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भारतीय नारी का आदर्श

भारतीय नारी का आदर्श

 


दक्षिण कोसल टुडे द्वारा सम्पादकीय प्रस्तावना

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्वामी विवेकानन्द का यह ऐतिहासिक संबोधन हमें नारी शक्ति के उस वास्तविक भारतीय स्वरूप से परिचित कराता है, जिसे आज का आधुनिक विमर्श अक्सर विस्मृत कर देता है। भारत में स्त्री का स्थान केवल पत्नी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यहाँ स्त्रीत्व का समस्त भाव 'मातृत्व' में ही केंद्रीभूत है। जहाँ पाश्चात्य संस्कृति में पत्नी घर की स्वामिनी है, वहीं भारतीय गृहों की वास्तविक शासिका 'माता' होती है। स्वामीजी स्पष्ट करते हैं कि हमारे यहाँ 'माँ' नाम पवित्रता का वह सर्वोच्च प्रतीक है, जहाँ वासना कभी फटक भी नहीं सकती।

इसी तरह आज भारतीय महिलाओं के पिछड़ेपन और अशिक्षा पर पाश्चात्य जगत सहानुभूति बटोरता है, वहाँ स्वामीजी इस दुर्दशा के लिए सीधे तौर पर पाश्चात्य शासन और उसकी दूषित शिक्षा पद्धति को उत्तरदायी ठहराते हैं। वे दो टूक कहते हैं कि विदेशी शासक यहाँ हमारी भलाई के लिए नहीं, बल्कि धन संचय के लिए आए थे और उनके द्वारा स्थापित शिक्षा संस्थाएँ केवल 'सस्ते और उपयोगी गुलाम' पैदा करने वाले कारखाने मात्र थीं, जिन्होंने संपूर्ण राष्ट्र की सहज शिक्षा की उपेक्षा की।

कुल मिलाकर यह लेख हमें स्मरण कराता है कि हमारे समाज में महिलाओं की समस्या वास्तव में आदर्शों की भिन्नता के कारण दिखलाई पड़ रही है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने हमारे आदर्शों को बदलकर रख दिया है। स्वामी जी यहाँ भारतीयता के आदर्शों को रेखांकित करते हुए कहते है कि भारतीय नारी का आदर्श अनित्य और पार्थिव नहीं, बल्कि अविनाशी और साक्षात् पवित्रता का प्रतीक है।



भारतीय नारी का आदर्श

इस विषय को आरम्भ करने के साथ ही मुझे यह बतला देना चाहिए कि मैं ऐसे आश्रम का मनुष्य हूँ, जिसमें विवाह नहीं किया जाता, इसलिए स्त्रियों का प्रत्येक दृष्टिकोण से-माता, स्त्री, कन्या और बहन के रूप से - मेरा ज्ञान अन्य लोगों की तरह पूर्ण नहीं भी हो सकता।

यद्यपि दूसरे लोगों की अपेक्षा मुझे, एक धर्म-प्रचारक के नाते, भारतीय स्त्रियों के बारे में जानने का साधारणतः अधिक अवसर प्राप्त होता है, फिर भी मेरे लिए यह कहना है कि मैं भारतवर्ष की स्त्रियों के सम्बन्ध में सब कुछ जानता हूँ, अति- शयोक्ति होगी। मेरी इस जानकारी का कारण यह है कि मैं बराबर एक स्थान से दूसरी जगह घूमा ही करता हूँ और समाज के हर श्रेणी के लोगों से मिलता-जुलता हूँ, यहाँ तक कि उत्तर भारत की स्त्रियों से भी, जो पुरुषों के सामने नहीं आतीं, पर जो कहीं कहीं धर्म के लिए इस नियम को तोड़कर हमारे सामने आती हैं, हमारे उपदेश सुनती हैं और हमसे बातें करती हैं।

