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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति

इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति

इंडोनेशिया प्रशांत महासागर में अवस्थित लगभग तीन हजार द्वीपों का समूह है जो बाली, जावा, कालीमंतन, सुलावासी, नासा तेगारी और पश्चिमी पापुआ नयूगिनी सहित 34 प्रांतों में विभक्त है। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में वर्तमान वर्तमान रूप में भारतीय संस्कृति ने अहम भूमिका निभाई है। हजारों वर्ष बाद भी भारतीय संस्कृति का जीवंत रूप देखना है तो इंडोनेशिया जाना चाहिए। नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर और विशिष्ट संस्कृति वाला इंडोनेशिया बड़े वर्ग को आकर्षित करता है।

इंडोनेशिया ने न केवल अपने को भारत की अमर सनातन संस्कृति से जोड़ा है, बल्कि उसे समृद्ध बनाने में भी महत्त्वपूर्ण निभाई है। इंडोनेशिया ने न केवल भारतीय संस्कृति को सहेजकर रखा है, बल्कि उसे संरक्षित, संवर्धित करने में भी सफलता पाई है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत-इंडोनेशिया की सामरिक मित्रता, बढ़ते व्यापारिक रिश्ते और दक्षिण-पूर्व प्रशांत क्षेत्र की शांति स्थापना में दोनों देशों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।


भारत और इंडोनेशिया के मध्य की दूरी 8897 कि.मी. है 

इंडोनेशियाई भाषा में भारतीय प्रभाव बड़ी संख्या में संस्कृत शब्दों के प्रयोग से स्पष्ट है। आज बहुसंख्यक इंडोनेशियाई मुस्लिम हो सकते हैं, लेकिन उनके नाम अभी भी संस्कृतनिष्ठ हैं। इंडोनेशियाई भाषा में 'स्वर्ग' के लिए शब्द 'स्वर्ग' स्वर्ग' और 'नर्क' के लिए शब्द 'नरक' है। इंडोनेशिया जनसंख्या के दृष्टिकोण से विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। इस देश में हिंदू संस्कृति की यहां के समाज पर अमिट छाप है।

यहां के बाली द्वीप में चालीस लाख हिंदू रहते हैं जो अपने धर्म पर सख्ती से अमल करते हैं। यहां का हिंदू समाज चार वर्णो यथा ब्रह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र में विभक्त है। ब्रह्मणों के प्रमुख गोत्र, ईदा और बेगोज कहलाते हैं, जबकि क्षत्रियों के प्रमुख गोत्र देव अगोयंग और ताजकोंडे हैं। बाली में सूर्यदेव की पूजा की जाती है जिनका चित्रण सात घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ में बैठे व्यक्ति से किया गया है।

यहां श्री देवी कृषि एवं उर्वकता की देवी है जिसे फसल कटाई-भोग के अवसर पर खेतों में प्रतिष्ठापित किया जाता है। भारत की भांति बाली में भी बहुत से मेलेऔर भोज समारोह संचालित किए जाते हैं। ऐसे ही ही एक मेले एवं भोज पर्व को 'देव संघ' कहते हैं जिसमें देव काकी और श्री देवी के विवाह पर उन्हें भोग लगाया जाता है। एक अन्य स्रोत के अनुसार बाली के धान के हर खेत में श्री देवी और भू देवी (धन की देवी लक्ष्मी) को समर्पित एक मंदिर होता है।


भू देवी जिन्हें बाली में धन की देवी माना जाता है 

कोई भी किसान श्री देवी और और भू देवी की पूजा किए बिना अपने कृषि कार्य कार्य की शुरुआत नहीं करता है। इसे 'सबक प्रथा' कहा जाता है।बाली में विष्णु को जल और पाताल लोक का देवता माना जाता है। समुद्र तट पर मेलिस नामक पवत्रिकरण पर्व का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों के देवताओं का एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। बाली के हिंदू न केवल अच्छे नक्काश हैं बल्कि बहुत अच्छे चित्रकार भी हैं।

