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छिन्दवाड़ा का ऐतिहासिक गौरव: देवगढ़

छिन्दवाड़ा का ऐतिहासिक गौरव: देवगढ़


प्रस्तुत लेख मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा जिले के उस अनछुए इतिहास को उजागर करता है, जो गोण्ड राजवंश की प्रशासनिक कुशलता और सांस्कृतिक चेतना का गौरवशाली प्रतीक है। देवगढ़ साम्राज्य का वैभव न केवल उसके अभेद्य दुर्गों और जल प्रबन्धन प्रणालियों में निहित था, बल्कि उस सामंजस्य में भी था जिसने जनजातीय परम्पराओं और हिन्दू संस्कृति को एक सूत्र में पिरोया। जननायक बादल भोई के बलिदान से लेकर ब्रिटिश शासन के दमनकारी वन कानूनों के दुष्प्रभावों तक, यह लेख छिन्दवाड़ा के सामाजिक ताने-बाने को ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर परखता है। वर्तमान के राजनीतिक विमर्श और ऐतिहासिक सत्य के बीच का यह अन्वेषण पाठकों को अपनी जड़ों से पुनः जुड़ने की प्रेरणा देगा।


मध्य प्रदेश का छिन्दवाड़ा जिला केवल अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और सतपुड़ा की हरी-भरी वादियों के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह एक अत्यन्त समृद्ध और गौरवशाली इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। सतपुड़ा की दुर्गम पहाड़ियों और घने वनों के बीच फला-फूला गोण्ड साम्राज्य यहाँ की सामाजिक समरसता, सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवन्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। इस क्षेत्र की स्वाधीनता की वेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले जननायक बादल भोई का इतिहास आज भी यहाँ की मिट्टी में गूँजता है।

देवगढ़ किला: छिन्दवाड़ा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय गोण्ड राजवंश के उदय के साथ आरम्भ होता है। इस साम्राज्य का सबसे प्रमुख और सामरिक केन्द्र देवगढ़ का किला था। यह किला न केवल अपनी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए जाना जाता था, बल्कि अपनी उन्नत जल प्रबन्धन प्रणाली के कारण भी प्रसिद्ध था। ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्थानीय किंवदन्तियों के अनुसार, गोण्ड शासकों ने देवगढ़ किले और उसके आसपास के क्षेत्र में 900 कुओं और 800 बावड़ियों का निर्माण कराया था।

इतनी विशाल संख्या में जल संरचनाओं का होना यह दर्शाता है कि गोण्ड राजा अत्यन्त दूरदर्शी और प्रजावत्सल थे। उन्होंने पहाड़ी दुर्ग की ऊँचाई पर सेना और नागरिक आबादी की जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 'मोती टांका' जैसी गहरी बावड़ियों का निर्माण कराया था। यह आज भी शोधकर्ताओं के लिए कौतूहल का विषय है कि उस कालखण्ड में इतनी गहराई वाली बावड़ियाँ कैसे निर्मित की गईं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि तत्कालीन शासन व्यवस्था में जल संरक्षण और नागरिक सुविधाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी।

गोण्ड राजाओं की आस्था:  गोण्ड राजवंश का शासन काल सामाजिक और धार्मिक समरसता का चरमोत्कर्ष माना जाता है। यद्यपि गोण्ड राजाओं ने स्वयं को हिन्दू धर्म से अलग नहीं माना,साथ ही अपनी प्राचीन परंपरा आउट संस्कृति के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी। देवगढ़ के खण्डहरों में आज भी बिखरे हुए मन्दिर उनकी धार्मिक सहिष्णुता और सनातनी जड़ों की कहानी कहते हैं।

गोण्ड शासक देवाधिदेव महादेव के अनन्य भक्त थे। किले के समीप और साम्राज्य के विभिन्न अंचलों में स्थापित प्राचीन शिव मन्दिर उनकी अटूट आस्था के केन्द्र थे। वे महादेव को अपनी सुरक्षा का मुख्य आधार मानते थे। केवल भक्ति ही नहीं, बल्कि शक्ति की उपासना में भी उनकी गहरी निष्ठा थी। युद्ध और शक्ति के प्रतीक के रूप में गोण्ड राजाओं ने माता चण्डी और काली माँ की उपासना को विशेष महत्त्व दिया था। देवगढ़ किले के समीप स्थित माता चण्डी का मन्दिर आज भी जन आस्था का बहुत बड़ा केन्द्र है। राजा किसी भी सैन्य अभियान पर प्रस्थान करने से पूर्व माँ का आशीर्वाद लेना अनिवार्य समझते थे।


गोंड शासकों द्वारा बनाया गया चण्डी मंदिर

शुभ कार्यों की परम्परा में भी गोण्ड राजपरिवार हिन्दू रीति रिवाजों को पूरी तरह आत्मसात किए हुए था। भगवान गणेश की पूजा की परम्परा यहाँ रची बसी थी। किले के प्रवेश द्वारों और महलों के अवशेषों पर अंकित गणेश जी की प्रतिमाएँ यह सिद्ध करती हैं कि वे 'प्रथम पूज्य' की अवधारणा को मान्यता देते थे। इन मन्दिरों के संरक्षण और संचालन के लिए राजाओं ने राजस्व मुक्त भूमि दान दी थी, जो उनकी सांस्कृतिक उदारता को प्रमाणित करती है।