अतएव मैं आप लोगों के सामने भारतीय स्त्रियों के आदर्श को रखने का प्रयत्न करूंगा। प्रत्येक राष्ट्र में पुरुष या स्त्री किसी एक आदर्श को व्यक्त करती है, जिसकी पूति ज्ञात या अज्ञात भाव से होती रहती है। व्यक्तिविशेष अभिप्रेत आदर्श का बाह्य रूप मात्र है। ऐसे व्यक्तियों के समूह को राष्ट्र कहते हैं; और ऐसा राष्ट्र भी किसी महान् आदर्श का प्रतीक होता है, जिसकी ओर वह बढ़ता रहता है। इसलिए यह कहना बिल्कुल ठीक है कि किसी राष्ट्र को समझने के लिए पहले उसके आदर्श को समझना आवश्यक है, कोई राष्ट्र अपना आदर्श छोड़कर किसी दूसरे आदर्श से जाँचा जाना स्वीकार नहीं करता।

परन्तु विभिन्न राष्ट्रों के सम्बन्ध में कुछ कहते समय, हम यह पहले से ही मान लेते हैं कि सभी जातियों के लिए एक ही आदर्श और एक ही आचार है। जब हम दूसरों का विचार करने लगते हैं, तब हह्म मान लेते हैं कि जो हमारे लिए शुभ है, वह सबके लिए शुभ होगा; जो हम करते हैं, ठीक करते हैं; और जो कुछ हम नहीं करते, वह यदि दूसरे करते हैं, तो गलती करते हैं। इसे मैं आलोचना के ढंग से नहीं, वरन् सच्ची बात बताने के लिए कहता हूँ। जब पाश्चात्य स्त्रियाँ चीनी स्त्रियों को पैर बाँध रखने के लिए दोषी ठहराने लगती हैं, तो वे मूल जाती हैं कि उसकी अपेक्षा पाश्चात्य देश की अँगिया (corset) उनकी जाति का कहीं अधिक अनुपकार कर रही है। यह तो केवल एक उदाहरण है। आप समझते ही हैं कि पैर की बाढ़ को रोकना मनुष्य की शक्ल की लक्षांश भी उतनी हानि नहीं करता, जितनी हानि उस अँगिया द्वारा हुई और हो रही है-उससे शरीर के अवयव विष्कृत हो जाते हैं और रीढ़ साँप की तरह टेढ़ी हो जाती है। जब नाप-जोख होती है, तो उस टेढ़ेपन को आप अच्छी तरह देख सकते हैं। इसे मैं आलोचना के लिए नहीं कह रहा हूँ, वरन् आपको परि- स्थिति समझाने के लिए। आप लोग अपने को सबसे श्रेष्ठ समझते हुए दूसरी जाति की स्त्रियों के प्रति आश्चर्य प्रकट करते हैं; उसी प्रकार वे भी आपके आचार-व्यव- हार, रीति-रिवाज़ को ग्रहण नहीं करतीं, क्योंकि वे भी आपको देखकर चकित रह जाती हैं।

भारत में स्त्री-जीवन के आदर्श का आरम्भ और अन्त मातृत्व में ही होता है। प्रत्येक हिन्दू के मन में 'स्त्री' शब्द के उच्चारण से मातृत्व का स्मरण हो आता है, और हमारे यहाँ ईश्वर को माँ कहा जाता है। बाल्यावस्था में प्रत्येक हिन्दू बालक प्रतिदिन प्रातःकाल एक कटोरी में जल भरकर अपनी माता के पास ले जाता है, माता उसमें अपने पैर का अंगठा डबा देती है और पुत्र उस जल का पान करता है।

पश्चिम में स्त्री पत्नी है। वहाँ पत्नी के रूप में ही स्त्रीत्व का भाव केन्द्रित है। किन्तु भारत में जनसाधारण समस्त स्त्रीत्व को मातृत्व में ही केन्द्रीमूत मानते हैं। पाश्चात्य देशों में गृह की स्वामिनी और शासिका पत्नी है, भारतीय गृहों में घर की स्वामिनी और शासिका माता है। पाश्चात्य गृह में यदि माता हो भी, तो उसे पत्नी के अधीन रहना पड़ता है, क्योंकि घर पत्नी का है। हमारे घरों में माता सदैव रहती और पत्नी अनिवार्यतः उसके अधीन होती है। आदर्शों की इस भिन्नता पर ध्यान दीजिए।

