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झाँसी जनपद का इतिहास

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स्थितिः

उत्तरप्रदेश के दक्षिण पश्चिमी छोर पर स्थित झाँसी जिला 24.11' और 25.50' उत्तरी अक्षांश तथा 78%, 10′ 25 पूर्वी देशांश के बीच स्थित है। पहुज तथा बेद्रवती नदियों के मध्य स्थित झाँसी जिले का मुख्यालय झाँसी है। इस नगर की स्थापना ओरछा नरेश राजा वीरसिंह देव ने की थी। यह नगर परकोटे से सुरक्षित है। 1613 ई० में निर्मित यहां का किला महत्वपूर्ण है। इस जिले का क्षेत्रफल 5024 वर्ग किलोमीटर है।

नामकरणः

झाँसी नगर का प्राचीन नाम बलवंत नगर था। कालांतर में इसे झांसी कहा जाने लगा। मान्यता है कि बुन्देला राजाओं की राजधानी ओरछा स्थित जहांगीर महल से झाँसी के किले की छाया अर्थात् "झाँसी" दिखाई देती थी इसलिए इसे झाँसी दुर्ग कहा गया। बाद में इस नगर को झाँसी कहा जाने लगा।

झाँसी के समीप खैलार, राजापुर, लहर और बड़ागांव में ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के कलावशेष प्राप्त हुए हैं। इनके द्वारा सिद्ध होता है कि बलवंतनगर के नाम से झाँसी का अस्तित्व मध्यकाल में था। चैदि महाजनपद के अंतर्गत झाँसी नगर और उसके आसपास का भू-भाग प्राग ऐतिहासिक तथा आद्य ऐतिहासिक मानव के निवास का क्षेत्र रहा है।

इतिहासः

झाँसी के निकट बनगवां और हंचूरा में पाषाण युग के उपकरण पाये गये हैं। एरच में ताम्र पाषाणयुगीन मानव के निवास को प्रदर्शित करने वाले काले और लाल मश्दभाण्ड प्राप्त हुए है। इस प्रकार प्रमाणित हुआ है कि झाँसी अंचल प्रागैतिहासिक काल से मानव के आकर्षण का केन्द्र रहा है। इसका कारण यह था कि तत्कालीन मानव की मूलभूत आवश्यकताओं यथा जल, कंदमूल-फल और वन पशुओं की इस क्षेत्र में प्रचुरता थी। ताम्र पाषाणकाल में भी इसीलिए झाँसी के निकट एरच में मनुष्य ने निवास किया।

यह प्रदेश चेदि राष्ट्र में समाहित था। महाजनपद काल के प्रारंभ में यह अंवति महाजनपद में था। प्रतापी अवंति नरेश चण्डप्रद्योत के साम्राज्य का यह अंग था। नंदों और मौर्यों का अधिकार भी इस भू-भाग पर था। मौर्य शासनकाल में इस भू-भाग के राजनीतिक महत्व का संकेत अशोक के गुजर्रा (जिला दतिया) शिलालेख द्वारा मिलता है। युवराज के रूप में अशोक उज्जयिनी का राजूक था।

शुगों के शासनकाल में भी इस प्रदेश की राजनीतिक महत्ता बनी रही है। झाँसी के समीप स्थित एरच और चिरगांव में उत्तरीकृष्ण मर्जित मृदभाण्डों की प्राप्ति द्वारा भी मौर्य तथा मौर्योत्तर काल में इस क्षेत्र में मानव की विकसित संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। एरच में पायी गयी एक मुद्रा में लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का मुद्रालेख 'मृगमुख अंकित है। उक्त मुद्रा भी इस भू-भाग की राजनीतिक स्थिति की परिचायक है।

एरच में ही पहली शताब्दी ईसा पूर्व की ब्राह्मी लिपि में अभिलिखित इष्टिका अभिलेख प्राप्त हुआ है। उक्त अभिलेख में राजा दाममित्र का नाम दिया गया है। पहली शताब्दी ईसा पूर्व में दाममित्र इस क्षेत्र का शासक था। पहली शताब्दी ईस्वी के लगभग एरच झाँसी अंचल पर राजा अदितिमित्र की सत्ता थी। यह एरच में प्राप्त अदिति मित्र की मुद्रा द्वारा प्रमाणित हुआ है।

इनके अतिरिक्त, एरच के इष्टिका अभिलेखों द्वारा यह उजागर हुआ है कि पहली शताब्दी ईस्वी के लगभग इस भू-भाग पर शतानीक, मूल और आषाढ़ नामक शासकों का आधिपत्य था। संभवतः ये मित्रवंशी राजा रहे होंगे। पहली शताब्दी ईस्वी के अंतिम चरण में यह प्रदेश कुषाण शासक कनिष्क प्रथम के अधिकार क्षेत्र में था। एरच के अभिलेख से ज्ञात शतानीक, मूल और आषाढ़ नामक स्थानीय शासक संभवतः कुषाणों के अधीन थे।

अंघो अभिलेख तथा टालमी के विवरण से ज्ञात होता है कि 130 ईस्वी के लगभग चष्टन और उसके बाद रूद्रदामन प्रथम का उज्जैन पर अधिकार था। उसके पश्चात् दूसरी शताब्दी के अंतिम चरण में नागों ने इस प्रदेश को हस्तगत कर लिया। नागों की सम्प्रभुता का प्रमाण झाँसी जिले के एरच और बड़ागांव में प्राप्त नाग शासकों की मुद्राएँ हैं। एरण, विदिशा, उज्जैन, प‌द्मावती और कांतिपुरी जैसे नाग केन्द्र झाँसी के आसपास थे।