देवगढ़ और नागपुर के मध्य ऐतिहासिक सम्बन्ध भी हैं वर्तमान नागपुर शहर का आधुनिक स्वरूप वास्तव में देवगढ़ के गोण्ड राजाओं की ही देन है। राजा जाटबा के वंशज राजा बख्त बुलन्द शाह ने 17वीं शताब्दी के अन्त में नागपुर शहर की आधारशिला रखी थी। उन्होंने अपनी राजधानी को पहाड़ी दुर्ग देवगढ़ से हटाकर नागपुर स्थानान्तरित करने का निर्णय लिया क्योंकि व्यापार और कृषि की दृष्टि से नागपुर अधिक सुगम और सम्भावनाओं से पूर्ण था। इस प्रकार नागपुर, देवगढ़ साम्राज्य की शक्ति और समृद्धि का नया केन्द्र बनकर उभरा।

तत्कालीन छिन्दवाड़ा और जन जीवन का स्वरूप की बात करें तो  उस कालखण्ड में वर्तमान छिन्दवाड़ा का सम्पूर्ण भूभाग देवगढ़ साम्राज्य का अभिन्न हिस्सा था। यह क्षेत्र घने वनों और 'छिन्द' (खजूर प्रजाति के पेड़) के बागों से आच्छादित था। माना जाता है कि छिन्द के पेड़ों की इसी बहुतायत के कारण इस स्थान का नाम कालान्तर में 'छिन्दवाड़ा' पड़ा। यहाँ की जनता मुख्य रूप से कृषि और वनोपज पर निर्भर थी।

गोण्ड शासनकाल में 'जमीन्दारी' शोषण का वह क्रूर रूप विद्यमान नहीं था जो ब्रिटिश काल में देखा गया। समाज में गोण्ड, हिन्दू और अन्य समुदायों के बीच गहरा भ्रातृत्व भाव था। राजा को देवता तुल्य सम्मान प्राप्त था और सम्पूर्ण शासन व्यवस्था जन कल्याणकारी नीतियों पर आधारित थी। सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र सेना की आवाजाही और रसद आपूर्ति का मुख्य केन्द्र था।

जननायक बादल भोई ने फूंका यहाँ क्रान्ति का बिगुल । जब भारत में अंग्रेजी हुकूमत का आगमन हुआ और आदिवासियों का शोषण बढ़ा, तब बादल भोई ने क्रान्ति का शंखनाद किया। बादल भोई का व्यक्तित्व केवल एक जनजातीय नेता का नहीं था, बल्कि वे एक महान सामाजिक सुधारक भी थे। उन्होंने 1923 में हजारों आदिवासियों के साथ अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती दी।

उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहाँ अमानवीय यातनाओं के कारण उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। आज छिन्दवाड़ा का 'राज्य जनजातीय संग्रहालय' उनकी पावन स्मृति में निर्मित है। उनका संघर्ष जल, जंगल और जमीन के साथ मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए था।

आज के दौर में कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा जनजातीय इतिहास को लेकर एक भ्रामक विमर्श गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। राजनीतिक लाभ के लिए सनातन संस्कृति और गोण्ड समुदाय को एक दूसरे से अलग दिखाने की कोशिशें हो रही हैं। परन्तु ऐतिहासिक तथ्य इन दावों को पूरी तरह निराधार सिद्ध करते हैं। राजा जाटबा शाह जैसे महान गोण्ड राजाओं ने कभी स्वयं को सनातन संस्कृति से पृथक नहीं माना। उनके सिक्कों, राजकीय प्रतीकों और मन्दिरों के स्थापत्य में हिन्दू देवी देवताओं का अंकन इस अटूट सम्बन्ध का प्रमाण है।

वास्तव में, समाज में विभाजन और शोषण की सुनियोजित व्यवस्था ब्रिटिश हुकूमत की देन थी। अंग्रेजों ने 1853 में देवगढ़ नागपुर साम्राज्य को हड़प लिया और दमनकारी 'वन कानून' लागू किए। उन्होंने ही आदिवासियों के पारम्परिक अधिकारों को छीना और 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई।

छिन्दवाड़ा और देवगढ़ का इतिहास अद्वितीय सामाजिक समरसता और सुशासन का जीवन्त दस्तावेज है। बादल भोई का बलिदान हमें याद दिलाता है कि हमारा वास्तविक संघर्ष विदेशी शोषक ताकतों के विरुद्ध था, न कि अपने ही भाइयों के विरुद्ध। आज आवश्यकता है कि हम इस गौरवशाली इतिहास को उसकी समग्रता और सत्यता के साथ आने वाली पीढ़ियों के समक्ष रखें और उन विघटनकारी शक्तियों को नकारें जो समाज में विभाजन की दीवारें खड़ी करना चाहती हैं।

-श्री नकुल सारंग
(लेखक समाजसेवी एवं सक्रिय पत्रकार हैं, जो अपनी लेखनी के माध्यम से आंचलिक जन-समस्याओं और सामाजिक सरोकारों को प्रखरता से प्रस्तुत करते हैं।)

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