यहां 'भीम स्वर्ग' नामक चित्र सर्वोत्कृष्ट है जिसमें भीम को राक्षसों पर भयंकर हमला करते हुए दिखाया गया है। चन्द्रग्रहण नामक एक अन्य प्रसिद्ध चित्र में राहु द्वारा चन्द्रदेवी रतीह को निगलने का प्रयास करते हुए दिखाया गया है। भारत के एक व्यापारी पंडित नरेंद्र देव शास्त्री 1949 में बाली गए थे। बाद में वे वहीं बस गए थे। उनके अनुसार बाली के हिन्दुओं को धार्मिक हिंदू ग्रन्थ पढ़ने, संस्कृत, हिंदी सीखने और मूल भारतीय ग्रन्थ पढ़ने का बड़ा चाव रहता है।


मेलिस पर्व - पवित्रीकरण का पर्व

बाली के पूरा बासफी नामक स्थान पर अवस्थित प्रमुख मठ में महादेवी की पूजा की जाती है। भारतीय राष्ट्रीय महाकाव्य 'रामायण' 'महाभारत' ने इंडोनेशिया की संस्कृति और इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान वर्तमान में भी इंडोनेशियाइयों के बीच भारतीय संस्कृति लोकप्रिय होने का प्रमाण यह है कि वहां की एयरलाइंस का नाम 'गरुड़ एयरलाइन्स' है। जावा के मुस्लिम, पूर्णिमा की रातों को रामायण नृत्य करते हैं।


गरुड़ एयरलाइन्स

इंडोनेशिया मुस्लिम 'नरमपंथी हैं' जो सहनशीलता और सह-अस्तित्व की बात करते हैं। इंडोनेशिया, गणेश उत्कीर्णित 20000 रुपये की कागजी मुद्रा भी जारी करता है। इंडोनेशिया में शासकीय प्रतीक चिन्ह हनुमान है, जिसके पीछे यह तर्क है कि हनुमान ही ने सीता का पता लगाया था जिन्हें रावण ने अपहरण करके श्रीलंका में अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा था। भारत के ऋषिगण जैसे कि मार्कडेय, भारद्वाज, अगस्त्य जिनके नाम भारत में अब प्रसिद्ध नहीं हैं, बाली के वि‌द्यालयों में सामान्य रूप से प्रचलित हैं।

त्रिकाल संध्या (दिन में तीन बार सूर्य की पूजा) का प्रचलन बाली के प्रत्येक विद्यालय में है, बाली के प्रत्येक वि‌द्यालय के बच्चों द्वारा गायत्री मंत्र दिन में तीन बार उच्चारित किया जाता है।बाली के पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के लिए राष्ट्रीय पोशाक धोती है। कोई भी धोती बिना मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। बाली की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था त्रि-हिंद-करन... हितकारी, लाभकारी सिदधांतों पर आधारित है।

मानवीय जीवन के तीन पहलू यथा ईश्वर के प्रति उसकी कर्तव्य परायणता (प्राह्यांगन), मानव के साथ उसका संबंध (पावोनग) और प्रकृति (पालेमहान) से उसका योग है। ये वही तीन सिद्धांत हैं जिन पर बाली की पूरी संस्कृति आधारित है। बाली द्वीप का प्रतीक चिन्ह देश की हिंदू परम्परा की अभिव्यक्ति है। इंडोनेशियाई पर्यटन मंत्रालय का एक प्रकाशन इस प्रतीक चिन्ह की इस प्रकार व्याख्या करता है, 'त्रिभुज प्रतीक चिन्ह चिन्ह का आकार स्थायित्व और संतुलन का दद्योतक है।

यह तीन सीधी रेखाओं से निर्मित हैं जिसके दोनों सिरे मिलते हैं जिससे यह जलती आग बन जाता है जो ब्रह्मा, (निर्माता), लिंग या फरल्लुस का प्रतिनिधित्व करता है। यह त्रिभुज विश्व प्रकृति और जीवन के तीन चरणों (जन्म, पालन और मृत्यु) की भी नुमाइंदगी करता है। यह धार्मिक और पवित्र अनुभूति का भी प्रतीक है, है, जो संतुलित गहरे परिवेश को जगाता है और सभी जीवित प्राणियों के बीच शांति बनाता है।

