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लोक कथाओं में छिपा समाज का इतिहास

लोक कथाओं में छिपा समाज का इतिहास

भारतवर्ष अपने समृद्ध इतिहास के लिए पूरे विश्व में अपनी विशेष पहचान रखता है। अपने ऐतिहासिक विरासतों को स्थापत्य कला, शिलालेख, मुद्राओं जैसे पुरातात्त्विक साक्ष्यों के रूप में सहेज कर रखा है, साथ ही श्रुति परंपरा के माध्यम से अपने इतिहास को लोक जीवन के विभिन्न रंगों जैसे लोक गीत, लोक नृत्य एवं लोक कथाओं, मुहावरों आदि के माध्यम से सदियों से जीवित रखा हुआ है।

समाज के बीच श्रुति परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जानकारियाँ स्थानांतरित होती आई है। हमें इन लोकगीतों, लोक नृत्यों, लोक कथाओं से हमें इतिहास के प्रमुख घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है तथा लोक कथाएं समाज में निहित अन्त संबंध को स्थापित करती है। 

आइए जानते है, छत्तीसगढ़ में निवास करने वाले कुछ समुदायों में प्रचलित उत्पत्ति कथाओं के बारे में। 

बैगा समुदाय की उत्पत्ति: बैगा समुदाय छत्तीसगढ़ के मैकल पर्वत शृंखला में निवास करती है। इनकी उत्पत्ति के संबंध में कई लोक कथाएं प्रचलित है।  किंवदंतियों के अनुसार जब सृष्टि के आरंभ में अधिकांश धरती जलमग्न थी। पानी जलस्तर ऊंचा था देवता इस क्षेत्र से चले गए। तब मानव जीवन को बचाने के लिए सारे देवी देवताओं ने मंथन किया। शंकर जी को ज्ञात हुआ कि एक पहाड़ी पर नागा बैगा और नागा बैगीन युगल रहते है। बुलावा भिजवाया गया। देवताओं की सभा बैठी हुई थी, तभी किसी ने नागा बैगा के बच्चों की बलि देने की बात कही। अगले दिन दुखी मन से नागा बैगा ने अपने बच्चों को कंधे पर बैठा कर बलि देने लेकर जा रहा था, तभी देवता प्रगट हुए और दुखी नागा बैगा को देख कर बरहा(जंगली सूअर), बकरे जैसे कई प्रकार के जानवरों को उत्पन्न किए। 


बैगा समाज की महिलाएं

बैगा युगल ने बच्चों की स्थान पर बरहा (जंगली सूअर) के बलि का उपाय ढूंढ लिया। उन्होंने वराह और बकरे की बलि दी और पूरी धरती शांत हो गई और बैगा ने पानी में हाथ डाल कर धरती ऊपर खींच लिया और धरती हरी भरी हो गई।  बैगा-बैगीन खुशी से घर वापस आ गए। बाद में उनकी पीढ़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। बैगा जनजातीय समाज नागा बैगा-नागा बैगीन युगल को ही अपना पूर्वज मानते है और उन्हें अपना आराध्य मान कर पूजा अर्चना करते है।   कुछ लोग इस प्रसंग को जल प्रलय के वराह अवतार के प्रसंग से भी जोड़ कर देखते है। जब वराह ने पृथ्वी को अपने मुख से ऊपर उठा लिया था। 

बिंझवार समुदाय की उत्पत्ति: बिंझवार समुदाय के लोग अपनी उत्पत्ति विंध्याचल पर्वत से मानते हैं। उनकी आराध्य देवी भी विध्यवासिनी देवी हैं। अपनी उत्पत्ति से संबंधित कथा भी कहते हैं, जिसके अनुसार बारह बेतकार (धनुषधारी) भाई विन्ध्यवासिनी देवी के पुत्र थे। उनके धनुर्विद्या अभ्यास के दौरान एक तीर उड़ीसा सागर तट के पुरी जगन्नाथ मन्दिर के द्वारा पर जा लगा और गड़ गया। वहाँ इसे कोई, राजा के हाथी भी, नहीं निकाल पाया। सभी भाई वहाँ पहुँचे और उन्होंने सहजता से तीर निकाल मन्दिर द्वारा खोल दिया। अब राजा ने प्रसन्न हो, उन्हें भूमि और जमीन्दारी प्रदान की। 