क्षत्रपों की अनेक मुद्राएं और मुहरें एरण उत्खनन में पायी गई है। समुद्रगुप्त ने नागों और शकों को पराजित कर उसे हस्तगत कर लिया।गुप्त सत्ता के प्रमाण इस क्षेत्र में उपलब्ध कलावशेष भी है। ललितपुर के गुप्त मंदिर और मूर्तियां तथा झांसी-बरुवासागर मार्ग पर झाँसी से 15 किलोमीटर दूर बेतवा नदी के तट पर स्थित पहाड़ी पर गुप्तकालीन मंदिर इस प्रमाण की पुष्टि करते हैं।

समुद्रगुप्त के पश्चात् उसके पुत्र रामगुप्त के अल्पकालीन शासन में शक क्षत्रपों का पुनः उत्कर्ष हुआ, किन्तु चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों का दमन कर 'शकारि' उपाधि धारण की। गुप्त शासनकाल में इस क्षेत्र का राजनीतिक स्थिरता के कारण बहुमुखी विकास हुआ। बुधगुप्त के समय सुरश्मिचन्द्र इस भू-भाग पर गुप्तों का सामंत राजा था। यह बुधगुप्त के एरण अभिलेख द्वारा सिद्ध हुआ है।

गुप्तों के पश्चात् छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में हूण शासक तोरमाण और मिहिरकुल का इस पर अधिकार हो गया। तोरमाण के आधिपत्य को सिद्ध करने वाला एक अभिलेख एरण में मिला है। मिहिरकुल ने एरण और ग्वालियर के मध्यवर्ती प्रदेश पर अधिकार कर लिया था। मिहिरकुल को नरसिंहगुप्त बालादित्य और यशोधर्मन ने पराजित किया था।गुप्तों के पश्चात् इस क्षेत्र पर किसी ब्राह्मण शासक का आधिपत्य था। यह हवेनसांग के विवरण से पता चलता है।

संभवतः वह ब्राह्मण शासक हर्ष के अधीन था। नवमी शताब्दी में गुर्जर प्रतीहारों के आधिपत्य के सूचक देवगढ़ से प्राप्त मिहिरभोज का और सीयडोणि (सीरोनखुर्द) से प्राप्त महेन्द्रपाल के अभिलेख हैं। कलावशेषों द्वारा भी प्रतीहारों की सम्प्रभुता का संकेत मिलता है। घंग के खजुराहों अभिलेख द्वारा दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस पर चंदेलों का अधि कार प्रमाणित हुआ है। झाँसी दुर्ग में पाये गये बारहवीं तेरहवीं शताब्दी के अभिलेखों में कीर्तिवर्मन और वीरवर्मन के उल्लेख द्वारा उस समय झाँसी पर चंदेलों का अधिकार ज्ञात हुआ है।

चंदेलों के पश्चात् खंगार और तत्पश्चात् बुंदेला इस भू-भाग में अधिपति हुए। बुंदेलों की प्रारंभिक राजधानी गढ़कुण्डार थी। ओरछा नगर की स्थापना का श्रेय भी बुंदेला राजा रूद्रप्रताप को ही जाता है। रुद्रप्रताप के पुत्र भारतीचन्द्र ने ओरछा को बुंदेलों की राजधानी बनाया। ओरछा के राजाओं में मधुकरशाह एवं वीरसिंह जूदेव प्रतापी हुए। वीरसिंह जू देव ने अनेक निर्माण कार्य सम्पन्न किये। अपनी राजधानी ओरछा के निकट झाँसी में भोज महल का निर्माण कराया। बाद में झाँसी किले में बुंदेलों ने गोसांइयों को दुर्गपति नियुक्त किया।

1742 के लगभग झाँसी मराठों के अधीन हो गया एवं यह मराठों की राजधानी के रूप में विकसित हुई। झाँसी में नियुक्त पेशवा के सूबेदार नारोशंकर को झाँसी के विकास का श्रेय है। यहां पराकोटा नारोशंकर ने निर्मित करवाया। 1762 के लगभग अवध के नवाब शुजाउ‌द्दौला ने झाँसी जीतकर मोहम्मद बशीर को नगर का फौजदार बनाया। किन्तु, 1766 में मल्हारराव होलकर ने झाँसी को जीतकर मराठों का आधिपत्य पुनः झाँसी पर स्थापित किया। 1854 के पश्चात् रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी पर लम्बे समय तक राज्य किया। तत्पश्चात् अंग्रेजों ने इस पर अपना अधिकार कर लिया।

लेख -
-डॉ. सुरेन्द्र चौरसिया
सागर

 

संदर्भः

1. मनोरमा ईयर बुक, 1990, कोट्टयम, पृ 553

2. झाँसी जिला गजेटियर, पश्. 344, उत्तम चरित्र, 82,162

3. झाँसी जिला गजेटियर, पृ. 1

4. पी.सी.पंत प्रीहिस्टोरिक उत्तरप्रदेश, पृ. 45,72,76

5. रूद्रकिशोर पाण्डेय झाँसी, 1990, ग्वालियर, पृ. 2,29

6 वही, पृ.2

7. वही, पृ.2

8. एस.डी. त्रिवेदीः बुन्देलखण्ड का पुरातत्व, झाँसी, 1984, पृ.97

9. रूद्रकिशोर पाण्डेयः पूर्वोल्लिखित, पृ.३

10. वही

11. वही, पृ.३

12. इंडियन आर्कियोलाजीः ए रिव्यू, 1965-66, पृ.11

13. एस.डी. त्रिवेदीः पूर्वोल्लिखित, पृ.32

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