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता के दो प्रमुख स्थलों पर बलशाली पांडव भीम और अनेक घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर आरुढ़ श्री कृष्ण-अर्जुन की प्रतिमाएं बनी हुई हैं। इंडोनेशिया का बोध वाक्य 'भिन्ने का तुंग्गल इका' अर्थात् एकता में अनेकता और अनेकता में एकता है। इंडोनेशियाई हस्तलिपि सुतासोमा काकविन हिंदी से प्रेरित है। वहां शिव और बुद्ध की समान मान्यता है।


बोरोबुदुर मंदिर 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान उनके सम्मान में वहां की राजधानी 'जकार्ता' में रामायण पर एक नाटक दिखाया गया। नाटक के अंत में रामायण के पात्रों का परिचय कराने पर पता चला है कि सभी कलाकार मुस्लिम हैं तथा वे विज्ञान और इंजीनियरिंग के छात्र हैं। नेहरू जी जी उन सभी कलाकारों से चर्चा कर आश्चर्यचकित हो गए। यह भी एक विडम्बना ही है कि विश्व के कोने-कोने में भारतीय संस्कृति के सूत्र यत्र-तत्र सर्वत्र बिखरे हुए मिलेंगे पर हम उनसे अनजान हैं।

 

जावा में रामायण

रामायण गद्य और पद्य दोनों रूपों में में मौजूद है। जावा के छाया नाटकों में रामायण की कथाओं का बड़ा आकर्षक मंचन होता है। इस कार्यकलाप को यहां "व्यांग" कहा जाता है। यहसच है कि जावावासियों ने स्थानीय प्रभावों के तहत वाल्मिकी रामायण में कुछ परिवर्तन और परिवधर्न भी कर लिए हैं। तथापि यूरोपीय विद्वानों वि‌द्वानों के अनुसार जावा में श्रीराम के दो रूप पहले रूप में वे महान नायक हैं जबकि उनका दूसरा रूप विष्णु अवतार के रूप में है।


रामायण की प्रस्तुति करते इण्डोनेशियाई कलाकार 

यह अनुश्रुति सम्पूर्ण दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में फैल गई। म्यांमार के कठपुतली शो में भारतीय नायक श्रीराम को प्रमुख रूप से दिखाया जाता है। स्याम में राजा श्रीराम का अवतार होता है। जावा के पड़ोसी देश कम्बोडिया के एक शिलालेख पर यह उत्कीर्ण है कि "ब्रह्मण सोमशरमण ने रामायण और पुराणों के सम्मिश्रण से संपूर्ण 'महाभारत' की रचना की और अपने अनुयाइयों को नियमित रूप से उसका पाठ करने के लिए कहा।

उन्होंने कहा कि जो कोई इसका जाप करेगा उसे मोक्ष प्राप्त होगा। कम्बोडिया के अंकोरवाट मंदिर का निर्माण बारहवीं शताब्दी में हुआ था जिसकी दीर्घाओं पर रामायण के विभिन्न विभिन्न पात्रों के चित्रों यथा श्रीराम द्वारा मारिच का पीछा, श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता, सुग्रीव और बाली का मल्लयुद्ध, हनुमान द्वारा लंका सीता की खोज, लंका का रणक्षेत्र और पुष्पक रथ में श्रीराम और सीता की वापसी को दर्शाया गया है। इसी प्रकार मध्य जावा स्थित परमबनन नामक मंदिर में भी इसी रामायण के पात्रों को दिखाया गया है।


अंगकोरवाट मंदिर - कम्बोडिया

प्रत्येक स्थान पर रचित मूल कार्य में कुछ विभिन्नताएं एवं विविधताएं आ जाती हैं। यहां यह यह उल्लेख करना युक्तियुक्त होगा कि जिस प्रकार दक्षिण भारत की लंबानी बंजारा जनजाति की लंबानी रामायण में श्रीराम के स्थान पर लक्ष्मण धनुष उठाते हैं और सीताजी उन्हें वरमाला पहनाने के लिए आगे बढ़ती हैं तब लक्ष्मण जी उन्हें रोककर यह बताते हैं कि मैंने श्रीराम की आज्ञा से धनुष उठाया है, इसलिए मेरे बड़े भाई श्रीराम इस माला के हकदार हैं क्योंकि हमारी जनजाति में बड़े भाई का विवाह होने से पहले छोटे भाई का विवाह नहीं होता है।