चित्र: विश्व प्रसिद्ध पुरी का जगन्नाथ मंदिर (ओडिसा) एवं विंध्यावासिनी देवी मैहर (मध्यप्रदेश)  

कंवर समुदाय की उत्पत्ति: कंवर समुदाय स्वयं को दुर्योधन से सम्बद्ध करते हैं। महाभारत पराजय उपरांत शेष रहे कौरव भाग कर वनों में छिपे। वे वहीं जीवनयापन करने लगे, उनके वंशज कंवर कहलाए। इसी कारण वे अपने को कुरुवंशी और चन्द्रवंशी कहते हैं। कंवर की एक शाखा तंवर भी कहलाती है। इन्हें ही छत्तरी (क्षत्रिय शब्द का अपभ्रंश) भी कहते हैं। रतनपुर राज्य के समय इनकी सात जमीन्दारियाँ थीं। यह जमीन्दारियाँ कोरबा, छुरी, चाँदा, लाफा, उपरोंड़ा, मतिन और पेंड्रा के जमीन्दार रहे कंवर लोग ही तंवर या छत्तरी कहलाने लगे।

पहाड़ी कोरवा समुदाय की उत्पत्ति: किवदंतियों के आधार पर अपनी ये उत्पत्ति राम-सीता से मानते हैं। वनवास काल में राम-सीता व लक्ष्मण धान के एक खेत के पास से गुजर रहे थे। पशु-पक्षियों से फसल की सुरक्षा हेतु एक मानवाकार पुतले को धनुष-बाण पकड़ाकर खेत के मेढ़ में खड़ा कर दिया था। सीता जी के मन में कौतुहल करने की सूझी। उन्होंने राम से उस पुतले को जीवन प्रदान करने को कहा। राम ने पुतले को मनुष्य बना दिया यही पुतला कोरवा समुदाय का पूर्वज था।

पारधी समुदाय की उत्पत्ति: पारधी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के पारध शब्द मानी जाती है, जिसका अर्थ होता है “शिकार”। इस समुदाय का मानना है कि महाभारत काल में भगवान महादेव द्वारा पारधी आखेटक का रूप धारण कर वराह का आखेट किया था। अर्जुन का तीर भी उसी वराह को लगा। इस शिकार पर अधिकार हेतु दोनों में युद्ध हुआ। अर्जुन ने महादेव को पटकनी देने हेतु उनका पैर पकड़, किन्तु महादेव ने प्रसन्न हो कर वर दे दिया। पारधी समुदाय समाज इसी पारधी शिकार वेषधारी महादेव से अपनी उत्पत्ति मानते है। 

भरिया समुदाय की उत्पत्ति: भारिया समुदाय की उत्पत्ति के संबंध यह मान्यता है, कि जब पांडवो को वनवास हुआ था तब पांडव अपनी कुटिया का निर्माण भारू नामक घास से करते थे, पांडव पांच भाई थे कौरव सैकड़ो भाई थे। इसलिए महाभारत युद्ध में पाँच पाण्डवों द्वारा सैकड़ो कौरवों को पराजित करना मुश्किल था। तब अर्जुन ने भारू नामक घास को हाथों में लेकर उसकी मानव मूर्ति  बनाया एवं उसे मंत्र-शक्ति द्वारा जीवित किया जिन्होंने कौरवों से युद्धकर उन्हें परास्त किया। यह मानव ही भारिया कहलाए। इसलिए भारियाजन स्वयं को पाण्डवों का वंशज मानते हैं एवं अर्जुन को अपना पितृपुरूष मानते हैं। यह समुदाय अपने घर के निर्माण के लिए भारु घास का उपयोग करते थे इसी भारु नामक घास के उपयोग से ही इस समुदाय का नामकरण भारिया हुआ।

भील समुदाय की उत्पत्ति: पुराणों के अनुसार भील समुदाय की उत्पत्ति भगवान शिव के पुत्र निषाद द्वारा मानी जाती है। कथा के अनुसार एक बार जब भगवान शिव ध्यान मुद्रा में बैठे हुए थे निषाद ने अपने पिता शिव के प्रिय बैल नंदी को मार दिया था तब दंड स्वरूप भगवन शिव ने उन्हें पर्वतीय क्षेत्र में निर्वासित कर दिया था वहां उनके वंशज भील कहलाये। रामायण महाकाव्य के रचयिता ऋषि वाल्मीकि भील पुत्र थे तथा उनका मूल नाम वालिया था। महाभारत महाकव्य में वर्णित गुरुभक्त एकलव्य भी भील समुदाय थे। रामायण महाकाव्य में भी शबरी नामक महिला का वर्णन मिलता है जिसने श्रीराम को वनवास के दौरान जूठे बेर खिलाए थे उस सबरी का संबंध भी भील समुदाय से ही था।

