रि के शान्त प्रहर में खुले स्थानों या घने जंगलों के मध्य अलाव जलाकर प्रस्तुत किया जाता है। मुख्य कथावाचक जिसे "भगत" कहा जाता है, वह पूरी तन्मयता और अगाध श्रद्धा के साथ कथा का गायन करता है, और उसका सहयोगी कलाकार उसके अन्तिम शब्दों को पूरे उल्लास के साथ दोहराता है, जिससे रात्रि के सन्नाटे में एक विशेष लय और जादुई संगीतात्मकता उत्पन्न होती है।
यह अनूठी गायन शैली श्रोताओं को कथा की गहराई से सीधा जोड़ती है और उन्हें मात्र दर्शक न रखकर कथा का सक्रिय सहभागी बना देती है। इस भावपूर्ण प्रस्तुति में एक विशेष स्थानीय वाद्ययन्त्र "थाली" का उपयोग किया जाता है। यह कांसी या पीतल की एक साधारण धातु की थाली होती है, जिसमें एक लकड़ी का डंडा विशेष तकनीक से लगाया जाता है और उसे अंगुलियों के घर्षण और थाप से एक विशिष्ट ढंग से बजाया जाता है। इस वाद्ययन्त्र से उत्पन्न होने वाली गूँजती हुई ध्वनि कथा के गम्भीर भावों को और भी अधिक गहरा और रहस्यमयी कर देती है।

वाचिक परम्परा के माध्यम से जीवित है कुंकना रामकथा
वस्तुतः कुंकना रामकथा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या सांगीतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह जनजातीय समाज का एक महान् सामाजिक उत्सव है। ग्राम के विवाह समारोहों, स्थानीय त्योहारों और अन्य सामुदायिक अवसरों पर इसका भव्य आयोजन होता है, जिसमें पूरा समुदाय बिना किसी भेदभाव के एक साथ भाग लेता है। यह लोकपरम्परा सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरन्तरता और उनकी सामूहिक पहचान को अत्यधिक मजबूत करती है। धर्म उनके लिए केवल मन्दिरों में पूजा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक शाश्वत पद्धति है।
शोध और अध्ययन की दृष्टि से भी यह परम्परा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसके माध्यम से न केवल लोकसाहित्य का गहन अध्ययन किया जा सकता है, बल्कि जनजातीय समाज की मानसिकता, उनकी अगाध आस्था, उनके सुदृढ़ सामाजिक ढांचे और उनकी ऐतिहासिक चेतना को भी भली-भांति समझा जा सकता है। यह सांस्कृतिक समन्वय और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने का एक अत्यन्त सशक्त माध्यम बन सकती है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं, वहाँ कुंकना रामकथा जैसी मौखिक परम्पराएं यह सिद्ध करती हैं कि हमारे मूल आदर्श और नैतिक मूल्य सर्वत्र एक समान हैं। आधुनिक समय में, जब तीव्र वैश्वीकरण, बढ़ते शहरीकरण और तकनीकी विकास की आंधी के कारण हमारी पारम्परिक लोककथाएं और क्षेत्रीय भाषाएं धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुँचती जा रही हैं, तब कुंकना रामकथा जैसी लोकपरम्पराओं का संरक्षण करना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया है।
यह केवल डांग के जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर नहीं है, अपितु यह पूरे भारतीय समाज और राष्ट्र की एक अमूल्य सम्पत्ति है। कुंकना रामकथा हमें यह महान् सन्देश देती है कि भारत की संस्कृति किसी एक ढांचे में बंधी हुई नहीं है, बल्कि यह बहुरंगी और बहुस्तरीय है। यहाँ रामकथा की एक ही मूल चेतना अनेकानेक लोक-रूपों में जीवित रह सकती है, और प्रत्येक रूप अपने आप में पूर्ण, सुन्दर और सार्थक होता है।
-डॉ. रत्ना त्रिवेदी
(लेखिका प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शिक्षाविद् व सूरत स्थिति सार्वजनिक विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं। वे अपनी शोधपरक दृष्टि और अकादमिक अनुभवों से शैक्षणिक व सांस्कृतिक विमर्श में सतत योगदान कर रही हैं।)
कुंकना रामकथा : जनजातीय लोकचेतना में राम
April 06, 2026