अब मैं चाहता हूँ कि आप इनकी तुलना कीजिए। मैं आपके समक्ष कुछ तथ्य उपस्थित करूँगा, जिससे आप स्वयं इन दोनों की तुलना कर सकें। यदि आप पूछें, "पत्नी के रूप में भारतीय स्त्री का क्या स्थान है ?" भारतीय पूछ सकता है, "माता, के रूप में अमेरिकन स्त्री कहाँ है ? उस तपस्विनी एवं ओजस्विनी माता का, जिसने हमें जन्म दिया, तुमने क्या सम्मान किया है ? जिसने हमें अपने शरीर में नौ मास तक वहन किया, वह माता क्या है? जो हमारे जीवन के लिए यदि प्राणों की आहुति देने की आवश्यकता हो, तो बीस बार भी देने को उद्यत है, वह माता कहाँ है ? कहाँ है वह, जिसका प्रेम कभी नहीं मरता - मैं कितना ही दुष्ट और अधम क्यों न हो जाऊँ? साधारण सी बात को लेकर तलाक़ के लिए न्यायालय का द्वार खटखटानेवाली तुम्हारी उस पत्नी के सामने उसका स्थान कहाँ ? है अमेरिका की स्त्रियो, वह माता कहाँ है ?" उसे मैं आपके देश में नहीं पा सकूंगा। मुझे यहाँ वह पुत्र दिखायी नहीं देता, जो कहता हो कि माता का पद प्रथम है। हमारे देश में तो कोई भी पुरुष यह कभी इच्छा नहीं करता कि उसकी मृत्यु के उपरान्त भी उसकी पत्नी और पुत्र उसकी माता का स्थान लें। हमारी माँ ! - यदि हमारी मृत्यु उसके पहले हो, तो हम चाहते हैं कि मृत्यु के समय पुनः एक बार हमारा सिर उसकी गोद में हो। कहाँ है वह ? क्या 'स्त्री' संज्ञा केवल मौतिक शरीर मात्र को ही दी जाने के लिए है? हिन्दू मन उन आदर्शों के प्रति सशंकित रहता है, जिनमें यह कहा जाता है कि मांस को मांस से ही संलग्न रहना चाहिए। नहीं, नहीं, देवि ! मासलता से संबद्ध किसी भी वस्तु से तुम्हें संलग्न नहीं किया जायगा। तुम्हारा नाम तो सदा ही पवित्रता का प्रतीक रहा है, विश्व में 'माँ' नाम से अधिक पवित्र और निर्मल दूसरा कौन सा नाम है, जिसके पास वासना कभी फटक भी नहीं सकती ? यही भारत का आदर्श है।

इसीतरह आजकल यूरोपीय ढंग पर उच्च शिक्षा देने की ओर लोगों का विशेष ध्यान है। स्त्रियों को भी यह उच्च शिक्षा देने के पक्ष में अधिक लोगों की सम्मति है। हाँ, भारत में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो यह पसन्द नहीं करते; पर प्रबल सम्मति स्त्री-शिक्षा के पक्षपातियों की ही है। यह आश्चर्य की बात है कि ऑक्सफ़ोर्ड और केम्ब्रिज विश्वविद्यालयों के दरवाजे स्त्रियों के लिए आज भी बन्द हैं। यही हालत हार्वर्ड और येल के विश्वविद्यालयों की भी है; पर कलकत्ता विश्वविद्यालय ने बीस वर्ष पूर्व ही स्त्रियों के लिए अपना द्वार खोल दिया था। मुझे स्मरण है, जिस साल मैं बी० ए० में उत्तीर्ण हुआ, उस साल कई लड़कियाँ भी बी० ए० में उत्तीर्ण हुई थीं। उन लोगों की पाठ्य पुस्तकें और अन्यान्य विषय लड़कों के ही समान थे, फिर भी बहुत सी लड़कियाँ बड़ी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण हुईं। हमारे घर्म में तो स्त्रियों को शिक्षा देने का निषेध है ही नहीं। लड़कियों को इसी प्रकार पढ़ाना चाहिए, उन्हें इसी प्रकार शिक्षा देनी चाहिए और पुराने ग्रन्थों में तो हमें यह भी लिखा मिलता है कि विद्यापीठों में लड़के-लड़कियाँ दोनों ही जाते थे। पर बाद में सारे राष्ट्र की ही शिक्षा उपेक्षित हो गयीं। विदेशियों के राज्य में भला क्या आशा की जा सकती है ? विदेशी विजयी वहाँ हमारी भलाई करने के लिए नहीं है; वह तो अपना रुपया चाहता है। मैंने बड़ी मेहनत से बारह वर्ष अध्ययन किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी० ए० पास किया; फिर भी मैं अपने देश में मुश्किल से मासिक पाँच डॉलर पैदा कर सकता हूँ। शायद आपको इसमें विश्वास नहो; पर यह सत्य है। विदेशियों की यह शिक्षा-संस्थाएँ तो थोड़े मूल्य पर उपयोगी गुलाम पैदा करने के कारखाने हैं; अर्थात् इन कारखानों से मुंशी, डाकबाबू, तार- बाबू आदि पैदा होते हैं। बस, केवल यहीं तक - इससे अधिक नहीं।