तदनुरूप तदनुरूप जावा की एक रामायण का नाम "सीरत कांड" है जो मुस्लिम गाथाओं और श्रीराम के महान कार्यों का सम्मिश्रण है। सीरत कांड में मक्कावासी आदिमानव आदम, उनके दो पुत्रों हाबील, काबील और शैतान का उल्लेख मिलता है। इसमें नूह (मनु) और उमा का भी जिक्र है। दिलचस्प बात यह कि इसमें विष्णु और वासुकी के साथ कुछ मुस्लिम किरदारों को भी जोड़ा गया गया है।

तथापि बाद में इन मुस्लिम किरदारों को को हटा दिया गया। इस रामायण के अध्याय 23 से 45 तक श्रीराम और रावण पर परिचर्चा की गई है। इसमें श्रीराम को भार्गव, लक्ष्मण को मुरढाक, सीता को सिंता, हनुमान को अनुमान कहा गया है। इसके अलावा हनुमान को श्रीराम और सीता का पुत्र माना गया है। सीरत कांड में सीताजी को स्पष्ट रूप से रावण और मंदोदरी की पुत्री कहा गया है।

स्याम की रामायण में भी सीताजी को रावण की पुत्री बताया गया है। अमूल रामायण के अनुसार नारद मुनि ने लक्ष्मी को राक्षसी के रूप में जन्म लेने का श्राप दिया था। अस्तु जावा में श्रीराम अब भी एक जीवंत शक्ति हैं। इंडोनेशिया एक लम्बे समय तक डचों (नीदरलैंडवासी) के प्रभुत्व में रहा। इसलिए इस अनुक्रम में डच विद्वानों का विचार है कि जावा की रामायण तमिल रामायण से प्रभावित रही है, इंडोनेशिया की कई लोकप्रिय गाथाएं गुजरात से ली गई हैं।


जावा संग्रहालय में संरक्षित सूर्य देव की प्रतिमा 

वहां के लोक गीतों से स्पष्टतः यह पता चलता है कि गुजरात के प्रवासियों ने जावा द्वीप को आबाद किया। पहले सम्पूर्ण इंडोनेशिया हिंदुत्व और बौद्ध धर्म के मिश्रित प्रभाव में था जो वहां उड़ीसा और दक्षिण भारत के व्यापारियों द्वारा पहुंचाया गया। 16वीं शताब्दी में गुजरात व्यापारियों के माध्यम से वहां इस्लाम पहुंचा। वास्तव में इंडोनेशिया में इस्लाम को पहुंचाने वाले वाले गुजराती व्यापारी ही थे।

पश्चिम जावा में हिंदुत्व से संबंधित शिलालेख एवं उत्कीर्ण लेखः ऐसे ही एक लेख में भारतीय मूल के पूर्णवर्मन नामक एक प्राचीन भारतीय नायक एवं ऋषि का उल्लेख मिलता है जिनकी उपासना पश्चिम जावा में शुरु की गई थी। भारत में शुंगवंश के शासनकाल (सन् 420-478) के दौरान जावा देश के राजा पूर्णवर्मन ने शुंगवंशी शासक के दरबार में अपना एक विशेष दूत भेजा था।

वस्तुतः शिलालेखों में उल्लिखित भारतीय मूल के जावा नरेश एक सुविख्यात और प्रतापी राजा थे। पूर्णवर्मन के शिलालेखों से स्पष्ट स्पष्ट होता है कि पांचवीं शताब्दी के दौरान पश्चिम जावा में एक उच्चस्तरीय हिन्दू सभ्यता फल-फूल रही थी। यह वह समय था जब विश्व में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का डंका बज रहा था जिसका अब पुनः प्रादुर्भाव समस्त विश्व को गहराई से प्रभावित कर रहा है।


पूर्णवर्मन का शिलालेख
 

ज्ञातव्य हो कि आज विश्व का प्रत्येक पांचवां व्यक्ति भारतीय भारतीय संस्कृति ने फिजी द्वीप समूह पापुआ न्यूगिनी, फिलीपींस, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, थाईलैंड, कम्बोडिया, वियतनाम, म्यांमार, मॉरिशस, मॉरिशस, सूरीनाम, ट्रीनीडाड एंड टोबेगो और मेडागास्कर सहित विश्व के बहुत से देशों को प्रभावित किया है।

लेख-
श्री इक़बाल अहमद 
संस्कृति

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