अजमेर की ऐतिहासिक हवेली द्वार
February 14, 2026
संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार
नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव
पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

राजस्थान के अजमेर नगर का प्राचीन नाम अजयमेरु है, जिसका अर्थ है—'जिसे जीता न जा सके'। ऊँचे पर्वत पर स्थित होने के कारण भी इसे अजयमेरु कहा जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, 12वीं शताब्दी में चौहान राजा अजयराज द्वारा इसकी स्थापना किए जाने के कारण इसका नाम अजमेर पड़ा। अजमेर जिस पठारी भाग पर स्थित है, वह भारत का सर्वोच्च मैदानी क्षेत्र है। यह नगर प्राचीन अरावली पर्वत श्रेणी की मध्य तलहटी में बसा हुआ है।

अजमेर का पहाड़ी द्श्य
डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार, प्राचीन काल में पुष्कर से लेकर हिमाचल तक का क्षेत्र 'अनन्त देश' कहलाता था; संभवतः कालांतर में इसी को अजमेर कहा गया। कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण इस नगर की प्राचीनता सिद्ध करते हैं। चौहान काल में यहाँ स्थापत्य कला चरम पर थी, जिसके साक्ष्य तत्कालीन भवनों, मंदिरों, स्तंभों और मूर्तियों में मिलते हैं।
चौहानों के पतन के पश्चात, सन् 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर को तुर्की साम्राज्य में मिला लिया। इसके बाद 1226 ई. में इल्तुतमिश ने इसे नागौर सूबे का हिस्सा बनाया। आगे चलकर यह नगर रणथंभौर के राजा हम्मीर और फिर मेवाड़ के महाराणाओं (1364 से 1448 ई.) के आधिपत्य में रहा। सन् 1557 से 1720 ई. तक अजमेर मुगल साम्राज्य के अधीन रहा। अकबर ने इसे मुगलकालीन भारत का सबसे बड़ा सूबा बनाया और शहर की सुरक्षा के लिए परकोटा व भव्य दरवाजों का निर्माण करवाया।
अकबर ने सुरक्षा की दृष्टि से परकोटे के समीप की पहाड़ियों पर निगरानी छतरियां बनवाईं। विशाल दरवाजों को 'प्रवेश द्वार' और छोटे द्वारों को 'मोखे' या 'मोरियां' (खिड़कियां) कहा जाता था, जिनका उपयोग युद्ध काल में शत्रु पर आक्रमण करने के लिए होता था। इस परकोटे का निर्माण चूना, मिट्टी, बजरी और पत्थर से किया गया है।
प्रमुख द्वार:
ऊसरी दरवाजा: यह केसरगंज में स्थित है। इसके ऊपरी भाग पर अरबी लिपि में "अल्लाहो अकबर" उत्कीर्ण है।
आगरा गेट: नया बाजार स्थित इस द्वार के अब केवल अवशेष (दोनों ओर की दीवारें) ही शेष हैं।
आगरा गेट
मदार गेट: मुगल सम्राट अकबर द्वारा 1570 ई. में निर्मित 'दौलतखाना' का यह मुख्य प्रवेश द्वार था। जून 1818 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा सूबेदार दौलतराव सिंधिया के मध्य संधि हुई, तब मराठा सेना इसी द्वार से बाहर गई थी।

मदार गेट
अलवर गेट: यह मेयो कॉलेज रोड पर स्थित है। 1875 में मेयो कॉलेज की स्थापना के समय अलवर के राजकुमार मंगल सिंह प्रथम विद्यार्थी थे, जिनकी स्मृति में इस द्वार का निर्माण कराया गया।
कोतवाली गेट: यह मैगजीन (वर्तमान संग्रहालय) का मुख्य द्वार है। मराठा काल में यहाँ कोतवाली होने के कारण इसका नामकरण हुआ।
अजमेर की शान: हवेलियों का वैभव
अजमेर में प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक वास्तुकला का सुंदर संगम है। यहाँ 'अढाई दिन का झोपड़ा' (6वीं-7वीं शताब्दी की प्राचीन संस्कृत पाठशाला) से लेकर इंडो-ब्रिटिश शैली की भव्य हवेलियाँ दृष्टव्य हैं। ब्रिटिश काल में सामरिक केंद्र होने के कारण विभिन्न रियासतों के राजाओं और ठिकानेदारों ने यहाँ अपनी कोठियाँ बनवाईं।
प्रमुख हवेलियाँ और कोठियाँ:
भिनाय कोठी (आगरा गेट): 18वीं शताब्दी में निर्मित इस भव्य कोठी में ही महर्षि दयानन्द सरस्वती का निर्वाण हुआ था। बाद में राजपरिवार ने इसे आर्य समाज को सुपुर्द कर दिया।
बांदनवाड़ा हवेली: नया बाज़ार में स्थित यह हवेली लगभग सौ वर्ष पुरानी है, जो अपनी सुरक्षात्मक बनावट के लिए जानी जाती है।
बाघसूरी हाउस: जयपुर रोड पर स्थित इस कोठी में पूर्व रक्षा सचिव श्री अजय विक्रम सिंह निवास करते थे।
मसूदा हाउस: वर्तमान में यहाँ CRPF केंद्र (प्रथम) स्थित है। स्वतंत्रता के पश्चात राजपरिवार ने यह भव्य इमारत सरकार को सौंप दी थी।
बदनौर हाउस: सिविल लाइंस स्थित इस कोठी का निर्माण बदनौर राजघराने के वंशजों द्वारा किया गया था।
खरवा हाउस: शास्त्री नगर में स्थित इस कोठी का निर्माण राव गोपाल सिंह खरवा के काल में आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ किया गया था।
दीवान साहब की हवेली: दरगाह से अन्दरकोट मार्ग पर स्थित यह लगभग 500 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक इमारत है।
मेहता जी की हवेली: लाखन कोठड़ी में स्थित इस हवेली का निर्माण लगभग 300 वर्ष पूर्व सेठ गम्भीमल मेहता ने करवाया था।
बम्बा कोठी एवं चन्दन निवास: लोढ़ा परिवार द्वारा निर्मित ये भवन अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध हैं। चन्दन निवास का निर्माण 1868-69 के दौरान हुआ था।
इसके अतिरिक्त मेयो कॉलेज परिसर में भरतपुर, कोटा, जोधपुर, अलवर और बीकानेर राजपरिवारों की भव्य कोठियाँ आज भी विद्यार्थियों के आवास के रूप में उपयोग की जा रही हैं।
लेखिका:
श्रीमती पुष्पा शर्मा (इतिहासकार)
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