परन्तु हिन्दुओं ने अपना पाठ पढ़ लिया है। वे आज- कल के बच्चों की तरह बकना नहीं चाहते। पश्चिमदेशीय लोगो ! तुम्हारी जो इच्छा हो, कह डालो- अभी यह तुम लोगों का समय है। आओ बच्चो ! जो कुछ बकना हो, बक लो। आजकल का समय तो बच्चों के बकने का है। हमने अपना पाठ पढ़ लिया है और इसीलिए हम चुप हैं। आज तुम लोगों के पास कुछ घन है, और इसलिए तुम लोग हमारी ओर तिरस्कार की दृष्टि से देखते हो। अच्छा, यह तुम्हारा समय है। बच्चो ! जितना बकना हो, बक लो- यही हिन्दुओं का दृष्टिकोण है।
भारत ने कई युगों की अनुभूति से अपना पाठ सीखा है। उसने परमात्मा की ओर अपनी दृष्टि फेरी है। अवश्य उसने बहुत सी ग़लतियाँ की हैं, कूड़ों का ढेर उस जाति पर लदा है। पर कोई बात नहीं, उससे क्या ? कूड़ा-कर्कट और नगरों को साफ़ करने से भला क्या मिलेगा ? क्या इससे जीवन मिलता है ? जिन जातियों में अच्छी अच्छी संस्थाएँ हैं, वे भी तो मर जाती हैं। फिर पाँच दिनों में बननेवाली और छठवें दिन टूट जानेवाली इन दिखावटी पश्चिमी संस्थाओं की भला क्या बिसात ! इन मुट्ठी भर राष्ट्रों में से एक भी तो दो शताब्दियों तक जीवित नहीं रह सकता। किन्तु हमारी जाति की संस्थाएँ युगों की कसौटी पर खरी उतरी हैं। हिन्दुओं का कहना है- "हाँ, हमने पृथ्वी के समस्त पुराने राष्ट्रों को दफ़ना दिया है और सभी नये राष्ट्रों को भी दफ़ना देने के लिए यहाँ खड़े हैं; क्योंकि हमारा लक्ष्य यह जगत् नहीं, वरन् जगदतीत है। जैसा आपका आदर्श है, आप वैसे ही हो जायेंगे। यदि आपका आदर्श अनित्य है, पार्थिव है, तो आप वैसे ही हो जायेंगे। यदि आपका आदर्श जड़ है, तो आप भी जड़ ही हो जायेंगे। स्मरण रहे, हमारा आदर्श है परमात्मा। एकमात्र वहीं अविनाशी है- अन्य किसीका अस्तित्व नहीं है, और उन परमात्मा की भाँति हम भी सदा जीवित रहेंगे।"

 

स्वामी विवेकानन्द द्वारा पैसाडोना, कैलिफोर्निया के शेक्सपियर क्लब में 18 जनवरी 1900 को दिये गए ऐतिहासिक भाषण का सम्पादित अंश।
स्रोत : विवेकानन्द साहित्य, प्रथम खण्ड, अद्वैत आश्रम द्वारा प्रकाशित

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