कोल समुदाय की उत्पत्ति: रामायण काल में कोल का उल्लेख किरात और भील समुदाय के साथ हुआ है। इनका उल्लेख रामायण में वन्य जाति के रूप में है, जिन्होंने वनवास काल में राम, लक्ष्मण और सीता की सेवा की। इनमें से कुछ अपने को इसी काल की शिवरी या शबरी का वंशज मानते हैं। छत्तीसगढ़ में कोरिया रियासत पर अंतिम शासक वंश चौहान के ठीक पूर्व कोल समुदाय के लोगों का ही शासन था। यह लोग सरगुजा के भागों पर भी शासक रहे।  कोल, किरात, भील का उल्लेख प्राचीन पारम्परिक आख्यानों में आता है। 

 

परधान समुदाय की उत्पत्ति:  परधान गोडों की एक उपजाति है।  ऐसी किंवन्दंति है कि प्राचीन काल में सात भाई- गोंड़, बैगा, गोंड़ ग्वारी, अगरिया, गुलिया, नगारची और परधान थे। वे बूढ़ा देव (महादेव) पूजन को गए। सभी भाई पूजा उपराँत वापस आ गए, परंतु छोटा भाई परधान ने बाँस से वाद्य यंत्र (किंकनी ) बना बूढ़ादेव की स्तुति कर बजाने लगा। मधुर स्वर और लय बद्धता से प्रभावित हो बूढ़ादेव ने प्रगट हो संगीत और पूजा में निपुड़ता का आशीर्वाद दिया। इसी के वंशज परधान जाति के लोग हुए और यह ही कार्य करने लगे। परधान गोंड समुदाय की ही शाखा मानी जाती रही है। वे उनके पुजारी और मंत्री का कार्य करते रहे। परधान संज्ञा बहुसंख्यक हिन्दू लोगों द्वारा दी गई। यह लोग परगनिहा, देसाई और पठारी भी कहलाते हैं। परगनिहा परगने के प्रमुख को भी कहा जाता रहा है। पठारी वंशानुगत भाट या पहाड़ी हेतु प्रयुक्त होता रहा है। छत्तीसगढ़ में इन्हें परधान पठारिया कहा जाता है।

सवरा समुदाय की उत्पत्ति: सवरा समुदाय अपनी उत्पत्ति रामायण आख्यान में प्रसिद्ध शबरी से मानते हैं। महाभारत में भी सबर जाति का उल्लेख आता है। “शवर” यह शब्द संस्कृत ग्रन्थों में प्राय: वहां आया है, जहाँ इस समुदाय के कई प्रसंगों की चर्चा है। रायपुर सम्भाग के सवरा लोग अपनी उत्पत्ति रामायण आख्यान से प्रसिद्ध वानर राज सुग्रीव से मानते हैं। इनकी उत्पत्ति हेतु दंत कथा भी है- मनुष्य को कृषि प्रशिक्षण देने हेतु महादेव ने हल बनाया। सवर जाति के पूर्वजों को, इस हेतु, कुल्हाड़ी से वन काट साफ करने को आदेशित किया। वे इस बीच नन्दी को हल के पास छोड़ दूसरा बैल लेने गए। सबर द्वारा वन काटने का कार्य किया और महादेव वापस लौटे तो वन सफाई का कार्य देख, प्रसन्न हो गए, सबर को तंत्र-मंत्र और जड़ी-बूटी का ज्ञान दिया। 

इन लोक कथाओं के माध्यम से प्राचीन कालीन भारत के विश्वास, आस्था और मान्यताओं की जानकारी मिलती है। समाज अपनी उत्पत्ति की लोक कथाएं शिव पार्वती, राम सीता, सुग्रीव, रामायण एवं महाभारत के अनेक प्रसंगों से बतलाते है। लोक कथाओं से स्पष्ट होता है, प्राचीन काल से ही सारे समाजों के बीच हिन्दू देवी देवताओं के पर गहरी आस्था रही है। यह विविध समुदायों के मध्य एकात्मता के भाव को प्रदर्शित करता है।

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